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Saturday, July 11, 2009

मध्यप्रदेश बजट : फिर गांव-गरीब की ओर

भोपाल. वित्तमंत्री राघवजी शुक्रवार को सुबह साढ़े 10 बजे राज्य की भाजपा सरकार का छठवां बजट पेश कर दिया है। बजट में शामिल राज्य आयोजना का आकार 16114 करोड़ रखा गया है। आज प्रस्तुत बजट में कृषि, और ग्रामीण विकास पर बल दिया गया है। इसके साथ ही राज्य के विकास की गति को बनाए रखने के लिए योजना के आकार में पूर्व स्वीकृति की तुलना में 11।48 की बढोत्तरी की गई है। पुलिस विभाग के लिए बजट में पिछले साल की तुलना में 10 फीसदी की बढोत्तरी की गई है। सरकार ने कानून व्यवस्था को मजबूत करने के लिए अतिरिक्त थानों और आतंकवाद निरोध दस्ते के निर्माण पर बल दिया है।
क्या रहीं बजट की प्राथमिकताएँ
1.अधोसंरचना विकास
2. निवेश वृद्धि
3. कृषि को फायदे का व्यवसाय बनाना
4. शिक्षा और स्वास्थ्य
5. महिला सशक्तिकरण
6. सुशासन एवं संसाधन
7. कानून एवं
ग्रामीण विकास के लिए सरकार की योजना
  • रोजगार गारन्टी के लिए 5137 करोड
  • बैकवर्ड रीजन ग्रांट फंड : 546 करोड़
  • ग्रामीण आजीविका योजना : 95

कृषि के लिए क्या खास

  • पिछले साल की तुलना में इस साल 50 फीसदी का अधिक प्रावधान
  • कम्यूनिटी रेडियो स्टेशन की स्थापना
  • गेंहू के उपार्जन पर बोनस हेतु इस वर्ष रु 90 करोड़ का प्रावधान
  • ग्वालियर में कृषि विवि की स्थापना
  • कम्यूनिटी रेडियो स्टेशन की स्थापना
  • राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना में रु 48 करोड़
  • दीर्घकालीन साख हेतु रू 275 करोड़ का

शिक्षा : क्या खास

  • 684 माध्यमिक शाला भवन एंव 18500 अतिरिक्त कक्षों का निर्माण
  • 28000 शिक्षकों की नियुक्तियां
  • महाविद्यालय में शिक्षा गुणवत्ता सुधार के तहत विदेश भ्रमण हेतु 50000 की पुरस्कार योजना
  • नेशनल इंस्टीटच्यूट ऑफ फैशन टेक्नालॉजी हेतु रु 30 करोड़ का प्रावधान
  • जाति अनुसूचित जनजाति के छात्रों को पीईटी पीएमटी प्रवेश परीक्षा हेतु देय छात्रवृत्ति रु 375 प्र. मा. से बढ़ाकर 500 प्र.माह और छात्राओं के लिए 525 प्र. मा
  • निशक्त छात्रों के लिए छात्रवृत्ति योजना रु 500 प्र.

स्वास्थ्य : क्या खास

  • 161 उप स्वास्थ्स केन्द्र, 72 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, 15 सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र एवं10 जिला चिकित्सालय के भवन निर्माण को पूर्ण करने हेतु प्रावधान

महिला एंव बाल कल्याण

  • 9691 आगंनबाड़ी तथा 9820 मिनी आंगनबाड़ी केन्द्रो की स्थपाना
  • 86 नई एकीकृत बाल विकास परियोजनाएंपोषण आहार हेतु: 781.84 करोड़ का प्रावधान
  • छात्राओं के लिए नि: शुल्क साईकिल कन्यादान योजना :25 करोड़

आयोजन में कुछ महत्वपूर्ण प्रावधान

  • ग्रामीण विकास : रुपए 3483 करोड़ का
  • शिक्षा : रुपये 1497 करोड़ का
  • शहरी विकास : रुपए 854
  • स्वास्थ्य : रुपये 413 करोड़

सिचाई , सड़क, उर्जा

  • सड़क, भवन एवं सेतु के लिए 1843 करोड़ रुपये का प्रावधान
  • सिचाई के लिए रुपये 2485 करोड़ का प्रावधान
  • ऊर्जा क्षेत्र के लिए 1386 करोड़ का प्रावधान
  • कृषि क्षेत्र के लिए 1587 करोड़ का

साभार: दै.भा.

Friday, July 10, 2009

स्थानीय स्वशासन की प्रयोगशाला बनेगा सोनिया विहार

अब अपनी समस्याओं के समाधान के लिए लोगों को नेताओं और अधिकारीयों का मुंह ताकने की जरुरत नहीं रहेगी । शीघ्र ही लोग ख़ुद अपने हित और क्षेत्र की समस्याओं पर स्वयं निर्णय लेने लगेंगे, क्योंकि दिल्ली में स्थानीय स्वशासन की संकल्पना अब जमीन पर उतर चुकी है, और इसकी प्रयोगशाला बनी है राजधानी में होकर भी उपेक्षा की शिकार एक अनधिकृत कालोनी सोनिया विहार....
उमाशंकर मिश्र/दिल्ली
अभी कुछ समय पहले मैग्सेसे अवार्ड विजेता अरविन्द केजरीवाल से मुलाकात हुयी। बातचीत के दौरान उन्होंने बुद्धकालीन एक घटना के बारे में बताया जिसमे २ राज्यों में उनकी सीमा से होकर बहने वाली नदी के पानी के बंटवारे को लेकर विवाद था. पानी को लेकर आये दिन झगडा और तनाव रहता था. समस्या को लेकर जनता की मौजूदुगी में इस बारे में विचार विमर्श कर निदान खोजने की बात तय हुयी. सभा में स्वयं रजा सिद्दार्थ (बुद्ध) भी मौजूद थे. चर्चा शुरू हुयी तो लोगों ने सुझाव देना शरू किया कि नदी हमारे राज्य की सीमा से होकर बहती है, इसके पानी पर हमारा अधिकार है और हम अपने अधिकार को बलपूर्वक हासिल कर लेंगे. इस बात का बुद्ध ने विरोध करते हुए कहा कि हिंसा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि खून खराबे से कुछ हासिल नहीं होगा. लेकिन वहां मौजूद सभी लोगों ने पानी कि समस्या को ध्यान में रखते हुए बुद्ध के निर्णय को नकार दिया, जबकि वो राजा थे.वास्तव में इस कहानी के माध्यम से अरविन्द जी मुझे बताना चाहते थे कि जनता के फैसले के आगे राजा को भी झुकना पड़ गया. यही सच्चा लोकतंत्र है जहाँ जनता अपने हितों को लेकर फैसले लेने के लिए स्वतंत्र होती है. यही तो लोकशाही है? लेकिन एक लोक्तान्त्तिक देश होते हुए भी भारत में क्या लोगों इस तरह से निर्णय लेने कि स्वतंत्रता है? क्या जनता द्वारा चुने गए नेताओं द्वारा किये जाने वाले दुराचरण के बावजूद उन्हें पदच्युत करने कि ताकत जनता के पास है? बिलकुल नहीं, ऐसे तथाकथित जनप्रतिनिधियों को अगले ५ साल तक सहना मजबूरी बन जाती है. और यदि हम मजबूरी में जी रहे हैं और हमारी स्मस्याये जस कि तस बनी हुई हैं, उनका समाधान जनप्रतिनिधि नहीं कर रहे हैं तो कहे कि लोकशाही? शिव खेडा एक बात कहते हैं-जिस देश में हम अपनी पुलिस और अदालतों से डरते हों, क्या वहां लोकतंत्र हो सकता है? सवाल महत्वपूर्ण है, क्योंकि पुलिस और न्यायपालिका जनता की समस्याओं, विवादों का निपटारा कर एक न्यायमूलक समाज कि स्थापना के सूत्रधार होते हैं. लेकिन इन दोनों संस्थाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार के चलते आम आदमी की न्यायिक व्यवस्था से भी आस्था डगमगाने लगी है.अरविन्द केजरीवाल लोकतंत्र की टूटती इन सांसों को बचने की कोशिश में जुट गए हैं. पर्याप्त शोध के बाद वे लोकशाही को पुष्ट करने के लिए स्थानीय स्वशासन की संकल्पना को अमली जामा पहनाने में जुटे हैं. सूचना के अधिकार के प्रचार प्रसार से ख्याति अर्जित करने वाले अरविन्द स्थानीय स्वशासन और उसके महत्व का पाठ पढाने की पहल कर रहे हैं. इसकी शुरुआत राजधानी की एक अनधिकृत कालोनी सोनिया विहार से होने जा रही है. इसकी एक बैठक हाल ही में संपन्न भी हो चुकी है.जिस तरह गांवों में ग्रामसभा गाँव के निवासियों की बॉडी होती है और गाँव के विकास से सम्बंधित किसी निर्णय पर ग्रामसभा के सदस्यों का सहमत होना जरूरी होता है, उसी तरह से शहरों में एक मुनिसिपल वार्ड के तहत आने वाली कालोनियों में मोहल्ला सभाओं की रचना की जायेगी. इन मोहल्ला सभाओं में सथानीय लोग शामिल होंगे, जो अपने इलाके की समस्याओं को चिन्हित कर उस कारवाही करने के लिए कार्य करेंगे. सभी मोहल्ला सभाओं का चेयरमैन उस वार्ड का निगम पार्षद होगा. पार्षद को मिलने वाला फंड कहाँ खर्च हो रहा है, इसकी जानकारी लोगो को रहेगी, और प्राथमिकता के मुताबिक जहाँ ज्यादा जरुरत होगी विकास कार्य किये जायेंगे.यदि किसी राज्य की समस्त मोहल्ला सभाएं मिलकर किसी एक विषय पर एकमत हो जाती हैं तो सरकार उसपर कानून बनाने के लिए बाध्य होना पड़ेगा. इस तरह से कहा जाये तो जनप्रतिनिधि तो रहेंगे, लेकिन इस व्यवस्था के अस्तित्व में आ जाने से लोग अपने अधिकारों की मांग मोहल्ला कमेत्यों के माध्यम से करने लगेंगे तो नेताओं पर जनदबाव बढेगा और वे भी अभी जिम्मेदारी को निभाने के लिए बाध्य होंगे, क्योंकि उन्हें इस बात का आभास हो जायेगा की अब जनता एकजुट हो चुकी है और विकास कार्य न करने पर अगले चुनाव में लोग उन्हें सिरे से खारिज कर देंगे. ये डर नेताओं में आ जायेगा. शासकों और प्रशासकों को जनता का डर होता है तभी लोकशाही सही अर्थो में फलती फूलती है. लेकिन पिछले कुछ समय में तो इसका बिलकुल उलटा हुआ है, जनता अपने अधिकारों के प्रति सचेत नहीं रहती, जिसका फायदा उठाकर अपराधी भी संसद में पहुँच जाते हैं.बहरहाल सोनिया विहार की महिला निगम पार्षद अन्नपूर्ण मिश्र ने इस कार्य में पहल कर एक मिसाल कायम की है. हालाकिं उन्हें राजनितिक विरोधियों समेत पार्टी के स्तर पर भी विरोध का भय सता रहा है. लेकिन एक महिला होने के बावजूद उनका लीक से हटकर किया गया यह प्रयास मील का पत्थर साबित होगा. मैंने उन्हें जब पत्र लिखकर इस पर बधाई दी तो उनका फन मेरे पास आया, काफी देर तक बातचीत होती रही. कालोनी की समस्याओं से लेकर राजनितिक विरोध की बात भी हुयी. बातचीत के दौरान उन्होंने बताया की अरविन्द केजरीवाल के इस क्षेत्र में काम करने की बात से इलाके के आधिकारी भी सहम से रहे हैं. यही नहीं क्योंकि अब इस अभियान के लगातार चलने से अन्नपूर्ण मिश्र भी निरंतर इलाके के लोगों के संपर्क में रहेंगी, ऐसे में उनके राजनितिक विरोधियों को भी चिंता सताने लगी है. क्योंकि जनता से सीधा संवाद होने से अन्नपूर्ण जी के प्रति लोगों का रुझान बढ़ना भी स्वाभाविक है, इसलिए उनके विरोधी घबराए हुए हैं.बहरहाल इस अभियान के अभी रंग में आने में काफी समय है, लेकिन इसके प्रभाव को लेकर अंदरखाते बहस शुरू हो चुकी है. सोनिया विहार देश का पहला ऐसा इलाका होगा जहाँ इस तरह की शरुआत होने जा रही है. अरविन्द केजरीवाल के लिए यह अभियान एक ड्रीम प्रोजेक्ट की तरह होगा, क्योंकि यहाँ से मिलने वाली सफलता को वो एक माडल के तौर पर प्रस्तुत करना चाहेंगे. बहरहाल जो भी हो इन कवायदों को देखते हुए इतना कहा जा सकता है की यदि सच में लोग एकजुट होकर पाने अधिकारों और समस्याओं पर फैसले लेने लगे तो लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करना फिर दुस्वप्न न रह जायेगा. और ऐसा हुआ तो सेनिटेशन, बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोड इत्यादि बुनियादी सुविधाओं की कमी कि मार झेल रहे सोनिया विहार के निवासियों को आने वाले समय में नारकीय जीवन से मुक्ति मिल सकेगी.

Thursday, July 9, 2009

परंपराओं का लोहा पीटते लोग

अपने पुरखों की विरासत को बचाए रखने के लिए लोग क्या कुछ नहीं करते। लेकिन आज हम आपसे चर्चा कर रहे हैं एक ऐसे समुदाय की जिसकी कई पीढ़ियां अपने पुरखों की एक क़सम को निभाने के लिए सड़क पर बंज़ारों की तरह जिंदगी गुज़ार चुकी है। गाड़िया लोहार कहलाने वाले ये लोग मुद्दतों से खानाबदोश ज़िंदगी जी रहे हैं। आइये जानते हैं राजस्थान की भूबिळया जाति की जीवनशैली और परंपराओं से जुड़े कुछ रोचक तथ्य.....
चिराग
जैन

