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Monday, May 24, 2010

नंदीग्राम से वेदांत विश्वविद्यालय तक -सरकारी दमन की एक ही गाथा

डॉ कुलदीप चंद अग्निहोत्री
12 मई 2004 को मुम्बई में वर्ली में रहने वाले चार लोगों ने मिलकर भारतीय कम्पनी अधिनियम की धारा 25 के अन्तर्गत स्टरलाईट फाउंडेशन का पंजीयन करवाया । इस धारा के अंतर्गत पंजीयन होने वाली कम्पनियां प्राइवेट होती हैं और उनका उद्देश्य लाभ कमाना नहीं बल्कि जनसेवा करना होता है । फाउंडेशन का पंजीयन करानेवाले ये परोपकारी जीव द्वारकादास अग्रवाल का बेटा अनिल कुमार अग्रवाल और उनकी बेटी सुमन डडवानिया हैं । इनके इस फाउंडेशन में अनिल कुमार अग्रवाल के दादा लक्ष्मीनारायण अग्रवाल भी हैं । इस प्रकार अग्रवाल परिवार के 4 सदस्यों को स्टरलाईट फाउंडेशन प्रारम्भ हुआ । कम्पनी का पंजीयन करवाते समय यह बताना आवश्यक होता है कि कम्पनी में किसी भी प्रकार की उन्नीस -इक्कीस हो जाने की स्थिति में क्षति की भरपाई करने की किसकी कितनी जिम्मेदारी होगी । इन चारों महानुभावों ने घोषित किया कि प्रत्येक की जिम्मेदारी केवल 5 हजार रुपए तक की होगी । इसका अर्थ यह हुआ कि स्टरलाईट फाउंडेशन के संस्थापक सदस्यों ने केवल 20 हजार रुपए की जिम्मेदारी को स्वीकार किया । कुछ समय के बाद इस फाउंडेशन ने अपना नाम बदलकर नया नाम वेदांत फाउंडेशन रख दिया ।
अनिल अग्रवाल के इस वेदांत फाउंडेशन की गाथा शुरु करने से पहले इसके बारे में थोडा जान लेना लाभदायक रहेगा । अग्रवाल इंग्लैंड में वेदांत के नाम से एक कम्पनी चलाते हैं जो अनेक कारणों से काली सूची में दर्ज है । ओडिशा में अग्रवाल खदानों के धंधे से जुडे हुए हैं जिसको लेकर उन पर अनेक आरोप -प्रत्यारोप लगते रहते हैं । अग्रवाल ओडिशा में ही बॉक्साईट की खदानों से जुडे हुए हैं और उन पर खदान के कार्य में अनियमितता बरतने के कारण अनेक मुकदमे चल रहे हैं । अनिल अग्रवाल कैसे फकीरी से अमीरी में दाखिल हुए यह एक अलग गाथा है । अनिल अग्रवाल के वेदांता रिसोर्सेज का नवीन पटनायक से पुराना रिश्ता है अग्रवाल ओडिशा में वेदांत एल्युमिनियम प्रोजेक्ट चलाते हैं । अरबों रुपए की खदानों का मामला है और खदानों के इस मामले में कम्पनी कितना गडबड घोटाला कर रही है , ओडिशा के प्राकृतिक स्त्रोंतों को लूट रही है और नियम कानूनों की धज्यियां उडाकर अपना भंडार भर रही है इसका एक नमूना 2005 में उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित की गयी केन्द्रीय उच्च शक्ति कमेटी द्वारा न्यायालय को सौंपी गयी रपट से अपने आप स्पष्ट हो जाता है । किस प्रकार अनिल अग्रवाल की खदान कम्पनी ने राज्य सरकार की मिली भगत से झूठ बोला , तथ्यों एवं प्रमाणों को बदला और विशेषज्ञों और ओडिशा की जनता को जानबूझकर बुद्धू बनाने का प्रयास किया । कम्पनी अपनी गतिविधियों को छुपाना चाहती थी । सरकार इसमें सहायक हो रही थी । इस कमेटी ने सर्वाेच्च को संस्तुति की कि अग्रवाल के एल्युमिनियम रिफाईनरी प्रोजेक्ट को जिस प्रकार पर्यावरण सम्बंधी एवं वनक्षेत्र में कार्य करने की अनुमति मिली है उससे इस बात का संदेह गहराता है कि राज्य सरकार इसमें मिली हुई है । जनहितों एवं राष्टृहितों का ध्यान नहीं रखा गया । इसका अर्थ यह हुआ कि अनिल अग्रवाल और उनकी कम्पनियां ओडिशा में क्या कर रहीं हैं यह मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से छुपा हुआ नहीं था । लेकिन शायद नवीन पटनायक के हित ओडिशा के बजाय कहीं अन्यत्र रहते हैं ।
वेदांत फाउंडेशन ने अप्रैल 2006 में ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को एक पत्र लिखकर यह सूचित किया कि फाउंडेशन पूरी , कोणार्क, मैरीना बीच के साथ एक विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय बनाना चाहता है जिसका नाम वेदांत विश्वविद्यालय होगा । क्योंकि विश्वविद्यालय बहुत बडा होगा और बकौल अनिल अग्रवाल उसमें से नोबल पुरस्कार विजेता निकला करेंगे इसलिए , उसे इस पवित्र काम के लिए 10 हजार एकड जमीन की जरुरत होगी । शायद , अग्रवाल ने यह भी कहा होगा कि यह ओडीशा के लिए अत्यंत गौरव का विषय होगा । ओडिया न जानने वाले ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ओडिशा के गौरव की बात सुनकर चुप कैसे रह सकते थे । और फिर जब यह प्रस्ताव एक ही परिवार के दादा और पौत्र ने साथ मिलकर दिया हो तो उसकी अवहेलना कैसे की जा सकती थी । आजकल ऐसे संयुक्त परिवार बचे ही कितने हैं । यह अलग बात है नवीन पटनायक ने अग्रवाल परिवार से यह नहीं पूछा कि विश्वविद्यालय खोलने सेे पहले अपने कहीं कोई स्कूल -इस्कूल भी