रेडियो मास्टर साहब की कक्षा में सीख
रहे हैं स्कूल के बच्चे अंग्रेजी बोलना
एक साल पहले रेडियो के द्वारा सरकारी स्कूलों में बच्चों को अंग्रेजी सिखाने का प्रयास की शुरूआत की गई थी हालंकि उस समय तो इसको गंभीरता से नहीं लिये गया था पर आज उसके परिणाम सामने आने लगे हैं । मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के स्वामी विवेकानंद स्कूल में सुबह दस बजे छात्रों के समूह को रेडियो के सामने बिठाकर उनको अंग्रेजी सीखने का प्रोग्राम सुनाया जाता है उसी समय ये बच्चे रेडियो पर बोले गए वाक्यों को साथ में दोहराते हैं और कार्यक्रम खत्म होने के बाद सीखे गए वाक्यों को दोहराते हैं । इस अभ्यास से बच्चों को काफी फायदा मिल रहा है और अब ये बच्चे अंग्रेजी में दक्ष होते जा रहे हैं । अब ये बच्चे अंग्रेजी के वाक्यों को बहुत अच्छी तरह से बोल लेते हैं । विवेकानंद स्कूल के टीचर बताते हैं कि रेडियो को सुनते सुनते ये बच्चे आसानी से अंग्रेजी सीख रहे हैं और ये प्रोग्राम भी इतना मनोरंजक होता है । कि बच्चे इसे कभी भी छोड़ना नहीं चाहते हैं । वहीं बच्चों को कहना है कि रेडियो प्रोग्राम सुनते हुए सीखना उनको अच्छा लगता है उसमें ना तो डांट होती हे और नही कुछ कठिन शब्द होते हैं । पिछले साल चालू की गई इस योजना को अभी तो कक्षा छ: से शुरू किया जाता है पर आने वाले साल में इसको कक्षा पहली से ही प्रारंभ किया जाएगा । कक्षाओं का दृष्य बड़ा मज़ेदार होात है कक्षा टीचर की टेबल पर रेडियो मास्टर साहब को बिठाया जाता है और कक्षा टीचर पीछे खड़े होते हैं और फिर चालू होती है रेडियो गुरूजी की कक्षा । अच्छा प्रयोग है पर ये तो बड़ी मुश्किल है कि आने वाले टीचर्स डे पर ये बच्चे किसको फूल भेंट करेंगें टीचर को या रेडियो को ।
साभार : subeerindia.blogspot.com
Thursday, January 31, 2008
Thursday, January 24, 2008

Thursday, 24 January, 2008
इस रिपोर्ट को पढ़कर मुझेऔर मेरे जैसे कई लोगों को थोड़ा दुख हो सकता है। समाज सेवा और इससे जुड़े लोगों की मैं बहुत इज्जत करता हूं लेकिन आज जब जनपथ पर यह रिपोर्ट पढ़ा तो कैलाश सत्यार्थी से पहली मुलाकात याद आ गई । उनसे पहली बार मैं जयपुर में एक कार्यक्रम में मिला था। दी संडे इंडियन के एक पत्रकार ने एक स्टोरी की है जो मशहूर बचपन बचाओ आंदोलन के बारे में है...पता चला है कि इस स्टोरी पर संस्था के प्रमुख कैलाश सत्यार्थी द्वारा उन्हें जान से लेकर नौकरी से निकलवाने तक की धमकियां दी जा रही हैं। अब इस रिपोर्ट को पढकर आपकी अपनी राय जरुर दें ताकि कैलाश सत्यार्थी और इन जैसे समाज सेवा के ठेकेदारों को पता चले कि जनता आपके बारें क्या सोचती है।
इस रिपोर्ट को पढ़कर मुझेऔर मेरे जैसे कई लोगों को थोड़ा दुख हो सकता है। समाज सेवा और इससे जुड़े लोगों की मैं बहुत इज्जत करता हूं लेकिन आज जब जनपथ पर यह रिपोर्ट पढ़ा तो कैलाश सत्यार्थी से पहली मुलाकात याद आ गई । उनसे पहली बार मैं जयपुर में एक कार्यक्रम में मिला था। दी संडे इंडियन के एक पत्रकार ने एक स्टोरी की है जो मशहूर बचपन बचाओ आंदोलन के बारे में है...पता चला है कि इस स्टोरी पर संस्था के प्रमुख कैलाश सत्यार्थी द्वारा उन्हें जान से लेकर नौकरी से निकलवाने तक की धमकियां दी जा रही हैं। अब इस रिपोर्ट को पढकर आपकी अपनी राय जरुर दें ताकि कैलाश सत्यार्थी और इन जैसे समाज सेवा के ठेकेदारों को पता चले कि जनता आपके बारें क्या सोचती है।
महान शुरुआत आखिरकार लड़खड़ाने को अभिशप्त होती है। प्रत्येक महान यात्रा कहीं-न-कहीं तो समाप्त होती ही है। -संत ऑगस्तीन
भारत के संदर्भ में भी यह बात नई नहीं है, बात आप चाहे जिस भी क्षेत्र की कर लें. यही बात समाज की सेवा के महान उद्देश्य और परोपकार के महान धर्म को ध्यान में रखकर शुरु हुई गैर-सरकारी, सामाजिक या फिर स्वयंसेवी संगठनों के साथ भी लागू होती है. जो विचारक या निर्देशक इनकी शुरुआत करता है. ताजा मामले की बात हम बचपन बचाओ आंदोलन, ग्लोबल मार्च या असोशिएशन फॉर वोलंटरी एक्शन(आवा) से कर सकते हैं. ये तीन नाम इस वजह से क्योंकि इन संस्थाओं का ढांचा ही ऐसा है. सारे एक-दूजे से जुड़े और अलग भी. ऊपर से इस मामले के पेंचोखम इतने कि आम आदमी तो उनको समझने में ही तमाम हो जाए या उसे यह शेर याद आ जाए- जो उलझी थी कभी आदम के हाथों, वो गुत्थी आज तक सुलझा रहा हूं. बहरहाल, मामला अभी टटका और ताजा है. इस पूरे मसले में तमाम नामचीन शख्सियतें उलझीं हैं और साथ ही मीडिया भी अपना अमला पसारे है. पूरे फसाद की जड़ में है दिल्ली-हरियाणा सीमा पर स्थित इब्राहिमपुर में मौजूद बालिका मुक्ति आश्रम. कभी हमसफर रहे दो लोग ही अब एक-दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोले बैठे हैं. तलवारें तन चुकी हैं, बखिया उधेड़ी जा रही है, आरोप-प्रत्यारोप लगाए जा रहे हैं और दोनों ही खेमे एक-दूजे के चरित्र हनन पर आमादा हैं. बहरहाल, मामले को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाकर इस पूरे घटनाक्रम का इतिहास जानना होगा. बालश्रम को खत्म करने और बंधुआ मजदूरों को बचाने के पवित्र उद्देश्य को ध्यान में रखकर दो महानुभाव इकट्ठा हुए. ये दोनों ही आज काफी नामचीन हैं-स्वामी अग्निवेश और कैलाश सत्यार्थी. 80 के दशक में शुरु हुआ यह सफर काफी मशहूर हुआ और सफल भी. इसका नाम फिलहाल बचपन बचाओ आंदोलन है, पर इसकी शुरुआत बंधुआ मुक्ति मोर्चा ने की थी और उस वक्त संस्था के तौर पर साउथ एशियन कोलिशन अगेंस्ट चाइल्ड सर्विटयूड (साक्स) का निर्माण किया गया. इसमें पेंच केवल एक आया, जब 93-94 में स्वामी अग्निवेश इस आंदोलन से अलग हो गए. बहरहाल स्वामी अग्निवेश से इस मसले पर जब पड़ताल की गई, तो उन्होंने कुछ ऐसा बयान दिया, ''देखिए, असल में बंधुआ मुक्ति मोर्चा(बीएमएम) ने ही इस पूरे आंदोलन की शुरुआत की थी. आप जो आश्रम देखकर आ रहे हैं, वह भी असल में बीएमएम का ही बनाया हुआ था. बाद में मुझे महसूस हुआ कि कैलाश जी उसका और भी कोई इस्तेमाल करना चाह रहे हैं. उसी समय हम दोनों में कुछ बातचीत हुई और मैंने अलग होने का फैसला कर लिया. '' खैर, अब आते हैं तात्कालिक मसले पर. फिलहाल विवाद की जड़ में है बालिका मुक्ति आश्रम और कभी कैलाश सत्यार्थी की करीबी सहयोगी और इसकी संचालिका रहीं सुमन ही खम ठोंककर मैदान में आ खड़ी हुई हैं. लाखों रुपए मूल्य की यह संपत्ति किसी व्यक्ति ने संस्था को दी थी और शायद यही वजह है-तलवारें खिंचने की. मामला तब सुर्खियों में आया, जब पिछले महीने मीडिया में यहां की कुछ लड़कियों के यौन-शोषण की खबरें आईं. वे लड़कियां उत्तर प्रदेश के सोनभद्र से लाई गईं थीं और आश्रम में रह रही थीं. बच्चियों ने मसाज करवाने की बात भी स्वीकारी. साथ ही सुमन और संगीता मिंज(फिलहाल आश्रम की केयरटेकर) पर तो दलाली के भी आरोप लगे. बचपन बचाओ आंदोलन (बीबीए) के राष्ट्रीय महासचिव राकेश सेंगर इसे कुछ ऐसे बयान करते हैं, ''देखिए, हम व्यक्तिगत आरोप नहीं लगाना चाहते, लेकिन आप रांची जाकर पता करें तो इनके खिलाफ कई मामले दर्ज पाएंगे. उन पर तो एफसीआरए के तहत भी आंतरिक कार्रवाई चल रही है. उन्होंने 2004 में अपनी एक अलग संस्था द चाइल्ड ट्रस्ट बनाई और संस्था की संपत्ति को निजी तौर पर इस्तेमाल किया. अपने लिए गाड़ी खरीदी और कई सारी वित्तीय अनियमितताएं की. हमारे पास सारे जरूरी कागजात हैं और आप उनको देक सकते हैं. '' हालांकि सुमन का इस मसले पर कुछ और ही कहना है. वह कहती हैं, ''ये सारे आरोप निराधार और बेबुनियाद हैं. मैं किसी भी जांच के लिए तैयार हूं. दरअसल यह सारा कुछ आश्रम पर कब्जा करने को लेकर है. उन्होंने तो मेरे कमरे को भी हथिया लिया और मेरे सामान को उठा लिया. आप खुद जाकर देख सकते हैं कि आश्रम में सुरक्षा के लिए हमें पुलिस से गुहार करनी पड़ी है. कैलाश जी ने संस्था में अपनी बीवी और बेटे को स्थापित कर यह सारा झमेला खड़ा किया है. अगर मैं इतनी ही बुरी थी तो 22 सालों तक ये चुप क्यों रहे और मुझे बर्दाश्त क्यों करते रहे?'' खैर, अब जरा पीछे की ओर लौट कर इस पूरे विवाद की जड़ देखें. साक्स से बीबीए की यात्रा में कई पड़ाव आए. संस्था जैसे-जैसे बढ़ती गई, विवाद भी गहराते गए. आखिरकार 2004 में यह तय किया गया कि आवा एक मातृसंस्था रह जाएगी और इसके बैनर तले सेव द चाइल्डहुड फाउंडेशन, बाल आश्रम ट्रस्ट, ग्लोबल मार्च अगेंस्ट चाइल्ड लेबर और द चाइल्ड ट्रस्ट बनाए जाएंगे. यही से पूरा बवाल शुरु हुआ. सुमन का कहना है, ''आप खुद देख सकते हैं कि कैलाश जी ने किस तरह अपने प्रभाव का दुरुपयोग किया. अपनी पत्नी को तो उन्होंने सेव द चाइल्डहुड...का अध्यक्ष बना दिया, तो बेटे को बाल आश्रम...का. ग्लोबल मार्च...के तो वह खुद ही मुख्तार हैं. इसके अलावा उनकी पत्नी के ट्रस्ट में ही उन्होंने सारे संसाधनों का रुख कर दिया. यही सब विवाद की जड़ में है. '' हालांकि इस संवाददाता ने जब बीबीए के वर्तमान अध्यक्ष रमेश गुप्ता से बात की, तो उनका कुछ और ही कहना था. वह बताते हैं, ''हमने तो सुमन को हमेशा ही सम्मान दिया है. लेकिन जब उसकी हरकतें नाकाबिले-बर्दाश्त हो गई तो हमें मामले को उजागर करना ही पड़ा. हमने तो उसे एक खुला पत्र भी लिखा है, उससे आप सारी बातें जान सकते हैं. उसने एक भी निर्णय का सम्मान नहीं किया. कभी भी वित्तीय पारदर्शिता नहीं दिखाई और आवा के संसाधनों का दुरुपयोग कर अपनी खुद की संस्था को पालती-पोसती रही. खुद को तो उसने जैहादी के तौर पर प्रोजेक्ट कर दिया, लेकिन बाकी साथियों का नाम भी नहीं लिया. यह सचमुच अफसोसनाक है. '' राकेश सेंगर तो उनसे भी एक कदम आगे बढ़कर आरोप लगाते हैं कि जबरिया निकालने वगैरह की बात बिल्कुल बेबुनियाद है. बाल आश्रम की लीज तो वैसे भी 31 दिसंबर को खत्म हो रही थी. फिर इस्तीफा भी उनसे जबरन नहीं लिया गया. जब उन्होंने संस्था छोड़ दी तो फिर वैसे ही आश्रम में उनके बने रहने की कोई तुक नहीं थी. जहां तक उनके कमरे से कुछ लेने की बात है, तो यह तो बिल्कुल अनर्गल प्रलाप है. आप खुद ही बताएं किसी स्वयंसेवी संस्था में काम करनेवाली महिला के पास 2 किलो सोना कहां से आ गया? हालांकि, कैलाश सत्यार्थी इस पूरे विवाद से पल्ला झाड़ लेते हैं. वह कहते हैं, ''भई, मेरा तो न बाल आश्रम और न ही बालिका आश्रम से कोई लेना-देना है. वहां से तो मैं डेढ़ साल पहले ही अलग हो गया था. आप मुझसे ग्लोबल मार्च के बारे में पूछें तो कुछ बता सकता हूं.'' हालांकि अपने परिवार के बारे में पूछने पर वह बिफर पड़े. इस संवाददाता को धमकी भरे लहजे में कैलाश जी ने कहा, ''अगर मेरा बेटा या पत्नी किसी संस्था का नेतृत्व करने लायक हैं तो इसमें गलत क्या है? वैसे भी वे दूसरे संस्थानों से जुड़े हैं. आप बेबुनियाद बातें न करें, वरना आपका करियर भी खतरे में पड़ सकता है. '' हालांकि इसके ठीक उलट राकेश सेंगर का कहना है कि अगर कैलाश जी के बेटे की बात साबित हो जाए तो वह सामाजिक जीवन ही छोड़ देंगे. बहरहाल, आरोपों की इस झड़ी में नुकसान सबसे ज्यादा तो उन बच्चों का हो रहा है, जिनका जीवन सुधारने के मकसद से इस आंदोलन की शुरुआत हुई है. साथ ही कुछ सवाल ऐसे हैं, जिनके जवाब खोजने होंगे. मसलन, वे लड़कियां अब कहां हैं, जिन्होंने मीडिया के सामने आकर मसाज की बात कबूल की थी? फिर मीडिया पर भी कुछ उंगलियां उठेंगी. जैसे, क्या हरेक रिपोर्टर ने इब्राहिमपुर जाकर पड़ताल की थी? जब यह संवाददाता बालिका आश्रम में पहुंचा, तो नजारा कुछ और ही था. वहां बाकायदा सारे काम सामान्य तौर पर ही हो रहे थे. फिलहाल वहां 25 बच्चियां हैं. जिसमें से चार वयस्क हैं. वहां सात-आठ बच्चियों के अभिभावक भी थे. जब हमने बच्चियों से बात की तो उन्होंने सारी बातों से इंकार किया. उनके अभिभावकों ने भी सुर में सुर मिलाते हुए आश्रम के काम की तारीफ ही की. जब उनसे पूछा गया कि क्या उन पर किसी तरह का दबाव है, तो उन्होंने नकारात्मक जवाब दिया. वहां की एक कर्मचारी बबली ने बताया, ''मीडिया ने एकतरफा रपटें छापी और दिखाई है. हमारा पक्ष किसी ने जानने की भी कोशिश नहीं की. आप खुद बताएं अगर यहां मसाज जैसे काम होते रहे हैं, तो क्या दूसरे लोग भी अपराधी नहीं सिध्द होते? फिर महिला आयोग ने जिन बच्चियों को निर्मल छाया भेजा, आप खुद उनके कागजात देख सकते हैं. उनके साथ उनके अभिभावकों ने भी अपनी सहमति से जाने की बात लिख कर दी है. यहां आप खुद आए, तो हालात आपके सामने हैं.'' बहरहाल, जब इस संवाददाता ने बाल आश्रम जाकर चीजें देखने का फैसला किया, तो उसे अंदर घुसने की अनुमति नहीं दी गई. सवाल कई हैं, जवाब अधूरे या मुकम्मल नहीं हैं. वैसे, यह कहानी किसी एक गैर-सरकारी संगठन की नहीं है. बटरफ्लाई नाम की एक संस्था में भी एक कर्मचारी के यौन-शोषण का मामला सामने आया है. साथ ही वहां अचानक कई कर्मचारियों की बर्खास्तगी भी विवाद का विषय है. इसी तरह ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क नाम की संस्था में एक महिला कर्मी के यौन-शोषण का मामला सामने आया है. इसी तरह जंगपुरा में (जो दिल्ली की महंगी जगहों में से एक है) भी करोड़ों रुपए की संपत्ति को लेकर एक संस्था में खींचतान जारी है. यहां विलियम केरी स्टडी एंड रिसर्च सेंटर और क्रिश्चियन इंस्टीटयूट फॉर स्टडी एंड रिलीजन के बीच तलवारें खिंची हैं. हालांकि दोनों संस्थाएं मूल रूप से एक ही हैं और एक ही व्यक्ति इनका जनक भी था. मामला यहां भी संपत्ति का ही है.बहरहाल, तालाब की सारी मछलियां गंदी ही नहीं, पर ऐसे उदाहरण इस क्षेत्र के महान उद्देश्य पर सवालिया निशान तो खड़ा कर ही देते हैं. यक्ष प्रश्न तो बचा ही रहता है, क्या ये स्वयंसेवी संगठन अपने मूल की ओर वापस लौटेंगे? क्या लोगों के कल्याण हेतु बनी संस्थाएं उसी काम में लगेंगी? या फिर, यह सिरफुटव्वल जारी रहेगी? (साभार - दी संडे इंडियन)