तीन सौ साल पहले जब महाराणा प्रताप अक़बर से हार कर जंगल में चले गए थे तो उन्होंने यह क़सम खाई थी कि जब तक अपना राज्य जीत नहीं लूंगा तब तक न बिस्तरों पर सोऊँगा न घर बनाऊँगा, न कहीं छत डालूंगा न ही एक जगह चैन से बैठूंगा( सोने-चांदी के बर्तनों में खाना नहीं खाऊँगा, दीपक नहीं जलाऊँगा और सभी प्रकार की भोग विलासिता से दूर रहूँगा।अपने राजा के त्याग और आचरण से प्रेरित होकर महाराणा के कुछ साथियों ने भी अपना घर-बार छोड़ कर साधना और राष्ट्रप्रेम के पथ पर उनका साथ दिया और हर हाल में उनका साथ निभाने की शपथ ली। राणा और उनके साथियों की महानता तो उनके जीवन के साथ चली गई लेकिन उनके वंशज अपने पुरखों के इस बलिदान की यादों को ज़िंदा रखने के लिए आज भी वैसा ही जीवन जीने की कोशिशों में जुटे हैं।लोहे को पीट-पीट कर औजार बनाने वाले ये लोग मूलत: राजस्थान के चित्तौड़गढ़ के रहने वाले हैं। इनके पूर्वज महाराणा प्रताप के युद्ध-सहयोगी रहे हैं लेकिन अक़बर से युद्ध में हारने के बाद ये लोग बंजारों की ज़िंदगी जीने लगे और धीरे-धीरे चित्तौड़ से बहुत दूर निकल आए।ये लोग समूह में कारवां बनाकर, गांव-गांव घूमते रहते थे। इसी कारण इन्हें घुमंतू कहा जाता है। समूह के पुरुष दाढ़ी नहीं बनवाते थे। किसी एक जगह घर बनाकर रहने की समूह में मनाही थी। आपसी मेलजोल बढ़ाने के लिए यह नियम था कि सभी परिवार आपस में रोटियां बांट कर खाएंगे। बर्तनों में भोजन करने और दीपक जलाने की भी मनाही थी। लेकिन अब ये सब परंपराएं खत्म होनी शुरू हो गई हैं। लोगों ने झोंपड़ियां डालकर रहना शुरू कर दिया है।आज़ादी के बाद इस समुदाय ने बंजारो की तरह घूमने-फिरने की परंपरा छोड़ दी और बड़े-छोटे शहरों में झोंपड़ियां बनाकर रहना शुरू कर दिया। राजधानी दिल्ली के सराय रोहिल्ला में लगभग 58 साल से ऐसी ही एक बस्ती बसी हुई है। इसके अलावा कालका जी, पालम, शाहदरा, नोएडा, गा़ज़ियाबाद, अलवर, रोहतक, कानपुर, हिसार, अम्बाला, पानीपत, बीकानेर, झांसी, आगरा, अजमेर और जयपुर आदि स्थानोंं पर भी इनकी बस्तियां बनी हुई हैं, जहां हज़ारों की संख्या में गाड़िया लोहार अपना पुश्तैनी पेशा कर रहे हैं।इस समुदाय की जीवन शैली ही नहीं पहनावा, खानपान, भाषा, त्यौहार और रीति-रिवाज़ भी बेहद रोचक हैं। इनकी स्त्रियां घघरा-आंगी (एक प्रकार की परंपरागत लहंगा-चोली) पहनती हैं। हाथी दांत के सुंदर-सुंदर कड़े, चांदी के मोटे-मोटे आभूषण और चूड़ियों के साथ ताबीज आदि पहनना इन महिलाओं का विशेष शौक होता है। पुरुषों को धोती-कुर्ता और कानों में मुरकी (सोने की कड़ीदार बाली) पहने देखा जा सकता है। इसके अलावा रौबदार चेहरे और अच्छे डीलडौल वाले ये पुरुष अपने शरीर पर गुदवाकर कलाकृतियां बनवाने के शौकीन होते हैं। आज भी इनके पूरे शरीर पर ऐसी चित्रकारी देखी जा सकती है।इन लोगों की भाषा चित्तौड़, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान के अन्य प्रदेशों में प्रयोग की जाने वाली भाषा का मिश्रण है। ऐसा शायद इसलिए है कि अलग-अलग स्थानों पर रहने के कारण इनकी भाषा क्षेत्र विशेष की बोलियों से प्रभावित होती रही है। इस समुदाय के लोग सामान्यत: मांसाहारी भोजन करते हैं साथ ही चूल्हे की रोटियां इनका प्रिय भोजन है। राजस्थान की स्थानीय भाषाओँ में भूबिळये कहलाने वाले इस समुदाय को हम लोग गाड़िया लोहार के नाम से जानते हैं। कहीं-कहीं इन्हें घुमंतू तथा बंजारा भी कहा जाता है। रोज़मर्रा की ज़िंदगी जीते हुए इनके पूर्वज अक़बर से अपना राज्य वापस लेने की तैयारियां भी करते रहते थे। इसके लिए वे लोहे को गलाकर छोटे-बड़े हथियार बनाते थे ताकि युद्ध में हथियारों की कमी न पड़ जाए। बाद में रोजी-रोटी के लिए इसी लोहे में से इन्होंने लोहे के औजार बनाकर बेचना शुरू कर दिया, जो आज भी इस समुदाय का प्रमुख पेशा है।परिवार की महिलाएं व पुरुष दोनों ही औजार बनाने के काम में दक्ष होते हैं और आजीविका के लिए औज़ार बनाते हैं। चाकू, खुरपी, कुल्हाड़ी और छैनी से लेकर हथौड़ा, हंसिया, कुदाल और तसले तक वे सभी प्रकार के औजार व उपकरण जो लोहे से बनते हैं, इन लोगों से खरीदे जा सकते हैं। खेती के औजार बनाने में इन लोगों को विशेष कुशलता प्राप्त होती है। अब दिल्ली जैसे महानगरों में करोल बाग, सदर बाज़ार और चांदनी चौक जैसे कई बड़े बाज़ारों और मेलों में भी इनके बनाए औज़ार बिकते हुए देखे जा सकते हैं।सराय रोहिल्ला की बस्ती में रहने वाले साठ वर्षीय नेकीराम का मानना है कि यदि हमें साधन दिए जाएं तो हम औजारों के बाज़ार में बहुत अच्छा कर सकते हैं। लेकिन सरकार हमें कोई सहायता प्रदान करने के स्थान पर समय-समय पर हमारी इन बस्तियों को उजाड़ने के लिए आदेश निकालती रहती है।यह सच है कि न तो अब इस समुदाय में अपनी परंपराओं के प्रति पहले जैसी आस्था रह गई है न ही इन परंपराओं की आज की दुनिया में कोई आवश्यकता रह गई है। नाम न बताने की शर्त पर एक व्यक्ति ने यह भी जानकारी दी कि उसने राजधानी के बुध विहार इलाके में अपना मकान भी खरीद लिया है लेकिन अब भी वह इस बस्ती में इसलिए रह रहा है कि यहां रहकर वह अपने औजार ज्यादा बेहतर तरीके से बेच सकता है।कुछ भी हो लेकिन इन लोगों के बनाए औजारों में आज भी वही दम है। मल्टीनेशनल कंपनियां और बड़े-बड़े उद्योगपति आज एक से एक खूबसूरत औजार लेकर बाज़ार में उतर रही हैं। ये चाकू और छुरियां इतनी सुंदर होती हैं कि बड़े-बड़े लोगों के घरों में इन्हें डाइनिंग टेबल पर सजाकर रखा जाता है। बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों में बनने वाले ये औजार सुंदर तो होते हैं लेकिन उनमें इन हस्तनिर्मित औजारों वाली मजबूती नहीं होती। बेशक ये लोग औजारों के क्षेत्र में बेहद विकसित हैं क्योंकि इन्होंने लगभग तीन सौ साल अपनी परंपराओं का लोहा पीटा है।

Wednesday, July 8, 2009

यहां दलित भी बनते हैं पुजारी

अवधेश कुमार मल्लिक
क्या आप सवर्ण हैं? यदि हां तो क्या आप अपने लड़के या लड़की शादी किसी दलित परिवार में करना चाहेंगें? क्या ऐसे रिश्ते आपको स्वीकार्य होंगे। गौरतलब है आजादी के आज 60से भी अधिक साल हो गये पर ऐसे सवालों का उत्तर आज भी ना में ही आते हैं। ऐसा क्यों? शादी की बात तो बहुत दूर की बात है, दलितों को आज भी जब धार्मिक स्थलों और कर्मकाण्ड से जुड़ी मामलों में बराबरी का दर्जा नहीं मिला है। गलती से इस मसले पर गर चर्चा भी हो जाए तो धरातल पर स्थिति वही ढ़ाक के तीन पात रहती है। पर चर्चा करने वाला जरुर हेय दृष्टि से देखा जाने लगता है, ऐसा क्यों? क्या इसलिए की गरीब दलित सदियों से शोषित होते आए हैं या मनुवादी समाज ने उनको जो कार्य सौंपे वो काफी घृणित और निचले स्तर के आज भी होते हैं? कारण जो भी हो पर वास्तविकता यह है की आज भी वे समाज को स्वीकार्य नहीं है। ऐसे में दलित धार्मिक पुर्नजागरण का मशाल बिहार थाम ले तो आप को हैरत होगी। पर यह बिलकुल सोलह आने सच है। वर्षों से बिहार अपनी कुप्रथाओं दलित विरोधी किस्से कहानियंा और गरीबी और पिछड़ेपन के कारण बदनाम होते आया है। परंतु प्रगतिवादी दक्षिण भारत, जहां दलित पार्टीयों का अपना एक व्यापक जनाधार व दबदबा है ।सरकार में हिस्सेदारी है फिर भी विडंबना यह है कि आज भी वहां दलितों को मंदिरों मेें जाने से रोका जाता है । इन्हें प्रताड़ित करने के नये नये हथकंडे अपनाए जाते हैं । कुछ दिनों पहले तक बिहार में भी यही स्थिति थी । पर आज अति रूढ़ीवादी और पिछड़ा कहे जाने वाला बिहार में इसके विपरीत परिवर्तन की हवा चल रही है। यह हवा है समाज में दलितों की सामाजिक और धार्मिक स्वीकार्यता बढ़ाने की। इन्हें प्रतिष्ठा दिलाने का। इसकी शुरूआत की गई प्रदेश की राजधानी पटना के भव्य एवम् अति प्रतििष्ठत महावीर मंदिर से। दलितों को ब्राह्मणों के समकक्ष लाने हेतु 1993 में भारतीय पुलिस सेवा के तेज तर्रार अधिकारी किशोर कुणाल के निर्देशन में महावीर मंदिर ट्रस्ट की स्थापना हुई और यहां नियुक्त हुआ देश का प्रथम दलित पुजारी श्री फलहारी दास । वर्तमान में श्री फलहारी दास महावीर मंदिर के प्रधान पुजारी हैं। प्रचलित रिवाजों के अनुसार मंदिरों में पुजारी के रूप में अधिकृत होने के अधिकार केवल ब्राह्मणों को है। ऐसे में किसी दलित का पुजारी के रूप में किसी प्रतििष्ठत मंदिर में नियुक्ति होने का सामाचार सदियों से चली आ रही ब्राह्मणवाद उच्चवर्गीय सत्ता को खुली चुनौती थी। दूसरे अर्थों में कहे तो यह एक खूनी संघर्ष और व्यापक जनविरोध का आमंत्रण था।इस चुनौती को किशोर कुणाल ने बखूबी निभाया और ऐसा कुछ नहीं हुआ। कोई अनहोनी घटीत नहीं हुई। लोग भौंचक्के थे। बिहारी खबर पटना के संपादक संतोष सुमन के अनुसार छिटपुट विरोध के बाद लोगों ने इसे सच स्वीकार कर लिया। इसका मुख्य कारण था लोगों में कुणाल की छवि एक निडर और स्वच्छ चरित्र वाले व्यक्ति होना , दूसरा पटना का शहर होना और तीसरा महावीर मंदिर के निर्माण में किशोर कुणाल के अहम भूमिका में होना था। इस घटना के बाद दलित उत्थान के नाम पर भाषणबाजियां चलती रही। दलित नेताएं जीतते रहे पर दलितों की धार्मिक स्वीकृति वाले मुद्दे इन सब के बीच ं न जानें कहीं दब गई। 14 साल बाद अब जो खबर अखबारों की सुिर्खयां बनी वो अपने आप में खास है। यह घटना है पटना से 40 किलोमिटर दूर देहात पालीगंज की। यहां के प्रतििष्ठत राम-जानकी मंदिर में कबीर जयंती के दिन दलित पुजारी जनार्दन मांझी की नियुक्ति हुई । मंदिर के 300 वषाZें से ज्यादा के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ। पालीगंज अपने धार्मिक कट्टरपन के लिए पूरे बिहार मे कुख्यात है। क्यूंकि यहां पर धर्मभीरु उंचे रसूख वाले ब्राहमणों की कमी नहीं है और अच्छी खासी संख्या में उच्च जाति के लोग यहां निवास करते हैं। इस बात को लेकर कुणाल भी आशंकित थे की उनके इस कदम का यहां पर भारी विरोध होगा। इन सब विसंगतियों के बाद बावजूद परिणाम इसके विपरीत निकले। विरोध तो दूर की बात है इसबार लोगों ने उनके इस कार्य की जमकर सराहना की। इतना ही नहीं इस कार्य की खुसी में आयोजित भोज (पंगतद्ध मे करीब दस हजार लोगों ने भाग लिया। क्या यह हैरत वाली बात नहीं हैं , बिहार जहां सियासत की लड़ाईयों में आज भी हार जीत का फैसला जातिय आधार पर होता है। जाति वचZस्वता कायम रखने और रक्त शुðता के नाम पर लोग मारने काटने तक से भी गुरेज नहीं करते। इसकी रक्षा करने के लिए लोग खून की नदीयां बहा देते हैं। वहां की धार्मिक सत्त में सेंध लग गई और विरोध के स्वर भी नहीं उठे। इस पर टिप्पणी करते हुए पटना के ए.एन. सिन्हा ईन्सीट्यूट में कार्यरत प्रख्यात मानव विज्ञानी एवं प्रोफेसर नीलरतन ने कहा की - विरोध न होने का मुख्य वजह है शिक्षा के स्तर में सुधार और प्रसार, ग्लोबलाइजेशन और व्यक्तिवाद का बढ़ता प्रभाव´। उनके अनुसार शिक्षा के प्रसार व ग्लोबलाईजेशन के कारण व्यक्तियों के मानसिक सोच में काफी परिवर्तन आया है। व्यक्ति आज सामाजिक कम और व्यिक्वादी ज्यादा हो गया हो गया है। जिसके कारण सामाजिक पकड़ पहले से काफी ढ़ीले हो गए हैं। उस पर से सरकार, गैरसरकारी संगठन व मीडिया का सकारात्मक रवैया और इन सब का संयुक्त प्रयास के चलते दलितों के प्रति समाजिक दृष्टिकोण में काफी बदलाव आया है। जबकी पटना के ए.एन. कॉलेज के प्रींसीपल एस आर सिंह कुणाल के कार्य को क्रांतिकारी कदम मानते हैं। सराहनीय कदम है। इस बात की चर्चा वो इसका श्रेय शिक्षा के प्रसार और समाज में आ रही जागृति को देतें हैं। ध्यान देने वाली बात है आजादी के बाद संविधान निर्माता डा. बी. आर. अंबेडकर भी इसी प्रकार की धार्मिक स्वीकृति चाहते थे जिसके ना मिलने के कारण अम्बेडकर ने अपने लाखों अनुयायियों के साथ बौ( धर्म अपना लिया। तब से लेकर आज तक धार्मिक स्वीकृति के नाम पर छिटपुट आंदोलन तो चलते रहे लेकिन इस प्रकार के साहसिक कदम उठाने का साहस किसी ने नहीं किया । इसलिए कुणाल के कदम पर प्रतिक्रिया जानने के लिए जब बिहार प्रशासनिकसेवा के एक दलित अधिकारी से संपर्क साधा तो नाम न छापने के शर्त पर बताया की वो दरभंगा जिले से हैं आज से 12 साल पहले उनकी बहन की शादी हुई, शादी पर बुलाए पंडित ने काफी आग्रह करने पर भोजन कर लिया। इस बात की खबर जब उनकी बिरादरी वाले को हुई तो सबने मिलकर उन्हें जाति से बेदखल करने की भरपूर कोशिश किया । जबकी यह जानते थे की मैं एक प्रशासनिक अधिकारी हूं। अत: मेरे दखल देने और मेरे द्वारा घोषणा करने पर की पंडितजी ने मेरे यहां भोजन ग्रहण नहीं किया तब जाकर मामला शांत हुआ। एक प्रशासनिक अधिकारी का यह हाल है तो सोचा जा सकता है कि निधर्न व कमजोर दलितों के साथ क्या होता होगा। भले ही संविधान में अस्पश्Zयता निषेध है पर आज भी गांवो में यह खूब चलता है। ऐसी घटनाएं आज भी घटती है लेकिन उनकी संख्या कम है । उच्चवर्ग के चपरासी आज भी अपने दलित अफिसर को चाय पानी यहां तक की उनकी हुक्म बजाने में आज भी आना-कानि करते हैं। डा. सिच्चदानंद द्वारा लिखि गई पुस्तक हरिजन ईलाइट में ऐसे कई घटीत वर्णन मिलते हैं। कुणाल के इस कदम के बारेमें कहा की हम सब उत्साहित हैं और हम इसका स्वागत करते हैं।हकीकत में संविधान और सरकार आरक्षण और कानून कस निमार्ण तो कर सकती है पर पालना तो जनता ही को करना है। कुणाल भी इस बात को स्वीकार करते हैं बिहार के मिथलाचंल कहे जाने वाले जिलों में अभि इस प्रकार की नियुक्ति संभव नहीं है समयानूकूल होने पर वो इससे पीछे नहीं हटेंगें। स्वंयं सेवी संस्था प्रयास से सबंध रखने वाले संजय सिंह का कुणाल मामले अलग राय रखते हैं। उनका कहना था बिहार के गांवो में लोग रहते ही कहां है। अधिकाशं लोग खासकर उच्च वर्ग के लोग शहरों में रहना पसंद करते हैं। वहां जाति से ज्यादा व्यक्तिगत स्थिति का ज्यादा महत्व होता है। इसलिए गांवों में भी लोग अब व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को ज्यादा महत्व देते हैं। जबकी दरभंगा के सुरेन्द्र नारायण दास जमींदारी प्रथा का जाति प्रथा जोड़ते हुए कहते हैं। अब जबकी जमिंदारी ही नहीं रही तो धीरे धीरे यह उंच नीच भी खत्म हो जाएगा लेकिन अमीर गरीब की खाई अवश्य रहेगी। मधुबनी के भवनाथ झा कहते हैं हमें दलितों से परहेज नहीं है पर उनके पारंपरिक कार्यों से अवश्य है। अगर व्यक्ति वेद मंत्रों का सही उच्चारण कर सकता है अगर कर्मकाण्ड का सही ज्ञान है तो उस से पूजा करवाने में क्या हर्ज है। पूजा करवाने के मसले पर किशोर कुणाल कहतें हैं यह एक मिथ्या प्रचार है की दलित अगर पूजा करेंगें तो धर्म भ्रष्ट हो जाएगा। मैंने अपनी 300 से ज्यादा पृष्ठों की पुस्तक दलितो देवो भव् में स्पष्ट लिखा है दलितों को भी ईश्वरीय अराधना करने का उतना ही अधिकार जितना की एक ब्राहमण को । इसको प्रमाणित करने के लिए मैंने वेद स्मृति समस्त पुराणो और विभिन्न प्रकार के धार्मि का ग्रंथो का सार लिया है जिसमें कहीं भी दलितो द्वारा पूजा को अवैध अनैतिक ठहराया गया है या प्रतिबंधित नहीं किया गया है। वैसे भी ईश्वर के दरबार में सब बराबर है तभी तो कबीर दास ने कहा था `जात पात न पूछे कोई हरि के भजै से हरि के होई´। अपने उपलब्धि से उत्साही किशोर कुणाल जो वर्तमान में बिहार राज्य धार्मिक ट्रस्ट बोर्ड (बी. आर. टी .बीद्धके अध्यक्ष हैं ने कहा की आनेवाले समय में बिहार के तमाम मंदिरों में पुजारी क ेरूप में दलित ही नियुक्त होंगें और इसके लिए वो प्रयासरत हैं। आंकड़ो के अनुसार बिहार में कुल रजिस्टर्ड मंदिरों की संख्या कुल 3000 है, और मंदिरों की संख्या करीब 50000 तक है। दूसरे अर्थो में यह समझा जा सकता है कि आने वाले समय में बिहार में दलित कुल पुजारियों की संख्या 50000 या उससे अधिक हो जाएगी। जो अपने आपमें एक बड़े बदलाव का द्योतक है। इसलिए हमें प्राथ्Zाना करनी चाहीए की कुणाल के प्रयास अवश्य रंग लाए । अगर ऐसा होता है तो निश्चय ही बिहार पूरे भारत में एक ऐसी क्रांति का नेतृत्व करेगा जिसका की इंतजार भारत को वर्षों से था। कुणाल के इस कदम को हम जाति रहित समाज निर्माण ओर बढ़ने वाला कदम मान सकते हैं जहां मानवता और कर्म की पूजा होती है न किसी जाति विशेष की। अगर हमें 2020 तक भारत को विकसित राष्ट्रों की सूची में लाना है तो ऐसे कदम उठाने ही होंगें । इसलिए विवेकानंद ने भारत विकास के संदर्भ में कहा `दीन-दलित-दुखी देवो भव्´