चलाया है या नहीं । खैर अग्रवाल के मित्र नवीन पटनायाक तुरंत सक्रिय हुए और पत्र मिलने के दो महीने के अंदर -अंदर उनके प्रिसीपल सेक्रेटरी ने 13 जुलाई को वेदांत विश्वविद्यालय खोलने के लिए फाईल चला दी । फाईल कितनी तेजी से दौडी होगी इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसके 5 दिन बाद ही 19 जुलाई का ओडिशा सरकार ने फाउंडेशन के साथ एमओयू पर हस्ताक्षर कर दिए। । यह अलग बात है कि ओडिशा के लोकपाल ने बाद में अपने एक आदेश में इस बात पर आश्चर्य प्रकट किया कि फाउंडेशन की ओर से किसने हस्ताक्षर किए , यह स्पष्ट नहीं है क्यांेकि हस्ताक्षर पढे ही नहीं जा रहे । साथ ही कि यह एमओयू अनिल अग्रवाल फाउंडेशन को किसी समझौते में भी नहीं बांधता । यानी सरकार फाउंडेशन के लिए सबकुछ करेगी लेकिन फाउंडेशन किसी बंधन में बंधा नहीं रहेगा । इसी बीच अनिल अग्रवाल ने वेदांत फाउंडेशन का नाम बदलकर उसका नया नाम अपने नाम पर ही रख लिया ।
अब सरकार को अनिल अग्रवाल या उनके फाउंडेशन के लिए 10 हजार एकड जमीन मुहैया करवानी थी , बहुत ज्यादा हो -हल्ला मचने के कारण अग्रवाल ने ओडिशा सरकार पर एक दया कि और वे लगभग 6 हजार 2 सौ एकड प्राप्त करने पर ही ओडिया गौरव को बचाने के लिए सहमत हो गए । अनिल अग्रवाल जानते है कि अपने इस नए शिक्षा उद्योग के लिए वे स्वयं भूमि नहीं खरीद सकते थे । किसान अपनी भूमि बेच या न बेचे यह उस पर निर्भर है । वैसे भी यदि किसान अपनी कृषि योग्य जमीन बेच देगा तो भूखों नहीं मरेगा तो और क्या करेगा । दूसरे अग्रवाल यह भूमि खुले बाजार मंे खरीदते तो निश्चय ही कीमत कहीं ज्यादा देनी पडती । इसके बावजूद भी एकसाथ लगभग 6-7हजार एकड भूमि मिल पाना भी सम्भव नहीं है । तब एक ही रास्ता बचता था कि नवीन पटनायक इस भूमि का अधिग्रहण करने के बाद यह भूमि अपने मित्र अनिल अग्रवाल को इस शिक्षा उद्योग के लिए सौंप दें । इससे , एक तो भूमि की ही ज्यादा सस्ती कीमतें मिल जाती दूसरे भूमि अधिग्रहण के झंझट का सरकार को ही सामना करना पडता । इसलिए , अनिल अग्रवाल फाउंडेशन ने प्रस्ताव तो विश्वविद्यालय का रखा लेकिन उसका अर्थ पूरी कोणार्क मार्ग पर एक बहुत बडा नया प्राईवेट शहर बसाना है जिसकी मिल्कीयत अग्रवालों के पास रहती । विश्वविद्यालय का नाम देने से एक और सुभीता भी है ।इस नए शहर के लिए शिक्षा के नाम पर सारी आधारभूत संरचना ओडिशा सरकार ही उपलब्ध करवा देगी । प्रस्तावित नया शहर अनिल अग्रवाल का होगा और उसे बसाने का खर्चा सरकार उठाएगी । जो भूमि अधिग्रहित की जा रही है उसमें साल मे ंतीन मौसम मंे खेती होती है । वह अत्यंत उपजाउ जमीन है । भूमि के अधिग्रहण से लगभग 50 हजार लोग उजड जाएंगे । उनके बसाने की सरकार के पास कोई योजना नहीं है । सरकार समझती है कि किसान को उसकी भूमि का मुआवजा भर देने से कर्तव्य की इतिश्री हो जाती है । एक व्यवसायी तो मुआवजे के पैसे नए स्थान पर अपना व्यवसाय शुरु कर सकता है लेकिन खेती करने वाला किसान जल्दी ही हाथ ही आए पैसे को गैर उत्पादक कामों में लगाकर भूखे मरने लगता है । किसान को जमीन के बदले जमीन चाहिए । लेकिन इस पर ओडिशा सरकार मौन है । उसे अनिल अग्रवाल के प्राईवेट विश्वविद्यालय को स्थापित कर देने की चिंता है । उसके लिए वह शदियांे से स्थापित किसानों को विस्थापित करने में भी नहीं झिझक रही ।
अनिल अग्रवाल इसको विश्वविद्यालय कहते हैं उनका कहना है कि इस विश्वविद्यालय में प्रत्येक वर्ष एक लाख छात्र भर्ती किए जाएंगे । विश्वविद्यालय के कोर्स आमतौर पर एक साल से लेकर 5 साल के बीच के होते हैं इस हिसाब से किसी भी समय छात्रांें की संख्या 3 से 4 लाख के बीच रहेगी ही । इन छात्रों को पढाने के लिए 20 हजार प्राध्यापक रखे जाएंगे और लगभग इतने ही गैर शिक्षक कर्मचारी । इसका अर्थ यह हुआ कि विश्वविद्यालय के नाम से चलाए जाने वाले इस नए शहर में लगभग 5 लाख की जनसंख्या होगी । नवीन पटनायक भी पढे लिखे प्राणी है और देश विदेश में भी घूमते रहते है । इतना तो वे भी जानते होंगे कि 5 लाख की जनसंख्या वाले स्थान शहर कहलाते हैं विश्वविद्यालय नहीं । अनिल अग्रवाल के अनुसार उनके इस नए विश्वविद्यालयी शहर को प्रतिदिन 11 करोड लीटर पानी चाहिए , 600 मेगावाट बिजली चाहिए , भुवनेश्वर हवाई अड्डे से लेकर इस नए शहर तक 4 लेन राष्ट्रीय राजमार्ग चाहिए और उनका यह भी कहना है िकइस राजमार्ग पर उनका संयुक्त स्वामित्व होगा । जमीन खरीदने पर लगने वाली स्टैम्प डयूटी और खरीद फरोख्त पर लगने वाले सभी प्रकार के टैक्सों से मुक्ती चाहिए और विश्वविद्यालय परिषर से 5 किलोमीटर की परिधि के भीतर किसी प्रकार का निर्माण कार्य प्रतिबंधित होना चाहिए । इस परिधि में लगभग 117 गांव और पूरी शहर आ जाता है । इसका अर्थ यह हुआ कि इन गांवों के लोगों की सम्पत्ति उनकी अपनी होते हुए भी अपनी नहीं रहेगी क्योंकि वे उस पर अपनी इच्छा से या अपनी जरुरत के मुताबिक किसी प्रकार का निर्माण कार्य नहीं करवा सकेंगे । यह लगभग इसी प्रकार की शर्तें है जैसी शर्तें कोई विजेता पार्टी पराजित पार्टी पर थोपती हैं ।
