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Friday, February 27, 2009

आंचलिक पत्राकारिता की ताकत : खबर लहरिया

डॉ स्मिता मिश्र
किसी देश के समग्र विकास में जनसंचार माध्यमों की अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका होती है। भारत के सन्दर्भ में ये माध्यम और अधिक महत्वपूर्ण हो उठते है। हमारी दो-तिहाई मानवीय पूंजी ग्रामीण भारत से ही सम्बद्ध है, जो कि आज भी ज्ञान तथा सूचना से वंचित है। विडम्बना यह है कि सरकार उनके लिये जितनी योजनाएं तथा नीतियां बनाती हैं उनकी जानकारी उन तक ही नहीं पहुंच पाती। यदि पहुंचती भी है तो आधी अधूरी। गाँव में संचार-रिक्तता की स्थिति हैं। इसी प्रकार कृषि अनुसंधनों या योजनाओं के क्रियान्वयन की प्रतिपुष्टि भी यहां से नहीं जा पाती। होता यह है कि प्रतिपुष्टि के अभाव में महानगर में बैठे नीति-नियामकों को उसकी जानकारी नहीं मिल पाती और विकास प्रक्रिया की पूरी कवायद की सार्थकता पर प्रश्नचिंह लग जाता है। इस संचार रिक्तता को आंचलिक पत्राकारिता ही दूर कर सकती है। क्योंकि अंचलों से निकलने वाली पत्र-पत्रिकाएँ समाचार-पत्र उस क्षेत्र-विशेष की भाषा और जरूरत को समझते हैं तथा स्थानीय लोग भी ऐसे माध्यमों से जुड़ाव महसूस करते हैं।आज बड़े-बड़े नामों वाली बहुत चमक-ध्मक और ग्लैमर वाली पत्राकारिता का जोर है। ऐसे में मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे चित्राकूट जनपद के कर्वी गाँव से निकलने वाले अखबार `खबर-लहरिया´ की उपस्थिति आश्चर्य के रूप में सामने आती है। प्रतििष्ठत `चमेली देवी´ पुरस्कार से सम्मानित इस अखबार को जनपद की नौ नवसाक्षर महिलाओं ने लगभग चार साल पहले शुरू किया। हालांकि इससे जुड़ी महिलाओं के पास पत्राकारिता की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं है। यह अखबार महिला सशक्तीकरण का अद्भुत उदाहरण है। ऐसा सशक्तीकरण जो सरकारी योजनाओं के अन्तर्गत नहीं हुआ है बल्कि गाँव की पिछड़ी और दलित महिलाओं ने `निरन्तर´ ट्रस्ट द्वारा प्रेरित किये जाने पर अपने कंधें पर यह दायित्व लिया और उसे बखूबी पूरा कर रही हैं।आज बाजार, राजनीति, अपराध्, सिनेमा और क्रिकेट के ग्लैमर को ही तवज्जो देना पत्राकारिता का मुख्य लक्ष्य हो गया है। ऐसे में आम आदमी खासतौर पर गाँव या पिछड़े इलाके में रह रहे आदमी के विकास का मुद्दा पीछे छूटा जा रहा है। ऐसे समय में `खबर लहरिया´ जैसे आंचलिक समाचार-पत्रा आशा की किरण के रूप में सामने आते हैं। बुंदेली भाषा में प्रकाशित इस समाचार-पत्रा की संपादिका मीरा देवी संघर्ष के दिनों को याद करते हुए बताती हैं कि प्रारम्भ में संवाददाताओं (मिथिलेश, दुर्गा, सोनिया, शकीला, मीरा, कविता, शांति, मंजूद्ध को कोई भी सूचना या समाचार हासिल करने में बहुत समस्या आती थी। महिला होने के कारण लोग गम्भीरता से नहीं लेते थे। सरकारी महकमों के लोग परेशान करते थे। पिफर भी वे हिम्मत न हारते हुए जनपद की समस्याओं विकास की बाधओं और महिला मुद्दों को बहुत बेबाकी से प्रस्तुत करते रहीं जिसके पफलस्वरूप प्रतििष्ठत `चमेली देवी´ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। शाहिर सी बात है कि स्थानीय लोगों की आवाज उन्हीं की भाषा में जब इस अखबार ने उठाई तो वह अपनी सामान्यता में ही असामान्य हो गया। इतने कम समय में इस आठ पृष्ठीय अखबार ने कई उपलिब्ध्यां हासिल की। जैसे इस अखबार की संवाददाता मिथिलेश को हन्ना गाँव की सड़क बनवाने का श्रेय जाता है। हन्ना गाँव में सड़क कापफी पहले बन गई थी, लेकिन सिर्पफ सरकारी कागजों पर। मिथिलेश ने जब सारी छानबीन कर इसकी रिपोर्ट `खबर लहरिया´ में छापी तो जिला मैजिस्ट्रेट ने सारी जाँच कराई और कागजी सड़क को हकीकत में बदल दिया। इसी प्रकार सूचना के अिध्कार से ग्रामीणों के जीवन में सम्भावित परिवर्तनों को भी मीरा देवी ने अपने सम्पादकीय में लक्षित किया। तमाम सरकारी योजनाओं की घोषणा की खबरें समय-समय पर इस अखबार में छपती रहती है। और इन सूचनाओं को ही ताकत बनाकर गाँव का आदमी अपने हक की लड़ाई लड़ने लगा है। जैसे मुख्यमंत्राी योजना में गरीब राशनकार्डधरियों का सरकारी अस्पताल में मुफ्रत इलाज का प्रावधन रखा गया। जब यह सूचना अख़्ाबार ने छापी तो अनेक ग्रामीण राशनकार्ड लेकर अस्पताल में पहुंचे। डॉक्टरों ने कहा कि ऐसी कोई योजना नहीं है तो ग्रामीणों ने झट से कहा कि योजना है, हमने `खबर लहरिया´ में पढ़ा है।