उमाशंकर मिश्र
ममता दीदी के रेल बजट के बाद अब प्रणब दादा की बारी थी। मंदी के दौर और खेती के चौपट होने की मार झेल रही ग्रामीण जनता को नई सरकार से काफी उम्मीदें थी। कृषि क्षेत्र के लिए कम से कम चार प्रतिशत की विकास दर का लक्ष्य रखते हुए अर्थव्यवस्था के लिए नौ प्रतिशत की विकास दर का लक्ष्य रखा गया है। वित्त मंत्री द्वारा प्रस्तुत बजट में कार्पोरेट जगत को ज्यादा कुछ नहीं दिया गया लेकिन आम भारतीय और देश के लिए महत्वपूर्ण इकाइयों के लिए काफी कुछ प्रावधान किए गए हैं। बजट में कृषि जगत का खास ध्यान रखा गया है और रेल तथा सड़क तंत्र के विकास की बात की गई है।
हालांकि अंतरीम बजट में सामाजिक सरोकारों को लेकर सरकार प्रतिबद्ध जान पड़ रही थी, लेकिन अब जब प्रणब दादा का पिटारा खुल चुका है तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर नज़र रखने वाले पैरोकारों समेत विभिन्न अर्थशास्त्री कृषि की घोर उपेक्षा का आरोप सरकार पर लगा रहे हैं। . एग्रीकल्चर ट्रेड एण्ड पॉलिसी एक्सपर्ट-भास्कर गोस्वामी बजट के दो पहलुओं की ओर ध्यान केंद्रित करते हुए कहते हैं कि राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना की राशि में 144 फीसदी की बढ़ोत्तरी कर 39 हजार करोड़ किए जाने को सही ठहराते हैं। वे कहते हैं कि-यदि सही तरीके से इसे लागू किया गया तो बेरोजगारों के साथ साथ किसानों को भी फायदा मिल सकता है। दूसरी ओर उर्वरक सब्सिडी के लिए 49980 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। फर्टीलाइजर्स पर दी जाने वाली सिब्सडी सीधे किसानों को दिये जाने की बात को भी जानकार उचित कदम मान रहे हैं। लेकिन इससे फर्टीलाइजर्स के उपभोग पैटर्न में आने वाले एक डेढ़ सालों में क्या परिवर्तन होंगे यह देखने की बात होगी। कृषि ऋण पर ब्याज दर घटाकर 4 प्रतिशत के स्तर पर लाये जाने की आशा अर्थशास्त्रियों को थी। लेकिन ऐसा न होने पर भास्कर गोस्वामी जैसे जानकारों कहना है कि-दीघZकालीन खेती की ओर सरकार का ध्यान बिल्कुल नहीं है और किसी न किसी बहाने सरकार खेती से अपना हाथ खींचकर उसे कार्पोरेट कंपनियों के हवाले कर देने में जुटी हुईZ है। वे कहते हैं-वर्तमान हालातों को देखते हुए किसानों के लिए आय की गारंटी से जुड़ी किसी घोषणा की उम्मीद थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। एक और बात हाईब्रिड बीजों के दुष्प्रभावों को देखते हुए इस पर सख्त कदम उठाने की अपेक्षा भी थी, लेकिन इस पर भी कुछ नहीं हुआ। फिलहाल जानकारों की मानें तो इस बजट से खेती में किसी तरह के सुधार की आशा नहीं की जानी चाहिए। इस बीच कर्ज माफी योजना को दिसंबर तक बढ़ाये जाने को किसानों को राहत पहुंचाने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वित्त मंत्री ने महाराष्ट्र में इस योजना से वंचित उन किसानों के लिए कार्य बल गठन करने का ऐलान किया जिन्होंने महाजनों से ऋण लिया हुआ है। इसके अलावा सरकार ने उन किसानों के लिए 6 फीसदी की दर से कर्ज देने की घोषणा की जो अपने कर्ज का भुगतान समय पर करते हैं। यह दर दूसरों से लिए जाने वाले ब्याज दर से एक फीसदी कम है। केन्द्र ने इस उद्देश्य के लिए अंतरिम बजट के मुकाबले इस बजट में 411 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि का आवंटन किया है। मुखर्जी का कहना है कि सरकार अल्पकालिक फसल कर्ज के लिए ब्याज सब्सिडी देना जारी रखेगी। तीन लाख रुपये तक के ऋण पर किसानों को 7 फीसद ब्याज देना होगा। सरकार ने वित्त वर्ष 2009.10 के लिए कृषि ऋण का लक्ष्य बढ़ाकर ३,2500 करोड़ रुपये कर दिया है।