ओडिशा सरकार ने अनिल अग्रवाल की इस महत्वकांक्षी योजना को पूरा करने के लिए एमओयू हस्ताक्षरित हो जाने के एक मास के अंदर ही एक उच्चस्तरीय कोर कमेटी का गठन कर दिया जिसने 1 साल के भीतर ही 6 बैठकें करके भूमि अधिग्रहण का कार्य चालू कर दिया । अनिल अग्रवाल फाउंडेशन की नीयत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कोर कमेटी की बैठक में जब यह आपत्ति उठायी गयी कि कम्पनी अधिनियम की धारा 25 के अंतर्गत रजिस्टर्ड प्राईवेट कम्पनी के लिए राज्य सरकार किसानों की भूमि का अधिग्रहण नही ंकर सकती तो फाउंडेशन के प्रतिनिधि ने कोर कमेटी को यह गलत सूचना दे दी कि कम्पनी का स्टेटस बदल गया है और अब वह पब्लिक कम्पनी में परिवर्तित हो गयी है और आश्चर्य इस बात का है कि कोर कमेटी ने भी आंखें बंदकर उनकी इस सूचना को स्वीकार कर लिया । न तो इसके लिए कोई प्रमाण मांगा गया और न ही दिए गए प्रमाण की जांच की गयी । ताज्जुब तो इस बात का है कि इस तथाकथित विश्वविद्यालय के लिए अधिग्रहित की गयी भूमि में 1361 एकड जमीन भगवान जगन्नाथ मंदिर की भी है जिसे मंदिर अधिनियम के अंतर्गत किसी और को नहीं दिया जा सकता । हो सकता है नवीन पटनायक की भगवान जगन्नाथ में आस्था न हो लेकिन ओडिशा के करोडों लोग जगन्नाथ में आस्था रखते हैं । ओडिशा की संस्कृति जगन्नाथ की संस्कृति के नाम से ही जानी जाती है । जगन्नाथ की भूमि व्यवसायिक हितों के लिए देकर पटनायक ओडिशा की अस्मिता पर ही आधात कर रहे हैं । मुगल काल में और ब्रिटिश काल में मंदिरों के भूमि हडपने के सरकारी प्रयास होते रहते थे ।पटनायक ने ओडिशा में आज भी उसी परम्परा को जीवित रखा और जगन्नाथ मंदिर की आधारभूत अर्थव्यवस्था को कमजोर करने का प्रयास किया ।
परन्तु इन तमान विरोधों के बावजूद जुलाई 2009 में ओडिशा विधाानसभा ने वेदांत विश्वविद्यालय अधिनियम पारित कर दिया । इस बिल की सबसे हास्यास्पद बात यह है कि 5 लाख 40 हजार करोड रुपए से स्थापित होने वाले इस शिक्षा उद्योग के मालिकों से केवल 10 करोड रुपए की प्रतिभूति रखने के लिए कहा गया है । सरकार का कहना है कि यदि विश्वविद्यालय के मालिक सरकारी नियमांे को पालन नहीं करेंगे तो उनकी यह 10 करोड रुपए की जमानत राशि जब्त कर ली जाएगी । यह प्रत्यक्ष रुप से सरकार ने अग्रवाल फाउंडेशन को खुली छूट दे दी है िकवे नियमों को माने या न माने उन्हों डरने की जरुरत नहीं है । अधिनियम के अनुसार विश्वविद्यालय की 16 सदस्यों की प्रबंध समिति में 5 लोग सरकार के होंगे । दो विधानसभा के प्रतिनिधि और तीन राज्य सरकार के । इन पांचों में से भी फाउंडेशन अपनी इच्छा के लोग नियुक्त नहीं करवा लेगा इसकी कोई गारंटी नहीं है । जब फाउंडेशन ने सरकार की उच्चस्तरीय कोर कमेटी से वह सब कुछ नियमविरुद्ध करवा लिया जिसके लिए राज्य के लोकपाल ने सरकार को फटकार लगायी , तो इन 5 मे से कितने फाउंडेशन के पाल के ही नहीं होंगे -कौन कह सकता है ।
इस तथाकथित वेदांत विश्वविद्यालय के खिलाफ ओडीसा में ही 16 मामले न्यायालय में लंबित है लेकिन सरकार इससे किसी प्रकार से भी पूरा करने का हठ किए हुए है ।नवीन पटनायक सरकार के इस पूरे प्रकल्प मेंशुरु से ही मिलीभगत रही है यह तो ओडिशा के लोकपाल के आदेश से ही स्पष्ट हो गया था । जो उन्होंने 17 मार्च 2010 को पारित किया था जिसमें इस सारे मामले की जांच करवाए जाने का आदेश दिया था । लेकिन फाउंडेशन की गतिविधियों और उसकी नीयत का अंदाजा एक और घटना से भी लगता है । 16 अप्रैल 2010 को केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने फाउंडेशन को अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी किया लेकिन उसके एक मास के भीतर ही पर्यावरण मंत्रालय ने इस प्रकल्प को दिए गए अनापत्ति प्रमाण पत्र पर रोक लगाकर एक बार फिर फाउंडेशन व नवीन पटनायक को कटघरे में खडा कर दिया है । मंत्रालय ने कहा है -फाउंडेशन द्वारा की गयी अनियमितताओं , गैर कानूनी , अनैतिक एवं विधिविरुद्ध कृत्यों के आरोपों के चलते अनापत्ति प्रमाणपत्र पर रोक लगा दी गयी है ।’ अनिल अग्रवाल ,उनके फाउंडेशन और उनके इस प्रस्तावित तथाकथित विश्वविद्यालय को लेकर नवीन पटनायक इतनी जल्दी में क्यों है ?