अखबार से जुड़ी सभी महिलाएं रोजाना अपने घरेलू काम-काज निपटाने के बाद सूचना एकत्राीकरण पर निकलती है। महीने में दो बार पूरे समूह की सभा होती है। जिसमें एकत्रा सूचनाओं की छंटनी होती है। पृष्ठों के आधर पर समाचार तय किये जाते हैं। पिफर समाचार-पत्रा का खाका बनता है। प्रथम पृष्ठ पर चित्राकूट या प्रदेश से सम्बंिध्त किसी महत्वपूर्ण समाचार को स्थान दिया जाता है। दूसरे पृष्ठ पर `देश-विदेश´ शीर्षक के अन्तर्गत देश-दुनिया की महत्वपूर्ण हलचलों पर भी नशर रखी जाती है। तीसरे पृष्ठ `विकास´ पर गाँव के विकास सम्बन्ध्ी मुद्दों को स्थान दिया जाता है। `महिला मुद्दा´ पृष्ठ पर महिलाओं की समस्याओं उनकी पीड़ा को अभिव्यक्ति दी जाती है। `पंचायत´ पृष्ठ पर सरकारी योजनाओं/नीतियों की सूचना, उनके क्रियान्वयन में की जा रही घपलेबाजी को उजागर किया जाता है। अंतिम पृष्ठ पर `सम्पादकीय´ तथा `पाठकों के पत्रा´ छापे जाते हैं।इस अखबार की संवाददाताओं को प्रशिक्षण देने के लिये समय-समय पर आयोजित कार्यशालाओं में भेजा जाता है। साथ ही इनकी राजनीतिक समझ विकसित करने के लिये `निरन्तर´ एन।जी.ओ., दिल्ली से विशेषज्ञ आते हैं। साथ ही राजनीतिक समाचारों द्वारा भी ये महिलाएं अपनी राजनीतिक समझ विकसित करती हैं। अखबार की बढ़ती लोकप्रियता के चलते सम्पादिका मीरा देवी इसका विस्तार करने की इच्छुक हैं। बांदा जिले से भी इसके प्रकाशन की योजना बन रही है। साथ ही इसे पाक्षिक से साप्ताहिक करने की भी योजना है ताकि अिध्क से अिध्क क्षेत्रा और अिध्क से अिध्क समाचारों को समाहित किया जा सकें।जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि आज की पत्राकारिता केवल अपराध् की सनसनीखेज पत्राकारिता बन कर रह गई है। बड़े अखबार सनसनी पैफलाने के ही काम में लगे हुए हैं। आदमी को आदमी से जोड़ने वाली खबरों की आजकल बेहद कमी है। इन आंचलिक अखबारों में ये ताकत है कि वे छूटी हुई खबरों को खबर बना सकते हैं क्योंकि आज का पाठक कूट घटनाओं का समाचार पढ़ देख कर ऊब गया है। खबर लहरिया में अक्सर आंचलिक प्रतिभाओं का `बातचीत´ कॉलम में इंटरव्यू लिया जाता है। जैसे जून 2006 अंक में बांदा जिले के बड़ोखर गाँव के जादूगर बुद्ध विलास से बातचीत की गयी। सम्पादकीय टिप्पणी में भी जिस तरह बेबाक शैली का प्रयोग किया जाता है वह शैली बड़े-बड़े अखबारों में द्रष्टव्य नहीं होती है। जैसे खबर लहरिया समूह कइती से सबहिन का नमस्ते। सरकार किसानन के विकास का िढंढोरा पीटत हवै अउर दूसर कइत किसानन के पेट मा लात मारत हवै। चित्राकूट जिला की ज्यादातर नहर सुखान परी हवै। ...सरकार आपन बड़ाई करत हवै। कहते हवै फ्या साल पूर देश मा बहुतै नीक पफसल भे हवै। यहै कारन सबै किसान खुशी हवै।य् इ बात मुलायम सिंह यादव कुरसी मा बइठे बइठे कहते हवै। का कतौ सरकार किसानन से उनके खुशी के बात पूछत हवै?इसी तरह `सूचना का अिध्कार´ कानून लागू होने पर प्रथम पृष्ठ का शीर्षक था µ `आ गा सूचना का अिध्कार´ अब मड़ई सरकारी आपिफस, सरकारी अस्पताल, ब्लॉक, पंचायत, पुलिस चौकी अउर दूसर सरकारी विभागन से सूचना लइ सकत हवैं। अब सरकारी अिध्कारी सूचना दे मा आनाकानी न करिहैं। काहे से सूचना न दे मा उनका जुर्माना दे का पड़ी।अखबार के नाम पर विचार करें तो पायेंगे कि `खबर लहरिया´ नाम द्योतक है समाचारों के अनवरत प्रवाह का। लहरिया कह देने से बुंदेलखंड की आंचलिक महक भर जाती है। एक ऐसा नाम जिसमें विज्ञापनों की भ्रामक दुनिया नहीं है, पेज-थ्री का ग्लैमर नहीं, एक दूसरे से मच रही अखबारों की गला काट प्रतियोगिता नहीं। जिसमें है तो हाशिये पर खड़े इंसान की आवाश, जिसमें है सदियों से दबी औरत की अभिव्यक्ति। इसलिये `खबर लहरिया´ नाम लेते ही अपने आसपास सुख-दु:ख बाँटने वाला कोई आत्मीय साथी ध्यान में आ जाता है। यही इसकी पहचान भी है और यही इसकी सार्थकता भी।
(डॉ स्मिता मिश्र दिल्ली विश्विद्यालय में व्याख्याता के तौर पर कार्यरत हैं और मीडिया और इससे जुड़े विषयों से से सीधा सरोकार रखती हैं। पत्रकारों की कई पीढियों को कलम पकड़ने की सीख दे चुकी स्मिता मिश्र की मिडिया पर कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। हाल ही में भारतेंदु हरिश्चद्र पुरस्कार से आपको नवाजा गया है। देश भर में भ्रमण कर ख़बर लहरिया जैसे ढेरों अनुभव बटोरे हैं स्मिता जी ने।)