भारत के संदर्भ में भी यह बात नई नहीं है, बात आप चाहे जिस भी क्षेत्र की कर लें. यही बात समाज की सेवा के महान उद्देश्य और परोपकार के महान धर्म को ध्यान में रखकर शुरु हुई गैर-सरकारी, सामाजिक या फिर स्वयंसेवी संगठनों के साथ भी लागू होती है. जो विचारक या निर्देशक इनकी शुरुआत करता है. ताजा मामले की बात हम बचपन बचाओ आंदोलन, ग्लोबल मार्च या असोशिएशन फॉर वोलंटरी एक्शन(आवा) से कर सकते हैं. ये तीन नाम इस वजह से क्योंकि इन संस्थाओं का ढांचा ही ऐसा है. सारे एक-दूजे से जुड़े और अलग भी. ऊपर से इस मामले के पेंचोखम इतने कि आम आदमी तो उनको समझने में ही तमाम हो जाए या उसे यह शेर याद आ जाए- जो उलझी थी कभी आदम के हाथों, वो गुत्थी आज तक सुलझा रहा हूं. बहरहाल, मामला अभी टटका और ताजा है. इस पूरे मसले में तमाम नामचीन शख्सियतें उलझीं हैं और साथ ही मीडिया भी अपना अमला पसारे है. पूरे फसाद की जड़ में है दिल्ली-हरियाणा सीमा पर स्थित इब्राहिमपुर में मौजूद बालिका मुक्ति आश्रम. कभी हमसफर रहे दो लोग ही अब एक-दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोले बैठे हैं. तलवारें तन चुकी हैं, बखिया उधेड़ी जा रही है, आरोप-प्रत्यारोप लगाए जा रहे हैं और दोनों ही खेमे एक-दूजे के चरित्र हनन पर आमादा हैं. बहरहाल, मामले को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाकर इस पूरे घटनाक्रम का इतिहास जानना होगा. बालश्रम को खत्म करने और बंधुआ मजदूरों को बचाने के पवित्र उद्देश्य को ध्यान में रखकर दो महानुभाव इकट्ठा हुए. ये दोनों ही आज काफी नामचीन हैं-स्वामी अग्निवेश और कैलाश सत्यार्थी. 80 के दशक में शुरु हुआ यह सफर काफी मशहूर हुआ और सफल भी. इसका नाम फिलहाल बचपन बचाओ आंदोलन है, पर इसकी शुरुआत बंधुआ मुक्ति मोर्चा ने की थी और उस वक्त संस्था के तौर पर साउथ एशियन कोलिशन अगेंस्ट चाइल्ड सर्विटयूड (साक्स) का निर्माण किया गया. इसमें पेंच केवल एक आया, जब 93-94 में स्वामी अग्निवेश इस आंदोलन से अलग हो गए. बहरहाल स्वामी अग्निवेश से इस मसले पर जब पड़ताल की गई, तो उन्होंने कुछ ऐसा बयान दिया, ''देखिए, असल में बंधुआ मुक्ति मोर्चा(बीएमएम) ने ही इस पूरे आंदोलन की शुरुआत की थी. आप जो आश्रम देखकर आ रहे हैं, वह भी असल में बीएमएम का ही बनाया हुआ था. बाद में मुझे महसूस हुआ कि कैलाश जी उसका और भी कोई इस्तेमाल करना चाह रहे हैं. उसी समय हम दोनों में कुछ बातचीत हुई और मैंने अलग होने का फैसला कर लिया. '' खैर, अब आते हैं तात्कालिक मसले पर. फिलहाल विवाद की जड़ में है बालिका मुक्ति आश्रम और कभी कैलाश सत्यार्थी की करीबी सहयोगी और इसकी संचालिका रहीं सुमन ही खम ठोंककर मैदान में आ खड़ी हुई हैं. लाखों रुपए मूल्य की यह संपत्ति किसी व्यक्ति ने संस्था को दी थी और शायद यही वजह है-तलवारें खिंचने की. मामला तब सुर्खियों में आया, जब पिछले महीने मीडिया में यहां की कुछ लड़कियों के यौन-शोषण की खबरें आईं. वे लड़कियां उत्तर प्रदेश के सोनभद्र से लाई गईं थीं और आश्रम में रह रही थीं. बच्चियों ने मसाज करवाने की बात भी स्वीकारी. साथ ही सुमन और संगीता मिंज(फिलहाल आश्रम की केयरटेकर) पर तो दलाली के भी आरोप लगे. बचपन बचाओ आंदोलन (बीबीए) के राष्ट्रीय महासचिव राकेश सेंगर इसे कुछ ऐसे बयान करते हैं, ''देखिए, हम व्यक्तिगत आरोप नहीं लगाना चाहते, लेकिन आप रांची जाकर पता करें तो इनके खिलाफ कई मामले दर्ज पाएंगे. उन पर तो एफसीआरए के तहत भी आंतरिक कार्रवाई चल रही है. उन्होंने 2004 में अपनी एक अलग संस्था द चाइल्ड ट्रस्ट बनाई और संस्था की संपत्ति को निजी तौर पर इस्तेमाल किया. अपने लिए गाड़ी खरीदी और कई सारी वित्तीय अनियमितताएं की. हमारे पास सारे जरूरी कागजात हैं और आप उनको देक सकते हैं. '' हालांकि सुमन का इस मसले पर कुछ और ही कहना है. वह कहती हैं, ''ये सारे आरोप निराधार और बेबुनियाद हैं. मैं किसी भी जांच के लिए तैयार हूं. दरअसल यह सारा कुछ आश्रम पर कब्जा करने को लेकर है. उन्होंने तो मेरे कमरे को भी हथिया लिया और मेरे सामान को उठा लिया. आप खुद जाकर देख सकते हैं कि आश्रम में सुरक्षा के लिए हमें पुलिस से गुहार करनी पड़ी है. कैलाश जी ने संस्था में अपनी बीवी और बेटे को स्थापित कर यह सारा झमेला खड़ा किया है. अगर मैं इतनी ही बुरी थी तो 22 सालों तक ये चुप क्यों रहे और मुझे बर्दाश्त क्यों करते रहे?'' खैर, अब जरा पीछे की ओर लौट कर इस पूरे विवाद की जड़ देखें. साक्स से बीबीए की यात्रा में कई पड़ाव आए. संस्था जैसे-जैसे बढ़ती गई, विवाद भी गहराते गए. आखिरकार 2004 में यह तय किया गया कि आवा एक मातृसंस्था रह जाएगी और इसके बैनर तले सेव द चाइल्डहुड फाउंडेशन, बाल आश्रम ट्रस्ट, ग्लोबल मार्च अगेंस्ट चाइल्ड लेबर और द चाइल्ड ट्रस्ट बनाए जाएंगे. यही से पूरा बवाल शुरु हुआ. सुमन का कहना है, ''आप खुद देख सकते हैं कि कैलाश जी ने किस तरह अपने प्रभाव का दुरुपयोग किया. अपनी पत्नी को तो उन्होंने सेव द चाइल्डहुड...का अध्यक्ष बना दिया, तो बेटे को बाल आश्रम...का. ग्लोबल मार्च...के तो वह खुद ही मुख्तार हैं. इसके अलावा उनकी पत्नी के ट्रस्ट में ही उन्होंने सारे संसाधनों का रुख कर दिया. यही सब विवाद की जड़ में है. '' हालांकि इस संवाददाता ने जब बीबीए के वर्तमान अध्यक्ष रमेश गुप्ता से बात की, तो उनका कुछ और ही कहना था. वह बताते हैं, ''हमने तो सुमन को हमेशा ही सम्मान दिया है. लेकिन जब उसकी हरकतें नाकाबिले-बर्दाश्त हो गई तो हमें मामले को उजागर करना ही पड़ा. हमने तो उसे एक खुला पत्र भी लिखा है, उससे आप सारी बातें जान सकते हैं. उसने एक भी निर्णय का सम्मान नहीं किया. कभी भी वित्तीय पारदर्शिता नहीं दिखाई और आवा के संसाधनों का दुरुपयोग कर अपनी खुद की संस्था को पालती-पोसती रही. खुद को तो उसने जैहादी के तौर पर प्रोजेक्ट कर दिया, लेकिन बाकी साथियों का नाम भी नहीं लिया. यह सचमुच अफसोसनाक है. '' राकेश सेंगर तो उनसे भी एक कदम आगे बढ़कर आरोप लगाते हैं कि जबरिया निकालने वगैरह की बात बिल्कुल बेबुनियाद है. बाल आश्रम की लीज तो वैसे भी 31 दिसंबर को खत्म हो रही थी. फिर इस्तीफा भी उनसे जबरन नहीं लिया गया. जब उन्होंने संस्था छोड़ दी तो फिर वैसे ही आश्रम में उनके बने रहने की कोई तुक नहीं थी. जहां तक उनके कमरे से कुछ लेने की बात है, तो यह तो बिल्कुल अनर्गल प्रलाप है. आप खुद ही बताएं किसी स्वयंसेवी संस्था में काम करनेवाली महिला के पास 2 किलो सोना कहां से आ गया? हालांकि, कैलाश सत्यार्थी इस पूरे विवाद से पल्ला झाड़ लेते हैं. वह कहते हैं, ''भई, मेरा तो न बाल आश्रम और न ही बालिका आश्रम से कोई लेना-देना है. वहां से तो मैं डेढ़ साल पहले ही अलग हो गया था. आप मुझसे ग्लोबल मार्च के बारे में पूछें तो कुछ बता सकता हूं.'' हालांकि अपने परिवार के बारे में पूछने पर वह बिफर पड़े. इस संवाददाता को धमकी भरे लहजे में कैलाश जी ने कहा, ''अगर मेरा बेटा या पत्नी किसी संस्था का नेतृत्व करने लायक हैं तो इसमें गलत क्या है? वैसे भी वे दूसरे संस्थानों से जुड़े हैं. आप बेबुनियाद बातें न करें, वरना आपका करियर भी खतरे में पड़ सकता है. '' हालांकि इसके ठीक उलट राकेश सेंगर का कहना है कि अगर कैलाश जी के बेटे की बात साबित हो जाए तो वह सामाजिक जीवन ही छोड़ देंगे. बहरहाल, आरोपों की इस झड़ी में नुकसान सबसे ज्यादा तो उन बच्चों का हो रहा है, जिनका जीवन सुधारने के मकसद से इस आंदोलन की शुरुआत हुई है. साथ ही कुछ सवाल ऐसे हैं, जिनके जवाब खोजने होंगे. मसलन, वे लड़कियां अब कहां हैं, जिन्होंने मीडिया के सामने आकर मसाज की बात कबूल की थी? फिर मीडिया पर भी कुछ उंगलियां उठेंगी. जैसे, क्या हरेक रिपोर्टर ने इब्राहिमपुर जाकर पड़ताल की थी? जब यह संवाददाता बालिका आश्रम में पहुंचा, तो नजारा कुछ और ही था. वहां बाकायदा सारे काम सामान्य तौर पर ही हो रहे थे. फिलहाल वहां 25 बच्चियां हैं. जिसमें से चार वयस्क हैं. वहां सात-आठ बच्चियों के अभिभावक भी थे. जब हमने बच्चियों से बात की तो उन्होंने सारी बातों से इंकार किया. उनके अभिभावकों ने भी सुर में सुर मिलाते हुए आश्रम के काम की तारीफ ही की. जब उनसे पूछा गया कि क्या उन पर किसी तरह का दबाव है, तो उन्होंने नकारात्मक जवाब दिया. वहां की एक कर्मचारी बबली ने बताया, ''मीडिया ने एकतरफा रपटें छापी और दिखाई है. हमारा पक्ष किसी ने जानने की भी कोशिश नहीं की. आप खुद बताएं अगर यहां मसाज जैसे काम होते रहे हैं, तो क्या दूसरे लोग भी अपराधी नहीं सिध्द होते? फिर महिला आयोग ने जिन बच्चियों को निर्मल छाया भेजा, आप खुद उनके कागजात देख सकते हैं. उनके साथ उनके अभिभावकों ने भी अपनी सहमति से जाने की बात लिख कर दी है. यहां आप खुद आए, तो हालात आपके सामने हैं.'' बहरहाल, जब इस संवाददाता ने बाल आश्रम जाकर चीजें देखने का फैसला किया, तो उसे अंदर घुसने की अनुमति नहीं दी गई. सवाल कई हैं, जवाब अधूरे या मुकम्मल नहीं हैं. वैसे, यह कहानी किसी एक गैर-सरकारी संगठन की नहीं है. बटरफ्लाई नाम की एक संस्था में भी एक कर्मचारी के यौन-शोषण का मामला सामने आया है. साथ ही वहां अचानक कई कर्मचारियों की बर्खास्तगी भी विवाद का विषय है. इसी तरह ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क नाम की संस्था में एक महिला कर्मी के यौन-शोषण का मामला सामने आया है. इसी तरह जंगपुरा में (जो दिल्ली की महंगी जगहों में से एक है) भी करोड़ों रुपए की संपत्ति को लेकर एक संस्था में खींचतान जारी है. यहां विलियम केरी स्टडी एंड रिसर्च सेंटर और क्रिश्चियन इंस्टीटयूट फॉर स्टडी एंड रिलीजन के बीच तलवारें खिंची हैं. हालांकि दोनों संस्थाएं मूल रूप से एक ही हैं और एक ही व्यक्ति इनका जनक भी था. मामला यहां भी संपत्ति का ही है.बहरहाल, तालाब की सारी मछलियां गंदी ही नहीं, पर ऐसे उदाहरण इस क्षेत्र के महान उद्देश्य पर सवालिया निशान तो खड़ा कर ही देते हैं. यक्ष प्रश्न तो बचा ही रहता है, क्या ये स्वयंसेवी संगठन अपने मूल की ओर वापस लौटेंगे? क्या लोगों के कल्याण हेतु बनी संस्थाएं उसी काम में लगेंगी? या फिर, यह सिरफुटव्वल जारी रहेगी? (साभार - दी संडे इंडियन)
Wednesday, January 23, 2008

पिछड़ने लगा कश्मीर का सेब
Jan 23, 01:46 am
जम्मू, जागरण संवाददाता : कश्मीर का सेब अव्वल दर्जे का माना जाता है। मगर अब हिमाचल प्रदेश ने मार्केट में पैर जमाना शुरू कर दिए हैं। इससे कश्मीर के सेबों को धक्का लग रहा है। मंगलवार को विधान परिषद में बजट सत्र पर बहस के दौरान पी. नमग्याल ने हालांकि पेश हुए बजट की प्रशंसा की मगर साथ ही साथ सरकार को सुझाव दिए कि वह सेबों की ग्रेडिंग सुधारने व स्टोरेज व्यवस्था की ओर ध्यान दे। उन्होंने कहा कि हिमाचल के सेब के कारण कश्मीर का सेब मार्केट से हट रहा है। उन्होंने कहा कि प्रदेश में सेबों के मामले में ट्रेडिंग सिस्टम ठीक नहीं है। यहा पर वैज्ञानिक तकनीक नहीं अपनाई जाती। साथ ही साथ सेबों की ग्रेडिंग सही तौर से नहीं होती। नमग्याल ने कहा कि सेबों के मामले में ग्रेडिंग की तरफ ध्यान देना होगा। साथ ही साथ स्टोरेज के लिए सरकार को व्यवस्था करनी होगी। ऐसे में रास्ता बंद होने से कश्मीर का सेब सुरक्षित रहेगा। उन्होंने साथ ही साथ सरकार से कहा कि फिशरी व पोल्ट्री में भी प्रदेश में अच्छा स्कोप है। इस दिशा में काम होना चाहिए।
इसी बीच मोहम्मद रशीद कुरेशी ने सरकार द्वारा बजट में किए गए तमाम दावों को खोखला करार दिया व कहा कि यह मात्र आंकड़ों का ही मायाजाल है। हकीकत में स्थिति कुछ और है। उन्होंने कहा कि आम आदमी के लिए बजट में कुछ नहीं रखा गया है।
साभार : जागरण
विवेकानंद समूह बीमा योजना चढ़ी लापरवाही की भेंट
Jan 23, 02:43 am
इंदौर। राज्य शासन की महत्वाकांक्षी विवेकानंद समूह बीमा योजना इंदौर जिले में लालफीताशाही में उलझकर रह गई है। अफसरों के लापरवाही के दांव में केवल नौ गरीब परिवारों को ही सुरक्षा की छांव मिल सकी है। गरीबी रेखा (बीपीएल) के नीचे जीवनयापन करने वाले परिवारों को आर्थिक सुरक्षा का कवच देने का वादा शासन ने किया था, लेकिन इस वादे को इंदौर जिले में अफसरों ने पूरा नहीं होने दिया। विभागों की आपसी खींचतान में योजना का लाभ गरीब तबके को नहीं मिल सका। इसके पालन की जिम्मेदारी वाले विभाग केवल पत्र लिखने में ही उलझे हुए हैं। दस महीने में शहर में सिर्फ पांच लोगों के परिजन को मौत के बाद 50-50 हजार रुपये बीमा कंपनी ने दिए हैं, जबकि चार प्रकरणों में दो देपालपुर व एक-एक गौतमपुरा व सांवेर के हैं। इन आंकड़ों की जुबानी तो यही कहती है कि शहर में गरीबी रेखा के नीचे जीने वाले व्यक्तियों की मौत ही नहीं हुई, जबकि इंदौर जिले में गरीबी रेखा के नीचे 60 हजार से ज्यादा परिवार गुजर-बसर कर रहे हैं। दुर्घटनाओं में इस तबके के महीने में ही औसतन 10 लोग शिकार हो रहे हैं। राज्य शासन ने 28 मार्च 2007 से प्रदेश के सभी 48 जिलों के शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में विवेकानंद समूह बीमा योजना शुरू की है। योजना 18 से 65 वर्ष आयु समूह के गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वाले लोगों के लिए लागू की गई है। इसमें इस वर्ग को बिना प्रीमियम फीस के दुर्घटना में बीमा कवरेज की सुरक्षा दी गई है। यह राशि रिलायंस जनरल इंश्योरेंस कंपनी द्वारा दी जाती है। इस योजना को जिले में साकार करने में सबसे अहम जिम्मेदारी शहरी क्षेत्र के लिए परियोजना अधिकारी, शहरी विकास अभिकरण और ग्रामीण क्षेत्र के लिए जनपद पंचायत के चारों मुख्य कार्यपालन अधिकारियों की है। स्वास्थ्य विभाग और पुलिस की भी जिम्मेदारी है। सबसे अहम पंचायत एवं सामाजिक न्याय विभाग के पास मॉनीटरिंग का जिम्मा है।
साभार : जागरण
Jan 23, 02:43 am
इंदौर। राज्य शासन की महत्वाकांक्षी विवेकानंद समूह बीमा योजना इंदौर जिले में लालफीताशाही में उलझकर रह गई है। अफसरों के लापरवाही के दांव में केवल नौ गरीब परिवारों को ही सुरक्षा की छांव मिल सकी है। गरीबी रेखा (बीपीएल) के नीचे जीवनयापन करने वाले परिवारों को आर्थिक सुरक्षा का कवच देने का वादा शासन ने किया था, लेकिन इस वादे को इंदौर जिले में अफसरों ने पूरा नहीं होने दिया। विभागों की आपसी खींचतान में योजना का लाभ गरीब तबके को नहीं मिल सका। इसके पालन की जिम्मेदारी वाले विभाग केवल पत्र लिखने में ही उलझे हुए हैं। दस महीने में शहर में सिर्फ पांच लोगों के परिजन को मौत के बाद 50-50 हजार रुपये बीमा कंपनी ने दिए हैं, जबकि चार प्रकरणों में दो देपालपुर व एक-एक गौतमपुरा व सांवेर के हैं। इन आंकड़ों की जुबानी तो यही कहती है कि शहर में गरीबी रेखा के नीचे जीने वाले व्यक्तियों की मौत ही नहीं हुई, जबकि इंदौर जिले में गरीबी रेखा के नीचे 60 हजार से ज्यादा परिवार गुजर-बसर कर रहे हैं। दुर्घटनाओं में इस तबके के महीने में ही औसतन 10 लोग शिकार हो रहे हैं। राज्य शासन ने 28 मार्च 2007 से प्रदेश के सभी 48 जिलों के शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में विवेकानंद समूह बीमा योजना शुरू की है। योजना 18 से 65 वर्ष आयु समूह के गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वाले लोगों के लिए लागू की गई है। इसमें इस वर्ग को बिना प्रीमियम फीस के दुर्घटना में बीमा कवरेज की सुरक्षा दी गई है। यह राशि रिलायंस जनरल इंश्योरेंस कंपनी द्वारा दी जाती है। इस योजना को जिले में साकार करने में सबसे अहम जिम्मेदारी शहरी क्षेत्र के लिए परियोजना अधिकारी, शहरी विकास अभिकरण और ग्रामीण क्षेत्र के लिए जनपद पंचायत के चारों मुख्य कार्यपालन अधिकारियों की है। स्वास्थ्य विभाग और पुलिस की भी जिम्मेदारी है। सबसे अहम पंचायत एवं सामाजिक न्याय विभाग के पास मॉनीटरिंग का जिम्मा है।
साभार : जागरण
विस्फोटों ने उड़ाई पाला के ग्रामीणों की नींद
Jan 23, 02:43 am
उत्तरकाशी। पाला-मनेरी जल विद्युत परियोजना के निर्माण के लिए पेड़ों के कटान का विरोध करते हुए ग्रामीणों ने समुचित पुर्नवास की मांग की है।
विकासखंड भटवाड़ी के अंतर्गत बन रही 480 मेगावाट की पाला-मनेरी जल विद्युत परियोजना निर्माण के दौरान हो रहे विस्फोटों से पाला गांव भूस्खलन की चपेट में है। भूस्खलन से गांव ही संकट में नहीं है बल्कि जंगल में बड़ी संख्या में पेड़ों का कटान किए जाने की तैयारी है। रक्षासूत्र आंदोलन के सुरेश भाई व गांधी विचार मंच के अध्यक्ष डा। नागेन्द्र दत्त जगूडी की अध्यक्षा में जिलाधिकारी आर.मीनक्षी से मुलाकात की। उन्होंने जिलाधिकारी से मांग की कि पाला गांव का भू-वैज्ञानिकों से सर्वे करवाने के बाद गांव का पुनर्वास किया जाए। उन्होंने जिलाधिकारी को बताया कि पाला गांव परियोजना के सुरंग के मुहाने पर स्थित और सुरंग में टेस्टिंग के दौरान लगातार भूकंप जैसी स्थिति बनी हुई है। भूस्खलन से खेती नष्ट हो रही है। पाला महिला मंगल दल ने सुरक्षा की भी जिलाधिकारी से मांग की है। पाला महिला मंगल दल ने चेतावनी दी है कि यदि गांव का पुनर्वास नहीं किया जाता तो वे परियोजना का निर्माण कार्य रोक देंगी।
साभार : जागरण
Jan 23, 02:43 am
उत्तरकाशी। पाला-मनेरी जल विद्युत परियोजना के निर्माण के लिए पेड़ों के कटान का विरोध करते हुए ग्रामीणों ने समुचित पुर्नवास की मांग की है।
विकासखंड भटवाड़ी के अंतर्गत बन रही 480 मेगावाट की पाला-मनेरी जल विद्युत परियोजना निर्माण के दौरान हो रहे विस्फोटों से पाला गांव भूस्खलन की चपेट में है। भूस्खलन से गांव ही संकट में नहीं है बल्कि जंगल में बड़ी संख्या में पेड़ों का कटान किए जाने की तैयारी है। रक्षासूत्र आंदोलन के सुरेश भाई व गांधी विचार मंच के अध्यक्ष डा। नागेन्द्र दत्त जगूडी की अध्यक्षा में जिलाधिकारी आर.मीनक्षी से मुलाकात की। उन्होंने जिलाधिकारी से मांग की कि पाला गांव का भू-वैज्ञानिकों से सर्वे करवाने के बाद गांव का पुनर्वास किया जाए। उन्होंने जिलाधिकारी को बताया कि पाला गांव परियोजना के सुरंग के मुहाने पर स्थित और सुरंग में टेस्टिंग के दौरान लगातार भूकंप जैसी स्थिति बनी हुई है। भूस्खलन से खेती नष्ट हो रही है। पाला महिला मंगल दल ने सुरक्षा की भी जिलाधिकारी से मांग की है। पाला महिला मंगल दल ने चेतावनी दी है कि यदि गांव का पुनर्वास नहीं किया जाता तो वे परियोजना का निर्माण कार्य रोक देंगी।
साभार : जागरण

कोई काम नहीं है मुश्किल, जब..