अनिल अग्रवाल के इस प्रकल्प का एक और चिंताजनक पहलू है । कहा जाता है कि इसमें इंग्लैंड के चर्च का भी पैसा लगा हुआ है । ओडिशा मतंातरण के मामले में काफी संवेदनशील क्षेत्र रहा है । विदेशी मशीनरियां यहां सर्वाधिक सक्रिय हैं और विदेशों से अकूत धनराशि इन मिशनरियों के पास मतांतरण के कार्य के लिए आती रहती है । यहां तक कि पिछले दिनों चर्च ने मतांतरण का विरोध करने वाले स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या तक करवा दी थी , जिससे राज्य के जनजातीय क्षेत्रों में दंगे भडक उठे थे ।इंग्लैंड का चर्च आखिर इस प्रकल्प में किन स्वार्थो के कारण निवेश कर रहा है । ऐसा भी सुनने में आया है कि चर्च ने किन्हीं मतभेदांे के चलते अब इस प्रकल्प से अपना हाथ खीच लिया है । अनिल अग्रवाल फाउंडेशयन और चर्च के इन आपसी सम्बंधों की भी गहरी जांच होनी चाहिए ।
अनिल अग्रवाल का ओडिशा में एक बडा खदान साम्राज्य है उसी का विस्तार इस प्रस्तावित विश्वविद्यालय के माध्यम से होने जा रहा है । जिस जमीन का अधिग्रहण किया जा रहा है उसमें यूरेनियम और अन्य बहुमूल्य धातुओं के होने की बात कही जा रही है । विश्वविद्यालय के नाम से जैसा कि अग्रवाल ने स्वयं कहा है वे एक हजार बिस्तरों का अस्पताल बनवाएंगे । जाहिर है कि यह अस्पताल प्राईवेट क्षेत्रों में चल रहे अपोलो और एस्कार्ट अस्पतालों के तर्ज पर ही होगा लेकिन अनेक प्रकार की सुविधाओं को प्राप्त करने के लिए इस पर स्टीकर विश्वविद्यालय का लगा दिया जाएगा । विश्वविद्यालय गेस्ट हाउस के नाम पर पांच सितारा होटल बन सकते हैं और विद्यार्थियों को जरुरी चीजें मुहैया कराने के नाम पर विश्वविद्यालय में मॉल खोले जा सकते हैं । जैसा कि ओडिशा की एक सामाजिक कार्यकर्ता डॉ.जतिन मोहंती ने कहा है कि इस नए शहर में जिसकी जनसंख्या 5 लाख के आस पास होगी प्रतिदिन 11 करोड लीटर पानी की क्या जरुरत है । यदि एक व्यक्ति एक दिन में 80 लीटर पानी का भी प्रयोग भी करता है तो यह पानी 14 लाख लोगों के काम आ सकता है । मोहंती कहते है जाहिर है यह पानी विश्वविद्यालय के नाम पर बनने वाले आलीशान होटलों , आरामगाहों और विश्वविद्यालय द्वारा खेलों के विकास के नाम पर बनाए जाने वाले गोल्फकोर्सो के लिए प्रयोग किया जाएगा। ’’ विश्वविद्यालय पर सरकार का तो कोई नियंत्रण होगा नहीं । मनमानी फीस वसूलकर लूट खसूट का बाजार गरम होगा और जाहिर है ऐसे विश्वविद्यालय में ओडिशा के आम आदमी का बच्चा तो झांक भी नही ंसकेगा ।
वैश्वीकरण के इस दौर में पश्चिमी बंगाल सरकार ने टाटा काउद्योग स्थापित करने के लिए नंदीगा्रम के किसानों पर गोलियां चलवाई और ओडिशा में विश्वविद्यालय के नाम पर अनिल अग्रवाल का खदान साम्राज्य स्थापित करने के लिए राज्य सरकार हजारों हजार किसानों को बेघर करने पर तुली हुई है और राज्य के प्राकृतिक स्त्रोतों को लूट के लिए प्राईवेट हाथों मेें सौंप रही है । निश्चय ही इस लूट में कुछ हिस्सा उनका भी होगा ही जो निर्णय लेेने की क्षमता रखते हैं । अभी तक तो यही लगता है कि जब अनिल अग्रवाल और ओडिशा की आमजनता के बीच अपने -अपने हितों को लेकर टकराव होगा तो राज्य सरकार अनिल अग्रवाल फाउंडेशन के साथ खडी दिखाई देगी। लेकिन लोकतंत्र में आखिर लोकलाज भी कोई चीज होती है इसलिए , सरकार ने ढाल के तौर पर वेदांत विश्वविद्यालय को आगे किया हुआ है ।
(यह लेख डॉ कुलदीप चन्द्र अग्निहोत्री के हवाले से समन्वय नन्द ने भुवनेश्वर से प्रेषित किया है.)

Thursday, March 5, 2009

सूदखोर महाजनों के चंगुल में संताल परगना

- ग्‍लैडसन की विशेष रिपोर्ट -
दिशोम गुरू शिबू सोरेन और महाजनों का नाम संताल परगना के इतिहास में एक साथ विराजमान होगा। यह इसलिए कि यही महाजन सुदखोरों के खिलाफ लडते हुए गुरूजी ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत की थी और अंततः दो बार झारखण्ड की राजगद्दी पर बैठे। लेकिन चिंताजनक बात यह है कि आज भी महाजनी प्रथा संताल परगना में हावी है। यहां के संताल और पहाडया आदिवासियों को महाजनी प्रथा से मुक्ति नहीं मिली। आज आलम यह है कि आदिवासियों का एक भी गांव महाजनी प्रथा से मुक्त नहीं है और आदिवासी लोग मानसिक रूप से महाजनी प्रथा के गुलाम बन चुके हैं।