Tuesday, July 7, 2009

पहचान के संघर्ष से आत्मनिर्भरता की ओर

सामाजिक तौर पर बहिष्कृत, अनवरत् मानसिक यंत्रणा का दंश झेल रही और गलियों में भीख मांगकर दो वक्त की रोटी जुटाने वाली वृंदावन की विधवा महिलाओं को कई बार शारीरिक शोषण का भी शिकार होना पड़ता है, इस सामाजिक निष्ठुरता एवं सरकारी उपेक्षा के बीच इन महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाकर उनमें जीवन के प्रति सम्मान एवं उत्साह जगाने की कोशिश की जा रही है।
उमाशंकर मिश्र/मथुरा
समाज से परित्यक्त और सरकारी उपेक्षा की शिकार वृंदावन में रहने वाली करीब 10 हजार विधवा महिलाओं के दुख और मानसिक यंत्रणा की कहानियों को सैकड़ों पत्रकारों और फिल्मकारों ने कई बार उकेरा है। अब तो मीडिया संस्थान के संपादकीय विभागों में बैठे प्रबुद्ध संपादकों को भी अब यह विषय घिसा-पिटा सा जान पड़ता है, लेकिन इन महिलाओं की दुखद दास्तान से हटकर उनके सशक्तिकरण और मनोबल को ऊंचा उठाने को लेकर भी प्रयास किये जा रहे हैं। दि गिल्ड फॉर सर्विसेज की अध्यक्ष वी.मोहिनी गिरी और `युनाईटेड नेशन्स डेव्लपमेंट फंड फॉर वुमेन´ (यूनीफेमद्ध मिलकर इस काम के लिए धन जुटाने हेतु एक फोटो प्रदर्शनी आयोजन कर रही हैं। `Lonely Images, lasting Impressions-A journey of widows of vrindavan and varanasi´ की थीम पर आधारित इस प्रदर्शनी में देश विदेश के अनेक फोटोग्राफर्स इन असहाय महिलाओं की व्यथा को अपने कैमरे में कैद कर दुनिया को उससे रूबरू करा रहे हैं। बकौल मोहिनी गिरी-`यह प्रयास इन महिलाओं की दुखद परिस्थितियों पर फिल्म बनाकर परोसने की बजाय उन्हें एक सम्मानजनक जीवन जीने के लिए प्रेरित करेगा।´ हर तरफ से ठुकराई जा चुकी इन महिलाओं की जिंदगी उत्साहविहीन और नीरस बन जाती है। दो वक्त की रोटी के लिए भीख मांगना और हरि भजन कर समय बिताना वृंदावन में रहने वाली विधवा महिलाओं की दिनचर्या का हिस्सा होता है। नितांत अकेलेपन के बीच न कोई आत्मसम्मान का भाव, न जीवन के प्रति कोई लगाव और न ही कुछ नया करने का उत्साह, बहते पानी की तरह इन महिलाओं की जिंदगी होती है, जहां ढाल मिला बहते चल दिये। ये महिलाएं सिर्फ फिल्मकारों की पटकथा की विषयवस्तु बन कर न रह जायें इसके लिए इन्हें विभिन्न प्रकार की व्यावसायिक गतिविधियों से जोड़ने की तैयारी की जा रही है। मोहिनी गिरी के मुताबिक-`इन महिलाओं को आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर और मानसिक तौर पर लचीला बनाने के लिहाज से नर्सिंग, सिलाई, आचार, पापड़, साबूदाना, धूपबत्ती, दोने और धार्मिक पोशाकें बनाने का प्रशिक्षण दियाा जा रहा है।´ आगे वे कहती हैं कि `आज ऐसी असहाय महिलाओं की संख्या निरंतर बढ़ रही है तो सिर्फ व्यवस्था को कोसने से काम नहीं चलेगा, बल्कि परंपरागत सोच से ऊपर उठकर काम करना होगा।´ सफेद धोती में लिपटी इन महिलाओं के कंठ से निकलने वाली आवाज और टकटकी लगाकर निहारती आंखों में तैरता पानी इनकी पीड़ा की कहानी कहता है। सब कुछ ठीक रहा तो अब शायद ऐसा नहींं रहेगा। कॉटेज इंडस्ट्री आधारित प्रशिक्षण, हैल्थकेयर, साक्षरता और सुरक्षित वातावरण से अब इन महिलाओं के आर्थिक एवं सामाजिक सशक्तिकरण की राह प्रशस्त हो रही है। वृंदावन में गिल्ड ऑफ सर्विस के एक नये प्रकल्प मॉं धाम में इसी तरह की 120 असहाय विधवा महिलाएं रह रही हैं। भोजन एवं आवास जैसी मूलभूत सुविधाओं के अलावा मॉं धाम में इन महिलाओं की जीवन में गुणात्मक सुधार हेतु कैपेसिटी बििल्डंग कार्यक्रम भी चलाये जाते हैं। वोकेशनल ट्रेनिंग सेंटर, डेयरी फार्म, तुलसी फार्म और हल्दी की खेती भी गिल्ड की कार्यसूची में शामिल है। यह शर्म की बात है कि इन महिलाओं की ओर समाज और सरकार किसी का ध्यान नहीं जाता। राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा 1998 में किए गए एक सर्वे के मुताबिक वृंदावन की गलियों में 10 से भी अधिक विधवा महिलाएं रह रही हैं, जिन्हें बहिष्कृत जीवन जीने के साथ साथ शारीरिक शोषण का भी दंश झेलना पड़ता है। यही नहीं जीवन यापन के लिए उन्हें भजन गाकर भीख मांगने के अलावा वेश्यावृत्ति के लिए भी मजबूर होना पड़ता है। बहुत अधिक उम्र के कारण कई महिलाएं तो चलने फिरने में भी असमर्थ होती हैं। मंदिरों की नगरी कहे जाने वाले वृंदावन की गलियों में देश-दुनिया से मन और आत्मा की शांति की आस लिए हजारों लोग आतें हैं, अपने प्रिय श्रीकृष्ण की स्तुति में मंत्रों का जाप और स्तुति गायन करते हैं और अंतत: आश्चर्यचकित निगाहों से इन विधवाओं को ताकते हुए वापस लौट जाते हैं। यह सिलसिला निरंतर कई वर्षों से चलता आ रहा है। हालांकि वृंदावन की विधवाओं की नीरस जिंदगी को जीवनपर्यन्त भीख और दर-दर की ठोकरों से बचाने की गिल्ड ऑफ सर्विस की कवायद आशा की एक नई किरण जान पड़ती है।

Monday, July 6, 2009

अब प्रणब दादा की बारी

उमाशंकर मिश्र
ममता दीदी के रेल बजट के बाद अब प्रणब दादा की बारी थी। मंदी के दौर और खेती के चौपट होने की मार झेल रही ग्रामीण जनता को नई सरकार से काफी उम्मीदें थी। कृषि क्षेत्र के लिए कम से कम चार प्रतिशत की विकास दर का लक्ष्य रखते हुए अर्थव्यवस्था के लिए नौ प्रतिशत की विकास दर का लक्ष्य रखा गया है। वित्त मंत्री द्वारा प्रस्तुत बजट में कार्पोरेट जगत को ज्यादा कुछ नहीं दिया गया लेकिन आम भारतीय और देश के लिए महत्वपूर्ण इकाइयों के लिए काफी कुछ प्रावधान किए गए हैं। बजट में कृषि जगत का खास ध्यान रखा गया है और रेल तथा सड़क तंत्र के विकास की बात की गई है।
हालांकि अंतरीम बजट में सामाजिक सरोकारों को लेकर सरकार प्रतिबद्ध जान पड़ रही थी, लेकिन अब जब प्रणब दादा का पिटारा खुल चुका है तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर नज़र रखने वाले पैरोकारों समेत विभिन्न अर्थशास्त्री कृषि की घोर उपेक्षा का आरोप सरकार पर लगा रहे हैं। . एग्रीकल्चर ट्रेड एण्ड पॉलिसी एक्सपर्ट-भास्कर गोस्वामी बजट के दो पहलुओं की ओर ध्यान केंद्रित करते हुए कहते हैं कि राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना की राशि में 144 फीसदी की बढ़ोत्तरी कर 39 हजार करोड़ किए जाने को सही ठहराते हैं। वे कहते हैं कि-यदि सही तरीके से इसे लागू किया गया तो बेरोजगारों के साथ साथ किसानों को भी फायदा मिल सकता है। दूसरी ओर उर्वरक सब्सिडी के लिए 49980 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। फर्टीलाइजर्स पर दी जाने वाली सिब्सडी सीधे किसानों को दिये जाने की बात को भी जानकार उचित कदम मान रहे हैं। लेकिन इससे फर्टीलाइजर्स के उपभोग पैटर्न में आने वाले एक डेढ़ सालों में क्या परिवर्तन होंगे यह देखने की बात होगी। कृषि ऋण पर ब्याज दर घटाकर 4 प्रतिशत के स्तर पर लाये जाने की आशा अर्थशास्त्रियों को थी। लेकिन ऐसा न होने पर भास्कर गोस्वामी जैसे जानकारों कहना है कि-दीघZकालीन खेती की ओर सरकार का ध्यान बिल्कुल नहीं है और किसी न किसी बहाने सरकार खेती से अपना हाथ खींचकर उसे कार्पोरेट कंपनियों के हवाले कर देने में जुटी हुईZ है। वे कहते हैं-वर्तमान हालातों को देखते हुए किसानों के लिए आय की गारंटी से जुड़ी किसी घोषणा की उम्मीद थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। एक और बात हाईब्रिड बीजों के दुष्प्रभावों को देखते हुए इस पर सख्त कदम उठाने की अपेक्षा भी थी, लेकिन इस पर भी कुछ नहीं हुआ। फिलहाल जानकारों की मानें तो इस बजट से खेती में किसी तरह के सुधार की आशा नहीं की जानी चाहिए। इस बीच कर्ज माफी योजना को दिसंबर तक बढ़ाये जाने को किसानों को राहत पहुंचाने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वित्त मंत्री ने महाराष्ट्र में इस योजना से वंचित उन किसानों के लिए कार्य बल गठन करने का ऐलान किया जिन्होंने महाजनों से ऋण लिया हुआ है। इसके अलावा सरकार ने उन किसानों के लिए 6 फीसदी की दर से कर्ज देने की घोषणा की जो अपने कर्ज का भुगतान समय पर करते हैं। यह दर दूसरों से लिए जाने वाले ब्याज दर से एक फीसदी कम है। केन्द्र ने इस उद्देश्य के लिए अंतरिम बजट के मुकाबले इस बजट में 411 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि का आवंटन किया है। मुखर्जी का कहना है कि सरकार अल्पकालिक फसल कर्ज के लिए ब्याज सब्सिडी देना जारी रखेगी। तीन लाख रुपये तक के ऋण पर किसानों को 7 फीसद ब्याज देना होगा। सरकार ने वित्त वर्ष 2009.10 के लिए कृषि ऋण का लक्ष्य बढ़ाकर ३,2500 करोड़ रुपये कर दिया है।
बहरहाल राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना की राशि में बढ़ोत्तरी एवं राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन का आरंभ करने के साथ 1.2 करोड़ नौकरियां प्रतिवर्ष देने को संतोषजनक माना जा रहा है। राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना 2009-10 में 63 फीसदी की वृद्धि के साथ 8.800 करोड़ रुपये का आवंटन, प्रधानमंत्री आदशZ ग्राम योजना में 100 करोड़ का प्रावधान, महिला साक्षरता के लिए राष्ट्रीय मिशन प्रारंभ करने की बात सरकार कर रही है। लेकिन जिस तरह से पेट्रोलियम पद्धार्थों के दामों में बढ़ोत्तरी हो रही हे, उसे नकारात्मक माना जा रहा है। आज उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पहले ही 10 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच चुका है, जानकारों के मुताबिक ऐसे में आने वाले समय में इसका सीधा असर कमोडिटी दामों पर पड़ेगा।
सरकार ने वित्त वर्ष २००९-10 में कृषि क्षेत्र के लिए लक्ष्य बढाकर ३,२५,000 करोड़ रुपये कर दिया है। पिछले वित्तीय वर्ष में यह लक्ष्य 280000 करोड़ रुपये रखा गया था। हालांकि कृषि क्षेत्र के लिए कर्ज के तौर पर २,८७,000 करोड़ रुपये दिए गए। लेकिन कमल नयन काबरा जैसे अर्थशास्त्रियों की नज़र में यह नाकाफी है। वे कहते हैं कि जरूरत को देखते हुए ग्रामीण क्षेत्र की तो घोर उपेक्षा की गई है। आधार संरचना में जीडीपी के 9 फीसदी के निवेश की बात पर वे कहते हैं कि भारत के 60 लाख गांवोंं में औसतन यदि 10 लाख रुपये भी लगा दिये जाये ंतो कुछ होने वाला नहीं है। सेनीटेशन की समस्या का हवाला देते हुए कहते हैं कि आज भी औरतों को कष्ट सहना पड़ता है। बकौल काबरा एक ओर तो सरकार आलीशान फलाईओवर्स बना रही है, बाम्बे में बाढ़ राहत के लिए 500 करोड़ रुपये दिये जा रहे है, लेकिन बिहार एक बार फिर बाढ़ के मुहाने पर खड़ा है, उसके लिए कुछ नहीं किया गया। आम आदमी की बात करते हुए काबरा कहते हैं कि गरीब के पल्ले अंतत: कुछ नहीं पड़ता, सब बिचौलियोंं की जेबों में चला जाता है। वे कहते हैं कि आज जरूरत है खेती के कार्पोरेटाइजेशन को रोकने और सीमांत एवं गरीब किसानों के हित में कदम उठाये जाने की।

Monday, April 13, 2009

बेटे की हत्या के बदले में है मां चुनाव मैदान में

प्रतापगढ़। भड़काऊ भाषण और राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत निरुद्ध होने के बाद देश की राजनीति में हाल ही में चर्चा में वरुण गांधी को लेकर मां कौन और कैसी हो पर बसपा प्रमुख मायावती और भाजपा की आंवला सीट से प्रत्याशी मेनका गांधी के बीच वाक युद्ध थमा भी नहीं है कि अपने बेटे की हत्या का बदला लेने चुनाव मैदान में आ गई एक और मां की भी जोरदार चर्चा है।
यह हैं बसपा के विधायक रहे राजू पाल की मां रानी पाल जो प्रतापगढ़ लोकसभा सीट से निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर अपना दल के उम्मीदवार अतीक अहमद के खिलाफ चुनाव मैदान में हैं। अतीक हैं राजू पाल की हत्या के आरोपी जो अभी तक इलाहाबाद के नैनी जेल में बंद थे और उन्हें रविवार रात लखनऊ जेल भेजा गया है। रानी पाल का मकसद चुनाव जीतना नहीं बल्कि अतीक के हार की जमीन तैयार करना है।
तपती दोपहर, 70 साल की आराम करने की उम्र, आंखों पर चश्मा फिर भी रानी पाल थकती नहीं और हाथ में झाड़ू तथा राजू पाल के कुछ दोस्तों के साथ घर-घर अपने लिए नहीं बल्कि अतीक को वोट नहीं देने की लोगों से गुजारिश कर रही हैं। सुबह होते ही वह राजू के दोस्तों के साथ घर से निकल लेती हैं और फिर किसी घर की कुंडी खटखटा देती हैं। उनकी अपील होती है बस अतीक को वोट मत दो क्योंकि यह मेरे बेटे का हत्यारा है।
रानी पाल कहती हैं मुझे भले ही वोट मत दो लेकिन मेरे बेटे के हत्यारे को भी जीतने मत दो। उनके गले में एक तख्ती भी लटकी रहती है जिसमें उनके बेटे राजू पाल की हत्या का पूरा ब्योरा लिखा है। जनता को सभी कुछ समझा नहीं सकतीं इसलिए गले में लटकी तख्ती आगे कर देती हैं कि लिखे को लोग पढ़े और समझ जाएं।
रानी पाल ने कहा कि यह एक मां के इंतकाम की आग है, जो तब तक नहीं बुझ सकती जब तक अतीक का सब कुछ खत्म नहीं हो जाए। उन्होंनें कहा, वह जब तक जीवित रहेंगी तब तक अतीक जहां से भी चुनाव लड़ेगा उसके सामने मैं होऊंगी।
उन्होंने कहा कि जिस तरह झाडू से घर और सड़क की गंदगी साफ की जाती है उसी तरह वह राज्य और देश को अपराधी से राजनीतिज्ञ बने लोगों से मुक्ति दिलाना चाहती है। यह झाडू सफाई का प्रतीक है और ऐसे लोगों पर मार का भी जो समाज में गंदगी फैला रहे हैं।
राजू पाल इलाहाबाद पश्चिम सीट से 2002 में अतीक अहमद से विधानसभा का चुनाव हार गए थे। अतीक ने समाजवदी पार्टी के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ने के लिए विधानसभा की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया और फूलपुर सीट से सपा के सांसद बन गए। अतीक के त्यागपत्र देने के बाद नवंबर 2004 में हुए उपचुनाव में राजू पाल ने अतीक के भाई अजिज अशरफ को हरा दिया। यह हार ही दोनों की दुश्मनी का कारण हो गया। बाहुबलि अतीक इस हार को बर्दाश्त नहीं कर सके और 26 जनवरी 2005 को राजू पाल की दिन दहाड़े हत्या कर दी गई। राजू अपने साथियों के साथ गणतंत्र दिवस पर होने वाले समारोह में हिस्सा लेने अपने पैतृक गांव जा रहे थे। राजू पाल की चार दिन पहले ही शादी हुई थी। उनकी पत्नी मात्र चार दिन ही सुहागन रह पाई।
राजू पाल की हत्या के बाद हुए उपचुनाव में बसपा ने उनकी पत्नी पूजा पाल को उम्मीदवार बनाया, लेकिन वह जीत नहीं सकीं। विधानसभा के लिए 2007 में हुए चुनाव में पूजा ने अतीक के भाई अजिज को हराया।
अतीक ने लोकसभा में पिछले 22 जुलाई को हुए शक्ति परीक्षण में पार्टी व्हिप का उल्लंघन करते हुए सरकार के खिलाफ मत दिया था इसलिए सपा ने उसकी सदस्यता खत्म कराने का आवेदन किया। फूलपुर के इस सांसद ने बसपा से भी लोकसभा टिकट लेने के लिए जोर लगाया लेकिन पार्टी ने अपने विधायक के हत्यारे को टिकट देने से मना कर दिया। हत्या के बाद से ही अतीक इलाहाबाद के नैनी जेल में बंद हैं और उनकी जमानत नहीं हुई है। रविवार रात उन्हें नैनी जेल से लखनऊ जेल लाया गया है। हत्या के मामले में अदालत का फैसला चाहे जो भी हो लेकिन एक मां अपने बेटे की हत्या का बदला लेने मतदाताओं के पास पहुंच गई है।