Jan 17, 12:28 pm
मनोहरपुर [रमेश सिंह]। कहते है कि अदम्य साहस और कुछ कर गुजरने की इच्छाशक्ति हो, तो कुछ भी असंभव नहीं है। 'कोई काम नहीं है मुश्किल, जब किया इरादा पक्का' इस गीत को चरितार्थ करते हुए मनोहरपुर प्रखंड के इचापीढ़ गांव निवासी 42 वर्षीय इंद्रजीत महतो ने कोयल नदी पर लकड़ी का पुल बनाकर इतिहास रच दिया।
इंद्रजीत महतो ने इचापीढ़ बारह डुंगरी घाट से आनंदपुर जाने के लिए लगभग 25 दिनों की कड़ी मेहनत से कोयल नदी पर लकड़ी का पुल बना डाला। बीती नौ जनवरी को इंद्रजीत ने विधिवत पूजा-अर्चना कर पुल का उद्घाटन भी कर दिया। बारह डुंगरी से आनंदपुर के लिए कोयल नदी पर लकड़ी का पुल बनने से दर्जनों गांव के आम लोगों के साथ-साथ स्कूली छात्र-छात्राओं को भी इसका लाभ मिल रहा है। आनंदपुर में हाईस्कूल होने के कारण इचापीढ़, रायडीह, सोनपोखरी, मोहलडीहा, ढीपा एवं बड़पोस आदि गांव के छात्र-छात्राओं के लिए कोयल नदी पार कर स्कूल जाने-आने में काफी सुविधा हो गई है। पूर्व में इन गांवों के लोग व छात्र पानी में उतर कर ही नदी पार करते थे। नदी का जल स्तर थोड़ा सा भी बढ़ जाने से उन्हे नदी पार करने में काफी दिक्कत होती थीं। सड़क मार्ग से उन्हें मनोहरपुर, रायकेरा होते हुए आनंदपुर तक जाने के लिए लगभग 25 किमी की दूरी तय करनी पड़ती थी। ज्ञात हो कि मनोहरपुर-रांची मार्ग पर ही आनंदपुर पड़ता है। इसलिए रांची आने-जाने वालों को भी बारहडुंगरी से कोयल नदी पार कर आनंदपुर से रांची, सिमडेगा, कोलेबीरा व बानो आदि की बस आसानी से मिल जाती है।
इंद्रजीत महतो बताते है कि उन्होंने प्रखंड के धानापाली में कोयल नदी पर बने लकड़ी के पुल को देखा था, जो झारखंड व उड़ीसा को जोड़ता है। धानापाली का लकड़ी पुल देखकर ही उन्होंने इचापीढ़ व आसपास के गांव के आम लोगों की परेशानी को देखते हुए बारह डूंगरी के पास कोयल नदी पर लकड़ी का पुल बनाने की ठानी थी। अपनी पत्नी व बच्चों की सहायता से 25 दिनों की कड़ी मेहनत से उन्होंने कोयल नदी पर लकड़ी का पुल बना डाला। इंद्रजीत ने बताया कि लकड़ी के पुल पर दो पहिये वाहन भी आसानी से चल सकते है। पुल से पार होने वाले स्वेच्छा से उन्हे जो पैसे देते है, उसे वे स्वीकार करते है। इस पैसे का उपयोग वे पुल को मजबूती देने के लिए करेगे। अगले आठ माह तक उन्हे पुल की देखभाल व मरम्मत नियमित तौर पर करते रहना है, जब तक कि बरसात न आ जाए।
Jan 17, 12:28 pm
मनोहरपुर [रमेश सिंह]। कहते है कि अदम्य साहस और कुछ कर गुजरने की इच्छाशक्ति हो, तो कुछ भी असंभव नहीं है। 'कोई काम नहीं है मुश्किल, जब किया इरादा पक्का' इस गीत को चरितार्थ करते हुए मनोहरपुर प्रखंड के इचापीढ़ गांव निवासी 42 वर्षीय इंद्रजीत महतो ने कोयल नदी पर लकड़ी का पुल बनाकर इतिहास रच दिया।
इंद्रजीत महतो ने इचापीढ़ बारह डुंगरी घाट से आनंदपुर जाने के लिए लगभग 25 दिनों की कड़ी मेहनत से कोयल नदी पर लकड़ी का पुल बना डाला। बीती नौ जनवरी को इंद्रजीत ने विधिवत पूजा-अर्चना कर पुल का उद्घाटन भी कर दिया। बारह डुंगरी से आनंदपुर के लिए कोयल नदी पर लकड़ी का पुल बनने से दर्जनों गांव के आम लोगों के साथ-साथ स्कूली छात्र-छात्राओं को भी इसका लाभ मिल रहा है। आनंदपुर में हाईस्कूल होने के कारण इचापीढ़, रायडीह, सोनपोखरी, मोहलडीहा, ढीपा एवं बड़पोस आदि गांव के छात्र-छात्राओं के लिए कोयल नदी पार कर स्कूल जाने-आने में काफी सुविधा हो गई है। पूर्व में इन गांवों के लोग व छात्र पानी में उतर कर ही नदी पार करते थे। नदी का जल स्तर थोड़ा सा भी बढ़ जाने से उन्हे नदी पार करने में काफी दिक्कत होती थीं। सड़क मार्ग से उन्हें मनोहरपुर, रायकेरा होते हुए आनंदपुर तक जाने के लिए लगभग 25 किमी की दूरी तय करनी पड़ती थी। ज्ञात हो कि मनोहरपुर-रांची मार्ग पर ही आनंदपुर पड़ता है। इसलिए रांची आने-जाने वालों को भी बारहडुंगरी से कोयल नदी पार कर आनंदपुर से रांची, सिमडेगा, कोलेबीरा व बानो आदि की बस आसानी से मिल जाती है।
इंद्रजीत महतो बताते है कि उन्होंने प्रखंड के धानापाली में कोयल नदी पर बने लकड़ी के पुल को देखा था, जो झारखंड व उड़ीसा को जोड़ता है। धानापाली का लकड़ी पुल देखकर ही उन्होंने इचापीढ़ व आसपास के गांव के आम लोगों की परेशानी को देखते हुए बारह डूंगरी के पास कोयल नदी पर लकड़ी का पुल बनाने की ठानी थी। अपनी पत्नी व बच्चों की सहायता से 25 दिनों की कड़ी मेहनत से उन्होंने कोयल नदी पर लकड़ी का पुल बना डाला। इंद्रजीत ने बताया कि लकड़ी के पुल पर दो पहिये वाहन भी आसानी से चल सकते है। पुल से पार होने वाले स्वेच्छा से उन्हे जो पैसे देते है, उसे वे स्वीकार करते है। इस पैसे का उपयोग वे पुल को मजबूती देने के लिए करेगे। अगले आठ माह तक उन्हे पुल की देखभाल व मरम्मत नियमित तौर पर करते रहना है, जब तक कि बरसात न आ जाए।
साभार : जागरण
उत्तर प्रदेश में किसान खेती के साथ करेंगे 'मास्टरगिरी'
लखनऊ, 22 जनवरी (आईएएनएस)। राष्ट्रीय या राज्य स्तर पर पुरस्कृत किसान अब उत्तर प्रदेश में 'मास्टर साहेब' की भूमिका निभाएंगे। कृषि विभाग के 'सपोर्ट टू स्टेट एक्सटेंशन रिफार्म्स' के तहत शुरू होने जा रही योजना में प्रत्येक विकास खंड में ऐसे स्कूल खोले जा रहे हैं, जिसमें उपलब्धि हासिल करने वाले किसान खेती के वैज्ञानिक गुर सिखाएंगे।
इन स्कूलों में न तो क्लास रूम होगा और न ही ब्लैक बोर्ड। खेतों में ही क्लास लगेगी और विद्यार्थी व गुरु दोनों होंगे किसान। स्कूलों में पशुपालन, डेयरी और मछली पालन सहित रेशम उत्पादन के भी वैज्ञानिक तरीके बताए जाएंगे।
'फार्म स्कूल' नाम से संचालित इन विद्यालयों को वित्तीय मदद केंद्र सरकार देगी। इसके तहत प्रत्येक स्कूल को 50 हजार 414 रुपये दिए जाएंगे। इतना ही नहीं इन स्कूलों को किसानों के खेतों में खोला जाएगा।
स्कूलों में विभिन्न फसलों और उस क्षेत्र की कृषि की खूबियों के बारे में विस्तार से चर्चा की जाएगी। इस दायरे में एकीकृत फसल प्रबंधन पर मुख्य रूप से ध्यान केंद्रित किया जाएगा। किसानों की जो भी दिक्कतें होंगी उसका हल इन स्कूलों में तुरंत किया जाएगा। कृषि विभाग में अपर निदेशक मुकेश गौतम ने बताया कि यह पहल राष्ट्रीय किसान आयोग में प्रतिभावान किसानों के सुझाव व सिफारिश के आधार पर की गई है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस
लखनऊ, 22 जनवरी (आईएएनएस)। राष्ट्रीय या राज्य स्तर पर पुरस्कृत किसान अब उत्तर प्रदेश में 'मास्टर साहेब' की भूमिका निभाएंगे। कृषि विभाग के 'सपोर्ट टू स्टेट एक्सटेंशन रिफार्म्स' के तहत शुरू होने जा रही योजना में प्रत्येक विकास खंड में ऐसे स्कूल खोले जा रहे हैं, जिसमें उपलब्धि हासिल करने वाले किसान खेती के वैज्ञानिक गुर सिखाएंगे।
इन स्कूलों में न तो क्लास रूम होगा और न ही ब्लैक बोर्ड। खेतों में ही क्लास लगेगी और विद्यार्थी व गुरु दोनों होंगे किसान। स्कूलों में पशुपालन, डेयरी और मछली पालन सहित रेशम उत्पादन के भी वैज्ञानिक तरीके बताए जाएंगे।
'फार्म स्कूल' नाम से संचालित इन विद्यालयों को वित्तीय मदद केंद्र सरकार देगी। इसके तहत प्रत्येक स्कूल को 50 हजार 414 रुपये दिए जाएंगे। इतना ही नहीं इन स्कूलों को किसानों के खेतों में खोला जाएगा।
स्कूलों में विभिन्न फसलों और उस क्षेत्र की कृषि की खूबियों के बारे में विस्तार से चर्चा की जाएगी। इस दायरे में एकीकृत फसल प्रबंधन पर मुख्य रूप से ध्यान केंद्रित किया जाएगा। किसानों की जो भी दिक्कतें होंगी उसका हल इन स्कूलों में तुरंत किया जाएगा। कृषि विभाग में अपर निदेशक मुकेश गौतम ने बताया कि यह पहल राष्ट्रीय किसान आयोग में प्रतिभावान किसानों के सुझाव व सिफारिश के आधार पर की गई है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस
'किताबी कीडे' बनकर पढ़ाई नहीं करेंगे यूपी के नौनिहाल
लखनऊ, 22 जनवरी (आईएएनएस)। जल्द ही उत्तर प्रदेश के नौनिहाल भी बरसों से चली आ रही पढ़ने-पढ़ाने के तरीकों से निजात पा सकेंगे। अब न तो उन्हें रट्टा लगाकर सवालों के जवाब देने पडेंग़े और न ही उनका ज्ञान केवल किताबों तक सीमित रहेगा। अब वे अपने ज्ञान को असीमित करेंगे जीवन के अनुभवों के आधार पर और उसे सहेजेगें अपने सामाजिक जीवन से जोड़कर। ऐसा संभव होगा प्रदेश में नई शिक्षा पध्दति से जुड़कर।
प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों से होने वाली इस शुरुआत में राष्ट्रीय शिक्षा अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने बड़ी भूमिका निभायी है। नए तरीके से पारंपरिक पठन पाठन शैली पर विराम लगेगा। इसमें न सिर्फ बच्चों का मानसिक विकास होगा, बल्कि शिक्षकों के अध्यापन के तरीकोंमें भी बदलाव लाए जाएंगे। यही नही परीक्षाओं में भी ऐसे सवाल पुछे जाएंगे, जिसमें दिमागी कसरत ज्यादा हो। नई पध्दति में बच्चे को अपनी मातृभाषा बोलने का पूरा अधिकार दिया जाएगा, साथ ही लचीली मूल्यांकन के तरीके पर ध्यान दिया जाएगा।
एनसीईआरटी की पाठयक्रम प्रमुख प्रोफेसर संतोष ने आईएएनएस से बातचीत में बताया प्राथमिक स्तर से ही बच्चों को समाज से जोड़कर पढाने की यह पध्दति वैसे तो देश भर में लागू हो चुकी है, लेकिन उत्तर प्रदेश इससे अछूता था। उन्होंने कहा कि इस बाबत नया पाठयक्रम तैयार किया जा रहा है। साथ ही शिक्षकों को प्रशिक्षित करने के लिए 21 पुस्तकें तैयार की गई हैं।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस
लखनऊ, 22 जनवरी (आईएएनएस)। जल्द ही उत्तर प्रदेश के नौनिहाल भी बरसों से चली आ रही पढ़ने-पढ़ाने के तरीकों से निजात पा सकेंगे। अब न तो उन्हें रट्टा लगाकर सवालों के जवाब देने पडेंग़े और न ही उनका ज्ञान केवल किताबों तक सीमित रहेगा। अब वे अपने ज्ञान को असीमित करेंगे जीवन के अनुभवों के आधार पर और उसे सहेजेगें अपने सामाजिक जीवन से जोड़कर। ऐसा संभव होगा प्रदेश में नई शिक्षा पध्दति से जुड़कर।
प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों से होने वाली इस शुरुआत में राष्ट्रीय शिक्षा अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने बड़ी भूमिका निभायी है। नए तरीके से पारंपरिक पठन पाठन शैली पर विराम लगेगा। इसमें न सिर्फ बच्चों का मानसिक विकास होगा, बल्कि शिक्षकों के अध्यापन के तरीकोंमें भी बदलाव लाए जाएंगे। यही नही परीक्षाओं में भी ऐसे सवाल पुछे जाएंगे, जिसमें दिमागी कसरत ज्यादा हो। नई पध्दति में बच्चे को अपनी मातृभाषा बोलने का पूरा अधिकार दिया जाएगा, साथ ही लचीली मूल्यांकन के तरीके पर ध्यान दिया जाएगा।
एनसीईआरटी की पाठयक्रम प्रमुख प्रोफेसर संतोष ने आईएएनएस से बातचीत में बताया प्राथमिक स्तर से ही बच्चों को समाज से जोड़कर पढाने की यह पध्दति वैसे तो देश भर में लागू हो चुकी है, लेकिन उत्तर प्रदेश इससे अछूता था। उन्होंने कहा कि इस बाबत नया पाठयक्रम तैयार किया जा रहा है। साथ ही शिक्षकों को प्रशिक्षित करने के लिए 21 पुस्तकें तैयार की गई हैं।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस
स्थानीय लोगों तक आनुवंशिक संसाधनों की पहुंच की वकालत
नई दिल्ली, 22 जनवरी (आईएएनएस)। अगले महीने संयुक्त राष्ट्र द्वारा जिनेवा में जैव विविधता पर आयोजित होने वाले सम्मेलन में जब 190 देशों के प्रतिनिधि जुटेंगे तो स्थानीय लोगों को आनुवंशिक संसाधनों से लैस किए जाने का मसला जोर-शोर से उठेगा। लंदन स्थित एक संगठन ने यह मुद्दा उठाने का फैसला किया है।
लंदन स्थित इंटरनेशनल इंस्टीटयूट फॉर एनवायरमेंट एंड डेवलपमेंट (आईआईईडी) का मानना है कि स्थानीय लोगों को गरीबी से मुक्ति, जैव विविधता की रक्षा और तापमान परिर्वतन के दुष्प्रभावों से निपटने के लिए आनुवंशिक संसाधनों से लैस किए जाने की जरूरत है। सोमवार को इस संगठन द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि यून कनवेंशन ऑन बायोलॉजिकल डायवर्सिटी (सीबीडी) के प्रावधानों को अमल में आए हुए 15 साल बीत चुके हैं, पर आनुवंशिक संसाधनों के निष्पक्ष वितरण और पहुंच के लिए आज तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
जिनेवा में 21-25 फरवरी को सीबीडी के प्रावधानों पर खास चर्चा होने वाली है। आईआईईडी की रिपोर्ट पनामा, भारत, पेरू और चीन में संगठन द्वारा आयोजित कार्यशिविर के निष्कर्षों पर आधारित है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वन्य और ग्रामीण इलाकों में मौजूद अरबों डॉलर के आनुवंशिक संसाधनों का व्यावसायिक दोहन करने की कोशिशें जारी हैं, पर इसके लिए स्थानीय लोगों को विश्वास में नहीं लिया जाता।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस
नई दिल्ली, 22 जनवरी (आईएएनएस)। अगले महीने संयुक्त राष्ट्र द्वारा जिनेवा में जैव विविधता पर आयोजित होने वाले सम्मेलन में जब 190 देशों के प्रतिनिधि जुटेंगे तो स्थानीय लोगों को आनुवंशिक संसाधनों से लैस किए जाने का मसला जोर-शोर से उठेगा। लंदन स्थित एक संगठन ने यह मुद्दा उठाने का फैसला किया है।
लंदन स्थित इंटरनेशनल इंस्टीटयूट फॉर एनवायरमेंट एंड डेवलपमेंट (आईआईईडी) का मानना है कि स्थानीय लोगों को गरीबी से मुक्ति, जैव विविधता की रक्षा और तापमान परिर्वतन के दुष्प्रभावों से निपटने के लिए आनुवंशिक संसाधनों से लैस किए जाने की जरूरत है। सोमवार को इस संगठन द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि यून कनवेंशन ऑन बायोलॉजिकल डायवर्सिटी (सीबीडी) के प्रावधानों को अमल में आए हुए 15 साल बीत चुके हैं, पर आनुवंशिक संसाधनों के निष्पक्ष वितरण और पहुंच के लिए आज तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
जिनेवा में 21-25 फरवरी को सीबीडी के प्रावधानों पर खास चर्चा होने वाली है। आईआईईडी की रिपोर्ट पनामा, भारत, पेरू और चीन में संगठन द्वारा आयोजित कार्यशिविर के निष्कर्षों पर आधारित है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वन्य और ग्रामीण इलाकों में मौजूद अरबों डॉलर के आनुवंशिक संसाधनों का व्यावसायिक दोहन करने की कोशिशें जारी हैं, पर इसके लिए स्थानीय लोगों को विश्वास में नहीं लिया जाता।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस
'नेशनल हेराल्ड' का प्रकाशन बंद होगा
नई दिल्ली, 22 जनवरी (आईएएनएस)। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा शुरू किए गए और पिछले कई वर्षों से कांग्रेस पार्टी की वित्तीय मदद से चल रहे समाचार पत्र 'नेशनल हेराल्ड' का प्रकाशन बंद कर दिया जाएगा।
समाचार पत्र के अधिकारियों के अनुसार 'नेशनल हेराल्ड व कौमी आवाज इम्पलायीज यूनियन' और कांग्रेसी नेताओं के बीच 265 कर्मचारियों के समायोजन के लिए वार्ताएं की गई हैं। इन 265 कर्मचारियों में नई दिल्ली से प्रकाशित होने वाले अंग्रेजी और उर्दू संस्करणों के 40 पत्रकार भी शामिल हैं।
सूत्रों के मुताबि कांग्रेस ने नेहरू द्वारा लखनऊ से नौ सितंबर 1938 को शुरू किए गए इस समाचार पत्र को बंद करने का निर्णय लिया है। अधिक कर्मचारी और विज्ञापन के अभाव के कारण समाचार पत्र घाटे में चल रहा था।
नेशनल हेराल्ड और कौमी आवाज के लखनऊ संस्करणों को लगभग 10 वर्ष पहले ही बंद किया जा चुका है। अखबार का हिन्दी संस्करण 'नवजीवन' (यह नाम महात्मा गांधी द्वारा दिया गया था) कुछ वर्ष पहले बंद हो चुका है।
अधिकारियों के अनुसार समाचार पत्र के अध्यक्ष एवं कांग्रेस पार्टी के कोषाध्यक्ष एवं सांसद मोतीलाल वोरा और अन्य कांग्रेसी नेताओं ने कर्मचारियों के लिए 38 करोड़ रुपये के मुआवजा पैकेज का निर्णय लिया है।
कौमी आवाज के वरिष्ठ पत्रकार और नेशनल हेराल्ड एवं कौमी आवाज इम्पलायीज यूनियन के अध्यक्ष सौद अख्तर ने इस समाचार पत्र को बंद किए जाने की पुष्टि करते हुए आईएएनएस को बताया, ''हां, इसे बंद किए जाने का फैसला लिया जा चुका है। इस पर अंतिम समझौता इस सप्ताह के अंत तक किया जा सकता है।''
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस
नई दिल्ली, 22 जनवरी (आईएएनएस)। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा शुरू किए गए और पिछले कई वर्षों से कांग्रेस पार्टी की वित्तीय मदद से चल रहे समाचार पत्र 'नेशनल हेराल्ड' का प्रकाशन बंद कर दिया जाएगा।
समाचार पत्र के अधिकारियों के अनुसार 'नेशनल हेराल्ड व कौमी आवाज इम्पलायीज यूनियन' और कांग्रेसी नेताओं के बीच 265 कर्मचारियों के समायोजन के लिए वार्ताएं की गई हैं। इन 265 कर्मचारियों में नई दिल्ली से प्रकाशित होने वाले अंग्रेजी और उर्दू संस्करणों के 40 पत्रकार भी शामिल हैं।