Sunday, February 22, 2009

अब हम घोषित स्लमडॉग हैं

स्लमडॉग को ऑस्कर मिला, जबकि निदेशक गैर भारतीय था. इससे पहले भी बेहतर फिल्में ऑस्कर के लिए गई है. लेकिन उनमे भारत की ताकत और पारम्परिक पहचान का प्रतीकात्मक चित्रण किया गया था. सवाल है कि मदर इंडिया और लगान जैसी फिल्में क्यों ऑस्कर नही प्राप्त कर सकी? कारण साफ़ है कि पाश्चात्य विकसित देशों ने भारत की उपलब्धियों और चिंतन को सदैव नजरअंदाज किया है. हालाँकि इसके पीछे उनका डर भी है की भारत कहीं उन्हें पछाड़ कर कहीं आगे न निकल जाए. हमने बेहतर फिल्म दी लेकिन ऑस्कर कभी नहीं मिला था, लेकिन आज जब किसी दूसरे देश के फिल्मकारों ने मुम्बई कि धारावी पर आधारित फ़िल्म के माध्यम से भारत की गरीबी पर फ़िल्म बनाकर पूरी दुनिया को यह बताने की कोशिश की कि यह देश अपनी उपलब्धियों से कहीं अधिक स्लमडॉग है, तो हमें ऑस्कर कि मार्फ़त पूरी दुनिया में प्रमाण पत्र मिल गया. अब हम घोषित तौर पर स्लमडॉग हैं. एकदम ''डर्टी और प्रमाणित स्लमडॉग मिलिनायर''. गौर करने वाली बात है कि हम करोड़पति भी तो हैं, लेकिन स्लम्स के मामले में, जनसँख्या में या फ़िर धन के मामले यह स्पष्ट नहीं किया गया है इस प्रमाणपत्र में. यह तो understood है. और इसी बात को स्थापित करने का प्रयास किया गया है कि भारत अब एक 'घोषित स्लमडॉग' है. लेकिन हम इस पर खुस हो रहे हैं कि हमें कुत्ता होने का अमेरिका ने अब सर्टिफिकेट दे दिया है. आप सब मित्रों कि प्रतिक्रिया आमंत्रित है....

Thursday, January 29, 2009

सूचना युग में इन्टरनेट

वर्तमान सूचना युग में इन्टरनेट एक क्रांतिकारी संचार मध्यम साबित हो रहा है. इसकी संभावनाएं बहुत अधिक हैं क्योंकि आने वाले समय जैसे भौतिक साधनों का विकास होता रहेगा तो टेलीविजन और समाचार पत्र जैसे जन माध्यमों पर लोगों की निर्भरता भी कम होने लगेगी. क्योंकि अव्यस्त होते हुए भी कल+युग के प्रभाव से मानव बच नहीं पायेगा. ऐसे में यह सुविधाभोगी प्राणी अपने हिसाब से देश और दुनिया के बारे में जानना चाहेगा. वह किसी निर्धारित समय पर ही फलां टीवी चैनल पर कोई न्यूज बुलेटिन अथवा मनोरंजनात्मक कार्यक्रम देखने की बाध्यता से ऐसी स्थिति में निजात पाना चाहेगा. वह कार्यक्रम का आनंद तो जरुर उठाना चाहेगा लेकिन टीवी चैनल द्वारा निर्धारित किए गए समय के मुताबिक नहीं, बल्कि अपने समय के मुताबिक. हालाँकि इसकी न्यूनाधिक तैयारी टेलीविजन ने कर ली और किसी कार्यक्रम को उन्नत टेलीविजन तकनीक के मध्यम से सेव करके रखा जा सकता है. लेकिन इस सेव करने तक के झंझट से भी इंसान अब मुक्ति चाहता है. सब कुछ रेडीमेड चाहिए अब तो. सूचना के साथ भी कुछ ऐसा ही आगामी दशक में होने जा रहा है. सूचना प्रसारण के जो भी प्रचलित तौर तरीके एवं मध्यम चलन में हैं, उनमे से इंटरनेट की उपयोगिता रेडिमेड हासिल करने के लिहाज से सबसे ऊपर रहने वाली है. युट्यूब और गूगल सर्च ने इसका आगाज काफी पहले ही कर दिया है.
आने वाले समय में इंटरनेट पर हिन्दी का प्रसार बढेगा इस बात की संभावनाएं नजर आ रही हैं. हिन्दीभाषी भी ज्ञानवर्धक जानकारियां अपनी भाषा में देखना और पढ़ना चाहते हैं. लेकिन इन्टरनेट पर अभी हिन्दी को अपना प्रभाव जमाने के लिए काफ़ी कुछ करना होगा.