साभार: याहू, दैनिक जागरण

Saturday, April 11, 2009

कितने हितकारी होंगे ग्राम न्यायलय

प्रीति पाण्डेय /दिल्ली
ग्राम न्यायलय बिल के द्वारा देश भर में करीब 3000 हजार ग्राम न्यायालय स्थापित करने की घोषणा हाल ही में केन्द्रीय मंत्री हंसराज भारद्वाज ने की है। क्या सच में यह बिल गांवों में सुख-शांति का बीज बो पाएगा? गांवों की न्यायिक व्यवस्था की बात चलती है तो `जिसकी लाठी, उसकी भैंस´ की कहावत अनायास ही ध्यान में आ जाती है। ऐसे में गरीब एवं पिछड़े ग्रामीणों को तो दबंगों के सामने आत्मसर्पण करना ही पड़ता है। 2007 में संसद में ग्राम न्यायलय का प्रस्ताव रखा गया, जिसे जनवरी 2009 में मंजूरी दी गईं। कानून पैसे वाले का होता है, सबके मन में पलने वाली इस धारणा पर ग्राम न्यायालय की संकल्पना क्या आशा की नई किरणा जान पड़ती है? क्या है जानकारों की राय और ग्राम न्यायलय गावों के लिए कितने हितकारी होंगे?आईये जानें...
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डॉ युधिष्ठिर शर्मा, न्यायधीश-जिला न्यायालय, गाजियाबाद
`ग्राम न्यायलय योजना´ सरकार द्वारा उठाया गया एक बहुत ही अच्छा कदम है। इससे ग्राम स्तर पर बढ़ रहे अपराधिक मामलों को यकीनन लगाम लगाया जा सकता है। गांवों के लोग अक्सर अन्याय सहते रहते हैं चूंकि उनकी नजर में न्याय का मतलब सालों-साल न्यायलय के चक्कर लगाने पर भी न्याय न मिलने से ही है। पहले गांव के कुछ पंच मिलकर पंचायत बैठाते थे जिसमें न्याय दिया जाता था लेकिन धीरे-धीरे इसका असर कम हो गया क्योंकि ग्राम पंचायतों पर से लोगों का विश्वास कम होता जा रहा था। और लोग न्यायलयों पर भरोसा करने लगे। इसलिए ग्राम न्यायलय का खुलना गांव वासियों को उनके अधिकार के प्रति न्याय दिलाने में एक यंत्र का काम कर सकता है। इससे तीन तरह के लाभ होंगे1. लोगों को उनके घर पर जाकर न्याय दिया जाएगा यानि जसटिस ऑन वील , जसटिस ऑन डोर:- ग्राम न्यायलय की योजना के अन्तर्गत इस बात का खास ध्यान रखा गया है कि प्रत्येक व्यक्ति के लिए न्याय उसके द्वार पर पहुंचे और एक से दो सुनवाई मेंं ही उसे न्याय मिलें।2. इस व्यवस्था से सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसमें न्याय मांगने वाले व्यक्ति का खर्चा कम से कम हो। सीमित साधनों के चलते गांव के लोग आर्थिक तौर पर काफी पिछड़े होते हैं इसीलिए वह न्याय के लिए दस्तक नहीं कर पाते लेकिन ग्राम न्यायलय के द्वारा अब वह कम से कम खर्चे पर न्याय प्राप्त कर सकते हैं। यहां तक की यदि किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिती बहुत ज्यादा खराब है तो सरकार स्वयं उसे सरकारी वकील मुहैया कराएगी और उसका सारा खर्चा सरकार द्वारा ही वहन किया जाएगा।3. ग्राम न्यायलय का तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण लाभ है कि इस व्यवस्था के अन्र्तगत न्याय की गति काफी तीव्र है। गांव के लोगों को न्याय मिलने में सालों नहीं लगेगे बल्कि उन्हें 6 माह के अन्दर ही यानि एक से दो सुनवाई में ही न्याय मिल जाएगा। इस प्रकार ग्राम न्यायलय एक ऐसी खुली अदालत होगी जिसमें प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह कितना ही गरीब क्यों न हो, वह भी न्याय मांगने के लिए जज के सामने खड़ा हो सकता है। वरना आमतौर पर व्यक्ति को अपनी बात जज तक पहुंचाने का मौका ही नहीं मिल पाता। इसलिए यकीनन इस व्यवस्था से गांव के लोगों को बहुत लाभ होगा और उनके छोटे-मोटे मामले गांव में ही सुलझ जाएंगे।

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मनीष सिसोदिया, सामाजिक कार्यकर्ता
(गैर सरकारी संस्था कबीर से सम्बद्ध)
सरकार द्वारा चलाई गई प्रत्येक योजना सफल ही हो ऐसा जरूरी नहीं है। योजनाएं तो लाखों हैं लेकिन उनमें से नाममात्र ही ऐसी होती हैं जो अपने उद्देश्य को पूरा कर पाती हैं। ग्राम न्यायलय बहुत प्रभावित होगा यह कहना मेरे लिए थोड़ा मुश्किल है, हाँ ग्राम न्यायलय गांव के लिए काफी प्रभावित हो सकता है इस बात में कोई अंदेशा नहीं है बशर्ते व्यवस्था सुव्यवस्थित ढंग से की जाएं तो। गांवों के आपसी झगड़ों को गांव के अन्दर ही सुलझाना बरसों से चली आ रही परंपरा रही है। जिसमें ग्राम पंचायत के आधार पर न्याय किया जाता था। यहां तक कि अंग्रेजों ने भी भारतीय ग्राम पंचायत को भारत की रीढ़ की हड्डी कहा है। ग्राम पंचायते जिन्हें पहले सरकार द्वारा मान्यता होती थी कि वह बिना किसी का पक्ष लिए बिना ही निष्पक्ष होकर न्याय करती थी। लेकिन समय के साथ-साथ ग्राम पंचायतों की मान्यता समाप्त होती गई क्योंकि लोगों का इनपर से विश्वास ही उठ गया था। लेकिन सरकार ने ग्राम न्यायलय को भी ग्राम पंचायत के आधार पर ही बनाया है। मेरा मानना है कि एक या दो व्यक्ति को न्यायलय की बागडोर देने से न्यायलय असल में न्याय ही देगा यह कहना थोड़ा मुश्किल है। उस व्यवस्था में जब तक समाज की भागीदारी नहीं और पारदर्शिता नहीं होगी तब तक लोगों को शुद्ध न्याय नहीं मिल सकता । भारी पक्ष से कमजोर पक्ष को दबना ही पडेगा। ग्राम न्यायलय में भागीदार जज और वकील अन्य वकील और जज की तरह रिश्वत नहीं लेते हों इसकी क्या गारंटी? आए-दिन घूसखोरी के मामले सामने आते हैं जिन्हें देखते हुए किस पर भरोसा किया जाए और किस पर नहीं यह कहना थोड़ा मुश्किल है। इसलिए जहां तक मैं समझता हूं ग्राम न्यायलय में ग्राम सभा को ही यह अधिकार दिया जाए कि वह अपने पूरे गांव में से किसी पढ़े-लिखे और समझदार व्यक्ति जिस पर पूरा गांव भरोसा करता हो, उसे ही अपना जज चुनें और ग्राम न्यायलय के द्वारा उस चुने गए जज और पूरे गांव की सहमती के आधार पर ही फैसला हो। यह एक खुला न्यायलय होना चाहिए जहां पूरे जन-समुदाय के सामने मुद्दा रखा जाए और लोगों की राय भी जाननी जाए की उनकी नजर में कौन गलत और कौन सही है। जिस प्रकार भारत जैसे लोकतंत्र देश में जनता से, जनता द्वारा और जनता के लिए नेता को चुना जाता है। उसी प्रकार गांव से गांव द्वारा और गांव के लिए- के आधार पर न्याय किया जाए तो ज्यादा बेहतर रहेगा। एक व्यक्ति को पावर देना गलत है। अपने गांव को और अपने गांव की समस्याओं को जितने अच्छे तरीके से गांव का व्यक्ति सुलझा सकता है, उतना बाहर से आए या सरकार द्वारा भेजे गए जज नहीं।


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शांति भूषण वरिष्ठ अधिवक्ता, उच्चतम न्यायालय
ग्राम न्यायलय एक बहुत ही अच्छी योजना है जो यकीनन सफल होगी। यह सरकार द्वारा उठाया गया एक प्रशंसनीय कार्य है जिसका परिणाम बहुत प्रभावशाली होगा और गांव में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को राहत पहुंचाएगा। जहां पहले गांव वाले अपने अधिकारों और अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाने से डरते थे वहीं वह अब स्वयं न्यायधीश के सामने अपनी बात रख सकते हैं। जहां कोई उनके बीच में बात काटने वाला नहीं होगा। दोनों पक्षों को अपनी-अपनी बात न्यायधीश के सामने रखने का पूरा-पूरा समय मिलेगा। न्यायधीश भी दोनों पक्षों के प्रत्येक पहलू पर नजर रखते हुए ही और सच्चाई की जड़ तक पहुंचने के बाद ही न्याय करेगा। इस व्यवस्था में वकील का कोई रोल नहीं होगा यहां न्याय देने वाला और न्याय मांगने वाले की डारेक्ट बात होगी। यह ऐसा मोबाइल कोर्ट होगा जिसमें पूरा जन-समुदाय मौजूद होगा और खुले मंच के तौर पर न्याय दिया जाएगा। मेरा मानना है प्रत्येक योजना तब तक सफल नहीं हो सकती जब तक वहां का नागरिक उस योजना का सफल न बनाएं। ग्राम न्यायलय से आने वाले समय में गांव काफी हद तक अपराध मुक्त हो जाएंगे। क्योंकि जहां न्याय की गति इतनी तेज होगी वहां अपराध कैसे ठहर सकता है। अपनी बात को खत्म करते हुए मैं यही कहुंगा कि ग्राम न्यायलय के आने से गांवों का बहुत जल्दी विकास होगा चूंकि जहां की न्यायिक व्यवस्था ठीक होती है वहां विकास का होना तय है।


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रामबहादुर रायसंपादक-प्रथम प्रवक्ता
ग्राम न्यायलय का बिल पास हुआ है यह एक अच्छी बात है बशतेZ इसे पास करने के पीछे अच्छी मंशा भी हो। यह फैसला सही दिशा में हो तो यकीनन इसका परिणाम सकारात्मक ही होगा लेकिन सरकार की परिक्षा तो तब होगी जब चुनाव हो चुके होंगे। तब असली काम नजर आता है। जहां तक मुझे लगता है अभी तक जहां भी न्याय की बात होती है वहां न्याय के नाम पर निर्णय किए जाते हैं इसलिए किसी जगह के लिए न्यायलय व्यवस्था देने से ज्यादा जरूरी है न्याय प्रणाली में सुधार! इन बिलों को पास करके प्रत्येक सरकार यह साबित करना चाहती है कि वह कितनी गरीबप्रस्त है फिर भले ही उनके चुनावी घोषणा पत्र में गरीब का जिक्र तक न किया गया हो। जो गरीब भूखे पेट सो रहा है उसे कोई क्या न्याय की जरूरत है उसके लिए तो पहला न्याय उसके पेट को भरना है। गरीब अपनी मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति कर पाए यही उसका पहला न्याय है, बाकी तो बाद की बातें हैं। ग्राम न्यायलय पूरी तरह ग्राम पंचायत के आधार पर हों जिनमें गांव की बात गंाव में ही खत्म हों और जिसमें कोई मुकदमेंबाजी न हो। चूंकि जहां सरकार जुड़ती है वहां अनेक औपचारिकताएं होती है जिन्हें पूरा करने के लिए अक्सर रिश्वत के देवताओं को चढ़ावा चढ़ाना होता है। इसलिए ग्राम न्यायलय में किसी जज और वकील के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए तभी न्याय के लिए रिश्वत का चलन समाप्त हो पाएगा। योजना अच्छी है लेकिन इसका सकारात्मक असर तभी होगा जब इसे अच्छे ढंग से चलाया जाए। (साभार :सोपान स्टेप)

Wednesday, April 8, 2009

हर गरीब की अपनी हो पहचान : प्रभाष जोशी


इलाहाबाद। रोजी, रोटी और मकान अपनी हो पुख्ता पहचान। यही वह नारा था जो शहरी गरीबों के घोषणा पत्र पर अंकित था। शनिवार को शहरी गरीबों के इस नारे से सभागृह गूंज उठा। मौका था लोक सभा चुनाव पर शहरी गरीब संघर्ष मोर्चा द्वारा तैयार घोषणा पत्र का। घोषणा पत्र को प्रख्यात पत्रकार व चिंतक प्रभाष जोशी और मोर्चा की कार्यकर्ता तारा देवी ने जारी किया। कार्यक्रम का आयोजन शहरी गरीब संघर्ष मोर्चा, विज्ञान फाउण्डेशन, मुहिम एवं ह्यूमन राइटर्स ला नेटवर्क ने संयुक्त रूप से किया।
घोषणापत्र जारी करते हुए प्रभाष जोशी ने कहा कि हर गरीब की अपनी पुख्ता पहचान होनी चाहिए। इन मेहनतकश लोगों के बिना हमारे आधुनिक नगर की कल्पना संभव नहीं। उन्होंने कहा कि गरीबों को जब तक उनकी पहचान और नागरिकता के अधिकार नहीं मिल जाते तब तक चुनाव और लोकतंत्र की बातें अधूरी हैं। श्री जोशी ने बाल भारती कैरियर कोचिंग के हाल में हुए दूसरे सत्र में न्यू लिबरल वाशिंगटन कान्ससनेस की बात उठायी। उन्होंने कहा कि ब्रिटिश व अमेरिका के बीच संधि स्वरूप जो उदारीकरण की नीति विश्व में फैली उसके कई दुष्परिणाम देश को भुगतने पड़ रहे हैं। लेकिन इसका अहसास शासन व सत्ता पर बैठे लोगों को नहीं हो पा रहा है। आज की दुनिया में संघर्ष के नये सत्र विषयक संगोष्ठी में उन्होंने बताया कि उपनिवेशवाद अपने बदले स्वरूप में पैर पसार रहा है। पूंजी ही ब्रह्म और मुनाफा ही मोक्ष बन गया है। इसके प्रति सजग होने की जरूरत है। कार्यक्रम का आयोजन प्रगतिशील लेखक संघ व इतिहास बोधमंच, पाकिस्तान इन्डिया पीपुल्स फोरम फार पीस एण्ड डेमोक्रेसी की ओर से किया गया। संगोष्ठी की अध्यक्षता जियाउल हक ने की।
सुबह और शाम के सत्र में उपस्थित लोगों में डा.मानस मुकुल दास, रविकिरण जैन, प्रो. आरसी त्रिपाठी, प्रो. लाल बहादुर वर्मा, डा. पद्मा सिंह, उत्पला शुक्ला, डा. अनीता गोपेश, हरीश्चन्द्र, जीतेन्द्र मौर्य, यश मालवीय, जफर बख्त, असरार गांधी, फैज अंसारी आदि शामिल रहे। संचालन अंशु मालवीय ने किया।