झारखण्ड के पाकुड जिलार्न्तगत महेशपुर प्रखण्ड स्थित दुमदुमी निवासी ४६ वर्शीय मारथा मूर्मु अपने गांव के ही महाजन से वर्श २००२ में ४ क्विंटल धान डेढाईया याने वार्शिक ५० प्रतिशत ब्याज के दर पर ली थी। मूलधन चुकाने के बाद भी आज कर्ज के रूप में उसे ३ क्विंटल धान महाजन को देना है। इसी तरह सुन्दर पहाडी प्रखण्ड के सोनाधोनी निवासी २० वर्शीय सुन्दरा पहाडया कर्ज में डूबकर अपनी मां के चंदी का जेवर के साथ अपना सबकुछ महाजन को सौंप चुका है। मारथा और सुन्दरा संताल परगना के प्रत्येक आदिवासी गाँव में विराजमान हैं। लेकिन कोई इसके खिलाफ बोलने को भी तैयार नहीं हैं।
दूसरी ओर महाजनों की चांदी है। महेशपुर प्रखण्ड के चक्काधर निवासी महाजन रामजी भगत महेशपुर एवं पाकुडया प्रखण्ड को अपने कब्जे में रखते हैं। वे प्रतिवर्श दो सौ क्विंटल धान कर्ज में लगाते ह। उनकी कई बैलगाडयां चलती हैं, जो मुख्यता कर्ज वसूली के समय धान की ढुलाई के लिए है। संताल परगना में इनके तरह कई महाजन मिलेंगे जो लोटा और लाठी लेकर गांवों में घुसे थे लेकिन महाजनी प्रथा ने उन्हें गांवों का सबसे ताकतवर व्यक्ति बना दिया है। आजकल महाजनी प्रथा में एक नया बदलाव देखने को मिल रहा है। दिक्कू महाजनों के खिलाफ लडने वाले कुछ आदिवासी भी उनका नकाल करते हुए सूदखोर महाजन बन गये हैं। महेशपुर प्रखण्ड के नोनबट्टा निवासी एस० किश्कू उनमें से एक हैं। वे प्रतिवर्श १०० क्विंटल धान कर्ज में लगाते हैं, जिससे उन्हें ५० क्विंटल मुनाफा मिलता है। इसके अलावा पैसा लगाते हैं वह अलग है।
यहां तीन तरह की महाजनी चलती है। इसमें ’’डेढाईया‘‘ सबसे ज्यादा प्रचलित है, जिसके तहत कर्ज का ब्याज ५० प्रतिशत प्रतिवर्श निर्धारित है। इसमें ज्यादातर अजान ही कर्ज में दिया जाता है। लेकिन खास बात यह है कि अगर कोई अपना कर्ज एक महिने के अन्दर भी चुकाना चाहता है तो उसे ५० प्रतिशत ब्याज देना पडेगा और अगर कोई एक साल बाद कर्ज नहीं चुका पाता है तो ब्याज अगले वर्श मूलधन में परिवर्तित हो जाता है। इसमें दूसरा है ’’सोटा‘‘ जिसमें व्याज सप्ताहिक १० प्रतिशत है। याने प्रतिमाह ४० प्रतिशत और वार्शिक ४८० प्रतिशत, जिसके तहत कर्ज में सिर्फ पैसा ही लगाया जाता है। महाजनी का तिसरा रूप ’’बानकी‘‘ कहलाता है, जो सबसे खतरनाक है। इसके तहत कर्ज के बदले महाजन के पास जेवर, जमीन व मवेशी रखा जाता है। इसमें सबसे मजेदार बात यह है कि जेवर, जमीन व मवेशी का कीमत सही मूल्य से ४०० फिसदी कम निर्धारित होता है तथा निर्धारित समय पर कर्ज वापस नहीं करने की स्थिति में जेवर, जमीन व मवेशी महाजन का हो जाता है। अधिकांश मामलों में कर्ज वापस नहीं होता है। इस तरह से समाज का एक बडा तबका कर्ज का जीवन जीता है और महाजन इसका लाभ उठाते ह तथा सत्ता सिर्फ मूकदर्शक बना रहता है।
ऐतिहासिक रूप से देखें तो संताल परगना बाबा मिलका मांझी एवं सिदो-कान्हो द्वारा अन्याय के खिलाफ विद्रोह हेतु प्रसिद्ध है। इस धरती ने महाजनों के खिलाफ लडने वाले शिबू सोरेन के अलावा साईमन मरांडी, थोमस हांसदा, स्टेफन मरांडी, हेमलाल मुर्मू जैसे कदावर नेता पैदा किया। लेकिन इन नेताओं ने सत्ता में रहते हुए महाजनी प्रथा के खिलाफ कोई ठोस कदम नहीं उठाया और न ही कोई कानून बनाया। फलस्वरूप महाजनी प्रथा संताल परगना के संस्कृति का हिस्सा बन गया है। यहां के लोग महाजनों को अपना दुःख का साथी मान बैठे हैं। सामाजिक कार्यकर्ता मनोज किश्कू कहते हैं कि जागरूकता का अभाव एवं बैंकों से लोन लेने हेतु कागजी दावपेंच लोगों को जरूरत के समय महाजनों के पास जाने हेतु मजबूर कर देता है।
संताल परगना में एन०जी०ओ० का भी भरमार है, जो लाखों रूपये का परियोजना प्राप्त करने हेतु महाजनी प्रथा के खिलाफ बडी-बडी बातें करते हैं। लेकिन वास्ताव में ये एन०जी०ओ० वृक्षारोपन, शौचालय निर्माण एवं सफाई जैसे परियोजनाओं की ठेकेदारी करते हैं। साथ ही साथ एन०जी०ओ० कार्यकर्ता गांवों में डियूटी बजाने का ही काम करते ह। उनके पास महाजनी प्रथा से ग्रामीणों को मुक्ति दिलाने की कोई ठोस योजना नहीं है। जबकि एक-एक गांव में कई एन०जी०ओ० कार्यरत हैं। उनमें एक बदलाव जरूर दिखाई देता है कि कभी साईकिल से चलने वाले एन०जी०ओ० कार्यकर्ता अब मोटर साईकिल और चार पहिया में घुमते हैं।
सबसे बडा सवाल यह है कि क्या दिशोम गुरू शिबू सोरेन महाजनी प्रथा को भूल गये या वोट की राजनीति के चलते सूदखोर महाजन ही उनके अपने हो गये? क्या महाजनी प्रथा से मुक्ति के बगैर संताल परगना का भला होगा? क्या गरीबों का खून चूसने वाले महाजनों के खिलाफ सत्ताधीश लोगों की नींद कभी खूलेगी? क्या संताल परगना को महाजनी प्रथा से कभी मुक्ति मिलेगी?