Saturday, August 30, 2008

सूचना क्रांति और सशक्त ग्रामीण


अजय कुमार

Auद्दust 21, 2008

दृष्टिकोण। अकसर गांव के लोगों को जाति या जन्म प्रमाण-पत्र हासिल करने के लिए सैकड़ों किलोमीटर तक की यात्रा करना पड़ती है। इस कवायद में महज एक प्रमाण-पत्र प्राप्त करने के लिए उनका पूरा दिन बर्बाद हो जाता है।
उन्हें भू-अभिलेख (लैंड रिकॉर्ड) की एक प्रति हासिल करने के लिए पटवारियों के कई-कई दिन तक चक्कर काटने पड़ते हैं। यहां तक कि टेलीफोन या बिजली विभाग में शिकायत करना भी काफी मशक्कत का काम होता है। एफआईआर दर्ज करने की तो बात ही न की जाए तो बेहतर रहेगा।
सूचनाओं को अविलंब व न्यूनतम लागत पर लोगों को उपलब्ध करवाना शासन की जिम्मेदारी मानी जाती है। सरकारी क्षेत्रों में सूचना प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल कर इस अवधारणा को यथार्थ के धरातल पर उतारने के कई प्रयास किए गए हैं। इसे आजकल ई-प्रशासन (ई-गवर्नेस) के नाम से जाना जाता है।
भारतीय जनता ई-प्रशासन के लाभों का स्वाद कम्प्यूटरीकृत रेलवे आरक्षण, कर्नाटक में च्भूमि’ परियोजना के तहत भू-अभिलेख तक आसान पहुंच, आंध्रप्रदेश में ई-सेवा केंद्रों के जरिए बिजली बिलों इत्यादि का ऑनलाइन भुगतान, महाराष्ट्र में च्सरिता’ परियोजना के जरिए दस्तावेजों का शीघ्र पंजीयन और अन्य राज्यों में चल रही ऐसी ही कई परियोजनाओं के माध्यम से चख चुकी है।
सवाल यह है कि ऐसी सफल परियोजनाएं केवल एक या दो राज्यों तक ही सीमित क्यों रहना चाहिए? आखिर ई-प्रशासन के लाभ ग्रामीण जनता तक भी तो पहुंचें। इसी के मद्देनजर भारत सरकार ने राज्यों के साथ मिलकर राष्ट्रीय ई-प्रशासन योजना बनाई है। इसका मकसद ऐसी व्यवस्था बनाना है ताकि लोगों को कोई भी जानकारी पंचायत स्तर पर ही मिल जाए और उन्हें इधर-उधर भटकते हुए समय व पैसा बर्बाद न करना पड़े।
23 हजार करोड़ रुपए की इस योजना को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने वर्ष 2006 में मंजूरी दी थी और इसके 2009 तक अमल में आने की संभावना है। इस योजना के पीछे दृष्टिकोण (विजन) यही है कि च्आम जनता को सभी सरकारी सेवाएं उनके गांवों या कस्बों में एक ही आउटलेट के जरिए वहन करने योग्य कीमत पर उपलब्ध करवाना और इन सेवाओं की क्षमता, पारदर्शिता और विश्वसनीयता को बनाए रखना’।
सूचनाएं वास्तव में ग्रामीण जनता तक पहुंचें, इस बात को सुनिश्चित करने के लिए देश की सभी पंचायतों में लगभग एक लाख सिटीजन कियोस्क (ई-गुमटियां) स्थापित करने का प्रस्ताव है। इसमें निजी क्षेत्र व एनजीओ की भी मदद ली जाएगी। यह संभवत: पहला मौका होगा जब सूचना सेवाओं को गांवों पर केंद्रित किया गया है जहां देश की अधिसंख्य आबादी रहती है। ऐसी ही ई-गुमटियां इससे पहले पूर्वोत्तर राज्यों, जम्मू एवं कश्मीर और अंडमान व निकोबार द्वीप समूहों में स्थापित की जा चुकी हैं।
ई-प्रशासन की योजना में 27 परियोजनाएं मिशन के रूप में तैयार की गई हैं। इनमें से नौ परियोजनाएं केंद्र सरकार के अधीन होंगी जिनके तहत आयकर, कंपनी मामलों, पासपोर्ट, पेंशन, केंद्रीय सीमा एवं उत्पाद शुल्क इत्यादि विभागों का कम्प्यूटरीकरण किया जाएगा। अन्य कुछ परियोजनाओं पर राज्य सरकारें काम करेंगी जिनके तहत कृषि, भू-अभिलेख, पुलिस, कोषालय, संपत्ति कर, वाणिज्यिक कर, सड़क परिवहन जैसे विभागों और रोजगार कार्यालय, नगर निकायों व पंचायतों का कम्प्यूटरीकरण किया जाएगा। ई-अदालतें, ई-खरीद इत्यादि भी इस योजना के अंतर्गत हैं। राज्यों में इन ई-गुमटियों को डाटा केंद्र मदद करेंगे जबकि कनेक्टिविटी राज्य स्तरीय नेटवर्क च्स्वान’ द्वारा उपलब्ध करवाई जाएगी।
च्स्वान’ फाइबर ऑप्टिक आधारित होगा जो उच्च गति की ब्राडबैंड कनेक्टिीविटी राज्यों व जिलों से लेकर ब्लॉक मुख्यालय तक मुहैया करवाएगा। यह काम भी सार्वजनिक निजी भागीदारी के साथ किया जाएगा और इस पर 3,क्क्क् करोड़ रुपए से भी अधिक खर्च किए जाएंगे। ई-प्रशासन योजना के कुछ अन्य बिंदु जैसे सभी नागरिकों, व्यवसायों व संपत्ति के लिए एक विशेष पहचान कोड देना, प्रशिक्षण के जरिए कार्यकुशलता में इजाफा करना, प्रौद्योगिकी में अनुसंधान व विकास इत्यादि इसकी गुणवत्ता व सफलता को सुनिश्चित करेंगे। इस योजना में समग्र नजरिए के साथ निजी भागीदारी को भी आमंत्रित किया गया है ताकि सूचनाओं के संप्रेषण की यह प्रणाली टिकाऊ बनी रहे।
इस योजना की राह में कई बाधाएं भी हैं, जिनसे पार पाना होगा। अधिकांश ई-प्रशासन परियोजनाओं की सबसे बड़ी कमी यह है कि इनमें आम जनता को सूचनाएं उनकी स्थानीय भाषा में मुहैया नहीं करवाई जातीं। दूसरी बड़ी समस्या ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली की उपलब्धता आसान नहीं होना है जिससे इस योजना की रफ्तार कम होने की आशंका है।
तीसरी बड़ी समस्या यह है कि सरकारें अब भी मौजूदा प्रक्रियाओं एवं नियम-कायदों को बदलने से बच रही हैं जबकि इनके बदलाव से सूचनाओं के संप्रेषण की गति में सहायता ही मिलेगी। चौथी समस्या यह है कि इन परियोजनाओं के बारे में न तो प्रिंट और न ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से जनता में पर्याप्त जागरूकता फैलाई जा रही है। इसके अलावा ई-प्रशासन परियोजनाएं मोबाइल फोन के व्यापक दायरे में होने के बावजूद इसकी ताकत का पूरी तरह इस्तेमाल नहीं कर पा रही हैं।
इनसे भी बढ़कर सबसे अहम बात होगी सरकारी कर्मचारियों की मानसिकता में बदलाव करना। सरकारी कर्मचारियों की इस मानसिकता की वजह से कई ई-प्रशासन परियोजनाएं गति नहीं पकड़ पा रही हैं। इसके अलावा कार्यकुशलता बढ़ाने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम का अनुभव भी अच्छा नहीं रहा है। यह अनुभव बताता है कि कर्मचारियों को केवल प्रशिक्षण देने भर से काम नहीं बनता। सूचनाओं के आसान संप्रेषण के लिए कर्मचारियों को हर स्तर पर प्रोत्साहित करना भी जरूरी है।
च्सूचना ही शक्ति है’ और सरकारी कर्मचारी बिलकुल नहीं चाहेंगे कि आम जनता को इस शक्ति से लैस किया जाए। कुछ सरकारी कर्मचारियों के साथ मिलीभगत से कार्य करने वाले दलालों की रोजी-रोटी इन सेवाओं को उपलब्ध करवाने से चलती है।
ये दोनों एक ऐसा गुट बनाते हैं, जिसे तोड़ना काफी कठिन होगा। राष्ट्रीय ई-प्रशासन योजना की सफलता सुनिश्चित करते हुए अगर हम आम नागरिक की सूचना संबंधी जरूरतों को बेरोकटोक पूरा करना चाहते हैं तो इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक कुशलता और जनता व मीडिया का दबाव जरूरी है।