साभार : दैनिक जागरण

Saturday, April 4, 2009

मोहर लगेगी जात पर

उमाशंकर मिश्र/वाराणसी
पूर्वांचल में रोजगार का एकमात्र साधन यहां खेती-बाड़ी है। लम्बे समय तक अर्थव्यवस्था मनीआर्डर इकॉनमी पर आधारित रही है, लेकिन अब तो हर नौजवान मुम्बई, दिल्ली या फिर सूरत जाना चाहता है। अपने लिए क्या सही अथवा क्या गलत है, इसके बारे में भले ही लोगों को जानकारी न हो, लेकिन राजनीतिक समीकरणों को लेकर चर्चा करने में इनका कोई सामी नहीं। लोगों को धर्म और जाति के नाम पर बरगलाकर जनप्रतिनिधी सत्ता हासिल कर लेते हैं, जबकि जनता राजनीतिक गणित बिठाने में जुटी रहती है।
पूर्वांचल के ग्रामीण अंचल में यह मौसम आम के पेड़ों पर बौर आने का होता है। खेतों में रबी की पकी हुई फसलें कटने को तैयार खड़ी हैं, जबकि कुछ फसलें तो खलिहान तक पहुँच भी चुकी हैं। हवाओं में भरी महुए के फूलों की खुशबु, सुबह तक टप-टप करके चूने वाले महुए के पीले रंग के रसीले फूलों की जमीन पर बिछी चादर और उस पर पड़ने वाला सवेरे का मि(म प्रकाश एक अप्रतिम सौन्दर्य की छटा बिखेरता है। महुआ को इकट्ठा करने के लिए लोग सुबह से टोकरी लेकर निकल जाते हैं। प्रतापगढ़ के प्रसिद्ध आंवले के बागों में नई कोंपले फूटने लगी हैं। चना, अरहर, गेहूं, अरसी, मटर इत्यादि की फसलें लोकजीवन में नई आशाओं का संचार करती हैं। इन सबके चलते ग्रामीण आशााओं के आसमान में विचरण करते हुए जीवन की भावी योजनाएं बनाने में जुट जाते हैं। निरंतर चली आ रही ग्राम्य जीवन की इस परंपरा के बीच लोकसभा चुनावों की आहट लिये यह साल क्या भोले-भाले ग्रामीणों के लिए भी कुछ नई उम्मीदों से परिपूर्ण होगा? यह सवाल कई लोगोें के मन में है। लेकिन आम आदमी क्या सोच कर वोट देता है और विकास उसके लिए कितना मायने रखता है? यह जानने की कोशिश चुनाव मैदान में उतरने वाले राजनेता भी शायद ही करते होंं।
भोपियामऊ प्रतापगढ़ के लालजी मुसहर रिक्शा चलाकर जीवन यापन करते हैं। उल्लेखनीय है कि भोपियामऊ समाजवादी पार्टी के बाहुबली सांसद रहे अक्षय प्रताप सिंह उर्फ गोपाल का प्रभाव क्षेत्र माना जाता है और पिछला चुनाव भी उन्होंने जेल में रहकर जीता था। लालजीसे जब पूछा गया कि पिछले चुनाव में किसे वोट दिया था, तो वह कहता है-साईकिल को भईया। क्यों? अरे अपने राजा साहब हैं ना, इसीलिए। राजा साहब ने तुम्हारे लिया क्या किया है? लालजी चुप हो जाता है। कुल मिलाकर लब्बोलुआब यह था है कि लालजी मुसहर जाति का है और ठाकुर बहुल गांव में रहता है। उसे नहीं मालूम कि उसकी अपनी और अपने समुदाय की आवश्यकता क्या है, जिससे भावी पीढ़ी समाज की मुख्यधारा में शामिल हों सके। उसके वोट की कीमत उसे नहीं मालूम, लेकिन वह अच्छी तरह जानता है कि उसे साईकिल पर ही मुहर लगानी है, क्योंकि यह राजा साहब का चुनाव चिन्ह है।
उत्तर प्रदेश में दलितों रहनुमाई की झंडाबरदार कही जाने वाली बहुजन समाज पार्टी की सरकार है, जिसके गठन का आधार ब्राम्हणों, दलितों एवं मुसलमानों को मिलाकर की गई सोशल इंजीनियरिंग को माना जाता है। दलितों ने मायावती की सरकार में अपने जीवन को लेकर सपने बुने थे, बेहतरी के लिए आशायें संजोयी थी और उन्हीं आशाओं को ध्यान में रखकर राज्य में दलित की बेटी को मुख्यमंत्री की गद्दी पर बैठाया था, ऐसा आमतौर पर समझा जाता है। पूर्वांचल का दौरा करने के पश्चात् यह धारणा परंपरागत जान पड़ी। यहां स्थानीय प्रत्याशी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को ध्यान में रखने की बजाय पिछड़ी जातियों के लोग हाथी को इसलिए वोट देते हैं क्योंकि उन्हें लगता है, हाथी उनका जन्मजात साथी है। कैसे और क्यों? यह किसी को नहीं मालूम। वयोवृद्ध बाबादीन प्रतापगढ़ जिले की पट्टी तहसील के डंडवा महोखरी गांव में रहते हैं। परिवार में चार बेटे, चार नाती और पांच पनाती हैं। चारों बेटों समेत बाबादीन खुद भी मजदूरी करके परिवार चलाते हैं। जब उनसे पूछा गया कि किसे वोट दोगे तो तपाक से बाबादीन कहते हैं कि-हाथी को। क्यों? तो वे कहते हैं कि-`जब समाजय हाथी का वोट देत अह्य तो हमहू देत अही।´ क्या पनातियों से भी मजदूरी कराओगे, अब तो आपकी सरकार भी है? इस सवाल से बाबादीन असमंजस में पड़ जाते हैं। उनसे जब यह पूछा गया कि अगर बसपा से कोई ऐसा व्यक्ति चुनाव लड़े जो अपराधिक प्रवृत्ति का हो तब किसे वोट देगें? जवाब में वे कहते हैं-`जेल तो सहिव का होत है और गैर सहिव का होई जात है। उल्लेखनीय है कि बाबादीन को कानूनी खामियां तो पता हैं कि सही व्यक्ति को भी जेल हो जाती है। लेकिन उनके आत्म-विकास के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार कितना जरूरी है, इस बात का उन्हें आभास नहीं है और न ही वे इसकी मांग करते हैं।
चनुआपट्टी के रामसिंह कहते हैं कि `यहां कोई चुनावी मुद्दा नहीं होता, राजनीति जात बिरादरी की हो गई है। विकास को रामसिंह गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से जोड़ कर देखते हैं। वे कहते हैं कि गांव में यदि बेहतर शिक्षा की व्यवस्था हो जाये तो लोगों की सोच में कुछ बदलाव आ सकता है। मिड-डे मील योजना को वे बंद कर देने की राय देते हैं। उनका मानना है कि इससे बच्चों का ध्यान पढ़ाई की बजाय खाने पर ही लगा रहता है और अध्यापक भी पूरा दिन खाना बनाने और खाना बनाने वाली से बतियाने में जुटे रहते हैं। खेती में सिंचाई की व्यवस्था को पुख्ता करने की बात पर रामसिंह जोर देते हैं। खेती के लिए मिलने वाले इन्पुट्स मसलन खाद, बीज इत्यादि के वितरण में होने वाली धांधली की बात करते हुए वे कहते हैं कि `प्रत्येक खाद की बोरी पर 10 रुपये कमीशन किसानों को जरूर देना पड़ता है।´ वहीं चनुआपट्टी ग्राम पंचायत के ही बालमुकुन्द मिश्र कहते हैं कि-`मंदिर मिस्जद मुद्दा रहा तो उससे कौन सा विधायक या मंत्री मरा है, मरता तो आम आदमी ही है। दूसरी ओर वे यह भी कहते हैं कि वर्तमान सरकार ने कौन सा रोजगार हमें दिया है? अपने गांव गड़ौरी कलां में स्कूल और डिस्पैन्सरी जैसी बुनियादी सुविधाओं के न होने का भी उन्हें मलाल है। इन बातों को लेकर बालमुकुन्द ने किसी भी राजनीतिक दल को वोट न देने का फैसला किया है। हालांकि पिछड़ेपन और परंपरागत सोच के अंधेरे के बीच कहीं-कहीं आशा की किरण भी नज़र आती है। छोटेलाल तिवारी डंड़वा महोखरी गांव के प्रधान हैं, उनके गांव में खड़ंजा, पानी की टंकी, स्कूल और स्वास्थ्य केन्द्र जैसी बुनियादी सुविधाएं मौजूद हैं। छोटेलाल विकासोन्मुख एवं रोजगारपरक शिक्षा की जरूरत पर जोर देते हैंं।

ग्राम सरायनानकार निवासी वीरेन्द्र मिश्र कहते हैं बिजली की आंख मिचौली का जिक्र करते हुए विद्युत आपूर्ति हेतु सरकारी प्रतिब(ता की कलई बखूबी खोलते हैं। कटाक्ष करते हुए वे कहते हैं कि `आजकल परीक्षाएं चल रही हैं इसलिए रात को 11 बजे के बाद बिजली आ जाती है और सुबह 5 बजे चली जाती है। यही नहीं मुख्य लाईन से घर तक बिजली का तार खींचने के लिए सालों से हमें कामचलाऊ खंभे खुद ही गाड़ने पड़ते हैं।´ बिजली की इस अनियमितता का असर खेती पर भी पड़ता है। घर से करीब 2 किलोमीटर दूर सुनसान में उनके खेत हैंं। वे बताते हैं कि सिंचाई के लिए उन्हें घर से मोटर लेकर वहां जाना पड़ता और खुले आसमान के नीचे चारपाई लगाकर पौष माघ की सदीZ में बिजली आने का इंतजार करना पड़ता था। ताकि खेतों को सींचा जा सके। सिंचाई सुविधाओं को बेहतर बनाने के अलावा बिजली और आवागमन सुविधाओं की बेहतरी की आस वीरेन्द्र को है। लेकिन चौपई गांव के गुरुप्रसाद तिवारी ने इस बार मतदान न करने का फैसला किया है। वे कहते हैं कि-`जनता को नेता लोग सपने दिखाकर बरगला लेते हैं और जब उनका स्वार्थ आता है तो एक पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में चले जाते हैं।
वाराणसी के संजीव सिंह पढ़े लिखे बेरोजगार युवाओं में से एक हैं। वे कहते हैं-`किसी पार्टी के पास कोई मुद्दा नहींं है। किसी राष्ट्रीय विषय से राजनीतिक दलों का सरोकार नहीं है। अल्पसंख्यक राजनीति को लेकर वे कहते हैं कि आज पूर्वांचल में कई आजमगढ़ दिखाई देते हैं, जबकि अशिक्षा, बेरोजगारी और धर्मान्धता को उपेक्षित किया जा रहा है।´ दूसरी ओर उत्तर प्रदेश में नये परिसीमन के बाद भी लोग जातिगत आधार पर ही वोट दे रहे हैं। एक अन्य महत्वपूर्ण बात स्थानीय भौतिक आवश्यकताओं की आपूर्ति से भी जुड़ी है। कृषि को ही लीजिये। पिछला मानसून किसानों के लिए लाभप्रद था, लेकिन सरकार को चावल देने का मामला आया तो उनके कोटे कम कर दिये गए। झांसी मंडल, चित्रकूट, इलाहाबाद इत्यादि के कोटे बढ़ा दिये गए। परिणाम यह हुआ कि यहां हजारों िक्वंटल धान जस के तस पड़े हुए हैं। वहीं गरीब किसानों की हजारों एकड़ जमीन गंगा एक्सप्रेस-वे की भेंट चढ़ गई। विडंबना है कि प्रदेश सरकार नदियों को पाट कर पार्क बनाने में जुटी है। बिजली की समस्या के चलते व्यावसायी उत्तरांचल की ओर रुख कर रहे हैं। सरकारों ने औद्योगिक केन्द्र खोले, लेकिन ढांचागत सुविधाओं का अभाव देखने को मिलता है। बकौल संजीव सिंह विगत 10 वर्षों में सरकार किसी बिजनेस का प्रारूप ही नहीं रख पाई है। वे कहते हैं कि जे.के. सीमेन्ट कारखाने से लोगों में आशाएं जगी थी, लेकिन उसे मूलभूत सुविधाएं ही नहीं मिल पा रही हैं।
बनारसी साड़ी के बुनकरों का व्यावसाय भी पावरलूम की भेंट चढ़ने लगा है। एक ओर बनारसी साड़ी की कला ख़तरे में पड़ गई है तो दूसरी ओर हजारों बुनकरों पर रोजी रोटी का संकट आन पड़ा है। मो. शाहिद कहते हैं कि हमारी अपनी मण्डी होनी चाहिए, जहां माल खरीदा और बेचा जा सके। वे इसके लिए सरकार द्वारा एक सोसाइटी बनाये जाने की बात कहते हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता लेनिन रघुवंशी राजनीती के अपराधीकरण पर चिंता व्यक्त करते हुए कहते हैं कि इससे जनाधिकार खतरे में पड़ गए हैं. जबकि गंगापुत्र डॉ. वीरभद्र मिश्र जैसे समाजसेवी पिछडेपन के लिए जनता को ही दोषी मानते हैं. वे कहते हैं कि ''यहाँ तो कुछ हो ही नहीं रहा है. ना पढाई, ना विकास और ना ही पर्यावरण। लीडर लीड करते हैं और जनता पीछे चलती है। जनता आगे दौड़ ही नहीं रही है। अगर पूर्वांचल को अलग राज्य बना भी दिया जाये तो यह आर्थिक तौर पर व्यावहारिक नहीं होगा।´´
इन सबके बीच वाराणसी समेत पूरे उत्तर प्रदेश में चुनावों में बाहुबलियों को टिकट दिये जाने की चर्चा जोरों पर है। न्यूनाधिक सभी राजनीतिक दलों ने आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों को राजनीतिक समीकरणों को ध्यान में रखकर टिकट दिया है। लेकिन बसपा इस मामले में भी सर्वाधिक बाहुबलियों को टिकट देकर इस मामले में भी आगे निकल गई। बहरहाल इस बीच काशी के हर नुक्कड़, गली, मोहल्ले, चाय की दुकान से लेकर बीएचयू के प्रांगण तक वाराणसी की संस्कृति एवं सभ्यता को बाहुबलियों के चंगुल से बचाने को लेकर चर्चाएं आम हो गई हैं। वाराणसी के ही तुलसीदास कहते हैं `अल्पसंख्यक वोटों का ध्रवीकरण यहां भाजपा को हराने में सक्षम प्रत्याशी की ओर हो जाता है। अंत समय तक मुस्लिम वॉच करते हैं और अंतत: मिस्जदों से ऐलान कर दिया जाता है कि किस दल को वोट करना है।´ बाहुबली को प्रत्याशी बनाने की बात पर वे कहते हैं कि प्रधानमंत्री बनने के लिए मायावती अब किसी भी स्तर पर जा सकती हैं। आगे वे कहते हैं कि 20-25 सालों से चुनावों से मुद्दे गायब हो चुके हैं और मतदाताओं को जातियों में बांट दिया गया है। जबकि जमीनी मुद्दे बौद्विक वर्ग की चर्चा का विषय बन कर रह गए हैं।