बहरहाल राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना की राशि में बढ़ोत्तरी एवं राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन का आरंभ करने के साथ 1.2 करोड़ नौकरियां प्रतिवर्ष देने को संतोषजनक माना जा रहा है। राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना 2009-10 में 63 फीसदी की वृद्धि के साथ 8.800 करोड़ रुपये का आवंटन, प्रधानमंत्री आदशZ ग्राम योजना में 100 करोड़ का प्रावधान, महिला साक्षरता के लिए राष्ट्रीय मिशन प्रारंभ करने की बात सरकार कर रही है। लेकिन जिस तरह से पेट्रोलियम पद्धार्थों के दामों में बढ़ोत्तरी हो रही हे, उसे नकारात्मक माना जा रहा है। आज उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पहले ही 10 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच चुका है, जानकारों के मुताबिक ऐसे में आने वाले समय में इसका सीधा असर कमोडिटी दामों पर पड़ेगा।
सरकार ने वित्त वर्ष २००९-10 में कृषि क्षेत्र के लिए लक्ष्य बढाकर ३,२५,000 करोड़ रुपये कर दिया है। पिछले वित्तीय वर्ष में यह लक्ष्य 280000 करोड़ रुपये रखा गया था। हालांकि कृषि क्षेत्र के लिए कर्ज के तौर पर २,८७,000 करोड़ रुपये दिए गए। लेकिन कमल नयन काबरा जैसे अर्थशास्त्रियों की नज़र में यह नाकाफी है। वे कहते हैं कि जरूरत को देखते हुए ग्रामीण क्षेत्र की तो घोर उपेक्षा की गई है। आधार संरचना में जीडीपी के 9 फीसदी के निवेश की बात पर वे कहते हैं कि भारत के 60 लाख गांवोंं में औसतन यदि 10 लाख रुपये भी लगा दिये जाये ंतो कुछ होने वाला नहीं है। सेनीटेशन की समस्या का हवाला देते हुए कहते हैं कि आज भी औरतों को कष्ट सहना पड़ता है। बकौल काबरा एक ओर तो सरकार आलीशान फलाईओवर्स बना रही है, बाम्बे में बाढ़ राहत के लिए 500 करोड़ रुपये दिये जा रहे है, लेकिन बिहार एक बार फिर बाढ़ के मुहाने पर खड़ा है, उसके लिए कुछ नहीं किया गया। आम आदमी की बात करते हुए काबरा कहते हैं कि गरीब के पल्ले अंतत: कुछ नहीं पड़ता, सब बिचौलियोंं की जेबों में चला जाता है। वे कहते हैं कि आज जरूरत है खेती के कार्पोरेटाइजेशन को रोकने और सीमांत एवं गरीब किसानों के हित में कदम उठाये जाने की।
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Monday, July 6, 2009
Wednesday, January 23, 2008
स्थानीय लोगों तक आनुवंशिक संसाधनों की पहुंच की वकालत
नई दिल्ली, 22 जनवरी (आईएएनएस)। अगले महीने संयुक्त राष्ट्र द्वारा जिनेवा में जैव विविधता पर आयोजित होने वाले सम्मेलन में जब 190 देशों के प्रतिनिधि जुटेंगे तो स्थानीय लोगों को आनुवंशिक संसाधनों से लैस किए जाने का मसला जोर-शोर से उठेगा। लंदन स्थित एक संगठन ने यह मुद्दा उठाने का फैसला किया है।
लंदन स्थित इंटरनेशनल इंस्टीटयूट फॉर एनवायरमेंट एंड डेवलपमेंट (आईआईईडी) का मानना है कि स्थानीय लोगों को गरीबी से मुक्ति, जैव विविधता की रक्षा और तापमान परिर्वतन के दुष्प्रभावों से निपटने के लिए आनुवंशिक संसाधनों से लैस किए जाने की जरूरत है। सोमवार को इस संगठन द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि यून कनवेंशन ऑन बायोलॉजिकल डायवर्सिटी (सीबीडी) के प्रावधानों को अमल में आए हुए 15 साल बीत चुके हैं, पर आनुवंशिक संसाधनों के निष्पक्ष वितरण और पहुंच के लिए आज तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