सूचना प्रौद्योगिकी एवं ग्रामीण विकास मामलों के विशेषज्ञ हैं।

Wednesday, August 27, 2008

तेजी से फैलता जा रहा है इंटरनेट का दायरा

इशिता रसेल
इंटरनेट की जड़ें ग्रामीण इलाकों में और गहराती जा रही हैं। दरअसल क्षेत्रीय भाषाओं में वेबसाइटों की बढ़ती संख्या लोगों को इंटरनेट से जोड़ने में मददगार साबित हो रही है।
खासतौर से युवा इन वेबसाइटों के प्रति बहुत आकर्षित हो रहे हैं। इंटरनेट रिसर्च फर्म 'जक्स्टकंसल्ट' द्वारा किए गए एक ताजा सर्वे के मुताबिक इंटरनेट का उपयोग करने वाला प्रत्येक सातवां व्यक्ति ग्रामीण इलाके से ताल्लुक रखता है।इस सर्वे के मुताबिक गांवों में शहरों की तुलना में कम उम्र के लोग इंटरनेट का उपयोग कर रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में कुल इंटरनेट उपभोक्ताओं में से 61 फीसदी ऐसे लोग हैं जिनकी उम्र 25 साल से कम है जबकि शहरों के मामले में यह आंकड़ा 50 फीसदी है। ग्रामीण क्षेत्रों में 14 फीसदी किशोर इंटरनेट का उपयोग कर रहे हैं जबकि शहरी क्षेत्र में यह संख्या 8 फीसदी है। सर्वे के मुताबिक ग्रामीण इंटरनेट उपभोक्ताओं में 50 फीसदी की तादाद दक्षिण भारतीयों की है। इसमें यह तथ्य भी उभरकर आया है कि इंटरनेट उपयोग करने वाले 72 फीसदी लोग अपनी क्षेत्रीय भाषा को तरजीह देते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे लोगों की संख्या 82 फीसदी है तो शहरों में 70 फीसदी लोग ऐसा चाहते हैं। हालांकि केवल 33 फीसदी ग्रामीण इंटरनेट उपभोक्ता ही क्षेत्रीय वेबसाइटों का उपयोग करते हैं।वैसे अभी तक कुल इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या 3.5 करोड़ तक ही पहुंच पाई है इनमें से 30 करोड़ लोग शहरों में हैं जबकि केवल 5 करोड़ ग्रामीण लोग ही इंटरनेट से जुड़ पाए हैं। गांवों में लोग मुख्य रूप से साइबर कैफे के जरिये ही इंटरनेट तक पहुंच रहे हैं। शहरी उपभोक्ता शादी कराने के लिए मैट्रिमोनियल साइट्स की शरण लेते हैं तो ग्रामीण उपभोक्ताओं का भरोसा अब भी स्थानीय और नजदीकी लोगों में बना हुआ है। यह बात भी सामने आई है कि लोग अपने घरों की बजाय अपने ऑफिस से ही ऐसी साइट को सर्च करने को तरजीह देते हैं।

Friday, June 20, 2008

अभी ज्यादा समय नहीं हुआ विस्फोट.कॉम की शुरुआत हुए, लेकिन इसकी गूंज अब सुनाई देने लगी है....एक नई तरह की धारा पत्रकारिता जगत में लेकर चलने के लिए बहुत साधुवाद संजय तिवारी जी को......

Wednesday, January 23, 2008

'नेशनल हेराल्ड' का प्रकाशन बंद होगा

नई दिल्ली, 22 जनवरी (आईएएनएस)। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा शुरू किए गए और पिछले कई वर्षों से कांग्रेस पार्टी की वित्तीय मदद से चल रहे समाचार पत्र 'नेशनल हेराल्ड' का प्रकाशन बंद कर दिया जाएगा।

समाचार पत्र के अधिकारियों के अनुसार 'नेशनल हेराल्ड व कौमी आवाज इम्पलायीज यूनियन' और कांग्रेसी नेताओं के बीच 265 कर्मचारियों के समायोजन के लिए वार्ताएं की गई हैं। इन 265 कर्मचारियों में नई दिल्ली से प्रकाशित होने वाले अंग्रेजी और उर्दू संस्करणों के 40 पत्रकार भी शामिल हैं।

सूत्रों के मुताबि कांग्रेस ने नेहरू द्वारा लखनऊ से नौ सितंबर 1938 को शुरू किए गए इस समाचार पत्र को बंद करने का निर्णय लिया है। अधिक कर्मचारी और विज्ञापन के अभाव के कारण समाचार पत्र घाटे में चल रहा था।

नेशनल हेराल्ड और कौमी आवाज के लखनऊ संस्करणों को लगभग 10 वर्ष पहले ही बंद किया जा चुका है। अखबार का हिन्दी संस्करण 'नवजीवन' (यह नाम महात्मा गांधी द्वारा दिया गया था) कुछ वर्ष पहले बंद हो चुका है।

अधिकारियों के अनुसार समाचार पत्र के अध्यक्ष एवं कांग्रेस पार्टी के कोषाध्यक्ष एवं सांसद मोतीलाल वोरा और अन्य कांग्रेसी नेताओं ने कर्मचारियों के लिए 38 करोड़ रुपये के मुआवजा पैकेज का निर्णय लिया है।

कौमी आवाज के वरिष्ठ पत्रकार और नेशनल हेराल्ड एवं कौमी आवाज इम्पलायीज यूनियन के अध्यक्ष सौद अख्तर ने इस समाचार पत्र को बंद किए जाने की पुष्टि करते हुए आईएएनएस को बताया, ''हां, इसे बंद किए जाने का फैसला लिया जा चुका है। इस पर अंतिम समझौता इस सप्ताह के अंत तक किया जा सकता है।''