सूत्रों के मुताबि कांग्रेस ने नेहरू द्वारा लखनऊ से नौ सितंबर 1938 को शुरू किए गए इस समाचार पत्र को बंद करने का निर्णय लिया है। अधिक कर्मचारी और विज्ञापन के अभाव के कारण समाचार पत्र घाटे में चल रहा था।
नेशनल हेराल्ड और कौमी आवाज के लखनऊ संस्करणों को लगभग 10 वर्ष पहले ही बंद किया जा चुका है। अखबार का हिन्दी संस्करण 'नवजीवन' (यह नाम महात्मा गांधी द्वारा दिया गया था) कुछ वर्ष पहले बंद हो चुका है।
अधिकारियों के अनुसार समाचार पत्र के अध्यक्ष एवं कांग्रेस पार्टी के कोषाध्यक्ष एवं सांसद मोतीलाल वोरा और अन्य कांग्रेसी नेताओं ने कर्मचारियों के लिए 38 करोड़ रुपये के मुआवजा पैकेज का निर्णय लिया है।
कौमी आवाज के वरिष्ठ पत्रकार और नेशनल हेराल्ड एवं कौमी आवाज इम्पलायीज यूनियन के अध्यक्ष सौद अख्तर ने इस समाचार पत्र को बंद किए जाने की पुष्टि करते हुए आईएएनएस को बताया, ''हां, इसे बंद किए जाने का फैसला लिया जा चुका है। इस पर अंतिम समझौता इस सप्ताह के अंत तक किया जा सकता है।''
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस
बढ़ रहा है बर्ड फ्लू पर इंसान संक्रमित नहीं
कोलकाता, 22 जनवरी (आईएएनएस)। पश्चिम बंगाल में नौ लोगों के बर्ड फ्लू से संक्रमित होने की अफवाहों के बाद कराई गई नमूनों की जांच के परिणाम नेगेटिव रहे हैं। इन परिणामों से राहत महसूस करते हुए अधिकारियों ने बचाव नीति के तहत आने वाले हफ्तों में बीस लाख से ज्यादा मुर्गियों को मारने का लक्ष्य निर्धारित किया है।
'नेशनल इंस्टीटयूट आफ कम्यूनिकेबल डिजीजेज' (एनआईसीडी) के निदेशक शिव लाल के अनुसार, ''हमारे मुख्यालय में चार लोगों के रक्त के नमुनों की जांच की गई और सभी के परिणाम नेगेटिव रहे।'' गौरतलब है कि इससे पहले भी पांच नमूनों की जांच करवाई गई थी, जिनके परिणाम भी नेगेटिव रहे थे।
लाल ने कहा कि लोगों को अफवाहों से बचना चाहिए और बेकार में परेशान नहीं होना चाहिए। इस बीच मालदा जिले के बर्ड फ्लू की चपेट में आने के बाद प्रभावित जिलों की संख्या बढ़कर सात हो गई है। बुधवार से अब तक पश्चिम बंगाल में दो लाख से ज्यादा मुर्गे-मुर्गियों को मारा जा चुका है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस
कोलकाता, 22 जनवरी (आईएएनएस)। पश्चिम बंगाल में नौ लोगों के बर्ड फ्लू से संक्रमित होने की अफवाहों के बाद कराई गई नमूनों की जांच के परिणाम नेगेटिव रहे हैं। इन परिणामों से राहत महसूस करते हुए अधिकारियों ने बचाव नीति के तहत आने वाले हफ्तों में बीस लाख से ज्यादा मुर्गियों को मारने का लक्ष्य निर्धारित किया है।
'नेशनल इंस्टीटयूट आफ कम्यूनिकेबल डिजीजेज' (एनआईसीडी) के निदेशक शिव लाल के अनुसार, ''हमारे मुख्यालय में चार लोगों के रक्त के नमुनों की जांच की गई और सभी के परिणाम नेगेटिव रहे।'' गौरतलब है कि इससे पहले भी पांच नमूनों की जांच करवाई गई थी, जिनके परिणाम भी नेगेटिव रहे थे।
लाल ने कहा कि लोगों को अफवाहों से बचना चाहिए और बेकार में परेशान नहीं होना चाहिए। इस बीच मालदा जिले के बर्ड फ्लू की चपेट में आने के बाद प्रभावित जिलों की संख्या बढ़कर सात हो गई है। बुधवार से अब तक पश्चिम बंगाल में दो लाख से ज्यादा मुर्गे-मुर्गियों को मारा जा चुका है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस
उप्र में रोजगार गारंटी योजना की समीक्षा करेंगे रघुवंश प्रसाद सिंह
लखनऊ, 22 जनवरी (आईएएनएस)। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना को लेकर केंद्र और प्रदेश सरकार के बीच जारी आरोप-प्रत्यारोपों के मद्देनजर केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह बुधवार को लखनऊ आ रहे हैं। यहां वह योजना के क्रियान्वयन की समीक्षा करेंगे। बुधवार को तिलक हाल में सभी सत्तर जिलों के मुख्य विकास अधिकारियों की बैठक बुलाई गई है।
ग्रामीण विकास विभाग के प्रमुख सचिव रोहित नंदन ने बताया कि बैठक का एजेंडा क्या होगा? इस बारे में अभी वह कुछ नहीं बता सकते। उधर, कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि हाल ही में राहुल गांधी ने बुंदेलखंड दौरे के दौरान केंद्रीय धन के जनता तक नहीं पहुंचने संबंधी टिप्पणी को गंभीरता से लेते हुए रघुवंश प्रसाद सिंह ने स्वयं योजना की समीक्षा करने का निर्णय लिया है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस
लखनऊ, 22 जनवरी (आईएएनएस)। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना को लेकर केंद्र और प्रदेश सरकार के बीच जारी आरोप-प्रत्यारोपों के मद्देनजर केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह बुधवार को लखनऊ आ रहे हैं। यहां वह योजना के क्रियान्वयन की समीक्षा करेंगे। बुधवार को तिलक हाल में सभी सत्तर जिलों के मुख्य विकास अधिकारियों की बैठक बुलाई गई है।
ग्रामीण विकास विभाग के प्रमुख सचिव रोहित नंदन ने बताया कि बैठक का एजेंडा क्या होगा? इस बारे में अभी वह कुछ नहीं बता सकते। उधर, कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि हाल ही में राहुल गांधी ने बुंदेलखंड दौरे के दौरान केंद्रीय धन के जनता तक नहीं पहुंचने संबंधी टिप्पणी को गंभीरता से लेते हुए रघुवंश प्रसाद सिंह ने स्वयं योजना की समीक्षा करने का निर्णय लिया है।
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भूमि अधिग्रहण को लेकर आगरा में तनाव
आगरा, 22 जनवरी (आईएएनएस)। आगरा में ताज और गंगा एक्सप्रेसवे के लिए भूमि अधिग्रहण के खिलाफ किसानों ने अपना विरोध तेज कर दिया है। ये किसान भूमि अधिग्रहण के खिलाफ बैठकें और प्रदर्शन कर रहे हैं।
आगरा विकास प्राधिकरण और आगरा नगर निगम ने ग्रामीण इलाकों, कार्यालय परिसरों और यमुना नदी के अविकसित किनारों पर सुविधा केंद्रों के विकास की योजना की घोषणा की है।
उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सहित सभी विपक्षी पार्टियों ने इस मुद्दे पर मायावती सरकार के खिलाफ किसानों को लामबंद करना शुरू कर दिया है।
समाजवादी पार्टी (सपा) इस विरोध में प्रमुखता से शामिल है। स्थानीय सपा सांसद और फिल्म अभिनेता राज बब्बर के नेतृत्व में 18 जनवरी को आगरा आयुक्त के कार्यालय के समक्ष भूमि अधिग्रहण के खिलाफ एक विरोध प्रदर्शन आयोजित किया गया था। हजारों गुस्साए प्रदर्शनकारियों ने सरकार की भूमि हड़पने की गतिविधि के खिलाफ अपना विरोध प्रदर्शन करने की घोषणा की है। राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी) और वामपंथी भी ग्रामीण विकास के लिए भूमि अधिग्रहण के खिलाफ हैं। आगरा के वामपंथियों ने सुभाष चंद्र बोस की जन्म सदी के अवसर पर 23 जनवरी को विरोध प्रदर्शन की घोषणा की है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस
आगरा, 22 जनवरी (आईएएनएस)। आगरा में ताज और गंगा एक्सप्रेसवे के लिए भूमि अधिग्रहण के खिलाफ किसानों ने अपना विरोध तेज कर दिया है। ये किसान भूमि अधिग्रहण के खिलाफ बैठकें और प्रदर्शन कर रहे हैं।
आगरा विकास प्राधिकरण और आगरा नगर निगम ने ग्रामीण इलाकों, कार्यालय परिसरों और यमुना नदी के अविकसित किनारों पर सुविधा केंद्रों के विकास की योजना की घोषणा की है।
उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सहित सभी विपक्षी पार्टियों ने इस मुद्दे पर मायावती सरकार के खिलाफ किसानों को लामबंद करना शुरू कर दिया है।
समाजवादी पार्टी (सपा) इस विरोध में प्रमुखता से शामिल है। स्थानीय सपा सांसद और फिल्म अभिनेता राज बब्बर के नेतृत्व में 18 जनवरी को आगरा आयुक्त के कार्यालय के समक्ष भूमि अधिग्रहण के खिलाफ एक विरोध प्रदर्शन आयोजित किया गया था। हजारों गुस्साए प्रदर्शनकारियों ने सरकार की भूमि हड़पने की गतिविधि के खिलाफ अपना विरोध प्रदर्शन करने की घोषणा की है। राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी) और वामपंथी भी ग्रामीण विकास के लिए भूमि अधिग्रहण के खिलाफ हैं। आगरा के वामपंथियों ने सुभाष चंद्र बोस की जन्म सदी के अवसर पर 23 जनवरी को विरोध प्रदर्शन की घोषणा की है।
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Monday, January 14, 2008
जमीन पाने भटक रही विधवा
उमरेठ । उमरेठ निवासी विधवा महिला प्रेमलता बाई की पांच एकड भूमि में से 76 डिसमिल जमीन अन्य किसान के रकबे में जोड दी गई। जमीन पर स्वामित्व पाने विधवा महिला तथा उनके पुत्र शरद चौरसिया द्वारा जगह-जगह गुहार लगा दी गई। इसके अलावा राजस्व मंत्री कमल पटेल, कलेक्टर अरुण पांडे को लोक कल्याण शिविर में समस्या से भी अवगत करा दिया गया। राजस्व मंत्री के सख्त निदेशों के बावजूद पीडित विधवा महिला को उसकी जमीन पर हक नहीं मिल पा रहा है। उपतहसील उमरेठ में गत माह आयोजित होने के पश्चात 11 जनवरी को पुनः ग्राम पंचायत गाजनडोह में जिला स्तरीय लोक कल्याण शिविर आयोजित होने जा रहा ह। लोक कल्याण के नाम पर आयोजित होने वाले इस शिविर की अध्यक्षता अरुण पांडे करेंगें। विगत माह राजस्व मंत्री कमल पटेल के मुख्य आतिथ्य एवं जिला कलेक्टर अरुण पांडे की अध्यक्षता में संपन्न उमरेठ लोक कल्याण शिविर में राजस्व मंत्री को प्रेमलता बाई के पुत्र शरद चौरसिया द्वारा यहां के राजस्व निरीक्षक के विरुद्घ बिंदुवार शिकायत की गई थी। जिसमें कहा गया था कि राजस्व दस्तावेजों में दर्ज कुल 5 एकड के रकबे में से 76 डिसमिल भूमि का हिस्सा काटकर एक अन्य किसान के रकबे के खसरे में जोडा गया। बताया जाता है कि उक्त भूमि पूर्व में पदस्थ पटवारी हल्का नम्बर 5 द्वारा त्रुटिवश जोडा गया था। शेष 4.24 डिसमिल भूमि में दूसरे खसरे रकबे से 76 डिसमिल जमीन जोडा जाकर 5 एकड पूर्ण किया जाना था। जिसे सीमांकन अधिकारी ने नक्शा दुरुसती के दौरान 36 डिसमिल दस्तावेजों में बताकर सीमा चिन्ह 76 डिसमिल पर लगाए। उसी अधिकारी द्वारा पुनः सीमांकन के उपरांत 45 डिसमिल भूमि दूसरे किसान के खसरे रकबे में बताकर 36 डिसमिल पर सीमा चिन्ह लगाए। इतना ही नहीं उक्त पीडित महिला को सीमांकन रिर्पोट दो माह तक नायब तहसील कार्यालय नहीं भेजी गई है। उस फील्ड रिर्पोट भूमि में स्थित दो नलकूपों का उल्लेख नहीं किया गया तथा अतिरिक्त निकली भूमि जो सीमांकन के दौरान पडत थी। जिसे कास्त में दर्शाया गया। उक्त मामले को गंभीरता से लेते हुए राजस्व मंत्री कमल पटेल ने जिले के राजस्व मुखिया को ओर मुखातिब होकर मंच से ही तीन दिनों के अंदर मामले की सूक्ष्म व निष्पक्ष जांच कर दोषी अधिकारी को तत्काल निलंबित कर बर्खास्तगी की कार्रवाई करने के लिए कहा। सवा माह बीत जाने के बाद उक्त आवेदन न्याय के इंतजार में फाइलों में कैद हो गया लगता है। उमरेठ के बाद गाजनडोह में शिविर पुनः आयोजित होने जा रहा है। किंतु उक्त शिकायत के अंजाम तक न पहुंचने से यह शिविर के आयोजन के उद्देश्यों के परिणामों पर प्रश्नचिन्ह लग गया है। इससे एक ओर जहां आरोपी अधिकारी विभाग में अपनी गहरी पैठ होने का दंभ भर रहा है वहीं इस घटना को प्रशासन की ढीली पकड के रुप में देखा जा रहा है। इस मामले में राजस्व मंत्री के आदेशों की अवहेलना उनके ही मातहत अमला द्वारा जाने से आम जनों तक पहुंच कहा है। इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। पीडित विधवा महिला प्रेमलता का कथन है कि इस मामले की जांच करने परासिया एसडीएम आए थे मौका मुआयना करने के बाद नायब तहसीलदार परासिया को दो दिनों में सीमांकन कर पूरी 5 एकड जमीन पर कब्जा दिलाने के निर्देश दिए गए थे। जब नायब तहसीलदार, आरआई, पटवारी को लेकर यहां जमीन नापने पहुंचे। इसके पूर्व रात्रि में ही पेठल पवार ने सन की फसल काटकर गेहूं की बोनी कर पानी सिंचाई कर भिगों दी। उसके बाद कोई नहीं आया। पीडित विधवा महिला न्याय पाने अभी भी कार्यालयों के चक्कर काट रही है।
साभार ः राज एक्सप्रेस, 13 Jan, 2008 09:01 PM
उमरेठ । उमरेठ निवासी विधवा महिला प्रेमलता बाई की पांच एकड भूमि में से 76 डिसमिल जमीन अन्य किसान के रकबे में जोड दी गई। जमीन पर स्वामित्व पाने विधवा महिला तथा उनके पुत्र शरद चौरसिया द्वारा जगह-जगह गुहार लगा दी गई। इसके अलावा राजस्व मंत्री कमल पटेल, कलेक्टर अरुण पांडे को लोक कल्याण शिविर में समस्या से भी अवगत करा दिया गया। राजस्व मंत्री के सख्त निदेशों के बावजूद पीडित विधवा महिला को उसकी जमीन पर हक नहीं मिल पा रहा है। उपतहसील उमरेठ में गत माह आयोजित होने के पश्चात 11 जनवरी को पुनः ग्राम पंचायत गाजनडोह में जिला स्तरीय लोक कल्याण शिविर आयोजित होने जा रहा ह। लोक कल्याण के नाम पर आयोजित होने वाले इस शिविर की अध्यक्षता अरुण पांडे करेंगें। विगत माह राजस्व मंत्री कमल पटेल के मुख्य आतिथ्य एवं जिला कलेक्टर अरुण पांडे की अध्यक्षता में संपन्न उमरेठ लोक कल्याण शिविर में राजस्व मंत्री को प्रेमलता बाई के पुत्र शरद चौरसिया द्वारा यहां के राजस्व निरीक्षक के विरुद्घ बिंदुवार शिकायत की गई थी। जिसमें कहा गया था कि राजस्व दस्तावेजों में दर्ज कुल 5 एकड के रकबे में से 76 डिसमिल भूमि का हिस्सा काटकर एक अन्य किसान के रकबे के खसरे में जोडा गया। बताया जाता है कि उक्त भूमि पूर्व में पदस्थ पटवारी हल्का नम्बर 5 द्वारा त्रुटिवश जोडा गया था। शेष 4.24 डिसमिल भूमि में दूसरे खसरे रकबे से 76 डिसमिल जमीन जोडा जाकर 5 एकड पूर्ण किया जाना था। जिसे सीमांकन अधिकारी ने नक्शा दुरुसती के दौरान 36 डिसमिल दस्तावेजों में बताकर सीमा चिन्ह 76 डिसमिल पर लगाए। उसी अधिकारी द्वारा पुनः सीमांकन के उपरांत 45 डिसमिल भूमि दूसरे किसान के खसरे रकबे में बताकर 36 डिसमिल पर सीमा चिन्ह लगाए। इतना ही नहीं उक्त पीडित महिला को सीमांकन रिर्पोट दो माह तक नायब तहसील कार्यालय नहीं भेजी गई है। उस फील्ड रिर्पोट भूमि में स्थित दो नलकूपों का उल्लेख नहीं किया गया तथा अतिरिक्त निकली भूमि जो सीमांकन के दौरान पडत थी। जिसे कास्त में दर्शाया गया। उक्त मामले को गंभीरता से लेते हुए राजस्व मंत्री कमल पटेल ने जिले के राजस्व मुखिया को ओर मुखातिब होकर मंच से ही तीन दिनों के अंदर मामले की सूक्ष्म व निष्पक्ष जांच कर दोषी अधिकारी को तत्काल निलंबित कर बर्खास्तगी की कार्रवाई करने के लिए कहा। सवा माह बीत जाने के बाद उक्त आवेदन न्याय के इंतजार में फाइलों में कैद हो गया लगता है। उमरेठ के बाद गाजनडोह में शिविर पुनः आयोजित होने जा रहा है। किंतु उक्त शिकायत के अंजाम तक न पहुंचने से यह शिविर के आयोजन के उद्देश्यों के परिणामों पर प्रश्नचिन्ह लग गया है। इससे एक ओर जहां आरोपी अधिकारी विभाग में अपनी गहरी पैठ होने का दंभ भर रहा है वहीं इस घटना को प्रशासन की ढीली पकड के रुप में देखा जा रहा है। इस मामले में राजस्व मंत्री के आदेशों की अवहेलना उनके ही मातहत अमला द्वारा जाने से आम जनों तक पहुंच कहा है। इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। पीडित विधवा महिला प्रेमलता का कथन है कि इस मामले की जांच करने परासिया एसडीएम आए थे मौका मुआयना करने के बाद नायब तहसीलदार परासिया को दो दिनों में सीमांकन कर पूरी 5 एकड जमीन पर कब्जा दिलाने के निर्देश दिए गए थे। जब नायब तहसीलदार, आरआई, पटवारी को लेकर यहां जमीन नापने पहुंचे। इसके पूर्व रात्रि में ही पेठल पवार ने सन की फसल काटकर गेहूं की बोनी कर पानी सिंचाई कर भिगों दी। उसके बाद कोई नहीं आया। पीडित विधवा महिला न्याय पाने अभी भी कार्यालयों के चक्कर काट रही है।
साभार ः राज एक्सप्रेस, 13 Jan, 2008 09:01 PM
महिला हेल्पलाइन ने जोडे 213 परिवार