जिनेवा में 21-25 फरवरी को सीबीडी के प्रावधानों पर खास चर्चा होने वाली है। आईआईईडी की रिपोर्ट पनामा, भारत, पेरू और चीन में संगठन द्वारा आयोजित कार्यशिविर के निष्कर्षों पर आधारित है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वन्य और ग्रामीण इलाकों में मौजूद अरबों डॉलर के आनुवंशिक संसाधनों का व्यावसायिक दोहन करने की कोशिशें जारी हैं, पर इसके लिए स्थानीय लोगों को विश्वास में नहीं लिया जाता।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस
नई दिल्ली, 22 जनवरी (आईएएनएस)। अगले महीने संयुक्त राष्ट्र द्वारा जिनेवा में जैव विविधता पर आयोजित होने वाले सम्मेलन में जब 190 देशों के प्रतिनिधि जुटेंगे तो स्थानीय लोगों को आनुवंशिक संसाधनों से लैस किए जाने का मसला जोर-शोर से उठेगा। लंदन स्थित एक संगठन ने यह मुद्दा उठाने का फैसला किया है।
लंदन स्थित इंटरनेशनल इंस्टीटयूट फॉर एनवायरमेंट एंड डेवलपमेंट (आईआईईडी) का मानना है कि स्थानीय लोगों को गरीबी से मुक्ति, जैव विविधता की रक्षा और तापमान परिर्वतन के दुष्प्रभावों से निपटने के लिए आनुवंशिक संसाधनों से लैस किए जाने की जरूरत है। सोमवार को इस संगठन द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि यून कनवेंशन ऑन बायोलॉजिकल डायवर्सिटी (सीबीडी) के प्रावधानों को अमल में आए हुए 15 साल बीत चुके हैं, पर आनुवंशिक संसाधनों के निष्पक्ष वितरण और पहुंच के लिए आज तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
जिनेवा में 21-25 फरवरी को सीबीडी के प्रावधानों पर खास चर्चा होने वाली है। आईआईईडी की रिपोर्ट पनामा, भारत, पेरू और चीन में संगठन द्वारा आयोजित कार्यशिविर के निष्कर्षों पर आधारित है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वन्य और ग्रामीण इलाकों में मौजूद अरबों डॉलर के आनुवंशिक संसाधनों का व्यावसायिक दोहन करने की कोशिशें जारी हैं, पर इसके लिए स्थानीय लोगों को विश्वास में नहीं लिया जाता।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस
Friday, January 11, 2008
आधा सफर भी तय नहीं कर पाया सिंचाई क्षेत्र
नई दिल्ली [रामनारायण श्रीवास्तव]। 'उत्तम खेती मध्यम व्यापार' की लोकोक्ति अब केवल इतिहास के पन्नों में ही सिमट कर रह गई है। देश के किसान व खेती जिस दौर से गुजर रही है, उसके लिए काफी हद तक सिंचाई सुविधाओं की कमी ही जिम्मेदार है। इन हालात को सुधारने के लिए केंद्र सरकार ने पिछली दस योजनाओं में ढेरों परियोजनाओं व कार्यक्रमों को शुरू तो किया, लेकिन उनकी धीमी गति और राज्य सरकारों की उदासीनता से सफलता परवान नहीं चढ़ सकी। महत्वाकांक्षी त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम ने अब थोड़ी गति पकड़ी भी तो बाकी योजनाएं धीमी पड़ गई हैं।