Thursday, April 2, 2009

सिर से मैला नहीं उतार पायी सरकार

सभ्यता के विकास में मल निस्तारण समस्या रही हो या न रही हो, लेकिन भारत में कुछ लोगों के सिर पर आज भी मैला सवार है. तमाम कोशिशों के बावजूद भारत सरकार उनके सिर से मैला नहीं उतार पायी है जो लंबे समय से इस काम से निजात पाना चाहते हैं. हालांकि सरकार द्वारा सिर से मैला हटा देने की तय आखिरी तारीख कल बीत गयी लेकिन कल ही 31 मार्च को दिल्ली में जो 200 लोग इकट्ठा हुए थे वे आज वापस अपने घरों को लौट गये हैं. तय है, आज से उन्हें फिर वही सब काम करना पड़ेगा जिसे हटाने की मंशा लिये वे दिल्ली आये थे. उमाशंकर मिश्र की रिपोर्ट-
भारत सरकार द्वारा 31 मार्च 2009 तक सिर पर मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करने की घोषणा की वास्तविकता को उजागर करने के लिए हाल ही में छह राज्यों के 200 लोग नई दिल्ली में एकत्रित हुए। मध्यप्रदेश, गुजरात, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, तमिलनाडु एवं महाराष्ट्र से आए दलित समुदाय के लोगों ने बताया कि आज भी देश में लाखों शुष्क शोचालय मौजूद है, जिसके कारण लाखों लोग मैला ढोने को विवश हैं। इंकार करने के बावजूद गांव के सामंती ढांचे में मौजूद दबंग तबकों द्वारा उनसे यह काम करने से जबरदस्ती करवाया जाता हैं। गरिमा अभियान मध्यप्रदेश, नवसृजन ट्रस्ट गुंजरात, टैम्स तमिलनाडू तथा मानुस्कि -महाराष्ट्र द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित राष्ट्रीय परामर्श में कई ऐसे लोग भी शामिल हुए जिन्होंने अपने साहस और संघर्ष के जरिये इस प्रथा से मुक्त होने में सफलता हासिल की। उल्लेखनीय है कि मैला ढोने का ज्यादातर महिलाओं को करना पड़ता है।
राष्ट्रीय परामर्श में शामिल महिलाओं ने अपनी बात प्रस्तुत करते हुए कहा कि वे यह काम अपनी मर्जी से नहीं बल्कि सामाजिक दबाव के कारण करने को विवश है। इससे उनके जीवन जीने के अधिकार का हनन हो रहा है। उनके साथ छुआछूत की जाती है, स्कूल में उनके बच्चों के साथ भेदभाव किया जाता है और अत्यन्त कठिन व असम्मानजनक परिस्थितियों में जीना पड़ता है। मध्यप्रदेश के मन्दसौर जिले की लालीबाई ने कहा कि जब उन्होंने मैला ढोने से इंकार कर दिया तो गांव के दंबग लोगों ने उनका घर जला दिया। गुजरात की शारदा बहन का कहना था कि ``बीस सालों तक मैने समाज के दबाव में यह काम किया, इससे मुझे कई तरह की बीमारियां हो जाती थी।´´ उत्तरप्रदेश से आई श्रीमती एकली का कहना था कि मैं गांव में मैला ढोने का काम करने को विवश हूं। यदि यह काम नहीं करें तो गांव के लोग दबाव डालते हैं। मैं यह काम छोड़ना चाहती हूं,।´´ इस की प्रथा समाप्ति के लिए सन् 1993 में सफाई कर्मचारी नियोजन एवं शुष्क शौचालय सिन्नर्माण (प्रतिषेध) अधिनियम - 1993 लागू किया गया। जिसमें इस प्रथा की पूरी तरह समाप्ति की बात कही गई।
भारत सरकार द्वारा इस प्रथा की समाप्ति के लिए कई समय सीमाएं निर्धारित की गई। पिछली समय सीमा 31 दिसंबर 2007 थी, जिसे बढाकर 31 मार्च 2009 कर दिया गया है. भारत सरकार द्वारा अप्रैल 2007 से लागू ``मैला ढोने वालों के पुर्नवास के लिए स्वरोजगार योजना (एस.आर.एम.एस.)´´ के अन्तर्गत 735.60 करोड़ का प्रावधान किया गया था और कहा गया था कि 31 मार्च 2009 तक इस प्रथा को समाप्त कर सभी का पुर्नवास कर दिया जावेगा। किन्तु जमीनी स्तर पर इस तरह को कोई सफल प्रयास देखने को नहीं मिला। राष्ट्रीय परामर्श में विभिन्न प्रांतों की महिलाओं ने अपनी बात रखी। चर्चा की आरम्भ करते हुए गरिमा अभियान के संयोजक आसिफ शेख ने कहा कि ``यह कोई नया मुद्दा नहीं है। मैला ढोने की प्रथा आजादी के पहले से कायम है और सरकार द्वारा इसे समाप्त करने के लक्ष्य कई बार घोषित किए गए है। पहले सरकार ने कहा था कि सन् 2007 तक देश को मैला ढोने की प्रथा से मुक्त कर दिया जाएगा और उसके बाद 31 मार्च 2009 तक इस खत्म करने का लक्ष्य रखा गया। लेकिन आज भी यह पूरे देश में कश्मीर से कन्याकुमारी तक कायम है।
राष्ट्रीय परामर्श में शामिल छह राज्यों के लोेगों को संबोधित करते हुए योजना आयोग की सदस्य डॉ. सईदा हमीद ने कहा है कि सरकार ने इस प्रथा को खत्म करने के लिए कई योजनाए लागू कि लेकिन राज्यों में उस पर कोई सक्रियता नहीं दिखाई। अखिल भारतीय दलित महिला अधिकार मंच की राष्ट्रीय संयोजक प्रो. विमल थोराट ने कहा कि सरकारी योजना लागू भी हो जाए तब भी यह समस्या कायम रहेगी। जब तक दलित समुदाय के हाथों में ऐसा काम नहीं आएगा जिससे उनकी गरिमा बढ़े, तब तक इससे मुक्त होना मुश्किल है। दक्षिण एशिया मानव अधिकार दस्तावेजीकरण केन्द्र के निदेशक श्री रवि नैयर ने कहा कि देश को मैला ढोने की प्रथा से मुक्त करने का काम जनआंदोलन के जरिये ही संभव है। इसी बात को आगे बढ़ाते हुए टाटा इंन्टीट्यूट ऑफ सोशल साईसेज के प्रो. शैलेष ने कहा कि सरकारी तंत्र में संवेदनशीलता का अभाव है तथा वे पारंपरिक मानसिकता से ग्रस्त है, जिसके चले यह काम देश में जारी है। उन्होने बताया कि महाराष्ट्र और गुजरात में तो सरकारी महकमों में भी यह काम जारी हैं। एनकॉस पूना के निदेशक श्री अमिताभ बेहार का कहना था कि इस मुद्दे पर व्यापक बहस की जरूरत है। इस अवसर पर जनमुद्दों के फिल्मकार श्री गोपाल मेनन भी उपस्थिति थे। श्री मेनन ने इस मुद्दे पर एक फिल्म ``वी वांन्ट फ्रीडम´´ बनाई है, कार्यक्रम के दौरान इस फिल्म का प्रदर्शन किया गया। कार्यक्रम का संचालन श्री देवसिंह शेखवत ने किया।

Friday, March 27, 2009

गांव में ही हो उच्च शिक्षा की व्यवस्था


संगीता शुक्ला
गुजरात को विकासोन्मुख राज्यों की श्रेणी में अग्रणी माना जाता है और राज्य के विकास में एक महत्वपूर्ण कारक गुजरातियों की विकासोन्मुख सोच भी है। गावों में उच्च शिक्षा संस्थानों की स्थापना की मांग गुजरातियों की इसी विकासात्मक सोच का परिचायक कही जा सकती है।
पंद्रहवीं लोकसभा के लिए चुनाव की उल्टी गिनती शुरु हो गई है। अब चंद दिनों बाद ही चुनाव प्रक्रिया भी शुरु हो जायेगी और नई लोकसभा का गठन होगा। नई लोकसभा का ताज किसके सर पर होगा यह कहना मुश्किल है लेकिन आजकल यह देखा जा रहा है कि सभी पार्टिया अपना पूरा जोर लगा रही है। शहरों में तो चुनावी माहौल चारों ओर दिख ही रहा है लेकिन गांवों में भी इन दिनों नेताओ की आवाजाही बढ गई है और गांव की जरुरतो पर खास ध्यान दिया जाता है। क्या उनके द्वारा दिये गये वचनो का पालन चुनाव जीतने के बाद होता है? या फिर नेताओं को जितनी फिक्र चुनाव से पहले गांव की होती है उतनी ही बाद में भी...गांवों के विकास की ओर सरकार क्या रुख अपनाती है इन्ही चंद सवालो का उत्तर जानने के लिए सोपान ने गुजरात के कच्छ, सौराष्ट्र और मध्य तथा उत्तर गुजरात के कुछ गांवो की मुलाकात ली और जाना कि गांवो के लोगों की क्या अपेक्षाएं है।
सबसे पहले सोपान ने कच्छ की मुलाकात ली और वहां के माहौल के बारे में हाजीभाई से बात की। हाजीभाई की उम्र 33 साल है और वे लोन्ड्री और बांधणी बनाने का धंधा करते हैं। जब हमने उनसे पूछा की आज देश में चारों ओर आर्थिक संकट छाया हुआ है तो इसकी असर क्या उनके धंधे पर भी हुई है? इसके जवाब में उन्होंने बताया कि हां, जरुर हुई है क्योंकि बांधणी बनाने के लिए जो कपडा वे खरीदते है वह महंगा हो गया है और साथ ही बाजार में अन्य चीजों की किंमते भी बढी है जिससे उन्हें आर्थिक संकट का सामना करना पडता है। चुनावी माहौल के बारे में पूछने पर उन्होंने बताया कि गुजरात की मौजुदा सरकार से वे खुश है क्योंकि इसके चलते उनके गांव का काफि विकास हुआ है और अब बिजली-पानी की किल्लत का सामना उन्हें बिल्कुल भी नहीं करना पडता है। जब हमने उनसे पूछा कि वे मतदान किस आधार पर करेंगें जाति या विकास ? तो उन्होंने बताया कि वे जातपात में नहीं मानते उन्हें केवल विकास चाहिये। नई सरकार से उनकी क्या अपेक्षाएं हैं इसके उत्तर मैं उन्होंने बताया कि यहां शिक्षा जरा कमजोर है इसलिए यदि नई सरकार शिक्षा की ओर अधिक ध्यान देगी तो उन्हें अच्छा लगेगा।
कच्छ-भुज विस्तार से ही हमने हीनाबेन पोनल से भी बातचीत की। हीनाबेन का वहां फोटोग्राफी और विडियोग्राफी का स्टुडियो है। हीनाबेन ने हमें बताया कि 26 जनवरी 2001 को कच्छ में भयंकर भूकंप आने से सारा शहर तबाह हो गया था लेकिन सरकार तथा अन्य सेवा संस्थाओं की मदद से आज कच्छ का नवनिर्माण हुआ है और अब कच्छ के हरेक व्यक्ति के पास अपना मकान और रोजगार है, जिससे कच्छवासी काफि खुश है। मतदान किस आधार पर करेंगे ऐसा पूछने पर उन्होंने बताया कि हम विकास को और जो उम्मीदवार उनके विस्तार से खडा रहेगा उसकी काबिलियत को ध्यान में रखकर ही मतदान करेंगे किसी जाति या पक्ष को ध्यान में रखकर नहीं।
कच्छ के बाद राजकोट के विडनगर गांव के रसिकभाई प्रागजीभाई रुपारेल मूंगफली और पपीते की खेती करते हैं। उन्होंने हमें बताया की गुजरात सरकार की "ज्योतिग्राम योजना" से उन्हें बहुत लाभ हुआ है। खेती के लिए बिजली-पानी भरपूर मिलता है। गांव का भी विकास हुआ है और पक्की सडके, मकान बनाये गये है। उन्होंने बताया कि चुनाव नजदीक आते ही गांव में सांसदो का आनाजाना बढ जाता है और इन दिनों वे खास हमारा हालचाल जानने आते हैं, फिर चाहे वे पांच साल तक अपनी शक्ल भी न दिखाये। खैर, इन दिनों दिये गये वचनों का वे कितना पालन करते हैं इसके जवाब में उन्होंने बताया कि 50% वचन पूरे किये जाते है। राष्ट्रीय पक्षो से उनकी क्या अपेक्षा हैं? इसके जवाब में उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय पक्ष यदि एकजुट होकर काम करेंगे तभी देश का विकास हो सकेगा। मौजुदा राज्य सरकार से वे खुश है क्योंकि वास्तव में गांव का विकास हुआ है। नई सरकार से उनकी अपेक्षाओं के बारे में वे बताते हैं कि उनके गांव में 12 कक्षा तक स्कूल तो है लेकिन कोलेज की व्यवस्था नहीं हैं जिससे बच्चो को उच्च शिक्षा के लिए राजकोट शहर तक जाना पडता है। यदि गांव में ही उच्च शिक्षा की सुविधा मिल जाय तो बच्चो को आसानी रहेगी।
राजकोट शहर के ही एक अन्य गांव लाखावाड में भी हम गये। वहां एक बेरोजगार युवक रणजीतभाई मेर से हमने बातचीत की। रणजीतभाई की उम्र 22 वर्ष है और वे 10वीं पास है। उच्च शिक्षा नहीं ली क्योंकि गांव में सुविधा न थी और वे शहर जाना नहीं चाहते थे। उनके पिताजी कपास व मूंगफली की खेती करते है। रणजीतभाई ने हमें बताया कि वे खेती काम में ही पिताजी की मदद करते हैं क्योंकि नोकरी उन्हें मिल नहीं सकती। मतदान किस आधार पर करेंगे? इसके उत्तर में उन्होंने बताया कि वे उम्मीदवार को ही देखते हैं फिर वो किसी भी पक्ष या जाति का क्यों न हो इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पडता। बस, उम्मीदवार की नीयत उनके गांव का विकास करने की होनी चाहिये। पिछले पांच वर्षो में लाखावाड गांव में काफि विकास हुआ है।
आणंद जिल्ले के अदाण गांव के कल्पेशभाई मनुभाई पटेल की उम्र 36 वर्ष है और वे एग्रीकल्चर व फर्टीलाईझर मेन्युफेक्चरींग का काम करते हैं। उन्होंने बताया कि उनके गांव में कुछ लोग है जो जातिवाद को प्रोत्साहन देते हैं लेकिन वे उनमें नहीं हैं। राज्य सरकार ने उनके गांव का अच्छा विकास किया है। केन्द्र सरकार से उनकी अपेक्षा हैं कि किसी भी अंगुठा छाप व्यक्ति को कोई भी उच्च पद नहीं देना चाहिये। देश की कमान उन्हीं के हाथो सोंपनी चाहिये जो दूरदृष्टि रखता हों।
आणंद जिल्ले के ही पीपलाव गांव की एक गृहिणी प्रेमिलाबेन फूनाभाई पटेल की उम्र 56 वर्ष हैं और वे अच्छी तरह जानती हैं कि वोट किसे देना चाहिये क्योंकि वे अनुभवी हैं। उनके पति खेती का व्यवसाय करते हैं और उनकी एक बेटी अमेरिका में हैं जिससे वे मोबाइल से बात करती है। प्रेमिलाबेन ने बताया कि गांवों में मोबाइल आ जाने से उन्हें काफि सुविधा हो गई है। गांव के विकास से और मौजुदा राज्य सरकार से वे खुश है। उन्होंने बताया कि यदि सरकार इसी प्रकार उनके गांव का विकास करती रहेंगी तो उन्हें उनसे कोई शिकायत नहीं है।
गुजरात गांवों का वास्तव में विकास हुआ हैं और वहां की प्रजा भी विकास से खुश है। भविष्य में भी वे यही चाहते है कि सत्ता की बागडोर उसे ही सोंपी जाय तो पढा-लिखा हो, जिसमें दूरदृष्टि हो, देश सेवा ही जिसका धर्म हो। वह देश विकास को ध्यान में रखे न कि स्वविकास को। गुजरात के आज सभी गांव में मोबाइल क्रांति आ चुकी है जिससे लोगों की नजदिकीयां बढी है। जातिवाद या ज्ञातिवाद को वे बिल्कुल भी महत्व देना नहीं चाहते हैं। गांववासियो की महत्वकांक्षाएं तो हमने देखी अब देखना यह है कि उनकी इन अपेक्षाओं पर कौन-कौन खरा उतरता है और सत्ता की बागडोर किसके हाथों में जाती है।
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Thursday, March 5, 2009

सूदखोर महाजनों के चंगुल में संताल परगना

- ग्‍लैडसन की विशेष रिपोर्ट -
दिशोम गुरू शिबू सोरेन और महाजनों का नाम संताल परगना के इतिहास में एक साथ विराजमान होगा। यह इसलिए कि यही महाजन सुदखोरों के खिलाफ लडते हुए गुरूजी ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत की थी और अंततः दो बार झारखण्ड की राजगद्दी पर बैठे। लेकिन चिंताजनक बात यह है कि आज भी महाजनी प्रथा संताल परगना में हावी है। यहां के संताल और पहाडया आदिवासियों को महाजनी प्रथा से मुक्ति नहीं मिली। आज आलम यह है कि आदिवासियों का एक भी गांव महाजनी प्रथा से मुक्त नहीं है और आदिवासी लोग मानसिक रूप से महाजनी प्रथा के गुलाम बन चुके हैं।
झारखण्ड के पाकुड जिलार्न्तगत महेशपुर प्रखण्ड स्थित दुमदुमी निवासी ४६ वर्शीय मारथा मूर्मु अपने गांव के ही महाजन से वर्श २००२ में ४ क्विंटल धान डेढाईया याने वार्शिक ५० प्रतिशत ब्याज के दर पर ली थी। मूलधन चुकाने के बाद भी आज कर्ज के रूप में उसे ३ क्विंटल धान महाजन को देना है। इसी तरह सुन्दर पहाडी प्रखण्ड के सोनाधोनी निवासी २० वर्शीय सुन्दरा पहाडया कर्ज में डूबकर अपनी मां के चंदी का जेवर के साथ अपना सबकुछ महाजन को सौंप चुका है। मारथा और सुन्दरा संताल परगना के प्रत्येक आदिवासी गाँव में विराजमान हैं। लेकिन कोई इसके खिलाफ बोलने को भी तैयार नहीं हैं।
दूसरी ओर महाजनों की चांदी है। महेशपुर प्रखण्ड के चक्काधर निवासी महाजन रामजी भगत महेशपुर एवं पाकुडया प्रखण्ड को अपने कब्जे में रखते हैं। वे प्रतिवर्श दो सौ क्विंटल धान कर्ज में लगाते ह। उनकी कई बैलगाडयां चलती हैं, जो मुख्यता कर्ज वसूली के समय धान की ढुलाई के लिए है। संताल परगना में इनके तरह कई महाजन मिलेंगे जो लोटा और लाठी लेकर गांवों में घुसे थे लेकिन महाजनी प्रथा ने उन्हें गांवों का सबसे ताकतवर व्यक्ति बना दिया है। आजकल महाजनी प्रथा में एक नया बदलाव देखने को मिल रहा है। दिक्कू महाजनों के खिलाफ लडने वाले कुछ आदिवासी भी उनका नकाल करते हुए सूदखोर महाजन बन गये हैं। महेशपुर प्रखण्ड के नोनबट्टा निवासी एस० किश्कू उनमें से एक हैं। वे प्रतिवर्श १०० क्विंटल धान कर्ज में लगाते हैं, जिससे उन्हें ५० क्विंटल मुनाफा मिलता है। इसके अलावा पैसा लगाते हैं वह अलग है।
यहां तीन तरह की महाजनी चलती है। इसमें ’’डेढाईया‘‘ सबसे ज्यादा प्रचलित है, जिसके तहत कर्ज का ब्याज ५० प्रतिशत प्रतिवर्श निर्धारित है। इसमें ज्यादातर अजान ही कर्ज में दिया जाता है। लेकिन खास बात यह है कि अगर कोई अपना कर्ज एक महिने के अन्दर भी चुकाना चाहता है तो उसे ५० प्रतिशत ब्याज देना पडेगा और अगर कोई एक साल बाद कर्ज नहीं चुका पाता है तो ब्याज अगले वर्श मूलधन में परिवर्तित हो जाता है। इसमें दूसरा है ’’सोटा‘‘ जिसमें व्याज सप्ताहिक १० प्रतिशत है। याने प्रतिमाह ४० प्रतिशत और वार्शिक ४८० प्रतिशत, जिसके तहत कर्ज में सिर्फ पैसा ही लगाया जाता है। महाजनी का तिसरा रूप ’’बानकी‘‘ कहलाता है, जो सबसे खतरनाक है। इसके तहत कर्ज के बदले महाजन के पास जेवर, जमीन व मवेशी रखा जाता है। इसमें सबसे मजेदार बात यह है कि जेवर, जमीन व मवेशी का कीमत सही मूल्य से ४०० फिसदी कम निर्धारित होता है तथा निर्धारित समय पर कर्ज वापस नहीं करने की स्थिति में जेवर, जमीन व मवेशी महाजन का हो जाता है। अधिकांश मामलों में कर्ज वापस नहीं होता है। इस तरह से समाज का एक बडा तबका कर्ज का जीवन जीता है और महाजन इसका लाभ उठाते ह तथा सत्ता सिर्फ मूकदर्शक बना रहता है।
ऐतिहासिक रूप से देखें तो संताल परगना बाबा मिलका मांझी एवं सिदो-कान्हो द्वारा अन्याय के खिलाफ विद्रोह हेतु प्रसिद्ध है। इस धरती ने महाजनों के खिलाफ लडने वाले शिबू सोरेन के अलावा साईमन मरांडी, थोमस हांसदा, स्टेफन मरांडी, हेमलाल मुर्मू जैसे कदावर नेता पैदा किया। लेकिन इन नेताओं ने सत्ता में रहते हुए महाजनी प्रथा के खिलाफ कोई ठोस कदम नहीं उठाया और न ही कोई कानून बनाया। फलस्वरूप महाजनी प्रथा संताल परगना के संस्कृति का हिस्सा बन गया है। यहां के लोग महाजनों को अपना दुःख का साथी मान बैठे हैं। सामाजिक कार्यकर्ता मनोज किश्कू कहते हैं कि जागरूकता का अभाव एवं बैंकों से लोन लेने हेतु कागजी दावपेंच लोगों को जरूरत के समय महाजनों के पास जाने हेतु मजबूर कर देता है।
संताल परगना में एन०जी०ओ० का भी भरमार है, जो लाखों रूपये का परियोजना प्राप्त करने हेतु महाजनी प्रथा के खिलाफ बडी-बडी बातें करते हैं। लेकिन वास्ताव में ये एन०जी०ओ० वृक्षारोपन, शौचालय निर्माण एवं सफाई जैसे परियोजनाओं की ठेकेदारी करते हैं। साथ ही साथ एन०जी०ओ० कार्यकर्ता गांवों में डियूटी बजाने का ही काम करते ह। उनके पास महाजनी प्रथा से ग्रामीणों को मुक्ति दिलाने की कोई ठोस योजना नहीं है। जबकि एक-एक गांव में कई एन०जी०ओ० कार्यरत हैं। उनमें एक बदलाव जरूर दिखाई देता है कि कभी साईकिल से चलने वाले एन०जी०ओ० कार्यकर्ता अब मोटर साईकिल और चार पहिया में घुमते हैं।
सबसे बडा सवाल यह है कि क्या दिशोम गुरू शिबू सोरेन महाजनी प्रथा को भूल गये या वोट की राजनीति के चलते सूदखोर महाजन ही उनके अपने हो गये? क्या महाजनी प्रथा से मुक्ति के बगैर संताल परगना का भला होगा? क्या गरीबों का खून चूसने वाले महाजनों के खिलाफ सत्ताधीश लोगों की नींद कभी खूलेगी? क्या संताल परगना को महाजनी प्रथा से कभी मुक्ति मिलेगी?
- ग्‍लैडसन डुंगडुंग एक स्‍वतंत्र पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं। - (साभार : न्यूजविंग.कॉम)