छिंदवाडा । पारिवारिक विवादों, आपसी नासमझी और घरेलू हिंसा के चलते टूट रहे परिवारों को जोडने में महिला हल्प लाइन ऐसे परिवारों के लिए सेतु का काम कर रही है। एक साल में महिला हेल्प लाइन अब तक 207 परिवारों को जोड चुकी ह। यह वे परिवार हैं जिनमें पति-पत्नी अलग अलग रह रहे थे और जिनके मामले पुलिस थाना से लेकर परिवार परामर्श केन्द्र तक जा चुके थे। हेल्प लाइन में आवेदन आने के बाद काउंसलरों ने दोनों पक्षों को बुलाकर न केवल समझाइश दी बल्कि उनके हालातों का भी अध्ययन किया और फिर समझौता करा दिया। काउंसलरों की बातों से अलग-अलग रह रहे पति-पत्नी फिर से साथ रहने को राजी हो गए। रविवार को भी ऐसे ही एक मामले में हल्प लाइन में एक पति की पोल उस समय खुल गई जब पत्नी ने हेल्प लाइन में आकर सच्चाई बताई। हल्प लाइन की काउंसलर श्रीमती संजीता शर्मा ने बताया कि शहर के एक युवक ने हेल्प लाइन को यह आवेदन दिया था कि उसकी पत्नी बार-बार मायके चली जाती है और उसके साथ नहीं रहना चाहती। हल्प लाइन में जुन्नारदेव के माजरी में रहने वाली उसकी पत्नी को बुलाया तो मामला कुछ और ही निकला। उसकी पत्नी ने बताया कि वह टीबी की बीमारी से ग्रस्त थी इस कारण उसका पति उसे साथ नहीं रखना चाहता वह तो अपने पति के साथ रहना चाहती है। हल्प लाइन ने दोनों को आमने-सामने कर बात कराई और टीबी की बीमारी को सामान्य बताया और दवाओं से बीमारी ठीक होने की बात कही। समझाइश में दोनों पति पत्नी फिर से साथ रहने को राजी हो गए जो एक साल से अलग अलग थे। श्रीमती शर्मा ने बताया कि हेल्प लाइन में एक साल में अब तक 250 मामले आ चुके हैं जिनमें 15 प्रकरण ही ऐसे हैं जिन्हें न्यायालय को भेजा गया है, वहीं 16 प्रकरण अभी लंबित ह। इसके अलावा छह अन्य प्रकरणों में भी कार्रवाई चल रही है।
साभार ः राज एक्सप्रेस, 13 Jan, 2008
छिंदवाडा । पारिवारिक विवादों, आपसी नासमझी और घरेलू हिंसा के चलते टूट रहे परिवारों को जोडने में महिला हल्प लाइन ऐसे परिवारों के लिए सेतु का काम कर रही है। एक साल में महिला हेल्प लाइन अब तक 207 परिवारों को जोड चुकी ह। यह वे परिवार हैं जिनमें पति-पत्नी अलग अलग रह रहे थे और जिनके मामले पुलिस थाना से लेकर परिवार परामर्श केन्द्र तक जा चुके थे। हेल्प लाइन में आवेदन आने के बाद काउंसलरों ने दोनों पक्षों को बुलाकर न केवल समझाइश दी बल्कि उनके हालातों का भी अध्ययन किया और फिर समझौता करा दिया। काउंसलरों की बातों से अलग-अलग रह रहे पति-पत्नी फिर से साथ रहने को राजी हो गए। रविवार को भी ऐसे ही एक मामले में हल्प लाइन में एक पति की पोल उस समय खुल गई जब पत्नी ने हेल्प लाइन में आकर सच्चाई बताई। हल्प लाइन की काउंसलर श्रीमती संजीता शर्मा ने बताया कि शहर के एक युवक ने हेल्प लाइन को यह आवेदन दिया था कि उसकी पत्नी बार-बार मायके चली जाती है और उसके साथ नहीं रहना चाहती। हल्प लाइन में जुन्नारदेव के माजरी में रहने वाली उसकी पत्नी को बुलाया तो मामला कुछ और ही निकला। उसकी पत्नी ने बताया कि वह टीबी की बीमारी से ग्रस्त थी इस कारण उसका पति उसे साथ नहीं रखना चाहता वह तो अपने पति के साथ रहना चाहती है। हल्प लाइन ने दोनों को आमने-सामने कर बात कराई और टीबी की बीमारी को सामान्य बताया और दवाओं से बीमारी ठीक होने की बात कही। समझाइश में दोनों पति पत्नी फिर से साथ रहने को राजी हो गए जो एक साल से अलग अलग थे। श्रीमती शर्मा ने बताया कि हेल्प लाइन में एक साल में अब तक 250 मामले आ चुके हैं जिनमें 15 प्रकरण ही ऐसे हैं जिन्हें न्यायालय को भेजा गया है, वहीं 16 प्रकरण अभी लंबित ह। इसके अलावा छह अन्य प्रकरणों में भी कार्रवाई चल रही है।
साभार ः राज एक्सप्रेस, 13 Jan, 2008
मुख्यमन्त्री ने ली प्रसाशनिक कामकाज की खबर
दतिया कलेक्टर की छुट्टी
भोपाल । कलेक्टर दतिया के खिलाफ मुख्यमंत्री की कार्रवाई की सूचना प्रदेशभर में फैलते ही नौकरशाहों के खेमे में हडकंप मच गया। मुख्यमंत्री ने दोपहर में भोपाल से हेलीकाप्टर द्वारा सीधे ही राजगढ जिले के ग्राम दूबली की उडान भरी। साथ ही वे दतिया जिले में भी पहुंचे। उनके साथ जनसंफ सचिव मनोज श्रीवास्तव भी थे। भ्रमण की प्रमुख विशेषता यह रही कि मुख्यमंत्री चौहान स्वयं जन-समस्याओं के नोट्स अपनी डायरी में अंकित कर रहे थे। मुख्यमंत्री दतिया जिले की सेवढा तहसील के ग्राम गोहना में शिक्षकों के नियमित विद्यालय आने एवं मध्यान्ह भोजन व्यवस्था की जानकारी प्राप्त की। ग्रामीणों ने सिंचाई सुविधा बढाने का आग्रह किया। प्राथमिक कृषि साख समिति के निरीक्षण के दौरान ग्रामीणों ने मिट्टी का तेल नियमित न मिलने की शिकायत की। ग्रामीणों ने एक उप स्वास्थ्य केंद्र शुरू करने का सुझाव दिया। मुख्यमंत्री श्री चौहान के अचानक दतिया जिले में पहचने की जानकारी मिलते ही ग्वालियर कमिश्नर डॉ. कोमल सिंह, दतिया कलेक्टर अशोक शिवहरे, पुलिस अधीक्षक एवं अन्य प्रशासनिक अधिकारी उनसे मुलाकात करने पहुंचे। मुख्यमंत्री ने संभागायुक्त को ग्रामीणों द्वारा प्राप्त आवेदनों पर (शेष पेज 9 पर)तत्काल आवश्यक कार्यवाही करने के निर्देश दिए। आकस्मिक निरीक्षण में अनुपस्थित एवं कार्य के प्रति लापरवाह अधिकारी, कर्मचारियों विरुद्ध वैधानिक कदम उठाने की हिदायत दी। भ्रमण के दौरान बाइक का सहारा -मुख्यमंत्री ने ग्राम गोहना में भ्रमण के बाद वहां से धीरपुरा पहुंचने के लिए बाइक का सहारा लिया। खेतो-खलिहानों के बीच से मोटर साइकिल द्वारा उन्होंने अपनी निरीक्षण यात्रा शुरू की। माथे पर गमछा बांधने के बाद भी उन्हें पहचानने में अधिकांश ग्रामीणों ने कोई गलती नहीं की। मोटरसाइकिल सवार युवक के साथ मुख्यमंत्री श्री चौहान गांव धीरपुरा के थाने पहुंचे। पुलिस द्वारा दर्ज शिकायतों पर की गई कार्यवाही का हाल जानने के बाद उन्होंने सीधे जनता से कानून व्यवस्था और पुलिस की भूमिका पर बातचीत की। शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई, परिवहन, सार्वजनिक वितरण प्रणाली आदि के कामकाज के बारे में वे ग्रामीणों से निरंतर बातचीत करते रहे। उन्होंने ग्रामवासियों से सरकारी विभागों की कार्यप्रणाली के बारे में प्रश्न किए। पर्चिंयां लिखकर सौंपे आवेदन -ग्रामीणों ने छोटी-छोटी पर्चियों पर लिखकर अपने आवेदन मुख्यमंत्री को सौंपे। मुख्यमंत्री ने इन आवेदनों पर जल्द कार्यवाही के निर्देश दिए। शिकायत पर चंद मिनटों में कार्रवाई -ग्राम दूबली में रामगोपाल साहू ने मुख्यमंत्री से शिकायत की थी कि उन्हें बीपीएल कार्ड देने के लिए सरपंच 5॰॰ रुपए की मांग कर रहा था, लेकिन मैंने उसे नहीं दिए। फिर बीपीएल कार्ड हमें जनपद पंचायत से जून माह में मिला। मुख्यमंत्री ने तुरंत कार्रवाई की और उनके निर्देश पर कलेक्टर ने रामगोपाल साहू से बात की तथा सरपंच द्वारा पैसे मांगने की जांच मौके पर तहसीलदार से कराई और सरपंच के विरुद्ध कार्रवाई के निर्देश दिए।
साभार ः राज एक्सप्रेस, 14 Jan, 2008 01:33 AM
दतिया कलेक्टर की छुट्टी
भोपाल । कलेक्टर दतिया के खिलाफ मुख्यमंत्री की कार्रवाई की सूचना प्रदेशभर में फैलते ही नौकरशाहों के खेमे में हडकंप मच गया। मुख्यमंत्री ने दोपहर में भोपाल से हेलीकाप्टर द्वारा सीधे ही राजगढ जिले के ग्राम दूबली की उडान भरी। साथ ही वे दतिया जिले में भी पहुंचे। उनके साथ जनसंफ सचिव मनोज श्रीवास्तव भी थे। भ्रमण की प्रमुख विशेषता यह रही कि मुख्यमंत्री चौहान स्वयं जन-समस्याओं के नोट्स अपनी डायरी में अंकित कर रहे थे। मुख्यमंत्री दतिया जिले की सेवढा तहसील के ग्राम गोहना में शिक्षकों के नियमित विद्यालय आने एवं मध्यान्ह भोजन व्यवस्था की जानकारी प्राप्त की। ग्रामीणों ने सिंचाई सुविधा बढाने का आग्रह किया। प्राथमिक कृषि साख समिति के निरीक्षण के दौरान ग्रामीणों ने मिट्टी का तेल नियमित न मिलने की शिकायत की। ग्रामीणों ने एक उप स्वास्थ्य केंद्र शुरू करने का सुझाव दिया। मुख्यमंत्री श्री चौहान के अचानक दतिया जिले में पहचने की जानकारी मिलते ही ग्वालियर कमिश्नर डॉ. कोमल सिंह, दतिया कलेक्टर अशोक शिवहरे, पुलिस अधीक्षक एवं अन्य प्रशासनिक अधिकारी उनसे मुलाकात करने पहुंचे। मुख्यमंत्री ने संभागायुक्त को ग्रामीणों द्वारा प्राप्त आवेदनों पर (शेष पेज 9 पर)तत्काल आवश्यक कार्यवाही करने के निर्देश दिए। आकस्मिक निरीक्षण में अनुपस्थित एवं कार्य के प्रति लापरवाह अधिकारी, कर्मचारियों विरुद्ध वैधानिक कदम उठाने की हिदायत दी। भ्रमण के दौरान बाइक का सहारा -मुख्यमंत्री ने ग्राम गोहना में भ्रमण के बाद वहां से धीरपुरा पहुंचने के लिए बाइक का सहारा लिया। खेतो-खलिहानों के बीच से मोटर साइकिल द्वारा उन्होंने अपनी निरीक्षण यात्रा शुरू की। माथे पर गमछा बांधने के बाद भी उन्हें पहचानने में अधिकांश ग्रामीणों ने कोई गलती नहीं की। मोटरसाइकिल सवार युवक के साथ मुख्यमंत्री श्री चौहान गांव धीरपुरा के थाने पहुंचे। पुलिस द्वारा दर्ज शिकायतों पर की गई कार्यवाही का हाल जानने के बाद उन्होंने सीधे जनता से कानून व्यवस्था और पुलिस की भूमिका पर बातचीत की। शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई, परिवहन, सार्वजनिक वितरण प्रणाली आदि के कामकाज के बारे में वे ग्रामीणों से निरंतर बातचीत करते रहे। उन्होंने ग्रामवासियों से सरकारी विभागों की कार्यप्रणाली के बारे में प्रश्न किए। पर्चिंयां लिखकर सौंपे आवेदन -ग्रामीणों ने छोटी-छोटी पर्चियों पर लिखकर अपने आवेदन मुख्यमंत्री को सौंपे। मुख्यमंत्री ने इन आवेदनों पर जल्द कार्यवाही के निर्देश दिए। शिकायत पर चंद मिनटों में कार्रवाई -ग्राम दूबली में रामगोपाल साहू ने मुख्यमंत्री से शिकायत की थी कि उन्हें बीपीएल कार्ड देने के लिए सरपंच 5॰॰ रुपए की मांग कर रहा था, लेकिन मैंने उसे नहीं दिए। फिर बीपीएल कार्ड हमें जनपद पंचायत से जून माह में मिला। मुख्यमंत्री ने तुरंत कार्रवाई की और उनके निर्देश पर कलेक्टर ने रामगोपाल साहू से बात की तथा सरपंच द्वारा पैसे मांगने की जांच मौके पर तहसीलदार से कराई और सरपंच के विरुद्ध कार्रवाई के निर्देश दिए।
साभार ः राज एक्सप्रेस, 14 Jan, 2008 01:33 AM
जाति प्रमाण-पत्र बनाना टेढी खीर
भोपाल। स्थायी जाति प्रमाण-पत्र बनाने की प्रक्रिया जटिल हो गई है। इसके लिए मांगे जा रहे दस्तावेजों की अनुपलब्धता के चलते अनुसूचित जाति, जनजाति के लोगों को कई परेशानियां उठाना पड रही हैं। शासन द्वारा अनु. जाति, जनजाति के स्थायी जाति प्रमाण-पत्र बनाने के लिए 195॰ का निवास संबंधी प्रमाण-पत्र अनिवार्य कर दिया गया है। गौरतलब है कि 195॰ के दौर में इस जाति के अधिकतर लोग अनपढ और घुमक्कड प्रवृत्ति के हुआ करते थे। मजदूरी के लिए एक जगह से दूसरी जगह भटकते थे। इससे उस अवधि में इनका स्थायी ठिकाना नहीं होता था। वहीं 195॰ में मप्र मध्य भारत हुआ करता था और इसकी राजधानी नागपुर थी। साथ ही शासकीय नियमानुसार पूर्व में 12 वर्ष से अधिक के रिकार्ड को नष्ट कर दिया जाता था, जिसके चलते भी उस अवधि का रिकार्ड मिलना मुश्किल है। क्या हो रहा असर ः जाति प्रमाण -पत्र बनवाने में आ रही दिक्कतों के चलते अनु. जाति, जनजाति के लोगों को स्कूल, कालेजों में प्रवेश, छात्रवृत्ति, ऋण और कल्याणकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। सरल हो प्रक्रिया ः मप्र कांग्रेस कमेटी स्वयंसेवी संगठन प्रकोष्ठ के उपाध्यक्ष कैलाश गुप्ता ने अजा-जजा के प्रमाण-पत्र बनाने की प्रक्रिया सरल करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि 5॰ साल पूर्व के दस्तावेज मांगने की की अनिवार्यता समाप्त की जानी चाहिए।दस्तावेजों में से सन् 195॰ का स्थायी निवास प्रमाण संबंधी दस्तावेज बनाने की अनिवार्यता समाप्त की जाए।
साभार ः राज एक्सप्रेस, 14 Jan, 2008 01:33 AM
भोपाल। स्थायी जाति प्रमाण-पत्र बनाने की प्रक्रिया जटिल हो गई है। इसके लिए मांगे जा रहे दस्तावेजों की अनुपलब्धता के चलते अनुसूचित जाति, जनजाति के लोगों को कई परेशानियां उठाना पड रही हैं। शासन द्वारा अनु. जाति, जनजाति के स्थायी जाति प्रमाण-पत्र बनाने के लिए 195॰ का निवास संबंधी प्रमाण-पत्र अनिवार्य कर दिया गया है। गौरतलब है कि 195॰ के दौर में इस जाति के अधिकतर लोग अनपढ और घुमक्कड प्रवृत्ति के हुआ करते थे। मजदूरी के लिए एक जगह से दूसरी जगह भटकते थे। इससे उस अवधि में इनका स्थायी ठिकाना नहीं होता था। वहीं 195॰ में मप्र मध्य भारत हुआ करता था और इसकी राजधानी नागपुर थी। साथ ही शासकीय नियमानुसार पूर्व में 12 वर्ष से अधिक के रिकार्ड को नष्ट कर दिया जाता था, जिसके चलते भी उस अवधि का रिकार्ड मिलना मुश्किल है। क्या हो रहा असर ः जाति प्रमाण -पत्र बनवाने में आ रही दिक्कतों के चलते अनु. जाति, जनजाति के लोगों को स्कूल, कालेजों में प्रवेश, छात्रवृत्ति, ऋण और कल्याणकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। सरल हो प्रक्रिया ः मप्र कांग्रेस कमेटी स्वयंसेवी संगठन प्रकोष्ठ के उपाध्यक्ष कैलाश गुप्ता ने अजा-जजा के प्रमाण-पत्र बनाने की प्रक्रिया सरल करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि 5॰ साल पूर्व के दस्तावेज मांगने की की अनिवार्यता समाप्त की जानी चाहिए।दस्तावेजों में से सन् 195॰ का स्थायी निवास प्रमाण संबंधी दस्तावेज बनाने की अनिवार्यता समाप्त की जाए।
साभार ः राज एक्सप्रेस, 14 Jan, 2008 01:33 AM
अभी दूर है नर्मदा जल भोपाल से
भोपाल। सरकार भले ही चुनाव के पहले नर्मदा जल भोपाल लाना चाहती है, लेकिन इसमें अभी दो से तीन साल लग सकते हें। खास बात यह है कि अब तक शहर में जल वितरण का प्लान नहीं बन पाया है। लगभग 300 करोड रुपए की लागत से नर्मदा जल भोपाल लाने की योजना है। इसके लिए टेंडर आदि की प्रक्रिया पूरी कर ली गई है और कार्यादेश भी दे दिए गए हैं। यह कार्य पीएचई द्वारा किया जा रहा है। वैसे तो यह काम 2॰॰8 में पूरा होना था, लेकिन टेंडर आदि की प्रक्रिया में इतना विलंब हुआ कि अब यह 2॰॰9 तक पूरी होने की उम्मीद है। पीएचई का काम केवल नर्मदा जल को जेल पहाडी तक छोडने का है। इसके बाद शहर में जल वितरण कराने की जवाबदारी नगर निगम को सौंपी गई है। इस पर लगभग 25॰ करोड रुपए खर्च होना है। नगर निगम अब तक इस योजना का प्रारूप भी नहीं बना पाया है। यह योजना तीन चरणों में पूरी की जानी है। अभी तक केवल एक चरण की योजना बनी है। दो चरणों की योजना बनने में ही चार माह का समय लगेगा। इस तरह निगम द्वारा यह कार्य वर्ष 2010 तक पूरा किया जाएगा। सर्वे का काम जारी महापौर सुनील सूद ने बताया कि सर्वे का कार्य चल रहा है। नर्मदा जल भोपाल आने के साथ ही इसके वितरण की व्यवस्था पूरी हो जाएगी।
साभार ः राज एक्सप्रेस, 14 Jan, 2008 01:32 AM
भोपाल। सरकार भले ही चुनाव के पहले नर्मदा जल भोपाल लाना चाहती है, लेकिन इसमें अभी दो से तीन साल लग सकते हें। खास बात यह है कि अब तक शहर में जल वितरण का प्लान नहीं बन पाया है। लगभग 300 करोड रुपए की लागत से नर्मदा जल भोपाल लाने की योजना है। इसके लिए टेंडर आदि की प्रक्रिया पूरी कर ली गई है और कार्यादेश भी दे दिए गए हैं। यह कार्य पीएचई द्वारा किया जा रहा है। वैसे तो यह काम 2॰॰8 में पूरा होना था, लेकिन टेंडर आदि की प्रक्रिया में इतना विलंब हुआ कि अब यह 2॰॰9 तक पूरी होने की उम्मीद है। पीएचई का काम केवल नर्मदा जल को जेल पहाडी तक छोडने का है। इसके बाद शहर में जल वितरण कराने की जवाबदारी नगर निगम को सौंपी गई है। इस पर लगभग 25॰ करोड रुपए खर्च होना है। नगर निगम अब तक इस योजना का प्रारूप भी नहीं बना पाया है। यह योजना तीन चरणों में पूरी की जानी है। अभी तक केवल एक चरण की योजना बनी है। दो चरणों की योजना बनने में ही चार माह का समय लगेगा। इस तरह निगम द्वारा यह कार्य वर्ष 2010 तक पूरा किया जाएगा। सर्वे का काम जारी महापौर सुनील सूद ने बताया कि सर्वे का कार्य चल रहा है। नर्मदा जल भोपाल आने के साथ ही इसके वितरण की व्यवस्था पूरी हो जाएगी।
साभार ः राज एक्सप्रेस, 14 Jan, 2008 01:32 AM
बांद्रा में होगा नदी महोत्सव
भोपाल । अंतरराष्ट्रीय नदी महोत्सव का आयोजन 23 से 25 फरवरी तक नर्मदा और तवा नदी के संगम बांद्राभान में होगा। नर्मदा समग्र के तत्वावधान में आयोजित इस महोत्सव में देश-विदेश के विशेषज्ञ शामिल होंगे। यह जानकारी नदी महोत्सव संरक्षक मंडल के सदस्य और चिंतक अनिल माधव दवे ने रविवार को पत्रकार वार्ता में दी। इस मौके पर पर्यटन विकास निगम के अध्यक्ष धु*वनारायण सिंह भी मौजूद थे। दवे ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय नदी महोत्सव-2॰॰8 नदियों के जलग्रहण क्षेत्र को प्रभावित करने वाले, नदी में जल लाने के तंत्र और नदियों के विषय विशेष पर केंद्रित होगा। संगोष्ठी में निर्णयकर्ता, विवि के शोधार्थी, तकनीकी विशेषज्ञ, नर्मदा सेवा और नदी संरक्षण प्रबंधन के प्रति चिंतित देश, विदेश के जन शामिल होंगे। संगोष्ठी में चिंतन के लिए 13 विषय निर्धारित किए गए हैं। सिर्फ नदियों पर केंद्रित यह समागम देश का पहला आयोजन है। उन्होंने बताया कि आयोजन में अनुभव और अनुसंधान से नदी के विभिन्न पक्षों पर एक दिशा तय करने का प्रयास किया जाएगा। दवे के मुताबिक मध्यप्रदेश में पर्यटन की (शेष पेज 9 पर)संभावनाएं खासतौर से नदी किनारे काफी हैं। तीन दिनी नदी महोत्सव का उद्देश्य नदी संसार के सभी पक्षों पर संवेदनशील और त्वरित हस्तक्षेप में गहरी रुचि रखने वाले प्रतिबद्घ कार्यकर्ता को एकत्र कर नदी के सभी आयामों पर चिंतन करना है। चिंतन के विषयपानी, किनारे, जंगल, भूमि, जनजीवन, प्रदूषण, संस्कृति, कृषि नदी का अर्थशास्त्र, जैव विविधता, नदी और सरकार, स्वयं संस्थाएं, विविध।