एक दशक बीत जाने के बाद भी एआईबीपी से देश को वह लाभ नहीं मिल सका है, जिसकी उसने अपेक्षा की थी। इस कार्यक्रम के तहत अब तक बड़ी व मझोली परियोजनाओं पर दो खरब 32 अरब 31 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च हो चुके हैं, लेकिन इससे 93 लाख हेक्टेयर जमीन के लिए ही सिंचाई सुविधाएं हासिल की जा सकी हैं। इसके अलावा माइनर योजनाओं से ढाई लाख हेक्टेयर के लिए सिंचाई सुविधाएं हासिल की गई हैं। इस छोटे आंकड़े को भी जल संसाधन बड़ी उपलब्धि मानता है, क्योंकि एआईबीपी से पहले सिंचाई योजनाओं के पूरा होने व सिंचाई क्षमता सृजित होने की गति और भी धीमी थी। हालांकि मंत्रालय यह बात स्वीकारता है कि जिस गति से सिंचाई योजनाओं को पूरा होना चाहिए, वह अभी भी नहीं हो पा रहा हैं। गौरतलब है कि एआईबीपी के तहत अभी भी लगभग डेढ़ सौ परियोजनाएं लंबित हैं। यही वजह है कि देश की आधी से भी अधिक खेती अभी भी सिंचाई सुविधाओं से वंचित है।
एआईबीपी से सिंचाई क्षेत्र को गति मिली है। लेकिन इसके तहत चुनिंदा योजनाओं को ही शामिल करने से बाकी योजनाओं की गति बेहद धीमी हो जाती है। मसलन दसवीं योजना में देश भर में 14 लाख 28 हजार हेक्टेयर सिंचाई सुविधाएं सृजित की गईं उनमें एआईबीपी का योगदान नौ लाख हेक्टेयर यानी 63 फीसदी रहा। केंद्र में संप्रग सरकार आने के बाद सिंचाई क्षेत्र के लिए बजट में बढ़ोतरी होने से जल संसाधन मंत्रालय को भरोसा है कि 11वीं योजना में हालात सुधरेंगे।
हाल में ही केंद्रीय जल संसाधन राज्यमंत्री जयप्रकाश नारायण यादव ने इस कार्यक्रम की समीक्षा बैठक में राज्यों को तेजी लाने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि केंद्र के पास पैसे की कमी नहीं है, लेकिन राज्य पहले दिए गए पैसे का उपयोगिता प्रमाणपत्र समय पर नहीं देते हैं, जिससे अगली किस्त लटक जाती है। चूंकि जल राज्य का विषय है, इसलिए केंद्र सरकार धन की व्यवस्था करने से लेकर राज्यों को सलाह देने की भूमिका तक ही सीमित है। उनके काम में हस्तक्षेप नहीं कर सकती है।
साभार : दैनिक जागरण Jan 11, 02:28 am
नई दिल्ली [रामनारायण श्रीवास्तव]। 'उत्तम खेती मध्यम व्यापार' की लोकोक्ति अब केवल इतिहास के पन्नों में ही सिमट कर रह गई है। देश के किसान व खेती जिस दौर से गुजर रही है, उसके लिए काफी हद तक सिंचाई सुविधाओं की कमी ही जिम्मेदार है। इन हालात को सुधारने के लिए केंद्र सरकार ने पिछली दस योजनाओं में ढेरों परियोजनाओं व कार्यक्रमों को शुरू तो किया, लेकिन उनकी धीमी गति और राज्य सरकारों की उदासीनता से सफलता परवान नहीं चढ़ सकी। महत्वाकांक्षी त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम ने अब थोड़ी गति पकड़ी भी तो बाकी योजनाएं धीमी पड़ गई हैं।
एक दशक बीत जाने के बाद भी एआईबीपी से देश को वह लाभ नहीं मिल सका है, जिसकी उसने अपेक्षा की थी। इस कार्यक्रम के तहत अब तक बड़ी व मझोली परियोजनाओं पर दो खरब 32 अरब 31 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च हो चुके हैं, लेकिन इससे 93 लाख हेक्टेयर जमीन के लिए ही सिंचाई सुविधाएं हासिल की जा सकी हैं। इसके अलावा माइनर योजनाओं से ढाई लाख हेक्टेयर के लिए सिंचाई सुविधाएं हासिल की गई हैं। इस छोटे आंकड़े को भी जल संसाधन बड़ी उपलब्धि मानता है, क्योंकि एआईबीपी से पहले सिंचाई योजनाओं के पूरा होने व सिंचाई क्षमता सृजित होने की गति और भी धीमी थी। हालांकि मंत्रालय यह बात स्वीकारता है कि जिस गति से सिंचाई योजनाओं को पूरा होना चाहिए, वह अभी भी नहीं हो पा रहा हैं। गौरतलब है कि एआईबीपी के तहत अभी भी लगभग डेढ़ सौ परियोजनाएं लंबित हैं। यही वजह है कि देश की आधी से भी अधिक खेती अभी भी सिंचाई सुविधाओं से वंचित है।