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस

Thursday, November 29, 2007

सूचना का अधिकार और पारंपरिक जनसमाज










डा. स्मिता मिश्र
लोकतन्त्रिक व्यवस्था को समृद्ध और सुरक्षित बनाने के लिए नागरिकों के अधिकारों में एक और अधिकार जुड़ गया है; `सूचना पाने का अधिकार।´ इसका अर्थ है कि प्रत्येक नागरिक को अपने जीवन के लिये जरूरी सूचना प्राप्त करने का अधिकार है। ऐसा माना जा रहा है। इस अधिकार से जहां शासन की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता आने की संभावना है वहीं नागरिकों की लोकतन्त्रिक सक्रियता बढ़ाने का सर्वाधिक कारगर उपाय भी सिद्ध होगा। भारतीय पारंपरिक ग्रामीण जनसमाज जहां सूचना का अधिकार तो दूर की बात है `अधिकार´ शब्द की ही व्याप्ति नहीं है। और यदि है तो वह प्रभुता संपन्न लोगों तक ही सीमित है। तो यह सोचने की बात है कि `सूचना का अधिकार´ नामक कानून किस तरह उन लाखों-असंख्य लोगों तक पहुंचेगा और वे लोग किस प्रकार इससे लाभािन्वत हो सकेंगे! लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि कस्बों और गांवों के लोग नगरों या महानगरों से जागरूक नहीं होते। कस्बों और गांवों से ही अनेक नेता निर्वाचित होकर शहरों में आते हैं, विचार मंथन में शिरकत करते हैं और उसका प्रभाव लेकर वापिस गांव या कस्बे लौटते रहते हैं तो उन्हें भी अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए वहां के लोगों में विचार-मंथन निष्कर्षों को संप्रेषित करते रहना पड़ता ग्रामीण शैक्षिक संस्थाओं के व्यक्ति पुस्तकों, समाचारपत्राों, शहरी संपको± के द्वारा नयी चेतना से संपन्न होते रहते हैं। तीसरे पंचायतों में भी अब शिक्षित, विवेकवान लोग शामिल होते हैं। वे भी नये विचारों के संवाहक हो सकते हैं। इनके ही द्वारा जनता की पारंपरिक विचार जड़ता को तोड़ा जा सकता है। और विचार मंथन के क्षेत्रा में जो कुछ नया हो रहा है उसकी सूचना से उसे जोड़ा जा सकता है। अब विचारणीय है कि यह कार्य किस-किस स्वरूप में हो सकता है। ज़ाहिर है कि उपदेश या आदेश का प्रभाव स्थाई नहीं होता। जरूरत इस बात कि है कि जनता को प्रीतिकर ढंग से नवचेतना की ओर उन्मुख करना है। और इस कार्य के लिये वे माèयम अिध्क कारगर होंगे जो जनता की पारंपरिकता से जुड़े हों। इनमें सर्वप्रथम मैं लोकगीतों की भूमिका को रूपायित करना चाहूंगी। लोकगीतों का लोकजीवन में अत्यंत व्यापक महत्व है। इनमें उनके सुख-दु:ख, अभाव-संघर्ष, समस्याएं, वर्गचेतना, वर्णचेतना, नर-नारी की अद्भुत प्रभावशाली व्याप्ति दिखाई पड़ती है। ये लोकगीत जीवन के सुख दु:ख, उल्लास-विषाद्, )तु मौसम, क्रिया-कलाप आदि अनेक संदभो± से जुड़े होने के कारण संवेदना और रूप के वैविèय से आभोक्ति होती है। ऐसे शक्तिशाली माèयम का उपयोग नये कानून, नयी चेतना के विकास के लिये निश्चित रूप से किया जा सकता है। यहां सरकार और एनण्जीण्ओण् की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है कि वह लोगगायकों को पफैलोशिप आदि देकर नयी चेतना के गाने बनाये और उनका प्रसार करे। जैसे एक लोकगीत में बांझ स्त्राी अपने बांझपन के कारण घर-परिवार और समाज से प्रतािड़त होती है। और आत्महत्या करने के लिये नदी, बाघिन, आग आदि के पास जाती है और प्रार्थना करती है कि वे उसे मार दे किन्तु सभी यह कहकर मना कर देती हैं कि उसे मारने से वे भी बांिझन हो जाएंगी। अंत में ध्रती के पास जाती है। ध्रती तो मां है। वह उसे अपने में समा लेती है। अब यहां पर ध्रती के माèयम से स्त्राी की नयी उफर्जा को जाग्रत करने का संदेश दिया जा सकता है कि ध्रती उस स्त्राी को स्वाभिमान से जीने को प्रेरित करती है।बेटी ससुरा में रहिह तू चांद बनकर सबकि पुतरि के विचवा, पुरान बनकर भिनइ सबसे पहिले उठिह, ननद के मुंह से कबहु त लगिह ससुराजी के बाजे खरउफह, पानी लेके पहिले जइह। इस तरह के गीतों में जहां लड़की को ससुराल में मर्यादापालन सिखाया जा रहा है वहीं कर्तव्यबोध्, आत्मसम्मान भी जाग्रत किया जा सकता है। इन गायकों के अनेक मंच हो सकते हैं। गांव-गांव में छोटे-छोटे कवि सम्मेलन, सरकार के अनुाद से बाजार, हाट, मेला, उत्सव, स्कूल, पंचायत आदि मेें मजमा इकट्ठा कर अपनी बात कह सकते हैं। रेडियो, टीण्वीण् के माèयम से इन गीतों को निरंतर प्रसारित किया जा सकता है।