साभार ः राज एक्सप्रेस14 Jan, 2008 01:25 AM
भोपाल । अंतरराष्ट्रीय नदी महोत्सव का आयोजन 23 से 25 फरवरी तक नर्मदा और तवा नदी के संगम बांद्राभान में होगा। नर्मदा समग्र के तत्वावधान में आयोजित इस महोत्सव में देश-विदेश के विशेषज्ञ शामिल होंगे। यह जानकारी नदी महोत्सव संरक्षक मंडल के सदस्य और चिंतक अनिल माधव दवे ने रविवार को पत्रकार वार्ता में दी। इस मौके पर पर्यटन विकास निगम के अध्यक्ष धु*वनारायण सिंह भी मौजूद थे। दवे ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय नदी महोत्सव-2॰॰8 नदियों के जलग्रहण क्षेत्र को प्रभावित करने वाले, नदी में जल लाने के तंत्र और नदियों के विषय विशेष पर केंद्रित होगा। संगोष्ठी में निर्णयकर्ता, विवि के शोधार्थी, तकनीकी विशेषज्ञ, नर्मदा सेवा और नदी संरक्षण प्रबंधन के प्रति चिंतित देश, विदेश के जन शामिल होंगे। संगोष्ठी में चिंतन के लिए 13 विषय निर्धारित किए गए हैं। सिर्फ नदियों पर केंद्रित यह समागम देश का पहला आयोजन है। उन्होंने बताया कि आयोजन में अनुभव और अनुसंधान से नदी के विभिन्न पक्षों पर एक दिशा तय करने का प्रयास किया जाएगा। दवे के मुताबिक मध्यप्रदेश में पर्यटन की (शेष पेज 9 पर)संभावनाएं खासतौर से नदी किनारे काफी हैं। तीन दिनी नदी महोत्सव का उद्देश्य नदी संसार के सभी पक्षों पर संवेदनशील और त्वरित हस्तक्षेप में गहरी रुचि रखने वाले प्रतिबद्घ कार्यकर्ता को एकत्र कर नदी के सभी आयामों पर चिंतन करना है। चिंतन के विषयपानी, किनारे, जंगल, भूमि, जनजीवन, प्रदूषण, संस्कृति, कृषि नदी का अर्थशास्त्र, जैव विविधता, नदी और सरकार, स्वयं संस्थाएं, विविध।
साभार ः राज एक्सप्रेस14 Jan, 2008 01:25 AM
गंगा जैसी बालिकाएं शिक्षा से वंचित क्यों?
धर्मग्रंथों में यह उल्लेख है कि प्राचीनकाल में भगवान शिव ने गंगा नदी को अपने सिर पर धारण कर उसका मान-सम्मान बढाया था। कहते है, गंगा के किनारे आकर कोई निराश नहीं होता। बहरहाल, हम यहां जिस गंगा का जिक्र कर रहे हैं, वह कोई नदी नहीं, बल्कि एक मूक-बधिर आदिवासी बालिका है, जो अपने लिए सरकार की मदद का इंतजार कर रही है। गरीबी, अभाव, अशिक्षा से संघर्ष करती ग्रामीण परिवेश की इस बालिका को एक ऐसे किनारे की तलाश है, जहां उसका जीवन बेहतर बनाए जाने की बुनियाद रखी जा सके। जाहिर है यह बुनियाद गंगा को पढाई-लिखाई से जोडकर रखी जा सकती है। गंगा खुद भी स्कूल जाना चाहती है, लेकिन आज तक उसको किसी स्कूल में प्रवेश नहीं मिल पाया है। आदिवासी बालक-बालिकाओं को शिक्षा से जोडने के लिए जो कार्यक्रम प्रदेश में संचालित किए जा रहे हैं, वे अभी गंगा जैसी जरूरतमंद बालिकाओं तक नहीं पहुंच पाए हैं।मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल जिले झाबुआ के पेटलावद विकासखंड अंतर्गत कासबी नामक गांव में गंगा का पालन-पोषण उसके परिवारजनों द्वारा किया जा रहा है। उसके पिता गोविंद पारधी कहते हैं, बाबूजी, यह न तो बोल सकती है न सुन सकती है, इसे दिखाई भी कम देता है, लेकिन समझती खूब है। यह पढना चाहती है। मैं इसे पढाने के लिए जहां-जहां जाकर फरियाद कर सकता था, कर चुका हूं। कोई नतीजा नहीं निकला। फिलहाल तो गंगा समझदारी के साथ घर का कामकाज करती है, लेकिन आगे इसका क्या होगा? मैं चाहता हूं कुछ पढने-लिखने लायक हो जाए तो जिंदगी आराम से कटेगी। गोविंद का सवाल है कि क्या गंगा जैसी मूक-बधिर बालिकाओं को पढाने-लिखाने के लिए कोई स्कूल है? यदि है, तो वहां गंगा को कैसे भर्ती किया जा सकता है।बता दें कि झाबुआ जिले में एक अकेली गंगा ही नहीं है, जो सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का किनारा ढूंढ रही है। केवल झाबुआ जिले के ही ग्राम नसिया, जोगडिया, धावली, पलासडी, धावल्या, देवली, छोटा सूलूनिया, सामली, कासबी, सारंगी, बरवेट जैसे अनेक गांवों के विकलांग बच्चे, आदिवासी बालिक-बालिकाएं स्कूल में प्रवेश नहीं ले पाए हैं। स्कूल में इन बच्चों के प्रवेश नहीं लेने के कुछ व्यक्तिगत या पारिवारिक कारण भी हो सकते हैं, लेकिन जो माता-पिता अपने बच्चों को पढाना चाहते हैं, वे गोविंद पारधी की तरह क्यों भटक रहे हैं।
साभार ः राज एक्स्प्रेस, 13 Jan, 2008 11:42 PM
धर्मग्रंथों में यह उल्लेख है कि प्राचीनकाल में भगवान शिव ने गंगा नदी को अपने सिर पर धारण कर उसका मान-सम्मान बढाया था। कहते है, गंगा के किनारे आकर कोई निराश नहीं होता। बहरहाल, हम यहां जिस गंगा का जिक्र कर रहे हैं, वह कोई नदी नहीं, बल्कि एक मूक-बधिर आदिवासी बालिका है, जो अपने लिए सरकार की मदद का इंतजार कर रही है। गरीबी, अभाव, अशिक्षा से संघर्ष करती ग्रामीण परिवेश की इस बालिका को एक ऐसे किनारे की तलाश है, जहां उसका जीवन बेहतर बनाए जाने की बुनियाद रखी जा सके। जाहिर है यह बुनियाद गंगा को पढाई-लिखाई से जोडकर रखी जा सकती है। गंगा खुद भी स्कूल जाना चाहती है, लेकिन आज तक उसको किसी स्कूल में प्रवेश नहीं मिल पाया है। आदिवासी बालक-बालिकाओं को शिक्षा से जोडने के लिए जो कार्यक्रम प्रदेश में संचालित किए जा रहे हैं, वे अभी गंगा जैसी जरूरतमंद बालिकाओं तक नहीं पहुंच पाए हैं।मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल जिले झाबुआ के पेटलावद विकासखंड अंतर्गत कासबी नामक गांव में गंगा का पालन-पोषण उसके परिवारजनों द्वारा किया जा रहा है। उसके पिता गोविंद पारधी कहते हैं, बाबूजी, यह न तो बोल सकती है न सुन सकती है, इसे दिखाई भी कम देता है, लेकिन समझती खूब है। यह पढना चाहती है। मैं इसे पढाने के लिए जहां-जहां जाकर फरियाद कर सकता था, कर चुका हूं। कोई नतीजा नहीं निकला। फिलहाल तो गंगा समझदारी के साथ घर का कामकाज करती है, लेकिन आगे इसका क्या होगा? मैं चाहता हूं कुछ पढने-लिखने लायक हो जाए तो जिंदगी आराम से कटेगी। गोविंद का सवाल है कि क्या गंगा जैसी मूक-बधिर बालिकाओं को पढाने-लिखाने के लिए कोई स्कूल है? यदि है, तो वहां गंगा को कैसे भर्ती किया जा सकता है।बता दें कि झाबुआ जिले में एक अकेली गंगा ही नहीं है, जो सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का किनारा ढूंढ रही है। केवल झाबुआ जिले के ही ग्राम नसिया, जोगडिया, धावली, पलासडी, धावल्या, देवली, छोटा सूलूनिया, सामली, कासबी, सारंगी, बरवेट जैसे अनेक गांवों के विकलांग बच्चे, आदिवासी बालिक-बालिकाएं स्कूल में प्रवेश नहीं ले पाए हैं। स्कूल में इन बच्चों के प्रवेश नहीं लेने के कुछ व्यक्तिगत या पारिवारिक कारण भी हो सकते हैं, लेकिन जो माता-पिता अपने बच्चों को पढाना चाहते हैं, वे गोविंद पारधी की तरह क्यों भटक रहे हैं।
साभार ः राज एक्स्प्रेस, 13 Jan, 2008 11:42 PM
Friday, January 11, 2008

गोशालाओं को दुधारू बनाना चाहते हैं मोदी
मुंबई [ओमप्रकाश तिवारी]। बिहार सरकार अब अपने राज्य की गोशालाओं को आत्मनिर्भर बनाने की योजना पर विचार करने लगी है। राज्य के उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी यह काम संघ परिवार की संस्था केशवसृष्टि द्वारा चलाई जा रही गोशाला की तर्ज पर करना चाहते हैं।
पिछले सप्ताह गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथग्रहण समारोह में हिस्सा लेने आए मोदी ने मुंबई से 60 किलोमीटर दूर स्थित इस गोशाला को न सिर्फ जाकर देखा, बल्कि इसकी संचालन पद्धति को भी गहरी रुचि लेकर समझा। लगभग दो सौ देसी गायों वाली यह गोशाला गोबर एवं गोमूत्र से बनने वाले उत्पादों को बेचकर प्रतिवर्ष 50 लाख रुपये कमा रही है। इस राशि में दूध से होने वाली आय शामिल नहीं है। गोशाला का सारा दूध केशवसृष्टि द्वारा संचालित एक आवासीय विद्यालय के काम आ जाता है।
केशवसृष्टि के सचिव सतीश सिन्नरकर के अनुसार पूर्णतया व्यावसायिक तरीके से इस गोशाला का संचालन करके संस्था किसानों को यह बताना चाहती है कि देसी गायें दुधारू न होते हुए भी हर महीने करीब दो हजार रुपये की आमदनी करवा सकती हैं।
गौरतलब है कि इस गोशाला की दो सौ में से करीब 60 गायें ही एक समय में दूध देती हैं। इन गायों के गोबर एवं गोमूत्र से शैंपू, साबुन, गोमूत्र अर्क, गोमूत्र टैबलेट जैसे 25 से अधिक उत्पाद बनाकर अच्छी पैकिंग के साथ बेचे जाते हैं। इसके अलावा गोशाला में जन्म लेने वाले बछड़ा-बछड़ी गरीब किसानों को इस शर्त के साथ नि:शुल्क दे दिए जाते हैं कि वे उनका उपयोग आमदनी बढ़ाने के लिए करें, लेकिन यदि वे उन्हें रख पाने में सक्षम न हों तो पुन: गोशाला को वापस कर जाएं।
गौरतलब है कि बिहार अकेला राज्य है जिसने गोशाला कानून बना रखा है। राज्य में करीब 80 गोशालाएं हैं, जिनके लिए हजारों एकड़ जमीन आरक्षित रखी गई है। लेकिन ये सभी गोशालाएं जर्जर स्थिति में हैं। केशवसृष्टि की गोशाला देखने के बाद सुशील मोदी ने बिहार की गोशालाओं का विकास भी उपरोक्त गोशाला की तर्ज पर करने की इच्छा जताई है। इसके लिए उन्होंने केशवसृष्टि से तकनीकी मदद एवं प्रशिक्षण मुहैया कराने का आग्रह भी किया है।
साभार दैनिक जागरण : Dec 31, 07:49 pm
माडर्न जमाने में भी टोटके का बोलबाला
दिल्ली। हम इक्कीसवीं सदी के आठवें साल में आ चुके हैं, लेकिन कुछ पुरानी मान्यताएं और वर्जनाएं अभी भी हमारा पीछा नहीं छोड़ रही हैं। उल्टे ये नई पीढ़ी के लोगों को भी अपना शिकार बना रही हैं। इन्हीं में से एक है तरह-तरह के टोटके आजमाना।
हमने अक्सर अपने किसी प्रिय बल्लेबाज को मैदान पर कोई खास टोटका आजमाते देखा है। फिल्म स्टारों की ऐसी आदतें तो अक्सर मीडिया की सुर्खियां बन जाती हैं। यदि हम आस-पास नजर दौड़ाएं तो तमाम लोग मिल जाएंगे जिन्होंने टोटके के रूप में विचित्र आदतें अपना रखी हैं। इनमें युवाओं की तादाद भी अच्छी-खासी है। कोई पीली शर्ट शुभ मानता है तो कोई नौकरी पाने के लिए उपवास रखता है।
विशेषज्ञ भी मानते हैं कि आजकल युवाओं में अंधविश्वास या अजीबोगरीब मान्यताओं के प्रति रुझान बढ़ा है। वे इसे 'मैजिकल हीलिंग' कहते हैं। उनके अनुसार यह मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है। इसके तहत किसी अनजाने डर की खातिर मनोवांछित फल पाने के लिए कोई बेकार की आदत पाल ली जाती है। लोग विशेष रंग के कपड़े पहनकर या कोई विशेष चीज रखकर सफलता की राह की बाधाएं दूर करने की कोशिश करते हैं। लेकिन एक सीमा के बाद यह आदत समस्या बन सकती है।
कुछ पुरानी मान्यताओं व वर्जनाओं का प्रभाव हम आज भी इतनी शिद्दत से महसूस करते हैं जिसका प्रभाव हमारी रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ने लगता है। अब एचडीएफसी बैंक के एक्जीक्यूटिव यशदीप सक्सेना को ही लीजिए। सक्सेना वर्षो से रोज सुबह 30-45 मिनट पूजा करते आ रहे हैं। इन्हें लगता है जिस दिन पूजा नहीं करते, कुछ न कुछ बुरा हो जाता है। वहीं मोनिका लालचंदानी की बेटी हमेशा नीला लिबास ही पहनती हैं। उसे लगता है यह उसका लकी कलर है। इतना ही नहीं वह नीले रंग पर जितना भरोसा करती है, लाल से उतना ही डरती भी है। रोज-रोज नीली ड्रेस पहनकर आने पर बास, दोस्तों और सहकर्मियों के टोकने का भी उन पर असर नहीं पड़ता।
सर गंगा राम अस्पताल में मनोवैज्ञानिक डाक्टर रोमा कुमार बताती हैं कि आज के युवाओं ने ऐसी तमाम आदतें अपना ली हैं। इच्छा पूर्ति के लिए विशेष रंग के कपड़े पहनना, पुराने रिवाजों पर अंधविश्वास या टोटके आजमाना एक तरह की मनोवैज्ञानिक निर्भरता है। डाक्टर रोमा के मुताबिक परीक्षा में किसी विशेष कलम से ही लिखना, कोई विशेष ज्वेलरी या कंगन पहनना, किसी विशेष रंग से ज्यादा मोह या अनोखे तरीके से बैठना तो यही दिखाता है। लेकिन एक सीमा के बाद यह परेशानी भी बन सकता है।
saabhaar : dainik jagran Dec 31, 08:43 pm
दिल्ली। हम इक्कीसवीं सदी के आठवें साल में आ चुके हैं, लेकिन कुछ पुरानी मान्यताएं और वर्जनाएं अभी भी हमारा पीछा नहीं छोड़ रही हैं। उल्टे ये नई पीढ़ी के लोगों को भी अपना शिकार बना रही हैं। इन्हीं में से एक है तरह-तरह के टोटके आजमाना।
हमने अक्सर अपने किसी प्रिय बल्लेबाज को मैदान पर कोई खास टोटका आजमाते देखा है। फिल्म स्टारों की ऐसी आदतें तो अक्सर मीडिया की सुर्खियां बन जाती हैं। यदि हम आस-पास नजर दौड़ाएं तो तमाम लोग मिल जाएंगे जिन्होंने टोटके के रूप में विचित्र आदतें अपना रखी हैं। इनमें युवाओं की तादाद भी अच्छी-खासी है। कोई पीली शर्ट शुभ मानता है तो कोई नौकरी पाने के लिए उपवास रखता है।
विशेषज्ञ भी मानते हैं कि आजकल युवाओं में अंधविश्वास या अजीबोगरीब मान्यताओं के प्रति रुझान बढ़ा है। वे इसे 'मैजिकल हीलिंग' कहते हैं। उनके अनुसार यह मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है। इसके तहत किसी अनजाने डर की खातिर मनोवांछित फल पाने के लिए कोई बेकार की आदत पाल ली जाती है। लोग विशेष रंग के कपड़े पहनकर या कोई विशेष चीज रखकर सफलता की राह की बाधाएं दूर करने की कोशिश करते हैं। लेकिन एक सीमा के बाद यह आदत समस्या बन सकती है।
कुछ पुरानी मान्यताओं व वर्जनाओं का प्रभाव हम आज भी इतनी शिद्दत से महसूस करते हैं जिसका प्रभाव हमारी रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ने लगता है। अब एचडीएफसी बैंक के एक्जीक्यूटिव यशदीप सक्सेना को ही लीजिए। सक्सेना वर्षो से रोज सुबह 30-45 मिनट पूजा करते आ रहे हैं। इन्हें लगता है जिस दिन पूजा नहीं करते, कुछ न कुछ बुरा हो जाता है। वहीं मोनिका लालचंदानी की बेटी हमेशा नीला लिबास ही पहनती हैं। उसे लगता है यह उसका लकी कलर है। इतना ही नहीं वह नीले रंग पर जितना भरोसा करती है, लाल से उतना ही डरती भी है। रोज-रोज नीली ड्रेस पहनकर आने पर बास, दोस्तों और सहकर्मियों के टोकने का भी उन पर असर नहीं पड़ता।
सर गंगा राम अस्पताल में मनोवैज्ञानिक डाक्टर रोमा कुमार बताती हैं कि आज के युवाओं ने ऐसी तमाम आदतें अपना ली हैं। इच्छा पूर्ति के लिए विशेष रंग के कपड़े पहनना, पुराने रिवाजों पर अंधविश्वास या टोटके आजमाना एक तरह की मनोवैज्ञानिक निर्भरता है। डाक्टर रोमा के मुताबिक परीक्षा में किसी विशेष कलम से ही लिखना, कोई विशेष ज्वेलरी या कंगन पहनना, किसी विशेष रंग से ज्यादा मोह या अनोखे तरीके से बैठना तो यही दिखाता है। लेकिन एक सीमा के बाद यह परेशानी भी बन सकता है।
saabhaar : dainik jagran Dec 31, 08:43 pm
रुपहला पर्दा न्याय नहीं करता रंगकर्म से
नई दिल्ली [वंदना गुप्ता]। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय [एनएसडी] की निदेशक अनुराधा कपूर चिंतित हैं। उनकी चिंता का मुख्य कारण यह है कि अफगानिस्तान का नाट्य दल भारत आ पाएगा या नहीं। ये कलाकार आएंगे, तो लोगों को यह समझने में मदद मिलेगी कि अफगानिस्तान के मुश्किल हालात के बावजूद कैसे रंगकर्म वहां अब भी सांस ले रहा है।
संस्कृति और रंगकर्म में जिनकी तनिक भी रुचि है, उनके लिए खबर यह है कि दिल्ली स्थित राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय अपने जीवन के 50 साल पूरे करने जा रहा है। वहीं उसके द्वारा आयोजित किए जाने वाले भारत रंग महोत्सव की 10वीं बारी है। इस कारण उसने इसे विशेष रूप से मनाने का फैसला किया है। इसका फोकस उसने अपने पूर्व छात्रों पर रखा है। आयोजन शुरू हो चुका है, जिसमें 18 दिनों तक देश-विदेश के नाट्यकर्मी अपनी कला की जीवंत प्रस्तुति करेंगे। इसमें 1150 कलाकार शिरकत कर रहे हैं और 77 कार्यक्रम पेश किए जाएंगे।
महोत्सव में विभिन्न राज्यों के साथ अफगानिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल, स्विट्जरलैंड, पोलैंड, इंग्लैंड, नार्वे, मारीशस, चीन व जापान के कलाकार आएंगे। पाकिस्तान के दो नाटकों इमरान पीरजादा का 'अंखियांवालेओ' व शाहिद नदीम के निर्देशन में 'बुरक ावेगेंजा' का मंचन होगा। अफगानिस्तान के दो नाटकों -'क्राई आफ हिस्ट्री' और 'द काकेशियन चाक सर्किल' को भी देखने का अंवसर मिल सकता है।