एआईबीपी से सिंचाई क्षेत्र को गति मिली है। लेकिन इसके तहत चुनिंदा योजनाओं को ही शामिल करने से बाकी योजनाओं की गति बेहद धीमी हो जाती है। मसलन दसवीं योजना में देश भर में 14 लाख 28 हजार हेक्टेयर सिंचाई सुविधाएं सृजित की गईं उनमें एआईबीपी का योगदान नौ लाख हेक्टेयर यानी 63 फीसदी रहा। केंद्र में संप्रग सरकार आने के बाद सिंचाई क्षेत्र के लिए बजट में बढ़ोतरी होने से जल संसाधन मंत्रालय को भरोसा है कि 11वीं योजना में हालात सुधरेंगे।
हाल में ही केंद्रीय जल संसाधन राज्यमंत्री जयप्रकाश नारायण यादव ने इस कार्यक्रम की समीक्षा बैठक में राज्यों को तेजी लाने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि केंद्र के पास पैसे की कमी नहीं है, लेकिन राज्य पहले दिए गए पैसे का उपयोगिता प्रमाणपत्र समय पर नहीं देते हैं, जिससे अगली किस्त लटक जाती है। चूंकि जल राज्य का विषय है, इसलिए केंद्र सरकार धन की व्यवस्था करने से लेकर राज्यों को सलाह देने की भूमिका तक ही सीमित है। उनके काम में हस्तक्षेप नहीं कर सकती है।
साभार : दैनिक जागरण Jan 11, 02:28 am
Tuesday, October 9, 2007
जैविक खाद से बदली तकदीर
इन्डिया फ़ांउडेशन फ़ार रूरल डेव्लपमेन्ट स्टडीज
नई दिल्ली
मध्य प्रदेश में बैतूल जिला मुख्यालय से करीब 70 किमीटर की दूरी पर पहाड़ों से घिरा हुआ ग्राम है, चिल्हाटी। दूरदराज के इस गांव में करीब डेढ़ सौ किसानों के घर हैं। नत्थू हजारे और जीवन लाल हिंगवे भी इसी गांव में रहने वाले कृषक हैं। जिन्हें करीब दो दो लाख रुपए का कर्ज विरासत में मिला था। उन्हें सूझ नहीं रहा था कि कैसे कर्ज के इस अभिशाप से मुक्ति पाई जाए। आमदनी कम होने के कारण परिवार का भरण पोषण भी कठिन हो गया था। लेकिन सरकारी अनुदान पर लगने वाले गोबर गैस संयंत्र और जैविक खाद से न केवल इन दोनों किसानो की तकदीर बदल गई बल्कि पूरा गांव इस तरह के प्रयोग से आत्मनिर्भर बनने की ओर अग्रसर है। जीवन लाल हिंगवे एक एकड़ जमीन के काश्तकार हैं। उनके घर पर दो घन मीटर और चार घन मीटर का गोबर गैस संयंत्र बना हुआ है। जिससे पैदा होने वाली गैस का उपयोग वे घर में खाना बनाने के लिए तो करते हैं। इसके अलावा उन्होंने 200 रुपए प्रति माह के हिसाब से इस संयंत्र से दो लोगों को कनेक्शन भी दिया है। इसी तरह से केंचुआ खाद से वे साल भर में डेढ़ लाख रुपए तक कमा लेेते हैं और करीब 30 हजार रुपए की कमाई केंचुए बेचने से हो जाती है। चिल्हारी गांव मे कुल 41 नाडेप टांके बने हैं और यहां सालाना दो सौ टन गोबर खाद एवं 100 टन केंचुआ खाद का उत्पादन हो रहा है। इस तरह के प्रयोग से गांव के किसानों को खेती के अलावा आय का एक वैकल्पिक जरिया मिल गया है। जिससे ग्रामीणों की आय में वृिद्ध होने के साथ साथ खेतों में जैविक खाद के प्रयोग से फसलों की उपज भी भरपूर हो रही है। इसी का परिणाम है कि नत्थू हजारे और जीवन लाल हिंगवे जैसे किसान आज बेहतर जीवन जी रहे हैं। हिंगवे ने तो खाद से होने वाली आय की बदौलत एक आटा चक्की भी लगा ली है। इसके अलावा गाय पालन के साथ सिंचाई के लिए एक ट्यूबवैल भी लगवा लिया है। इस तरह जैविक खाद के उत्पादन से किसानों किसानोें के जीवनस्तर को सम्मानजनक स्थिती में पहुंचा दिया है। गांव की पूर्व सरपंच दुर्गाबाई ने भी एक गोबर गैस और चार नाडेप टांंके बनवाए हैं। इनमें से दो नाडेप टांके तो सरकारी अनुदान से बने हैं। बकौल दुर्गाबाई पहले हजारों रुपए की लकड़ियां ईंधन के रूप में जल जाती थी