एक बहुत शक्तिशाली माèयम है नुक्कड़ नाटक का। नाट्य मंडलियां जगह-जगह नुक्कड़-नाटक आयोजित कर नयी चेतना का प्रसार करती रहती है। ये मंडिलियां देहात जाकर नये अिध्कार, नये कानून का प्रचार प्रसार करने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इसी प्रकार कठपुतली या बंदरों का खेल तमाशा में लोककथा का प्रसार होता है। इस लोककथा के ढांचे भी पारंपरिक स्वर के स्थान पर नये स्वर को प्रमुखता दी जा सकती है। इसके लिये सरकारी तंत्रा इन लोक कलाकारों को आर्थिक रूप से सहायता करके प्रचार माèयम के रूप में प्रयोग कर सकती है। पंचायत का भी विभिन्न तरीकों से इस्तेमाल हो सकता है। पंचों को सरकार नयी सूचनाओं से अप-टु-डेट करे। उनके वर्कशॉप हों ताकि वही पंच गांव को नयी सूचनाओं से अप-टू-डेट कर सके। इस अवसर पर आगे-पीछे मनोरंजक माèयमों का प्रयोग किया जा सकता है। यहां पिफल्म भी दिखाई जा सकती है। पिफल्म एक अत्यंत सशक्त माèयम है। ऐसी पिफल्में जहां ग्रामीणों ने, महिलाओं ने एकजुट होकर अपने हक की लड़ाई लड़ी हो चाहे वह मंथन हो, लगान हो या मिर्च मसाला। इसी प्रकार समाचार पत्राों की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण है। जैसे कुछ वर्ष पहले मèयप्रदेश के टीकमगढ़ जिले की पीपरा बिमारी ग्राम पंचायत की अनुसूचित जाति की सरपंच गुंदिया बाई को वहां के प्रभावशाली लोगों ने स्वतंत्राता दिवस पर झंडा पफहराने से रोकने पर वहां समाचार पत्राों ने इस घटना को भरपूर प्रचारित किया। परिणामस्वरूप आगामी स्वतंत्राता दिवस पर मुख्यमंत्राी ने स्वयं गुंदिया बाई के हाथों टीकमगढ़ जिला मुख्यालय पर झंडा पफहरवाया। इस दिशा में कथित राष्ट्रीय समाचार पत्राों की अपेक्षा छोटे पत्रा-पत्रिाकाएं बेहतर सि( हो रहे हैं। यहां एनण्जीण्ओण् की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। कई एनण्जीण्ओण् के द्वारा छोटी-छोटी जगहों से बेहतर समाचार-पत्रा-पत्रिाका निकाल रहे हैं। जैसे मèयप्रदेश में देवास जिले से एकलव्य संस्था - `पंचतंत्रा´ पत्रिाका, पीण्आईण्आईण् `ग्रासरफट´ निकालती है। `खबर लहरिया´ समाचार पत्रा को `चमेली देवी´ पुरस्कार मिला। तब इसकी संपादक मीरादेवी व संवाददाता दुगाZ मिथिलेश आज के पत्राकारों की तरह नहीं हैं, न इनके शरीर पर ग्लैमरस ड्रेस पोशक है न मेकअप। उप अपनी जमीन की भाषा में समाचार प्रस्तुत करने का जो अंदाज देवगांव वह बड़े-बड़े समाचारपत्राों में नहीं दिखाई पड़ती। आज हमारे अखबारी भाषा में जो तेवर गायब होते जा रहे हैं वे यहां पूरी ताकत के साथ मौजूद हैं। इनके विषयों में जहां विकासमूलक, स्थानीय मुद्दे हावी रहते हैं, वहीं राष्ट्रीय स्तर की हलचलों से भी ये नावाकिपफ नहीं रहते। इसे वायन की सहायता से भी प्रस्तुत किया जा सकता है। एपफण्एमण् पर इसे डाला जा सकता है। गांववालों की ही आवाज में गांव से जुड़े मुद्दों पर सूचना प्राप्त करने, उनपर विश्लेषण करने तथा राय बनाने में ये अखबार महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इसके अतिरिक्त धार्मिक सत्संग, अभियान जत्था, स्वयं सहायता ग्रुप आदि भी सूचना के अिध्कार को ग्रामीणों तक पहुंचाने में अत्यंत सहायक सि( होंगे। ये नारी संबंध्ी मुद्दे जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा, अिध्कार, स्वरोजगार आदि पर जागरूकता लाने के कापफी कारगर सि( होंगे। आखिर में एक कविता से बात खत्म करफंगी आकाश से बहती है एक नदी और उफपर ही उफपर पी लेता कोई उसे ध्रती प्यासी की प्यासी रहती है और कहने को आकाश से नदी बहती है। यदि सूचना का अिध्कार नामक कानून आकाश से उतरकर प्यासी ध्रती तक पहुंचेगा तभी लोकतंत्रा की सही पहचान होगी अन्यथा कागजी कानूनों की सूची में एक कानून और जुड़कर रह जाएगी।