इस मौके पर यह बहस लाजिमी है कि नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, मनोहर सिंह, नीना गुप्ता, पंकज कपूर जैसे नाम रंगकर्म की दुनिया को देने वाला नाट्य विद्यालय क्या अब खामोश है? ऐसे चमकदार नाम अब वहां से क्यों नहीं निकलते? अनुराधा कपूर का जवाब जहां अपनी विधा का बचाव है, वहीं खुद में सवाल भी। वह प्रश्नोत्तर शैली में जवाब देती हैं कि फिल्मों को ही रंगमंच की सफलता का मानक क्यों माना जाए, रंगकर्म फिल्मों से बड़ा है। पूर्व निदेशक देवेंद्र राज अंकुर भी नाटकों के प्रति आम नजरिये को नकारते हैं। वह कहते हैं कि फिल्में नाट्य प्रतिभा के साथ न्याय नहीं करतीं और कलाकार फिर नाटकों की ओर लौटता है। उनके मुताबिक 'दस साल लगाने के बाद कलाकार को किसी एक फिल्म में छोटा रोल मिलता है। यही 10 साल अगर वह नाटकों में दे, तो तरक्की निश्चित है।' उनके अनुसार इसीलिए नसीरुद्दीन शाह और ओम पुरी फिर रंगकर्म में सक्रिय हैं। नसीर, नादिरा बब्बर, राजेंद्र गुप्त, रजित कपूर महोत्सव में अपने नाटक प्रस्तुत करने वाले हैं। अनुराधा कपूर कहती हैं कि लोग सिर्फ बड़े नाम देखते हैं। एनएसडी से निकले ऐसे बहुत नाम हैं, जो विभिन्न शहरों में अच्छा काम कर रहे हैं। वह नेपाल में सक्रिय अनूप बराल व सुनील पोखरियाल और बांग्लादेश के कमलुद्दीन नीलू का नाम लेती हैं। उन्हें लगता है कि महोत्सव से पिछले 50 सालों में एनएसडी की भूमिका परखने का मौका भी मिलेगा।
साभार : दैनिक जागरण Jan 11, 11:47 am
नई दिल्ली [वंदना गुप्ता]। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय [एनएसडी] की निदेशक अनुराधा कपूर चिंतित हैं। उनकी चिंता का मुख्य कारण यह है कि अफगानिस्तान का नाट्य दल भारत आ पाएगा या नहीं। ये कलाकार आएंगे, तो लोगों को यह समझने में मदद मिलेगी कि अफगानिस्तान के मुश्किल हालात के बावजूद कैसे रंगकर्म वहां अब भी सांस ले रहा है।
संस्कृति और रंगकर्म में जिनकी तनिक भी रुचि है, उनके लिए खबर यह है कि दिल्ली स्थित राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय अपने जीवन के 50 साल पूरे करने जा रहा है। वहीं उसके द्वारा आयोजित किए जाने वाले भारत रंग महोत्सव की 10वीं बारी है। इस कारण उसने इसे विशेष रूप से मनाने का फैसला किया है। इसका फोकस उसने अपने पूर्व छात्रों पर रखा है। आयोजन शुरू हो चुका है, जिसमें 18 दिनों तक देश-विदेश के नाट्यकर्मी अपनी कला की जीवंत प्रस्तुति करेंगे। इसमें 1150 कलाकार शिरकत कर रहे हैं और 77 कार्यक्रम पेश किए जाएंगे।
महोत्सव में विभिन्न राज्यों के साथ अफगानिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल, स्विट्जरलैंड, पोलैंड, इंग्लैंड, नार्वे, मारीशस, चीन व जापान के कलाकार आएंगे। पाकिस्तान के दो नाटकों इमरान पीरजादा का 'अंखियांवालेओ' व शाहिद नदीम के निर्देशन में 'बुरक ावेगेंजा' का मंचन होगा। अफगानिस्तान के दो नाटकों -'क्राई आफ हिस्ट्री' और 'द काकेशियन चाक सर्किल' को भी देखने का अंवसर मिल सकता है।
इस मौके पर यह बहस लाजिमी है कि नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, मनोहर सिंह, नीना गुप्ता, पंकज कपूर जैसे नाम रंगकर्म की दुनिया को देने वाला नाट्य विद्यालय क्या अब खामोश है? ऐसे चमकदार नाम अब वहां से क्यों नहीं निकलते? अनुराधा कपूर का जवाब जहां अपनी विधा का बचाव है, वहीं खुद में सवाल भी। वह प्रश्नोत्तर शैली में जवाब देती हैं कि फिल्मों को ही रंगमंच की सफलता का मानक क्यों माना जाए, रंगकर्म फिल्मों से बड़ा है। पूर्व निदेशक देवेंद्र राज अंकुर भी नाटकों के प्रति आम नजरिये को नकारते हैं। वह कहते हैं कि फिल्में नाट्य प्रतिभा के साथ न्याय नहीं करतीं और कलाकार फिर नाटकों की ओर लौटता है। उनके मुताबिक 'दस साल लगाने के बाद कलाकार को किसी एक फिल्म में छोटा रोल मिलता है। यही 10 साल अगर वह नाटकों में दे, तो तरक्की निश्चित है।' उनके अनुसार इसीलिए नसीरुद्दीन शाह और ओम पुरी फिर रंगकर्म में सक्रिय हैं। नसीर, नादिरा बब्बर, राजेंद्र गुप्त, रजित कपूर महोत्सव में अपने नाटक प्रस्तुत करने वाले हैं। अनुराधा कपूर कहती हैं कि लोग सिर्फ बड़े नाम देखते हैं। एनएसडी से निकले ऐसे बहुत नाम हैं, जो विभिन्न शहरों में अच्छा काम कर रहे हैं। वह नेपाल में सक्रिय अनूप बराल व सुनील पोखरियाल और बांग्लादेश के कमलुद्दीन नीलू का नाम लेती हैं। उन्हें लगता है कि महोत्सव से पिछले 50 सालों में एनएसडी की भूमिका परखने का मौका भी मिलेगा।
साभार : दैनिक जागरण Jan 11, 11:47 am
आधा सफर भी तय नहीं कर पाया सिंचाई क्षेत्र
नई दिल्ली [रामनारायण श्रीवास्तव]। 'उत्तम खेती मध्यम व्यापार' की लोकोक्ति अब केवल इतिहास के पन्नों में ही सिमट कर रह गई है। देश के किसान व खेती जिस दौर से गुजर रही है, उसके लिए काफी हद तक सिंचाई सुविधाओं की कमी ही जिम्मेदार है। इन हालात को सुधारने के लिए केंद्र सरकार ने पिछली दस योजनाओं में ढेरों परियोजनाओं व कार्यक्रमों को शुरू तो किया, लेकिन उनकी धीमी गति और राज्य सरकारों की उदासीनता से सफलता परवान नहीं चढ़ सकी। महत्वाकांक्षी त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम ने अब थोड़ी गति पकड़ी भी तो बाकी योजनाएं धीमी पड़ गई हैं।
एक दशक बीत जाने के बाद भी एआईबीपी से देश को वह लाभ नहीं मिल सका है, जिसकी उसने अपेक्षा की थी। इस कार्यक्रम के तहत अब तक बड़ी व मझोली परियोजनाओं पर दो खरब 32 अरब 31 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च हो चुके हैं, लेकिन इससे 93 लाख हेक्टेयर जमीन के लिए ही सिंचाई सुविधाएं हासिल की जा सकी हैं। इसके अलावा माइनर योजनाओं से ढाई लाख हेक्टेयर के लिए सिंचाई सुविधाएं हासिल की गई हैं। इस छोटे आंकड़े को भी जल संसाधन बड़ी उपलब्धि मानता है, क्योंकि एआईबीपी से पहले सिंचाई योजनाओं के पूरा होने व सिंचाई क्षमता सृजित होने की गति और भी धीमी थी। हालांकि मंत्रालय यह बात स्वीकारता है कि जिस गति से सिंचाई योजनाओं को पूरा होना चाहिए, वह अभी भी नहीं हो पा रहा हैं। गौरतलब है कि एआईबीपी के तहत अभी भी लगभग डेढ़ सौ परियोजनाएं लंबित हैं। यही वजह है कि देश की आधी से भी अधिक खेती अभी भी सिंचाई सुविधाओं से वंचित है।
एआईबीपी से सिंचाई क्षेत्र को गति मिली है। लेकिन इसके तहत चुनिंदा योजनाओं को ही शामिल करने से बाकी योजनाओं की गति बेहद धीमी हो जाती है। मसलन दसवीं योजना में देश भर में 14 लाख 28 हजार हेक्टेयर सिंचाई सुविधाएं सृजित की गईं उनमें एआईबीपी का योगदान नौ लाख हेक्टेयर यानी 63 फीसदी रहा। केंद्र में संप्रग सरकार आने के बाद सिंचाई क्षेत्र के लिए बजट में बढ़ोतरी होने से जल संसाधन मंत्रालय को भरोसा है कि 11वीं योजना में हालात सुधरेंगे।
हाल में ही केंद्रीय जल संसाधन राज्यमंत्री जयप्रकाश नारायण यादव ने इस कार्यक्रम की समीक्षा बैठक में राज्यों को तेजी लाने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि केंद्र के पास पैसे की कमी नहीं है, लेकिन राज्य पहले दिए गए पैसे का उपयोगिता प्रमाणपत्र समय पर नहीं देते हैं, जिससे अगली किस्त लटक जाती है। चूंकि जल राज्य का विषय है, इसलिए केंद्र सरकार धन की व्यवस्था करने से लेकर राज्यों को सलाह देने की भूमिका तक ही सीमित है। उनके काम में हस्तक्षेप नहीं कर सकती है।
साभार : दैनिक जागरण Jan 11, 02:28 am
नई दिल्ली [रामनारायण श्रीवास्तव]। 'उत्तम खेती मध्यम व्यापार' की लोकोक्ति अब केवल इतिहास के पन्नों में ही सिमट कर रह गई है। देश के किसान व खेती जिस दौर से गुजर रही है, उसके लिए काफी हद तक सिंचाई सुविधाओं की कमी ही जिम्मेदार है। इन हालात को सुधारने के लिए केंद्र सरकार ने पिछली दस योजनाओं में ढेरों परियोजनाओं व कार्यक्रमों को शुरू तो किया, लेकिन उनकी धीमी गति और राज्य सरकारों की उदासीनता से सफलता परवान नहीं चढ़ सकी। महत्वाकांक्षी त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम ने अब थोड़ी गति पकड़ी भी तो बाकी योजनाएं धीमी पड़ गई हैं।
एक दशक बीत जाने के बाद भी एआईबीपी से देश को वह लाभ नहीं मिल सका है, जिसकी उसने अपेक्षा की थी। इस कार्यक्रम के तहत अब तक बड़ी व मझोली परियोजनाओं पर दो खरब 32 अरब 31 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च हो चुके हैं, लेकिन इससे 93 लाख हेक्टेयर जमीन के लिए ही सिंचाई सुविधाएं हासिल की जा सकी हैं। इसके अलावा माइनर योजनाओं से ढाई लाख हेक्टेयर के लिए सिंचाई सुविधाएं हासिल की गई हैं। इस छोटे आंकड़े को भी जल संसाधन बड़ी उपलब्धि मानता है, क्योंकि एआईबीपी से पहले सिंचाई योजनाओं के पूरा होने व सिंचाई क्षमता सृजित होने की गति और भी धीमी थी। हालांकि मंत्रालय यह बात स्वीकारता है कि जिस गति से सिंचाई योजनाओं को पूरा होना चाहिए, वह अभी भी नहीं हो पा रहा हैं। गौरतलब है कि एआईबीपी के तहत अभी भी लगभग डेढ़ सौ परियोजनाएं लंबित हैं। यही वजह है कि देश की आधी से भी अधिक खेती अभी भी सिंचाई सुविधाओं से वंचित है।
एआईबीपी से सिंचाई क्षेत्र को गति मिली है। लेकिन इसके तहत चुनिंदा योजनाओं को ही शामिल करने से बाकी योजनाओं की गति बेहद धीमी हो जाती है। मसलन दसवीं योजना में देश भर में 14 लाख 28 हजार हेक्टेयर सिंचाई सुविधाएं सृजित की गईं उनमें एआईबीपी का योगदान नौ लाख हेक्टेयर यानी 63 फीसदी रहा। केंद्र में संप्रग सरकार आने के बाद सिंचाई क्षेत्र के लिए बजट में बढ़ोतरी होने से जल संसाधन मंत्रालय को भरोसा है कि 11वीं योजना में हालात सुधरेंगे।
हाल में ही केंद्रीय जल संसाधन राज्यमंत्री जयप्रकाश नारायण यादव ने इस कार्यक्रम की समीक्षा बैठक में राज्यों को तेजी लाने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि केंद्र के पास पैसे की कमी नहीं है, लेकिन राज्य पहले दिए गए पैसे का उपयोगिता प्रमाणपत्र समय पर नहीं देते हैं, जिससे अगली किस्त लटक जाती है। चूंकि जल राज्य का विषय है, इसलिए केंद्र सरकार धन की व्यवस्था करने से लेकर राज्यों को सलाह देने की भूमिका तक ही सीमित है। उनके काम में हस्तक्षेप नहीं कर सकती है।
साभार : दैनिक जागरण Jan 11, 02:28 am

पोंगल में सांड़ों की लड़ाई पर रोक
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु में पोंगल त्योहार के दौरान सांड़ों की लड़ाई से संबंधित आयोजन जल्लीकट्टू के लिए अनुमति देने से इनकार कर दिया है।
मुख्य न्यायाधीश के जी बालकृष्णन की अध्यक्षता वाली पीठ ने शुक्रवार को कहा, हम इसके आयोजन पर अदालत द्वारा लागू रोक को हटाने के इच्छुक नहीं हैं। लेकिन न्यायालय ने अधिकारियों के निर्देशन में रकला दौड़ की अनुमति दे दी जिसमें बैलगाडि़यों की दौड़ होती है। सांड़ों की लड़ाई से संबंधित आयोजन पर रोक लगाते हुए पीठ ने कहा कि ऐसे किसी भी आयोजन की अनुमति नहीं दी जा सकती जिनमें पशुओं पर अत्याचार होता हो।
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु में पोंगल त्योहार के दौरान सांड़ों की लड़ाई से संबंधित आयोजन जल्लीकट्टू के लिए अनुमति देने से इनकार कर दिया है।
मुख्य न्यायाधीश के जी बालकृष्णन की अध्यक्षता वाली पीठ ने शुक्रवार को कहा, हम इसके आयोजन पर अदालत द्वारा लागू रोक को हटाने के इच्छुक नहीं हैं। लेकिन न्यायालय ने अधिकारियों के निर्देशन में रकला दौड़ की अनुमति दे दी जिसमें बैलगाडि़यों की दौड़ होती है। सांड़ों की लड़ाई से संबंधित आयोजन पर रोक लगाते हुए पीठ ने कहा कि ऐसे किसी भी आयोजन की अनुमति नहीं दी जा सकती जिनमें पशुओं पर अत्याचार होता हो।
साभार : दैनिक जागरण, Jan 11, 12:10 pm
खेतिहर महिलाओं को मिलेगी जमीन
नई दिल्ली [राजकेश्वर सिंह]। सरकारी कोशिशें मुकाम तक पहुंचीं तो आने वाले वर्षो में खेती से जुड़ी महिलाओं की स्थिति बेहतर हो सकती है। सरकार ऐसी महिलाओं को सीधे जमीन का आवंटन कर उन्हें स्वतंत्र रूप से उसका मालिकाना हक दिलाएगी। इसके लिए भूमि सुधार अभियान चलाया जाएगा। साथ ही फसल की बर्बादी या कर्ज से डूबे किसानों के खुदकुशी करने पर उनकी विधवाओं को राहत दिलाने के लिए एक नई योजना भी शुरू की जाएगी।
सरकार ने किसान परिवारों व खेती से जुड़ी महिलाओं की समस्याओं से निपटने के लिए दो तरह की रणनीति बनाई है। सरकार का मानना है कि जमीन का स्वतंत्र रूप से सीधे उनके नाम आवंटन होने से महिलाएं न सिर्फ आर्थिक रूप से सशक्त होंगी, बल्कि सामाजिक व राजनीतिक असमानता की चुनौतियों से भी निपटा जा सकेगा। इसी सोच के मद्देनजर 11वीं योजना में महिलाओं को जमीन उपलब्ध कराने की पहल की जानी है। इसके लिए पुनर्वास व गरीबी उन्मूलन जैसे कार्यक्रम तो चलाए ही जाएंगे। साथ ही भूमि सुधार अभियान के जरिए महिलाओं को सीधे तौर पर जमीन का आवंटन किया जाएगा, जिसकी मालकिन वे खुद होंगी। सरकारी जमीनों का यह आवंटन किसी एक महिला या फिर महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों [एसएचजी] को भी किया जा सकेगा।
इसके अलावा कर्ज के बोझ से दबे या फिर फसलों के बर्बाद हो जाने से आत्महत्या करने वाले किसानों की विधवाओं की मदद के लिए महिला एवं बाल विकास मंत्रालय एक विशेष योजना शुरू करेगा। इसके पीछे उन राज्यों की पीड़ित महिलाओं को राहत पहुंचाने की मंशा है, जहां किसानों में आत्महत्या की घटनाएं अमूमन ज्यादा होती हैं। इतना ही नहीं, 11वीं योजना में गरीब महिलाओं को जमीन को खरीदने या फिर पंट्टे पर लेने के लिए कर्ज के रूप में भी मदद दी जाएगी। पैतृक संपत्तियों के उत्तराधिकार संबंधी मामलों में कानूनी मदद भी दिए जाने की योजना है। विस्थापन की दशा में महिलाओं के लिए संवेदनशील पुनर्वास नीति अख्तियार किया जाएगा। गरीब भूमिहीनों के अधिकारों को सुनिश्चित कराने के साथ ही आदिवासियों को वनों की भूमि का भी मालिकाना हक दिलाने पर जोर दिया जाएगा।
साभार : दैनिक जागरण, Jan ०१ 2008
नई दिल्ली [राजकेश्वर सिंह]। सरकारी कोशिशें मुकाम तक पहुंचीं तो आने वाले वर्षो में खेती से जुड़ी महिलाओं की स्थिति बेहतर हो सकती है। सरकार ऐसी महिलाओं को सीधे जमीन का आवंटन कर उन्हें स्वतंत्र रूप से उसका मालिकाना हक दिलाएगी। इसके लिए भूमि सुधार अभियान चलाया जाएगा। साथ ही फसल की बर्बादी या कर्ज से डूबे किसानों के खुदकुशी करने पर उनकी विधवाओं को राहत दिलाने के लिए एक नई योजना भी शुरू की जाएगी।
सरकार ने किसान परिवारों व खेती से जुड़ी महिलाओं की समस्याओं से निपटने के लिए दो तरह की रणनीति बनाई है। सरकार का मानना है कि जमीन का स्वतंत्र रूप से सीधे उनके नाम आवंटन होने से महिलाएं न सिर्फ आर्थिक रूप से सशक्त होंगी, बल्कि सामाजिक व राजनीतिक असमानता की चुनौतियों से भी निपटा जा सकेगा। इसी सोच के मद्देनजर 11वीं योजना में महिलाओं को जमीन उपलब्ध कराने की पहल की जानी है। इसके लिए पुनर्वास व गरीबी उन्मूलन जैसे कार्यक्रम तो चलाए ही जाएंगे। साथ ही भूमि सुधार अभियान के जरिए महिलाओं को सीधे तौर पर जमीन का आवंटन किया जाएगा, जिसकी मालकिन वे खुद होंगी। सरकारी जमीनों का यह आवंटन किसी एक महिला या फिर महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों [एसएचजी] को भी किया जा सकेगा।
इसके अलावा कर्ज के बोझ से दबे या फिर फसलों के बर्बाद हो जाने से आत्महत्या करने वाले किसानों की विधवाओं की मदद के लिए महिला एवं बाल विकास मंत्रालय एक विशेष योजना शुरू करेगा। इसके पीछे उन राज्यों की पीड़ित महिलाओं को राहत पहुंचाने की मंशा है, जहां किसानों में आत्महत्या की घटनाएं अमूमन ज्यादा होती हैं। इतना ही नहीं, 11वीं योजना में गरीब महिलाओं को जमीन को खरीदने या फिर पंट्टे पर लेने के लिए कर्ज के रूप में भी मदद दी जाएगी। पैतृक संपत्तियों के उत्तराधिकार संबंधी मामलों में कानूनी मदद भी दिए जाने की योजना है। विस्थापन की दशा में महिलाओं के लिए संवेदनशील पुनर्वास नीति अख्तियार किया जाएगा। गरीब भूमिहीनों के अधिकारों को सुनिश्चित कराने के साथ ही आदिवासियों को वनों की भूमि का भी मालिकाना हक दिलाने पर जोर दिया जाएगा।
साभार : दैनिक जागरण, Jan ०१ 2008
रोज़गार गारंटी योजना है..पर रोज़गार नहीं
फ़ैसल मोहम्मद अली, भोपाल
रोज़गार गारंटी योजना को 'सबसे बेहतर तरीके से लागू' करने का दावा करने वाले मध्य प्रदेश में स्थिति ख़राब है.