- ग्‍लैडसन डुंगडुंग एक स्‍वतंत्र पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं। - (साभार : न्यूजविंग.कॉम)

Saturday, September 13, 2008

छत्तीसगढ़ में जट्रोफा की फसल से लोग संकट में


छत्तीसगढ़ के ग्रामीण बकरंडा का उपयोग घर की सुरक्षा हेतु उसके चारो तरफ बाड़ लगाने के लिए करते रहे हैं। लेकिन इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि जिस बकरंडा का प्रयोग छत्तीसगढ़ के लोग घर की सुरक्षा के लिए करते थे, वही आज जट्रोफा बनकर उनके घर के उजड़ने का कारण बन रहा है, क्योंकि जट्रोफा प्रमोशन के नाम पर लोगों को उनकी जमीनों से बेदखल किया जा रहा है।

उमाशंकर मिश्र
'''जमीन, जिसको हम वर्षों से जोतते बोते रहे हैं और जो हमारी गुजर-बसर का सहारा रही है, आज उसे छोड़कर आखिर कहां हम जाएंगे'' बिलासपुर के कोटा ब्लॉक के गांव दैहारीपारा की रहने वाली आदिवासी महिला संतोषी सउता के इस प्रश्न का जवाब जब जिलाधिकारी और मुख्यमंत्री के पास नहीं मिला तो वह अपनी गुहार लेकर राजधानी दिल्ली आ पहुंची, कि जट्रोफा उत्पादन के नाम पर किस तरह से उनकी जमीनों को जबरन छीना जा रहा है। संतोषी के अलावा बिलासपुर के कोटा ब्लॉक के पंडरीपानी ग्राम निवासी धर्मसिंह की दास्तान भी इसी तरह की है। इन दोनों का कहना है कि वन अधिकारी जमीन छोड़ देने का दबाव डाल रहे हैं। वे बताते हैं कि जट्रोफा के उत्पादन के लिए जमीन खाली करने के लिए हमें नोटिस भी भेजे गए थे और यह भी कहा गया कि जमीन न खाली करने पर जेल भेज दिया जाएगा। संतोषी के मुताबिक कुछ और लोगों को भी ऐसे नोटिस भेजे गए हैं। दैहारीपारा बिलासपुर से करीब 70 किलोमीटर की दूरी पर बेलगहना की पहाड़ियों तथा जंगल के बीच में बसा छोटा सा गांव है। यहां अधिकतर लोग सउता जाति के हैं, जिनके जीवन यापन का मुख्य आधार वन्य-उत्पाद तथा कृषि है। पड़ोस के गांव मिट्ठुनवा के महित्रु सउता बताते हैं कि दैहारीपारा, ग्राम पंचायत 'उपका' का आश्रित ग्राम है और यहां 25 घर हैं। दैहारीपारा के झूलसिंह सउता बताते हैं कि ग्राम वन समिति के लोगों द्वारा हमारी फसल को चरवा दिया गया। वे कहते हैं कि जिन खेतों को चरवाया गया था, उन पर धान, ज्वार, अरहर, उड़द और कांदा प्याज की खेती की गई थी।
जब झूलसिंह से पूछा गया कि अब परिवार का गुजारा कैसे होगा तो वे असमंजस में पड़ जाते हैं, काफी सोचकर कहते हैं कि मजदूरी करेंगे और क्या कर सकते हैं! उल्लेखनीय है कि जट्रोफा को स्थानीय भाषा में 'बकरंडा' कहा जाता है, जिसमें औषधीय गुण विद्यमान होने की बात कही जाती है। ग्रामीण इस बकरंडा का उपयोग घर की सुरक्षा हेतु उसके चारो तरफ बाड़ लगाने के लिए करते रहे हैं। लेकिन इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि जिस बकरंडा का प्रयोग छत्तीसगढ़ के लोग घर की सुरक्षा के लिए करते थे, वही आज जट्रोफा बनकर उनके घर के उजड़ने का कारण बन रहा है।
कोरबा जिले के पसान ब्लॉक में तैनात वन अधिकारी आरएस मरकाम कहते हैं कि वनभूमि पर अनाधिकृत रूप से काबिज लोगों को नोटिस भेजा जाना विभाग की कार्य-प्रक्रिया का हिस्सा है। इन सबके बीच सवाल उठता है कि क्या उन लोगों के साथ भी अतिक्रमणकारियों की तरह ही व्यवहार किया जाएगा, जो वर्षो से उस जमीन पर रहकर जीवन यापन के संसाधन के तौर पर उपयोग करते रहे हैं। वनभूमि में वर्षों से आदिवासी रहते रहे हैं, हालांकि उनके साथ पट्टे की समस्या रही है, जिसे वनाधिकार अधिनियम 2005 के माध्यम से दूर करने का प्रयास किया गया है। इस अधिनियम के आ जाने से 13 दिसंबर 2005 के पूर्व तक काबिज आदिवासियों को पट्टा दिये जाने की बात कही जा रही है।
छत्तीसगढ़ को आदिवासियों एवं दलित बहुल जनसंख्या के लिए जाना जाता है। यहां 3113 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति तथा 2232 प्रतिशत अनुसूचित जाति के लोग हैं। बैगा, कोरबा, कमार, पाहाड़ी, भुंजिया, बिरहोर और मरिया प्रमुख जनजातियां हैं। उल्लेखनीय है कि संयुक्त संसदीय समिति ने 24 अक्टूबर 1980 की बजाय 13 दिसंबर 2005 के पूर्व तक वनभूमि में रहने वाले आदिवासियों को पट्टा देने की सिफारिश की थी। प्रदेश सरकारों पर आरोप लगाया जा रहा है कि, 1980 के बाद काबिज लोगों को वे पट्टा नहीं देना चाहती, इसीलिए जट्रोफा प्रमोशन की आड़ में लोगों को उजाड़ा जा रहा है। दूसरी ओर वन विभाग इस आशंका से भी ग्रस्त जान पड़ता है कि यदि भविष्य में जटोफा उत्पादन की मुहिम जोर पकड़ने लगी तो, इसकी देखरेख के लिए बनाई जाने वाली पृथक सोसायटी के अधीन यह सारी वनभूमि चली जाएगी। विभाग अपनी भूमि को गंवाने की आशंका से वनभूमि पर जटोफा के रोपण की इजाजत नहीं देना चाहता। जबकि संतोषी और धर्मसिंह जैसे लोगों को शिकार बनाया जा रहा है।