Sunday, March 1, 2009

कश्मीरी पण्डित चाहते हैं पृथक होमलैण्ड

उमाशंकर मिश्र/जम्मू
पेशे से अध्यापक मनोज कुमार कौल बताते हैं कि हम `छोटा लंदन´ के नाम से विख्यात सोपोर के रहने वाले हैं, लेकिन आज नरक में रहना पड़ रहा है। वहां का वातावरण ही ऐसा था कि अन्य किसी परिवेश में जाकर वहां के लोगों का जीवन यापन आसान नही था, जलवायु परिवर्तन का भी असर देखने को मिला। यहां गर्मी थी, लेकिन पैसा नहीं थी कि एक पंखा खरीद सकें। वे बताते हैं कि पिताजी घर छूटने के सदमे को बर्दाश्त नहीं कर सके और चल बसे, उन्होंने बड़ी गरीबी में एक-एक पाई जोड़कर घर बनाया था। वे आगे कहते हैं कि "मैं सरकारी नौकरी में था, लेकिन लम्बे समय तक मुझे सिर्फ बेसिक वेतन ही मिलता रहा, जबकि कश्मीर में सरकारी नौकरियां छोड़कर आए विस्थापित पंडितों के रिक्त पदों पर अब अन्य लोग काबिज हो गए हैं।" मनोज कहते हैं कि हम वोट बैंक नहीं हैं न, इसलिए सरकार हमारी नहीं सुनती। वे बताते हैं कि विस्थापन के करीब दो दशकों के दौरान हमारे समुदाय के एक भी बच्चे को प्रतिभशाली होने के बावजूद सरकारी नौकरी नहीं मिली है। हालांकि मनोज जैसे कुछ लोग पहले से ही सरकारी नौकररियों में थे तनख्वाह तो पूरी नहीं मिलती थी, गुजारा जैसे तैसे चलता रहा। बाद में वेतन में कुछ सुधार भी हुआ और इन्होंने कबूतरखाने को अपने तरीके से परिवार की जरूरतों के मुताबिक ढाल लिया है। लेकिन इन शिविरों में रहने वाले सभी लोगों के साथ ऐसा नहीं है। बकौल मनोज इतने पर भी हमारे सिर पर तलवार लटकती रहती है, हमारे पास अपनी कोई प्रोपर्टी नहीं रही है और सरकार जब चाहे इस कबूतरखाने से भी हमें बेदखल कर सकती है। वे कहते हैं कि ये जो मरम्मत वगैरह हमने करवाई है इसका कोई मुआवजा तक हमें नहीं मिलेगा, एक आदेश पर सब कुछ छोड़कर जाना पड़ेगा। सतही तौर पर न देखते हुए मानवीय संवेदना के स्तर पर उतर इन लोगों की पीड़ा को समझने की जरूरत है, तभी वास्तविकता का आभास हो सकेगा। 37 वर्षीय तेजकिशन भट्ट 19 साल से शिक्षा विभाग में 600 रुपये वेतन पर वॉचमैन के पद पर हैं, जबकि अभी तक नियमित कर्मचारी नहीं बन सके हैं। तेजकिशन के साथ उनके भाई का परिवार भी रहता है। ऐसे में कैसे गुजर-बसर होती होगी, अंदाजा लगाया जा सकता है। अनंतनाग निवासी तेजकिशन बताते हैं कि गांव में उनका मकान, जमीन, बाग बगीचा सब खत्म हो गया है। आगे वे कहते हैं कि ``1990 में आतंकवाद बढ़ गया तो हमें अपना घर छोड़ना पड़ गया। पहले तो उधमपुर में 5 सालों तक हमको परिवार सहित टैन्टों में रहना पड़ा। जब बरसात का मौसम आता तो डंडे पकड़कर न जाने कितनी ही रातें हमने काटी हैं। बहुत से लोगों की मौत तो सांप और बिच्छुओं के ज़हर से हो गई। 1995 में बट्टर वालियां में हमें एक कमरा मिला था, बाद में हम जम्मू आ गए और तबसे यहीं रह रहे हैं।´´ तेजकिशन बताते हैं कि युवाओं का तो अब कोई भविष्य ही नहीं रह गया है। मां-बाप जैसे तैसे करके बच्चों को पढ़ाते हैं, लेकिन नौकरी के लिए कोई फार्म ही स्वीकार नहीं होता है। विस्थापितों के लिए कोई कोटा नहीं है, जबकि सरकार को हालातों की पूरी जानकारी है। तेजकिशन अपने किसी संबंधी के बेटे वीर जी भट्ट का हवाला देते हुए बताते हैं कि उसका चयन टीचर के लिए हुआ था और वह इंटरव्यू के लिए श्रीनगर गया था, लेकिन वहां से वीर जी भट्ट जिंदा लौटकर नहीं आया। डॉ चौधरी कहते हैं- 'इन हालातों में तो बस हम यही कह सकते हैं कि हम अपना संघर्ष जारी रखेंगे, आयरलैंड और इस्राईल की मिसाल देते हुए डॉ. चौधरी कहते हैं कि जब कश्मीर का फैसला हो जाएगा तो कश्मीरी पंडितों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे यहां के मूल निवासी हैं।'
गुग्लुसा गांव, कुपवाड़ा के निवासी प्रेमनाथ भट्ट कहते हैं कि `राहत शिविर असल में हमारे गुजारे की जगह नहीं हो सकती, हमें तो कश्मीर में अपनी जमीन मिल जाती तो बेहतर होता।´ प्रेमनाथ के तीन बच्चे हैं जो अभी पढ़ रहे हैं, जबकि भाई के बच्चे ओवर-एज हो गए हैं और उन्हें नौकरी नहीं मिल सकी है। प्रेमनाथ बताते हैं कि `बच्चे खुद को नफ़रत भरी नजरों से देखते हैं। बच्चों के भविष्य की ओर देखते हैं तो लगता है कि सब खत्म हो गया है, कहीं खुदकुशी न करनी पड़े।´
पंडिता बताते हैं कि यहां कश्मीरी पंडितों का विभिन्न स्तरों पर जितना मानवाधिकार हनन हुआ उतना कहीं नहीं हुआ होगा। वे सवाल उठाते हैं कि क्या भिन्न-भिन्न समुदायों का मानवाधिकार अलग अलग होता है। वे कहते हैं कि `इस भेदभाव के बावजूद भी इस समुदाय के लोगों ने धैर्य नहीं खोया। आर.के. पंडिता कहते हैं कि 20 सालों में किसी कश्मीरी पंडित ने प्रतिशोध में बंदूक नहीं उठाई, क्योंकि इस समुदाय के लोगों ने गन-मूवमेंट की बजाय पेन-मूवमेंट को अधिक तरजीह दी है, लेकिन सरकार हमारी बात नहीं सुनती, वह तो सिर्फ बंदूक के इशारों पर चलती है। यहां तक कि लोगों को प्रशासनिक आतंकवाद का भी सामना करना पड़ा है।´ डॉ. के.एल. चौधरी इस तरह के भेदभाव को अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की नीति बताते हुए कहते हैं कि इससे जातीय भेदभाव को गहराता जा रहा है। हमें सिर्फ इसलिए कश्मीर से बाहर निकाल दिया गया, क्योंकि हम सच्चे भारतीय हैं, जिन्हें एजेंट का नाम दिया जाता है। ये देश के लिए अच्छी बात नहीं है। डॉण् चौधरी मीडिया पर भी सवाल उठाते हैं। वे कहते हैं कि मीडिया स्टोरी-बैंलेस करने के फेर में मुद्दे की बात ही नहीं करता, यह `वन-साइडेड मीडिया´ है। डॉ. चौधरी इस समस्या को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में जोड़कर देखते हैं और सरकार तथा राजनेताओं की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि क्यों चरमपंथ पर सरकार मौन है? आखिर न्यूक्लियर डील मुस्लिम विरोधी कैसे है? यासिन मलिक जैसे लोगों को इंडिया कान्क्लेव में भाषण देने के लिए बुलाने से आखिर लोकतंत्र की क्या गरिमा बचती है? उनसे पूछा जाता है कि आप लोगों कि मांगे क्या हैं? जवाब में वे कहते हैं कि इतने सालों के बाद भी हमें माईग्रेटेड कहा जाता है, जबकि हम लोगों को इंटरनली डिस्पलेस्ड पीपुल्स का दर्जा दिया जाना चाहिए और इसी आधार पर संयुक्त राष्ट्र के मानकों के अनुसार व्यावहार होना चाहिए, क्योंकि माईग्रटेड तो वे लोग कहे जाते हैं जो अपनी इच्छा से रोजी रोटी की तलाश में घर छोड़ते हैं। यहां तो जबरन हम लोगों को निकाला गया है।
सरकार कैम्पों में कुछ राहत देती है, स्कूल और डिस्पैन्सरी भी बनी है और अब तो कुछ फ्लैट भी बन रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कश्मीरी पंडितों के लिए उनकी अपनी जन्मभूमि पर लौटने की संभावनाएं समाप्त की जा रही हैं? डॉ. के.एल. चौधरी इस पर कहते हैं कि यह तो सभी जानते हैं कि ये फ्लैट गिने-चुने लोगों के लिए ही होंगे, क्योंकि इससे समस्या खत्म नहीं होगी। जबकि सरकार को यह कहने का अवसर मिल जाएगा कि कैम्प खत्म अर्थात समस्या भी खत्म और इस तरह से सरकार अपनी जिम्मेदारी को ताक पर रख इस समस्या से हाथ धो लेना चाहती है। मजबूरन लोगों ने अपनी जमीनों को बेचना शुरु कर दिया है।
कश्मीरी पंडितों की मांग है कि कश्मीर में उन्हें भी मुसलमानों के समान ही अधिकार और हमारा हक दिया जाय। ये लोग कश्मीर वापस तो जाना चाहते हैं लेकिन पहले कि तरह बिखर कर नहीं रहना चाहते, बल्कि अब वे वहां पृथक होमलैण्ड की मांग कर रहे हैं जो कि भारत के संविधान तथा केन्द्र के शासनाधीन हो, क्योंकि राज्य सरकार से इन लोगों की आस्था भंग हो चुकी है। डॉ.चौधरी कहते हैं कि सरकार इस पर कभी कोई सकारात्मक जवाब नहीं देती, असल में वह चरमपंथियों से डरती है और कश्मीर में वह मुसलमान चरमपंथियों का सामना करने की हिम्मत नहीं रखती।