योजना शुरू होने के लगभग दो साल बाद भी काम पाने के लिए सबसे ज़रूरी दस्तावेज़ जॉब कार्ड ही लोगो को नहीं दिया गया है.
एक सर्वेक्षण के अनुसार उत्तर-पूर्वी मध्य प्रदेश के चार ज़िलों में ही साढ़े सोलह प्रतिशत से अधिक लोगों को जॉब कार्ड नहीं मिल पाए हैं.
लेकिन शासन का दावा है कि राज्य के जिन इकत्तीस ज़िलों में ये योजना लागू की गई है वहाँ जॉब कार्डो का वितरण लगभग एकसौ इकत्तीस प्रतिशत है.
यानी जनगणना के मुताबिक़ राज्य में इस योजना के तहत आने वाले कुल परिवारों से ज़्यादा लोगों को प्रशासन ने ज़रूरी दस्तावेज़ प्रदान किए हैं.
ग्रामीणों को रोज़गार मुहैया कराने के उद्देश्य से भारत सरकार ने पिछले साल फ़रवरी महीने में रोज़गार गारंटी योजना की शुरूआत की थी.
'फ़र्ज़ी जॉब कार्ड'
भोजन का अधिकार अभियान समूह के कार्यकर्ता सचिन जैन के अनुसार ये स्पष्ट है कि बड़े पैमाने पर फ़र्ज़ी कार्ड बना कर फ़ंड के वितरण में घोटाला किया जा रहा है जबकि ग्रामीण योजना के फ़ायदे से वंचित हैं.
समूह ने रोज़गार गारंटी योजना पर एक स्टडी जारी की है जिसमें कहा गया है कि कुल बाँटे गए जॉब कार्डों में लगभग पैंतालिस प्रतिशत फ़र्ज़ी हैं.
स्टडी के मुताबिक़ "ना तो हर हाथ को काम है और ना ही काम का पूरा दाम है जिसका दावा संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने इस योजना को लागू करते समय किया था.''
छतरपुर ज़िले के केसीपुरा गाँव के नंद राय का कहना है कि उनके और उनके गाँव के चालीस अन्य दलित परिवारों के पास जॉब कार्ड होने के बावजूद एक दिन भी काम नहीं मिल पाया है.
लुभावने वादों की 'सच्चाई'
केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार की सबसे महत्वपूर्ण योजना कही जाने वाली इस योजना में मध्य प्रदेश ने पिछले दो सालो में लगभग दो हज़ार करोड़ रूपए ख़र्च करने का दावा किया है.
इसके आधार पर मध्य प्रदेश को देश में रोज़गार गारंटी योजना लागू करने वाला सबसे उत्तम प्रदेश क़रार दिया गया है.
'अव्वल प्रदेश' में योजना की हक़ीकत जानने के लिए पाँच ज़िलो में टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, सतना और अशोक नगर में की गई 'ज़मीनी पड़ताल' से पता चला कि मज़दूरों से काम के लिए आवेदन ही नही लिए जाते हैं.
इन्हीं आवेदनो के आधार पर उन्हे निश्चित अवधि में काम मिलने की गारंटी सुनिश्चित होती है.
ऐसा न होने की स्थिति में ज़रूरी बेरोज़गारी भत्ता भी उन्हें नही दिया जाता है.इसके साथ ही योजना का छमाही आकलन यानी सोशल ऑडिट भी गाँव वालों कि सहभागिता से नहीं हो रहा है.
स्वयंसेवी संस्था का कहना है कि वो इस रिपोर्ट को शासन को सौंपकर एक निष्पक्ष एजेन्सी से पूरे मामले की जांच कराने की मांग करेगीं.
साभार : बी।बी।सी. हिन्दी रविवार, 30 दिसंबर, 2007
फ़ैसल मोहम्मद अली, भोपाल
रोज़गार गारंटी योजना को 'सबसे बेहतर तरीके से लागू' करने का दावा करने वाले मध्य प्रदेश में स्थिति ख़राब है.
योजना शुरू होने के लगभग दो साल बाद भी काम पाने के लिए सबसे ज़रूरी दस्तावेज़ जॉब कार्ड ही लोगो को नहीं दिया गया है.
एक सर्वेक्षण के अनुसार उत्तर-पूर्वी मध्य प्रदेश के चार ज़िलों में ही साढ़े सोलह प्रतिशत से अधिक लोगों को जॉब कार्ड नहीं मिल पाए हैं.
लेकिन शासन का दावा है कि राज्य के जिन इकत्तीस ज़िलों में ये योजना लागू की गई है वहाँ जॉब कार्डो का वितरण लगभग एकसौ इकत्तीस प्रतिशत है.
यानी जनगणना के मुताबिक़ राज्य में इस योजना के तहत आने वाले कुल परिवारों से ज़्यादा लोगों को प्रशासन ने ज़रूरी दस्तावेज़ प्रदान किए हैं.
ग्रामीणों को रोज़गार मुहैया कराने के उद्देश्य से भारत सरकार ने पिछले साल फ़रवरी महीने में रोज़गार गारंटी योजना की शुरूआत की थी.
'फ़र्ज़ी जॉब कार्ड'
भोजन का अधिकार अभियान समूह के कार्यकर्ता सचिन जैन के अनुसार ये स्पष्ट है कि बड़े पैमाने पर फ़र्ज़ी कार्ड बना कर फ़ंड के वितरण में घोटाला किया जा रहा है जबकि ग्रामीण योजना के फ़ायदे से वंचित हैं.
समूह ने रोज़गार गारंटी योजना पर एक स्टडी जारी की है जिसमें कहा गया है कि कुल बाँटे गए जॉब कार्डों में लगभग पैंतालिस प्रतिशत फ़र्ज़ी हैं.
स्टडी के मुताबिक़ "ना तो हर हाथ को काम है और ना ही काम का पूरा दाम है जिसका दावा संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने इस योजना को लागू करते समय किया था.''
छतरपुर ज़िले के केसीपुरा गाँव के नंद राय का कहना है कि उनके और उनके गाँव के चालीस अन्य दलित परिवारों के पास जॉब कार्ड होने के बावजूद एक दिन भी काम नहीं मिल पाया है.
लुभावने वादों की 'सच्चाई'
केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार की सबसे महत्वपूर्ण योजना कही जाने वाली इस योजना में मध्य प्रदेश ने पिछले दो सालो में लगभग दो हज़ार करोड़ रूपए ख़र्च करने का दावा किया है.
इसके आधार पर मध्य प्रदेश को देश में रोज़गार गारंटी योजना लागू करने वाला सबसे उत्तम प्रदेश क़रार दिया गया है.
'अव्वल प्रदेश' में योजना की हक़ीकत जानने के लिए पाँच ज़िलो में टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, सतना और अशोक नगर में की गई 'ज़मीनी पड़ताल' से पता चला कि मज़दूरों से काम के लिए आवेदन ही नही लिए जाते हैं.
इन्हीं आवेदनो के आधार पर उन्हे निश्चित अवधि में काम मिलने की गारंटी सुनिश्चित होती है.
ऐसा न होने की स्थिति में ज़रूरी बेरोज़गारी भत्ता भी उन्हें नही दिया जाता है.इसके साथ ही योजना का छमाही आकलन यानी सोशल ऑडिट भी गाँव वालों कि सहभागिता से नहीं हो रहा है.
स्वयंसेवी संस्था का कहना है कि वो इस रिपोर्ट को शासन को सौंपकर एक निष्पक्ष एजेन्सी से पूरे मामले की जांच कराने की मांग करेगीं.
साभार : बी।बी।सी. हिन्दी रविवार, 30 दिसंबर, 2007
आदिवासियों से सीखें नारी सशक्तीकरण
दिल्ली [आशुतोष शुकल]। कल्पना करें एक ऐसे समाज की, जिसमें घर की बुजुर्ग महिला की मृत्यु के बाद घड़े में उसकी अस्थियां रखी जाती हैं। स्त्री को 'हितदेवी' का दर्जा देकर परिजन अस्थियों वाला कुम्भ घर में ही स्थापित कर देते हैं। अब यह देवी उसी तरह परिवार पर कृपा करेंगी, जैसे जीवित रहते करती थीं।
यह कल्पना नहीं, हकीकत है। नारी सशक्तीकरण के शोर और तमाम सरकारी आयोजनों के बीच देश के 12 करोड़ आदिवासियों के समाज में स्त्री बिना किसी आडंबर व प्रपंच के जिस तरह सदियों से परिवार की कर्ता है, वह सभ्य समाज के लिए कौतुक भी हो सकता है और अनुकरणीय भी। दिल्ली में हाल ही में खत्म हुआ आदिवासी सम्मेलन ऐसी कई जानकारियों से भरपूर था। जिस समाज को अशिक्षित और पिछड़ा कहकर शहरों में उसे सुधारने की योजनाएं बनती और वहीं परवान चढ़ जाती हैं, वहां स्त्री का व्यक्तित्व दबा हुआ नहीं है।
इस समाज में शादी से पहले भावी वर को लड़की के घर में छह महीने 'इंटर्नशिप' करनी होती है। वह चाहे मजदूरी करे, लेकिन उसे पर्याप्त कमा कर लड़की के पिता को यह भरोसा दिलाना होता है कि वह उसकी बेटी का भरण-पोषण कर सकता है। वहां दहेज नहीं, स्त्री के उत्पीड़न का प्रश्न नहीं। स्त्री विधवा हुई, तो परिवार के बाहर विवाह कर पति को पुराने पति के घर ला सकती है।
गुजरात के आदिवासी कवि कांजी भाई पटेल और भीलों के महाभारत को लिपिबद्ध करने वाले आदिवासी अकादमी, वड़ोदरा के निदेशक डा. भगवानदास पटेल आदिवासी समाज को समतामूलक बताते हैं। उनके मुताबिक साबरकांठा जिले के डोंगरी भीलों के महाभारत में जुआ तो है, लेकिन उसमें द्रौपदी का चीरहरण नहीं होता। वहां कुंती और द्रौपदी का ओजस्वी चित्रण है। उनकी सलाह के बिना घर में पत्ता नहीं हिलता। आदिवासी नहीं मानते कि महाभारत का युद्ध द्रौपदी के कारण हुआ। शहरवासी क्या विश्वास करेंगे कि भादो में जब 'भीलों की भारथा ' का मंचन होता है, तब गुरु के स्थान पर गृहस्वामिनी की स्थापना होती है और उनकी सशरीर पूजा होती है। भीलों के रामायण में सीता न अग्निपरीक्षा देती हैं और न धरती में समाने को विवश हैं।
कांजीलाल पटेल और महाराष्ट्र के वाहरु सोनवणे हों या उत्तर प्रदेश के गारु चिंचले, वे मानते हैं कि भौतिक अर्थो में पिछड़े आदिवासी सामाजिक दृष्टि से आगे हैं। यहां आज भी मातृसत्ता है। उनके मुताबिक उत्तर प्रदेश और राजस्थान के सहरिया, बिहार व बंगाल के मुंडा हों या मदारी जैसे घुमंतू समाज, सभी जगह स्त्री बिना किसी घोषणा के प्रधान है। अगर हिंदी प्रदेशों में बहुधा दिखने वाली घुमंतू जाति नटों पर दृष्टि डाली जाए, तो उनमें शादी के लिए लड़के के साथ जाने वाले पड़ोसी घर से खाना लेकर जाते हैं, ताकि लड़की के पिता पर भार न पड़े।
साभार : दैनिक जागरण Jan 11, 2008
दिल्ली [आशुतोष शुकल]। कल्पना करें एक ऐसे समाज की, जिसमें घर की बुजुर्ग महिला की मृत्यु के बाद घड़े में उसकी अस्थियां रखी जाती हैं। स्त्री को 'हितदेवी' का दर्जा देकर परिजन अस्थियों वाला कुम्भ घर में ही स्थापित कर देते हैं। अब यह देवी उसी तरह परिवार पर कृपा करेंगी, जैसे जीवित रहते करती थीं।
यह कल्पना नहीं, हकीकत है। नारी सशक्तीकरण के शोर और तमाम सरकारी आयोजनों के बीच देश के 12 करोड़ आदिवासियों के समाज में स्त्री बिना किसी आडंबर व प्रपंच के जिस तरह सदियों से परिवार की कर्ता है, वह सभ्य समाज के लिए कौतुक भी हो सकता है और अनुकरणीय भी। दिल्ली में हाल ही में खत्म हुआ आदिवासी सम्मेलन ऐसी कई जानकारियों से भरपूर था। जिस समाज को अशिक्षित और पिछड़ा कहकर शहरों में उसे सुधारने की योजनाएं बनती और वहीं परवान चढ़ जाती हैं, वहां स्त्री का व्यक्तित्व दबा हुआ नहीं है।
इस समाज में शादी से पहले भावी वर को लड़की के घर में छह महीने 'इंटर्नशिप' करनी होती है। वह चाहे मजदूरी करे, लेकिन उसे पर्याप्त कमा कर लड़की के पिता को यह भरोसा दिलाना होता है कि वह उसकी बेटी का भरण-पोषण कर सकता है। वहां दहेज नहीं, स्त्री के उत्पीड़न का प्रश्न नहीं। स्त्री विधवा हुई, तो परिवार के बाहर विवाह कर पति को पुराने पति के घर ला सकती है।
गुजरात के आदिवासी कवि कांजी भाई पटेल और भीलों के महाभारत को लिपिबद्ध करने वाले आदिवासी अकादमी, वड़ोदरा के निदेशक डा. भगवानदास पटेल आदिवासी समाज को समतामूलक बताते हैं। उनके मुताबिक साबरकांठा जिले के डोंगरी भीलों के महाभारत में जुआ तो है, लेकिन उसमें द्रौपदी का चीरहरण नहीं होता। वहां कुंती और द्रौपदी का ओजस्वी चित्रण है। उनकी सलाह के बिना घर में पत्ता नहीं हिलता। आदिवासी नहीं मानते कि महाभारत का युद्ध द्रौपदी के कारण हुआ। शहरवासी क्या विश्वास करेंगे कि भादो में जब 'भीलों की भारथा ' का मंचन होता है, तब गुरु के स्थान पर गृहस्वामिनी की स्थापना होती है और उनकी सशरीर पूजा होती है। भीलों के रामायण में सीता न अग्निपरीक्षा देती हैं और न धरती में समाने को विवश हैं।
कांजीलाल पटेल और महाराष्ट्र के वाहरु सोनवणे हों या उत्तर प्रदेश के गारु चिंचले, वे मानते हैं कि भौतिक अर्थो में पिछड़े आदिवासी सामाजिक दृष्टि से आगे हैं। यहां आज भी मातृसत्ता है। उनके मुताबिक उत्तर प्रदेश और राजस्थान के सहरिया, बिहार व बंगाल के मुंडा हों या मदारी जैसे घुमंतू समाज, सभी जगह स्त्री बिना किसी घोषणा के प्रधान है। अगर हिंदी प्रदेशों में बहुधा दिखने वाली घुमंतू जाति नटों पर दृष्टि डाली जाए, तो उनमें शादी के लिए लड़के के साथ जाने वाले पड़ोसी घर से खाना लेकर जाते हैं, ताकि लड़की के पिता पर भार न पड़े।
साभार : दैनिक जागरण Jan 11, 2008
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