ग्रामसभा के अंतर्गत सार्वजनिक जमीनें या कमांड लेंड जिस पर समुदाय का अधिकार होता है, आज विवाद का विषय बनती जा रही हैं। जबकि सैकड़ों वर्षों से लोग वहां काबिज रहकर स्थानीय संसाधनों की मदद से जीवन यापन करते रहे हैं। वैसे भी पंचायत एक्ट -- द एक्सटेंशन टू शिडयूल्ड एरिया 1996, के मुताबिक आदिवासियों को यह सुनिश्चित करने का अधिकार होना चाहिए कि गांव की सार्वजनिक भूमि का वे किस प्रकार उपयोग करें। जबकि छत्तीसगढ़ एवं राजस्थान सरकारेंऋ गांव की सार्वजनिक जमीन को वेस्टलैण्ड मानती हैं। इसी आधार पर इस जमीन पर जट्रोफा उत्पादन की वकालत की जा रही है। 'रिसर्च फांउडेशन फॉर साइंस, टेक्नॉलजी एण्ड एन्वायरमेंट' ने राजस्थान, विदर्भ और छत्तीसगढ़ में बायोयूल प्रमोशन के कारण स्थानीय समुदायों एवं पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों के अध्ययन में पाया है, कि जट्रोफा प्रमोशन के कारण 'ग्रामीणों की जमीन लिए जाने, आदिवासी अधिकार-हनन, बायोडाइवर्सिटी को नुक्सान और इन सबके कारण खाद्य उत्पादों के दामों में वृद्धि हो रही है।
फांउडेशन के अनुसंधानकर्ता मनुशंकर बताते हैं कि 'छत्तीसगढ़ में जट्रोफा रोपण के लिए आदिवासियों की फसलों को नष्ट कर दिया गया। आदिवासियों को उनके गांव की सार्वजनिक भूमि के उपयोग के अधिकार से भी बेदखल किया गयाऋ जो पंचायत एक्ट के उल्लंघन का मामला बनता है।' वे बताते हैं कि आदिवासी अब इस खतरे के चलते जट्रोफा का विरोध करने लगे हैं।
विवाद के स्वर छत्तीसगढ़ तक ही सीमित नहीं है, बल्कि राजस्थान और उड़ीसा से भी गूंज सुनाई देने लगी है। राजस्थान में बायोईंधन प्रमोशन के चलते ग्रामीण सार्वजनिक भूमि एवं चरागाहों के नष्ट होने की बात कही जा रही है। उल्लेखनीय है कि अंग्रजों के समय से चले आ रहे कानूनों में इस तरह की भूमि को वेस्टलैण्ड की संज्ञा दी गई है। 7 मई 2007 को 'राजस्थान लैण्ड रिवेन्यु रूल्स 2007' बनाया गया।
इस नियम के अंतर्गत 1000 हेक्टेयर से 5000 हेक्टेयर भूमि को, जिसे राज्य के मुताबिक वेस्टलैण्ड माना जाता हैऋ 20 वर्षों के लिए ग्रामीण समुदाय से लेकर बायोयूल इंडस्ट्री को ट्रांसफर किया जाना सुनिश्चित कर दिया गया। उदयपुर की मावली तहसील के कुंचोली गांव निवासी हरीराम गुर्जर और माला मागरा की जमनीबाई भील को कुछ समय पूर्व उनकी जमीन से बेदखल कर दिया गया। अजब विरोधाभास है कि उसी जमीन को गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों को जट्रोफा उत्पादन के लिए दिया जा रहा है। सामाजिक कार्यकर्ताओं की मानें तो आज दलित और आदिवासी समुदाय राजस्थान टेनेन्सी एक्ट में संशोधन के प्रस्ताव से भी व्यथित हैं, क्योंकि इससे अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों की जमीनों को अन्य लोगों को बेचे जाने का रास्ता साफ हो जाएगा। इस घटनाक्रम को जट्रोफा प्रमोशन की मुहिम का हिस्सा बताया जा रहा है। सामाजिक कार्यकर्ता सवाई सिंह के अनुसार 'राजस्थान के एक वृहद् हिस्से में लोगों के परामर्श के बिना, बड़े पैमाने पर जट्रोफा प्रमोशन का कार्य किया जा रहा है।'
राजस्थान में 194 मिलियन हेक्टेयर सार्वजनिक चरागाह भूमि है, जबकि कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 70 प्रतिशत हिस्सा सार्वजनिक भूमि के अंतर्गत माना जाता है।
जट्रोफा उत्पादन से ग्रामीणों के सार्वजनिक भूमि के उपयोग के वर्षों से चले आ रहे अधिकार को नुक्सान पहुंचेगा। राजस्थान जैसे राज्य में पशुधन लोगों के जीवन यापन का मुख्य साधन माना जाता है। पशुओं के चराने का स्थान छिन जाने से उनका जीवन प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाएगा। जट्रोफा की खेती से बायोडाइर्सिटी में बदलाव की बात मानें तो इससे ग्रामीण एग्रो-सिस्टम को इंडस्ट्री द्वारा बायोयूल उत्पादन के लिए बदल देने से स्थानीय पर्यावरण में परिवर्तन हो सकता है।
जट्रोफा उत्पादन में कंपनियों की धोखाधड़ी का नमूना उड़ीसा में देखने को मिला है। बलांगीर जिले के पटनागढ़ सब-डिवीजन के तीन गांवों घूमर, घुंघुटीपाली और जलपाली के किसानों की भूमि को दिल्ली की 'ताज गैस लिमिटेड'कंपनी द्वारा छीने जाने का आरोप है। बाद में जब मामला तूल पकड़ने लगा तो रिवेन्यु डिविजनल कमिश्नर मधुसूदन पढ़ी की देखरेख में जांच का कार्य शुरु किया गया। स्थिति का जायजा लेने के लिए जब आरडीसी ने इन गांवों का दौरा किया तो पाया कि भूमि के एक बड़े हिस्से को कंपनी द्वारा धोखे से हड़प लिया गया था। धोखाधड़ी भी कुछ इस तरीके से की गई थी कि जमीनों को पुन: किसानों को दिलाना टेड़ी खीर होगा।