Saturday, February 28, 2009

स्वरोजगारियों का गांव नगला धाकड़

उमाशंकर मिश्र/भरतपुर
भरतपुर जिले की वैर तहसील की इटामड़ा ग्राम पंचायत के गांव नगला-धाकड़ में रहने वाले धाकड़ जाति के लोगों की आजीविका का मुख्य आधार खेती और पशुपालन रहा है। लेकिन छोटी जोतें और उस पर अनुपजाऊ भूमि स्थानीय ग्रामीणों के जीवन की एक फांस बन चुकी थी और हालात भरण-पोषण के संकट तक पहुंच चुके थे। ऐसे में जीवन-यापन के साधन जुटाने के लिए स्थानीय लोगों में पलायन की प्रवृत्ति बढ़ रही थी। पलायन करने वालों में नगला के तीन ऐसे परिवार भी थे, जिन्हें जयपुर में नगीनों की पॉलिश का काम मिल गया। सुरेश चंद्र धाकड़ एवं उनके दो अन्य साथी इसमें शामिल थे। कुछ लोगों को आगरा एवं आसपास के अन्य इलाकों में भी काम मिल गया, लेकिन कमाई का अधिकांश हिस्सा वहां पर आवास, भोजन और आवागमन पर खर्च हो जाने से बचत नहीं हो पाती थी। स्थानीय स्तर पर संसाधनों की अनुपलब्धता के कारण तो आजीविका दूभर थी ही, लेकिन घर-बार छोड़कर जाने के बाद भी अपेक्षित लाभ नहीं हो रहा था। पलायन कर चुके हर व्यक्ति की तरह परदेस में रहते हुए नगला के लोगों के मन में भी ख्याल आते थे कि `यदि गांव में रहकर ही कोई काम मिल जाये तो परेशानियां हल हो जायेंगी, क्योंकि थोड़ी बहुत खेती-बाड़ी भी ऐसे में हो जाएगी।
गत दीपावली के दौरान सुरेश धाकड़ ने गांव में ही नगीना घिसाई मशीन व शेड बनाने का विचार गांव वालों के सम्मुख रखा। चर्चा हुई और ग्रामीणों की सहमती भी इस काम को लेकर बन गई। लेकिन इसके लिए संसाधन कैसे जुटाया जाये, यह गरीब ग्रामीणों के लिए इतना आसान नहीं था। नगीना घिसाई की मशीन व शेड बनाने हेतु लगभग 40-50 हजार रूपये की आवश्यकता थी। इस समस्या को कैसे हल किया जाये, इस बात को लेकर ग्रामीणों ने लुपिन ह्युमन वेलफेयर फांउडेशन के प्रतिनिधी से चर्चा की तो उसने लघु उद्योगों की स्थापना के लिए बैंकों से मिलने वाले ऋण के बारे में लोगों को जानकारी दी। यही नहीं लुपिन के प्रतिनिधियों ने ऋण के लिए आवेदन कराने से लेकर उद्यमों की स्थापना तक पूरा सहयोग नगला के नव-स्वरोजगारियों को दिया। इस तरह सुरेश को सिडबी की ओर से ऋण मिल गया और उसने अपनी छोटी से यूनिट नगला में ही आरंभ कर दी। जयपुर में काम करने वाले अन्य लोगों को जब नगला में हुए इस नए प्रयोग के बारे में पता चला तो उन्होंने भी लुपिन के प्रतिनिधियों से सहयोग की अपील की। इस तरह अन्य लोगों को भी स्थाीनय लोगों को ऋण दिला दिया गया। देखादेखी नगीना पॉलिश करने वाली स्वरोजगार इकाइयों की संख्या दिनो-दिन बढ़ने लगी।
अपने गांव में इस बदलाव से प्रभावित होकर आगरा में काम करने वाले लोग भी वापस अपने ही गांव में आ गये और संस्था के सहयोग से गांव में घुंघरू तथा पट्टा चैन की यूनिटे लगाई। इन लोगों को गांव में संचालित 6 महिला स्वयं तथा अन्य लोंगों को प्रशिक्षण केन्द्र के माध्यम से घुंघंरू व पट्टा चैन बनाने का प्रशिक्षण दिया गया। जिससे ये महिलाऐं उनकेे काम को सफलतापूर्वक निभाने लगी तथा उनके घर के पुरूष इनकीे मािर्कटिंग हेतु आगरा तथा आसपास के शहरों में जाने लगे। नगीना घिसाई के व्यवसाय के लिए गांव के अन्दर ही प्रशिक्षण केन्द्र प्रारम्भ किया गया, जिसमें गांव तथा आसपास के युवाओं को 3 महीने का गहन प्रशिक्षण दिया जाता है। इसके उपरान्त यहां से प्रशिक्षित लोग गांव में लगी हुई यूनिटों में तथा कुछ प्रशिक्षणार्थी अपनी इन स्वयं की यूनिटें लगाकर काम करने लगे।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने की दिशा में एक और कदम बढ़ाते हुए संस्था ने `लुपिन ग्राम विकास पंचायत´ का गठन किया गया है। गांव के लोग प्रतिनिधि चुनकर इस कमेटी का गठन करते हैंं, जो ग्रामीणों के ऋण प्रस्तावों पर विचार-विमर्श कर अनुमोदन के बाद स्वीकृत कर लुपिन, राष्ट्रीय महिला कोष तथा स्थानीय बैंकों से धन दिलाने में मदद करती है। इस तरह गांव में ही स्वरोजगार के साधन ग्रामीणों को उपलब्ध हो जाते हैं और वे इससे होने वाली आय से ऋण समय पर चुका देते हैं। गांव के सहायता समूह की महिलाएं आपस में स्वरोजगार की छोटी-मोटी आवश्यकताएं अपने समूह से ही ऋण लेकर पूरी कर लेती है। गांव के 26 अनुभवी तथा प्रशिक्षित लोगों को वहां के स्थानीय बैंक द्वारा उद्यमी कार्ड भी दिलवाया हुआ है। इसके तहत सदस्य 25000 तक का लेन-देन कभी कर सकते है। यह कार्ड सदस्यों की समय-समय पर आने वाली आवश्यकता जैसे मजदूरी भुगतान, कचचे माल का क्र्रय, डीजल क्रय आदि हेतु काफी काम आता है। वर्तमान में नगला धाकड़ गांव में नगीना पॉलिश की 42, घुंघरू की 14 तथा पट्टे चैन की 28 यूनिटें कार्य कर रही हैं, जिससे लगभग 1000 लोगों को सीधे तौर पर रोजगार मिल रहा है। यहां पुरूष नगीना पॉलिश तथा महिलाऐं घुंघरू के व्यवसाय में लगी हुई है। समय-समय पर संस्था का गांव के लोगों को स्वरोजगार के प्रति प्रोत्साहन महत्वपूर्ण रहा है। स्थानीय लोगों को प्रशिक्षित कर उनकी कला निखरने में संस्था की भूमिका एक उत्प्रेरक की रही है। आसपास के लोगो को आदर्श गांवों का भ्रमण कराकर उन्हें इसी प्रकार के कार्य की पुनरावृत्ति करने की प्रेरणा दे रही है।
सिलसिला शुरू हुआ तो कारवां बनता चला गया और इसका प्रभाव कुछ ही समय में नगला-धाकड़ में नज़र आने लगा। सिडबी के सहयोग से ग्रामीण उद्यमिता विकास कार्यक्रम केे तहत 450 लोगों को प्रायोगिक व सैद्धान्तिक प्रशिक्षण मिल जाने से लोगों में उद्यमीय कौशल में भी वृद्धि हुई है। आज नगला में विभिन्न व्यवसाय की 84 इकाइयां कार्यरत हैं, जिसमें लगभग एक हजार परिवारों के आर्थिक तथा सामाजिक विकास को प्रोत्साहन मिला है। चूल्हे चौके तक सिमट कर रहने वाली महिलाएं भी स्वरोजगार से जुड़कर गांव के विकास की मुख्यधारा में शामिल होने लगी हैं। यही नहीं आसपास के क्षे़़त्रों में सैकड़ों लोगों ने इस तरह के प्रयास के प्रारम्भ कर दिये हैं, जो एक सुखद बात कही जा सकती है। जीवन यापन की समस्या हल हो जाने के बाद स्थानीय ग्रामीणों का रूझान शिक्षा की तरफ अब बढ़ने लगा है। आधारभूत सुविधाओं के विकास के चलते गांव की छात्राएं अब उच्च शिक्षा हेतु जाने लगी हैं। हालांकि अब नगला धाकड़ आर्थिक समृद्धि की ओर अग्रसर है, परन्तु आज भी गांव के लोग व्यथित है कि यहां मात्र 6 से 8 घन्टे बिजली रहती है। जिससे प्रत्येक परिवार का लगभग 30 हजार रूपये का डीजल बिजली की वैकल्पिक व्यवस्था करने में खर्च हो जाता है। फिलहाल गांव के सभी लोग लुपिन के सहयोग से जिला प्रशासन से गांव को कस्बे के समान अधिक बिजली दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। गांव वालों की मानें तो बिजली की समस्या हल हो जाने से उनकी सारी मुिश्कलें हल हो जाएंगी और नगला-धाकड़ एक संपूर्ण आत्मनिर्भर गांव बनकर एक मिसाल कर पाने में समर्थ हो जाएगा।

Friday, February 27, 2009

आंचलिक पत्राकारिता की ताकत : खबर लहरिया

डॉ स्मिता मिश्र
किसी देश के समग्र विकास में जनसंचार माध्यमों की अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका होती है। भारत के सन्दर्भ में ये माध्यम और अधिक महत्वपूर्ण हो उठते है। हमारी दो-तिहाई मानवीय पूंजी ग्रामीण भारत से ही सम्बद्ध है, जो कि आज भी ज्ञान तथा सूचना से वंचित है। विडम्बना यह है कि सरकार उनके लिये जितनी योजनाएं तथा नीतियां बनाती हैं उनकी जानकारी उन तक ही नहीं पहुंच पाती। यदि पहुंचती भी है तो आधी अधूरी। गाँव में संचार-रिक्तता की स्थिति हैं। इसी प्रकार कृषि अनुसंधनों या योजनाओं के क्रियान्वयन की प्रतिपुष्टि भी यहां से नहीं जा पाती। होता यह है कि प्रतिपुष्टि के अभाव में महानगर में बैठे नीति-नियामकों को उसकी जानकारी नहीं मिल पाती और विकास प्रक्रिया की पूरी कवायद की सार्थकता पर प्रश्नचिंह लग जाता है। इस संचार रिक्तता को आंचलिक पत्राकारिता ही दूर कर सकती है। क्योंकि अंचलों से निकलने वाली पत्र-पत्रिकाएँ समाचार-पत्र उस क्षेत्र-विशेष की भाषा और जरूरत को समझते हैं तथा स्थानीय लोग भी ऐसे माध्यमों से जुड़ाव महसूस करते हैं।आज बड़े-बड़े नामों वाली बहुत चमक-ध्मक और ग्लैमर वाली पत्राकारिता का जोर है। ऐसे में मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे चित्राकूट जनपद के कर्वी गाँव से निकलने वाले अखबार `खबर-लहरिया´ की उपस्थिति आश्चर्य के रूप में सामने आती है। प्रतििष्ठत `चमेली देवी´ पुरस्कार से सम्मानित इस अखबार को जनपद की नौ नवसाक्षर महिलाओं ने लगभग चार साल पहले शुरू किया। हालांकि इससे जुड़ी महिलाओं के पास पत्राकारिता की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं है। यह अखबार महिला सशक्तीकरण का अद्भुत उदाहरण है। ऐसा सशक्तीकरण जो सरकारी योजनाओं के अन्तर्गत नहीं हुआ है बल्कि गाँव की पिछड़ी और दलित महिलाओं ने `निरन्तर´ ट्रस्ट द्वारा प्रेरित किये जाने पर अपने कंधें पर यह दायित्व लिया और उसे बखूबी पूरा कर रही हैं।आज बाजार, राजनीति, अपराध्, सिनेमा और क्रिकेट के ग्लैमर को ही तवज्जो देना पत्राकारिता का मुख्य लक्ष्य हो गया है। ऐसे में आम आदमी खासतौर पर गाँव या पिछड़े इलाके में रह रहे आदमी के विकास का मुद्दा पीछे छूटा जा रहा है। ऐसे समय में `खबर लहरिया´ जैसे आंचलिक समाचार-पत्रा आशा की किरण के रूप में सामने आते हैं। बुंदेली भाषा में प्रकाशित इस समाचार-पत्रा की संपादिका मीरा देवी संघर्ष के दिनों को याद करते हुए बताती हैं कि प्रारम्भ में संवाददाताओं (मिथिलेश, दुर्गा, सोनिया, शकीला, मीरा, कविता, शांति, मंजूद्ध को कोई भी सूचना या समाचार हासिल करने में बहुत समस्या आती थी। महिला होने के कारण लोग गम्भीरता से नहीं लेते थे। सरकारी महकमों के लोग परेशान करते थे। पिफर भी वे हिम्मत न हारते हुए जनपद की समस्याओं विकास की बाधओं और महिला मुद्दों को बहुत बेबाकी से प्रस्तुत करते रहीं जिसके पफलस्वरूप प्रतििष्ठत `चमेली देवी´ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। शाहिर सी बात है कि स्थानीय लोगों की आवाज उन्हीं की भाषा में जब इस अखबार ने उठाई तो वह अपनी सामान्यता में ही असामान्य हो गया। इतने कम समय में इस आठ पृष्ठीय अखबार ने कई उपलिब्ध्यां हासिल की। जैसे इस अखबार की संवाददाता मिथिलेश को हन्ना गाँव की सड़क बनवाने का श्रेय जाता है। हन्ना गाँव में सड़क कापफी पहले बन गई थी, लेकिन सिर्पफ सरकारी कागजों पर। मिथिलेश ने जब सारी छानबीन कर इसकी रिपोर्ट `खबर लहरिया´ में छापी तो जिला मैजिस्ट्रेट ने सारी जाँच कराई और कागजी सड़क को हकीकत में बदल दिया। इसी प्रकार सूचना के अिध्कार से ग्रामीणों के जीवन में सम्भावित परिवर्तनों को भी मीरा देवी ने अपने सम्पादकीय में लक्षित किया। तमाम सरकारी योजनाओं की घोषणा की खबरें समय-समय पर इस अखबार में छपती रहती है। और इन सूचनाओं को ही ताकत बनाकर गाँव का आदमी अपने हक की लड़ाई लड़ने लगा है। जैसे मुख्यमंत्राी योजना में गरीब राशनकार्डधरियों का सरकारी अस्पताल में मुफ्रत इलाज का प्रावधन रखा गया। जब यह सूचना अख़्ाबार ने छापी तो अनेक ग्रामीण राशनकार्ड लेकर अस्पताल में पहुंचे। डॉक्टरों ने कहा कि ऐसी कोई योजना नहीं है तो ग्रामीणों ने झट से कहा कि योजना है, हमने `खबर लहरिया´ में पढ़ा है।अखबार से जुड़ी सभी महिलाएं रोजाना अपने घरेलू काम-काज निपटाने के बाद सूचना एकत्राीकरण पर निकलती है। महीने में दो बार पूरे समूह की सभा होती है। जिसमें एकत्रा सूचनाओं की छंटनी होती है। पृष्ठों के आधर पर समाचार तय किये जाते हैं। पिफर समाचार-पत्रा का खाका बनता है। प्रथम पृष्ठ पर चित्राकूट या प्रदेश से सम्बंिध्त किसी महत्वपूर्ण समाचार को स्थान दिया जाता है। दूसरे पृष्ठ पर `देश-विदेश´ शीर्षक के अन्तर्गत देश-दुनिया की महत्वपूर्ण हलचलों पर भी नशर रखी जाती है। तीसरे पृष्ठ `विकास´ पर गाँव के विकास सम्बन्ध्ी मुद्दों को स्थान दिया जाता है। `महिला मुद्दा´ पृष्ठ पर महिलाओं की समस्याओं उनकी पीड़ा को अभिव्यक्ति दी जाती है। `पंचायत´ पृष्ठ पर सरकारी योजनाओं/नीतियों की सूचना, उनके क्रियान्वयन में की जा रही घपलेबाजी को उजागर किया जाता है। अंतिम पृष्ठ पर `सम्पादकीय´ तथा `पाठकों के पत्रा´ छापे जाते हैं।इस अखबार की संवाददाताओं को प्रशिक्षण देने के लिये समय-समय पर आयोजित कार्यशालाओं में भेजा जाता है। साथ ही इनकी राजनीतिक समझ विकसित करने के लिये `निरन्तर´ एन।जी.ओ., दिल्ली से विशेषज्ञ आते हैं। साथ ही राजनीतिक समाचारों द्वारा भी ये महिलाएं अपनी राजनीतिक समझ विकसित करती हैं। अखबार की बढ़ती लोकप्रियता के चलते सम्पादिका मीरा देवी इसका विस्तार करने की इच्छुक हैं। बांदा जिले से भी इसके प्रकाशन की योजना बन रही है। साथ ही इसे पाक्षिक से साप्ताहिक करने की भी योजना है ताकि अिध्क से अिध्क क्षेत्रा और अिध्क से अिध्क समाचारों को समाहित किया जा सकें।जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि आज की पत्राकारिता केवल अपराध् की सनसनीखेज पत्राकारिता बन कर रह गई है। बड़े अखबार सनसनी पैफलाने के ही काम में लगे हुए हैं। आदमी को आदमी से जोड़ने वाली खबरों की आजकल बेहद कमी है। इन आंचलिक अखबारों में ये ताकत है कि वे छूटी हुई खबरों को खबर बना सकते हैं क्योंकि आज का पाठक कूट घटनाओं का समाचार पढ़ देख कर ऊब गया है। खबर लहरिया में अक्सर आंचलिक प्रतिभाओं का `बातचीत´ कॉलम में इंटरव्यू लिया जाता है। जैसे जून 2006 अंक में बांदा जिले के बड़ोखर गाँव के जादूगर बुद्ध विलास से बातचीत की गयी। सम्पादकीय टिप्पणी में भी जिस तरह बेबाक शैली का प्रयोग किया जाता है वह शैली बड़े-बड़े अखबारों में द्रष्टव्य नहीं होती है। जैसे खबर लहरिया समूह कइती से सबहिन का नमस्ते। सरकार किसानन के विकास का िढंढोरा पीटत हवै अउर दूसर कइत किसानन के पेट मा लात मारत हवै। चित्राकूट जिला की ज्यादातर नहर सुखान परी हवै। ...सरकार आपन बड़ाई करत हवै। कहते हवै फ्या साल पूर देश मा बहुतै नीक पफसल भे हवै। यहै कारन सबै किसान खुशी हवै।य् इ बात मुलायम सिंह यादव कुरसी मा बइठे बइठे कहते हवै। का कतौ सरकार किसानन से उनके खुशी के बात पूछत हवै?इसी तरह `सूचना का अिध्कार´ कानून लागू होने पर प्रथम पृष्ठ का शीर्षक था µ `आ गा सूचना का अिध्कार´ अब मड़ई सरकारी आपिफस, सरकारी अस्पताल, ब्लॉक, पंचायत, पुलिस चौकी अउर दूसर सरकारी विभागन से सूचना लइ सकत हवैं। अब सरकारी अिध्कारी सूचना दे मा आनाकानी न करिहैं। काहे से सूचना न दे मा उनका जुर्माना दे का पड़ी।अखबार के नाम पर विचार करें तो पायेंगे कि `खबर लहरिया´ नाम द्योतक है समाचारों के अनवरत प्रवाह का। लहरिया कह देने से बुंदेलखंड की आंचलिक महक भर जाती है। एक ऐसा नाम जिसमें विज्ञापनों की भ्रामक दुनिया नहीं है, पेज-थ्री का ग्लैमर नहीं, एक दूसरे से मच रही अखबारों की गला काट प्रतियोगिता नहीं। जिसमें है तो हाशिये पर खड़े इंसान की आवाश, जिसमें है सदियों से दबी औरत की अभिव्यक्ति। इसलिये `खबर लहरिया´ नाम लेते ही अपने आसपास सुख-दु:ख बाँटने वाला कोई आत्मीय साथी ध्यान में आ जाता है। यही इसकी पहचान भी है और यही इसकी सार्थकता भी।
(डॉ स्मिता मिश्र दिल्ली विश्विद्यालय में व्याख्याता के तौर पर कार्यरत हैं और मीडिया और इससे जुड़े विषयों से से सीधा सरोकार रखती हैं। पत्रकारों की कई पीढियों को कलम पकड़ने की सीख दे चुकी स्मिता मिश्र की मिडिया पर कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। हाल ही में भारतेंदु हरिश्चद्र पुरस्कार से आपको नवाजा गया है। देश भर में भ्रमण कर ख़बर लहरिया जैसे ढेरों अनुभव बटोरे हैं स्मिता जी ने।)

Tuesday, February 24, 2009

स्लमडॉग के नाम पर ही भीख दे दो

जैसा कि आपका मालूम ही है कि स्लमडॉग को ऑस्कर प्राप्त हो गया है। परन्तु भिखारी भी स्लमडॉग कहकर भीख मांग रहे हैं। मामला दिल्ली का है। तुलसी जी एक प्रतिष्ठित पत्रिका से जुड़े हुए हैं और अच्छे नेट-फ्रेंड हैं। हाल ही में उन्होंने बड़ी ही विचित्र घटना सुनाई, जिसे सुनकर हतप्रभ होना स्वाभाविक ही था। घर से ऑफिस की तरफ़ जाते हुए सीलमपुर की लालबत्ती पर उन्होंने देखा कि कुछ भिखारी हमेशा की तरह अपने दैनिक शिडयुल में व्यस्त थे। लेकिन गौर करने वाली बात यह थी कि आज उनका तरीका एकदम नया और आकर्षक था। अब वे भिखारी अल्लाह, भगवान या फ़िर अपने नवजात बच्चे के नाम पर भीख मांगने कि बजाय "स्लमडॉग के नाम पर" जनता जनार्दन कि सहानुभूति हासिल करने में जुट गए हैं।