और खेतों में रसायनिक खाद डालने के लिए भी धन का काफी खर्च होता था। लेकिन अब इन मदों पर होने वाले खर्च की बचत का उपयोग ग्रामीण अन्य कामों मे करने लगे हैं। जैविक खाद के प्रयोग से फसल उत्पादन में वृिद्ध के अलावा कीटों के प्रकोप का खतरा भी कम हो गया है। कृमि अर्थात् केंचुओं को मृदा में डालना या उनमें कृमि खाद बनाना अत्यंत प्राचीन प्रक्रिया है। इसे अन्य प्रचलित प्रक्रियाओं में सर्वोत्तम भी माना गया है। इस तरह से देखा जाए तो जैविक खाद के प्रयोग से न केवल रसायनिक उर्वरकों पर होने वाले खर्च से बचा जा सकता है। बल्कि यह पर्यावरण हितकारी भी है। केंचुओं की खाद बनाने वाली प्रजाती जमीन में रहने वाली समान्य प्रजाति से भिन्न होती है। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि इसके लिए अच्छी प्रकार के केंचुएं प्रयोग किए जाएं। इसके लिए तीन प्रकार की प्रजातियां प्रचलित हैं। अफ्रीकन नाइट क्राउजर, टाईगर वर्म और इंडियन ब्लू वर्म इसमें प्रमुख है।
Sunday, October 7, 2007
बीजों पर अधिकार की मुहीम

उमाशंकार मिश्र
इंडिया फ़ांउडेशन फ़ार रूरल डेव्लप्मेंट स्टडीज
नयी दिल्ली
खेती पूरी प्रक्रिया का प्रथम चरण बीज ही होता है। इस बात को बीज कंपनियां भली भांति जानती हैं। जिसके चलते बीज जो कभी समुदाय की धरोहर हुआ करता था, आज उन पर कंपनियों द्वारा अधिकार की कवायद जोर पकड़ती जा रही है। परिणामत: वे किसानों की खोजों को हथियाने से भी नहीं चूकती।
इंडिया फ़ांउडेशन फ़ार रूरल डेव्लप्मेंट स्टडीज
नयी दिल्ली
खेती पूरी प्रक्रिया का प्रथम चरण बीज ही होता है। इस बात को बीज कंपनियां भली भांति जानती हैं। जिसके चलते बीज जो कभी समुदाय की धरोहर हुआ करता था, आज उन पर कंपनियों द्वारा अधिकार की कवायद जोर पकड़ती जा रही है। परिणामत: वे किसानों की खोजों को हथियाने से भी नहीं चूकती।
इस पूरी प्रक्रिया में जो एक बात समान रूप से झलकती है, वह है बीजों का आदान प्रदान, जिसके कारण सदियों से फसलों में विविधता का विकास हुआ है। हमारे देश कुछ इसी तरह से किसान लम्बे समय से बीजों का आदान प्रदान करते रहे हैं। यही नहीं जरुरत के समय अनाज के आदान की परंपरा भी हमारे देश में रही है। लेकिन जबसे हरित क्रांति का शंखनाद हमारे देश में हुआ है, तभी से कृषकों के विकास की आड़ में बीजों के धंधे ने भी पांव पसारने शुरु कर दिए था। परिणामत: कृषि के क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कंपनियों का हस्तक्षेप भी बढ़ना शुरु हो गया था। आज वही कंपनियां बीजों के रखरखाव की इस परंपरा के चक्र को विखंडित करने पर तुली हुई हैं क्योंकि ऐसा करने पर ही किसान बीजों की जरुरत को पूरा करने के लिए इन कंपनियों पर निर्भर हो सकते थे। इस तरह की परिस्थिती के उत्पन्न होने से बीजों के संरक्षण की जो परंपरागत पद्धतियां छिन्न भिन्न होती चली गई। इस तरह जैसे जैसे कंपनियों के एकाधिकार की मुहिम तेज हुई, लूट का चक्र भी बढ़ता चला गया। इसक ताजा उदाहरण बहुराष्ट्रीय कंपनी मोन्सेंटों द्वारा भारत में देशी कपास के बीजों के स्थान पर अधिक उत्पादन के नाम पर जीन संविर्द्धत बीजों के प्रचार प्रसार के रूप में देखा जा सकता है। जबकि इस तरह के प्रतिकूल प्रभाव के कारण इसका चौतरफा विरोध हम देख चुके है। विदर्भ के किसानों के द्वारा की जा रही आत्महत्याओं का एक कारण इस तरह के बीजों के प्रयोग को भी माना जा रहा