जुलाई 2007 में पेरिस में सम्पन्न हुई 'सब्सिडियरी बॉडी ऑन सांइटिफिक, टेक्निकल एडवाईज' की बैठक में भी 'नार्वे, स्वीडन, जर्मनी और इंडोनेशिया समेत विश्व की अनेक सरकारों ने वृहद् पैमाने पर किए जा रहे बायोयूल के उत्पादन के कारणऋ जंगलो, पारीस्थितिक तंत्र और स्थानीय समुदायों पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की थी।' हालांकि छत्तीसगढ़ प्लानिंग बोर्ड के उपाध्यक्ष दीनानाथ तिवारी के मुताबिक 'जट्रोफा उत्पादन के कार्यक्रम से प्रदेश उर्जा सुरक्षा में आगे बढ़ेगा और वर्ष 2012 तक इससे गरीबों के जीवन स्तर को उूंंचा उठाने में मदद मिलेगी।' इंकार नहीं किया जा सकता कि यदि जट्रोफा से भारत की उर्जा संबंधी जरूरतें पूरी होने लगेंगी, तो बहुत बड़ी रकम देश के विकास के काम आ सकेगी। लेकिन इसके लिए क्या उन आदिवासियों को उनकी जमीन से हटाया जाना सही ठहराया जा सकता है, जिस पर वे वर्षो से रहकर अपना जीवन यापन करते रहे हैं। हालांकि डॉ संकेत ठाकुर जैसे जानकार इस बात से इंकार करते हैं कि छत्तीसगढ़ में प्राईवेट भूमि पर जट्रोफा लगाना सरकार की नीतियों में शामिल है। वे यह भी बताते हैं कि यहां पर निजी कंपनियों को इस काम के लिए ठेका न देकर स्वयं सरकार द्वारा ही जट्रोफा रोपण का कार्य किया जा रहा है। डॉ ठाकुर कहते हैं कि ये जो लोग विरोध करते हैं, या तो वे अज्ञानी हैं अथवा बहुत ही होशियार हैं। वे कहते हैं कि विरोध तो किया जा रहा है, लेकिन कोई विकल्प क्यों नहीं सुझाया जाताऋ जबकि बायोयूल के ढेरों विकल्प मौजूद हैं। वहीं नवदान्य की अध्यक्ष डॉ वंदना शिवा 'जट्रोफा रोपण की अंधी दौड़ को पारीस्थितिकीय, आर्थिक और सामाजिक संकट' बताती हैं।
ठेकेदार, सरकार, गैर-सरकारी संगठन एवं वन विभाग अपने तरीके से जट्रोफा और जमीन की उठापटक में लगे हैं। लेकिन इन सबके बीच क्या जनसरोकार सुरक्षित रहेंगे, या एक बार फिर आदिवासी शातिर लोगों की चाल का शिकार बनकर रह जाएंगे।

इंडिया फांउडेशन फॉर रूरल डेव्लपमेंट स्टडीज
रूम नं 406, 49-50 रेड रोज बिल्डिंग
नेहरू प्लेस, नई दिल्ली-११००१९
(किसी को उजास से सामग्री उठाने के के लिए अनुमति आवश्यक नहीं है, लेकिन स्रोत का यदि उल्लेख रहेगा तो अच्छा लगेगा। प्रस्तुत स्टोरी सोपान स्टेप पत्रिका में प्रकाशित है, जिसे 'मेरी ख़बर' ( http://merikhabar.com/fullstory.aspx?storyid=452#)ने अपना स्वत्वाधिकार बताकर पुनर्प्रकाशित किया है.)

Friday, January 11, 2008

आदिवासियों से सीखें नारी सशक्तीकरण

दिल्ली [आशुतोष शुकल]। कल्पना करें एक ऐसे समाज की, जिसमें घर की बुजुर्ग महिला की मृत्यु के बाद घड़े में उसकी अस्थियां रखी जाती हैं। स्त्री को 'हितदेवी' का दर्जा देकर परिजन अस्थियों वाला कुम्भ घर में ही स्थापित कर देते हैं। अब यह देवी उसी तरह परिवार पर कृपा करेंगी, जैसे जीवित रहते करती थीं।
यह कल्पना नहीं, हकीकत है। नारी सशक्तीकरण के शोर और तमाम सरकारी आयोजनों के बीच देश के 12 करोड़ आदिवासियों के समाज में स्त्री बिना किसी आडंबर व प्रपंच के जिस तरह सदियों से परिवार की कर्ता है, वह सभ्य समाज के लिए कौतुक भी हो सकता है और अनुकरणीय भी। दिल्ली में हाल ही में खत्म हुआ आदिवासी सम्मेलन ऐसी कई जानकारियों से भरपूर था। जिस समाज को अशिक्षित और पिछड़ा कहकर शहरों में उसे सुधारने की योजनाएं बनती और वहीं परवान चढ़ जाती हैं, वहां स्त्री का व्यक्तित्व दबा हुआ नहीं है।
इस समाज में शादी से पहले भावी वर को लड़की के घर में छह महीने 'इंटर्नशिप' करनी होती है। वह चाहे मजदूरी करे, लेकिन उसे पर्याप्त कमा कर लड़की के पिता को यह भरोसा दिलाना होता है कि वह उसकी बेटी का भरण-पोषण कर सकता है। वहां दहेज नहीं, स्त्री के उत्पीड़न का प्रश्न नहीं। स्त्री विधवा हुई, तो परिवार के बाहर विवाह कर पति को पुराने पति के घर ला सकती है।
गुजरात के आदिवासी कवि कांजी भाई पटेल और भीलों के महाभारत को लिपिबद्ध करने वाले आदिवासी अकादमी, वड़ोदरा के निदेशक डा. भगवानदास पटेल आदिवासी समाज को समतामूलक बताते हैं। उनके मुताबिक साबरकांठा जिले के डोंगरी भीलों के महाभारत में जुआ तो है, लेकिन उसमें द्रौपदी का चीरहरण नहीं होता। वहां कुंती और द्रौपदी का ओजस्वी चित्रण है। उनकी सलाह के बिना घर में पत्ता नहीं हिलता। आदिवासी नहीं मानते कि महाभारत का युद्ध द्रौपदी के कारण हुआ। शहरवासी क्या विश्वास करेंगे कि भादो में जब 'भीलों की भारथा ' का मंचन होता है, तब गुरु के स्थान पर गृहस्वामिनी की स्थापना होती है और उनकी सशरीर पूजा होती है। भीलों के रामायण में सीता न अग्निपरीक्षा देती हैं और न धरती में समाने को विवश हैं।
कांजीलाल पटेल और महाराष्ट्र के वाहरु सोनवणे हों या उत्तर प्रदेश के गारु चिंचले, वे मानते हैं कि भौतिक अर्थो में पिछड़े आदिवासी सामाजिक दृष्टि से आगे हैं। यहां आज भी मातृसत्ता है। उनके मुताबिक उत्तर प्रदेश और राजस्थान के सहरिया, बिहार व बंगाल के मुंडा हों या मदारी जैसे घुमंतू समाज, सभी जगह स्त्री बिना किसी घोषणा के प्रधान है। अगर हिंदी प्रदेशों में बहुधा दिखने वाली घुमंतू जाति नटों पर दृष्टि डाली जाए, तो उनमें शादी के लिए लड़के के साथ जाने वाले पड़ोसी घर से खाना लेकर जाते हैं, ताकि लड़की के पिता पर भार न पड़े।
साभार : दैनिक जागरण Jan 11, 2008