(लेखिका दिल्ली विश्वविद्यलय मे लेक्चरर और मीडिया विश्लेषक हैं)

Thursday, October 11, 2007

भई बहुत रिस्की है ! !



- उमाशंकर मिश्र
ऐसा बहुत कम ही देखने को मिलता है, जब कोई मीडिया संस्थान अपने ही कुनबे के किसी सदस्य पर उंगली उठाने की हिमाकत कर सके, क्योंकि एक उंगली अगर सामने वाले पर उठती है तो तीन उंगलियों का रुख स्वयं की ओर ही होता है। इस तरह से यह काम भी बिल्ली के गले में घंटी बांधने से कम नहीं कहा जा सकता। शायद यही कारण है कि दबे कुचलों की आवाज बनने का दंभ भरने वाले मीडिया संस्थानों में ही जब कर्मचारियों का शोषण होने लगे तो उसकी खिलाफत करने के लिए कोई आगे नहीं आता। लेकिन यह स्वाभाविक तौर पर कहा जा सकता है कि जैसे मीडिया को बस उपदेश देने का हक है। खबरें क्या होंगी, यह टीआरपी तय करती है। जरा सी गलती हुई नहीं कि आसमान सिर पर उठा लिया जाता है और बार बार किसी खबर को इस तरह से दबाव देकर दिखाया जाता है, जिससे खबर अगंभीर होते हुए भी गंभीर बन जाती है। लेकिन टीआरपी के फेर में और सनसनी फैलाने तथा वाहवाही बटोरने की कवायद में जो गलतियां मीडिया करता है, उसका पोस्टमार्टम कौन करेगा? यह एक बहुत बड़ा सवाल है। प्रख्यात पत्रकार रामशरण जोशी का कथन उल्लेखनीय है कि ``19 वीं एवं 20 शताब्दी में पत्रकारिता को एक मिशन के रूप स्वीकार किया गया था, अब मिशनरी पत्रकारिता पर आधारित युग समाप्त हो गया है। सर्जनात्मक पत्रकारिता पर आधारित संपादकीय संस्थान कोमा में चले गए हैं, उनकी जगह एक ऐसी बाजारू पत्रकारिता ने लिया है, जिसने नए पूंजीवाद का जन्म दिया है। पुरानी परंपराओं को तोड़ नई अपसंस्कृति विकसित की जा रही है। इससे जनता का विष्वास पत्रकारिता पर कम होता जा रहा है।´´
इस तरह से कहा जा सकता है कि आज मीडिया की लगाम विज्ञापनदाताओं के हाथ में ही है। एक बात याद आती है, जब एक पत्रकार मित्र ने किसी कंपनी के डेयरी उत्पाद में फफूंद पाए जाने की षिकायत एक मीडिया संस्थान में नमूनों के साथ की। मीडिया संस्थान में डील करने वाले महाषय भी उनके मित्र थे। उन्होंने स्पश्ट बता दिया कि जब कंपनी से हमें करोड़ों का विज्ञापन मिलता है तो ऐसे में रिस्क नहीं लिया जा सकता। लेकिन शायद इस खबर को यदि तान दिया जाता तो उक्त कंपनी से भी अधिक विज्ञापन इस जनहित से जुड़ी खबर के बूते मिल सकते थे। लेकिन कोई रिस्क क्यों लेगा? जब पहले से ही अपना कोटा पूरा हो। अभी ज्यादा समय नहीं बीता जब एक प्रतििश्ठत मीडिया संस्थान के कर्मचारियों की भारी संख्या में छंटनी कर दी गई। रोजी रोटी से महरूम सैकड़ों कर्मचारी सड़क पर महीनों डेरा डाले पड़े रहे कि शायद प्रबंधन का दिल पसीज जाए। लेकिन ऐसे मेें मीडिया के लिए रामशरण जोशी की बात में एक बात और जोड़ने की जरुरत महसूस होती है। वह है संवेदनहीनता, जो उन सैकड़ों कर्मचारियों के प्रति दिखाकर तथाकथित संस्थान ने दिखा दिया कि समकालीन पत्रकारिता में कितना खोखलापन है। एक तरफ तो ढेरों कागज इस बात के लिए काले किए जाते हैं, लेकिन जब बात खुद पर आती है तो सामाजिक जिम्मेदारी का बहरूपियापन सामने आ जाता है।
रामषरण जोषी की बात को फॉलोे करते हुए अगर कहा जाए तो आज प्रोफेषनलिज्म के नाम पर ये जो ट्रेंड चल पड़ा है, कहीं ना कहीं इससे मीडिया के अपेक्षित वजूद और भावी पत्रकारों के भटकाव का सिलसिला शुरु होने की संभावना बढ़ जाती है। आज ऐसा जान पड़ता है मानों पत्रकारिता एक याचक की सी स्थिती में सकुचाती हुई `ग्लैमराई मीडिया´ से अपने वजूद की भीख मांग रही हो। जो लोग पत्रकारिता की पढ़ाई करके इस पेषे को अपना रहे हैं, उन्होंने इसके सिद्धांतों को जरूर पढ़ा होगा। ऐसे नवांकुर पत्रकार भी समझते हैं कि आज पत्रकारिता के पवित्र पेषे में व्यवसायिकता की दीमक लग गई है। हर राजनेता, उद्योगपती और समाज का अन्यत्र प्रभावषाली वर्ग मीडिया को अपनी जेब में रखना चाहता है। परिणामत: कुकुरमत्तों की तरह मीडिया संस्थान एवं प्रषिक्षण केन्द्र खुलने लगे। पहले ऐसा माना जाता था कि पत्रकार पैदा होता है, पैदा तो अब भी होता है। लेकिन धीरे धीरे यह धारणा स्थापित कर दी गई कि पत्रकार पैदा नहीं होता, बल्कि अब वह मैन्युफैक्चरिंग का आइटम बन गया है। इस धारणा के बूते प्रषिक्षण अनिवार्य कर दिया गया। लेकिन नौकरी देने की अनिवार्यता सुनिश्चत हो सकी है। ऐसा जान पड़ता है कि अब पत्रकारिता भी एमबीए, इंजीनियरिंग और एमबीबीएस की तरह गरीब एवं मध्यमवर्गीय तबके से दूर हो जाएगी, भले ही कैन्डीडेट प्रतिभासंपन्न तबके से दूर हो जाएगी। ऐसे में इस पेषे को निरा व्यावसाय ना बनने देने की जिम्मेदारी आखिर किस पर है? यह सवाल मुंह बाये खड़ा हुआ है।
बात मीडिया की है तो सरकार भी धो पोंछकर ही हाथ लगाने का प्रयास भर करती है, लगाती नहीं। कुछ समय पूर्व एक कार्यक्रम में सूचना एवं प्रसारण मंत्री जयपाल रेड्डी ने मीडिया की गिरती हुई साख पर चिंता भर ज़ाहिर करते हुए मीडिया कमीशन बनाने की बात कही थी। वे आंध्र प्रदेश भवन में ``क्या मीडिया में लक्ष्मण रेखा खींची जानी चाहिए´´विषय पर बोल रहे थे। काल, पात्र एवं स्थान का उस समय उन्होंने बखूबी ध्यान रखते हुए भाषण दिया। रेड्डी ने तो बुतप्राय पे्रस परिशद् के अधिकारों को भी बढ़ाने की इच्छा भर कर डाली और बड़ा ही चिकना और चुपड़ा हुआ वक्तव्य देते हुए कहा कि ``मीडिया शुरुआती दिनों से ही चाहे वह चर्च रहा हो, राजशही रही हो या फिर सरकार हो उसके खिलाफ लड़ाई लड़ती रही है और उसकी अपनी एक साख रही है। लेकिन आज किसी और से नहीं बल्कि मीडिया को खतरा उसके अपने अंदर से ही है। मीडिया समाचारों को बढ़ा चढ़ाकर सनसनी फैलाने की वजह से अपनी साख खोता जा रहा है।´´ कुछ भी हो जयपाल रेड्डी ने मीडिया की हकीकत को समझा तो सही। भले ही हकीकत से हम सबको रूबरु भर करवाया हो। इस फिसलनदार भाषण से कानून मंत्री हंसराज भारद्वाज फिसल पड़े। उनके अंदर की नैतिकता जाग उठी। मीडिया पर लगाम लगाने वाले कानून का खुला विरोध करते हुए कह दिया कि यदि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने ऐसा कोई विधेयक तैयार भी किया है तो वह उनके मंत्रालय से आगे नहीं बढ़ पाएगा। अपनी बात को पुख्ता करते हुए उन्होंने यह भी कह डाला कि सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी इसके पक्ष में नहीं हैं। तत्कालीन उपराष्ट्रपती भैरो सिंह शेखावत द्वारा हैदराबाद में इंडिया मीडिया सेंटर के उद्घाटन के अवसर पर कही गई बात उल्लेखनीय है कि ``तथ्यों को पक्षपात रहित प्रस्तुत करने के लिए मीडिया को खुद पर ही आचार संहिता लागू करने की आवश्यकता है। मीडिया की निष्प्क्ष रिपोर्ट ही लोगों का दिल जीत सकती है।´´ बात महत्वपूर्ण तो जरूर है, लेकिन क्या प्रैिक्टकल भी है? यह सोचने का विषय है, जो उन्होंने छोड़ दिया है। लेकिन बेहतर होगा कि मीडिया की बेहतरी के लिए मीडियाकर्मी ही आगे आकर यह सोचें कि मीडिया किस तरह से हमें खुद ही इसके लिए एक लक्ष्मण रेखा तय करनी है। ना सरकार और ना ही कोई अन्य इस मामले में हाथ डालना चाहेगा, `क्योंकि काम बहुत रिस्की है।´