है। इस प्रकार बीज जो कभी समुदाय की धरोहर हुआ करता था, वह निजी संपत्ति बन कर बाजार की गिरफ़्त में आ गया। बीजों के बाजारीकरण के इस ताने बाने में बीजों के संरक्षण की देशी विधियों को निशाना बनाया गया। टर्मीनेटर तकनीक जिसके तहत बीजों के उत्पादन की बात कही गई है, इस बात को पुख्ता करता है। इस प्रकार के बीजों के प्रयोग से फसल तो होगी लेकिन अगली फसल के लिए किसानों के पास कुछ नहीं बचा रह पाता। अर्थात हर बार फसल की बीजाई के लिए किसान को बीज बाजार से ही खरीदना ही पड़ता है। इन बाजारू शातिर के परिणामस्वरूप बीज अब किसानों की पहुंच से दूर होते जा रहे हैं। संकर बीजों के प्रयोग से वास्तविक फायदा किसानों की अपेक्षा बीज कंपनियों, रसायन एवं यूरिया कंपनियों को होता है। क्योंकि इन बीजों के प्रयोग से रसायनिक खाद, कीटनाशकों और सिंचाई की अधिकतम आवश्यकता होती है। निरंतर इस चक्र के चलते रहने के कारण ही भूमि बांझपन की ओर बढ़ने लगती है। पंजाब के विभिन्न हिस्सों में भूमि का बंजर होना इसी बात का प्रमाण माना जा सकता है। खेती की पूरी प्रक्रिया का प्रथम चरण बीज ही होता है। सदियों से खेती का विकास बीजों की विविधता के संरक्षण एवं संवर्धन पर टिका रहा है। अलग अलग मिट्टी एवं पानी के कारण सैकड़ों वर्षों से फसलों की विविधता का विकास हुआ है। यही नहीं स्थानीय खेती की विशेष पारिस्थितिक जरूरतों को समझते हुए लोग फसलों की विविध किस्मों का संरक्षण करते रहे हैं। महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले की नागबीड़ तालुका के वयोवृद्ध किसान दादाजी रामाजी खोब्रागेड़े को इसी कड़ी एक हिस्सा माना जा सकता है। उन्होंने धान की पटेल-3 किस्म में होने वाले परिवर्तनों का लम्बे समय तक अवलोकन किया और अपनी पारखी दृिष्ट एवं लगन से धान की नई किस्म खोजकर उसे विकसित किया। आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में बहुतायत में पैदा किए जाने वाले धान का नाम एचएमटी है। 1990 में जब एचएमटी की खिली हुई फसल को आसपास के लोगों ने खोब्रागेड़े के खेतों में देखा तो उन्होंने भी इसकी मांग शुरु कर दी। एचएमटी की बढ़ती लोकप्रियता के कारण इसकी महक अकोला स्थित पंजाबराव देशमुख कृषि विद्यापीठ तक जा पहुंची और इसकी भारी मांग के चलते विद्यापीठ के शोधकर्ताओं के मुंह में भी पानी आ गया। विद्यापीठ के वैज्ञानिक खोब्रागेड़े से अनुसंधान के नाम पर कुछ बीज ले गए और उन बीजों का शुद्धिकरण कर पीकेवीएचएमटी के नाम से बाजार में जारी कर दिया और खोब्रागेड़े को उसकी खोज एवं योगदान के प्रतिफल से वंचित कर दिया। कुछ समय पूर्व ``राष्ट्रीय नवप्रर्वतन संस्थान´´ की ओर से महामहिम अब्दुल कलाम ने खोब्रागेड़े को सम्मानित किया। राष्ट्रीय अनुसंधान परिषद् ने भी खोब्रागेड़े की उपलब्धि को पुरस्कृत करने हेतु नामांकित किया था। लेकिन विद्यापीठ से अधिकृत मान्यता न दिए जाने के कारण खोब्रागेड़े को उन्हें पुरस्कार नहीं मिल सका। दूसरी ओर खोब्रागेड़े का दावा है कि शुद्धिकरण के बाद भी धान में कोई गुणात्मक सुधार विद्यापीठ ने नहीं किया है। इस तरह की परिस्थितियों का आरंभ तभी से हुआ है जबसे कृषि से संबंधित मदों का बेतहाशा बाजारीकरण किया जाने लगा। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में स्थित इंदिरा गांधी विश्वविद्यालय में पारंपरिक धान की 20 हजार से अधिक किस्मों का संग्रहण किया गया है। बहुराष्ट्रीय कंपनी सिंजेन्टा की गिद्धदृिष्ट लंबे समय से गड़ी हुई थी। कंपनी ने बीजों के संग्रह को हथियाने के लिए इंदिरा गांधी विश्वविद्यालय से साझा अनुसंधान के नाम पर एक समझौता कर लिया। जब इस बात का खुलासा हुआ तो छत्तीसगढ़ मे इसका पुरजोर विरोध होने लगा। अंतत: विश्वविद्यालय को इस समझौते से अलग होना पड़ा। अपने संसाधनों को संरक्षित रखने के लिए छत्तीसगढ़वासियों की भांति ही लोक-पहल की आवश्यकता है। छत्तीसगढ़ में पाई जाने वाली हजारों धान की किस्में गुणात्मक और पैदावार की दृिष्ट से काफी समृृद्ध हैं। धान की इन प्रजातियों का विकास किसी प्रयोगशाला में नहीं किया गया था। बल्कि स्थानीय किसानों ने मिट्टी से अपने जुड़ाव से सैकड़ों वर्षों से इस धरोहर को सजाया संवारा है। यहां सवाल यह उठता है कि फसलों की नई किस्मों का चयन, विकास एवं विभिन्न किस्मों के सुधार का अधिकार-क्षेत्र क्या कृषि वैज्ञानिकों, शोध संस्थानों और कार्पोरेट बीज कंपनियों तक ही सीमित है? क्या फसलों की किस्मों के विकास का श्रेय उन किसानों को नहीं मिलना चाहिए जिन्होंने धरती से अपने लगाव के चलते अपनी पारखी दृिष्ट एवं अनुभव से फसलों की अनगिनत किस्मों का विकास किया है। किसानों की पारंपरिक खोजों को बढ़ावा देने के लिए क्या कृषि वैज्ञानिकों, कृषि शोध संस्थानों द्वारा उन्हें प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए? लेकिन इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि किसानों को उनके योगदान के लिए प्रोत्साहित करने की बजाय तथाकथित कृषि वैज्ञानिक एवं शोध संस्थान ही किसानों की खोजों पर अपना लेबल लगाकर उनका श्रेय हासिल करने को आतुर रहते हैं। विश्व व्यापार संगठन के माध्यम से दुनिया भर की बहुराष्ट्रीय कंपनियां विभिन्न देशों के संसाधनों को अपनी पूंजी एवं तकनीक के माध्यम से हड़पने को आतुर हैं। विडंबना ही है कि हमारे देश में कानून भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की एकाधिकार की मुहिम को रोक पाने और स्थानीय समुदाय के अधिकारों की रक्षा करने में अक्षम जान पड़ते हैं। भारत मे जैव संसाधनों के विषय से संबंधित पेटेंट(द्वितीय संसोधन) अधिनियम 2002, पौध प्रजाति एवं कृषक अधिकार सुरक्षा अधिनियम-2001 एवें जैव विविधता बिल जैसे कानूनों की व्यवस्था की गई है। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि ये कानून इस तरह की जैव विविधता की धरोहरों पर पेटेंट की अनुमती प्रदान करते हुए कहीं न कहीं स्थानीय समुदायों को उनके नैसर्गिक अधिकारों से वंचित कर रहे हैं। वास्तव मे पेटेंट कानून पर यदि गौर करें तो इसका स्वरूप जैव विविधता को नष्ट करके उसमें एकरूपता कायम करते हुए बहुराष्ट्रीय कंपनियों के चुनिंदा बीजों की किस्मोंं पर निर्भरता को सुनििश्चत करते हैं। छत्तीसगढ़ स्थित ``रिछारिया किसानी संरक्षण एवं संवर्द्धन '' से सम्बद्ध जैकब नल्लिथनम हरित क्रांति की विसंगतियों को इस प्रकार की स्थिति के उत्पन्न होने के लिए जिम्मेदार मानते हैं। साथ ही वे इस पूरे ताने-बाने को राजनीतिज्ञों, नौकरशाहों और बड़ी कंपनियों की आपसी संाठगांठ का परिणाम बताते हुए कहते हैं कि इन लोगों ने अपने स्वार्थों की सििद्ध के लिए बहुसंख्य आबादी के समक्ष बहुत बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।
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