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Monday, September 1, 2008

पहल नीचे से ही करनी होगी

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् की ओर से डूसू अध्यक्ष पद की उम्मीदवार ''नुपुर शर्मा'' के दिन भर के व्यस्त शिड्यूल से निपटने के बाद उमाशंकर मिश्र ने उनसे विभिन्न विषयों पर गहन चर्चा की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश -
डूसू प्रत्याशियों से मिलने जब शाम को हम 6-महादेव रोड स्थित अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के चुनाव कार्यालय पहुंचे तो अध्यक्ष पद की उम्मीदवार नुपुर शर्मा आगामी रणनीतियों को लेकर चल रही एक बैठक में मशगूल थीं। थोड़ी देर इंतजार करने के बाद जब हम उनसे मिलने गए तो बैठक ख़त्म हो चुकी थी, लेकिन उनकी व्यस्तता यथावत् बनी हुई थी। उनसे मुझे जब मिलवाया जाता है तो दिन भर की थकान के बावजूद भी एक औपचारिक मुस्कान नुपुर के चेहरे पर तैर जाती है और जैसे ही वे ''हैल्लो'' कहती हैं तो पता चलता है कि चुनाव अभियान में छात्रों के सवालों के जवाब देकर और उनके बीच अपनी बात को रखने के लिए लगातार भाषणों के सिलसिले के चलते उनका गला बैठ चुका था। बातचीत शुरू होती है तो अपने दिन भर के अनुभवों के बारे में वे बताने लगती हैं और कहती हैं कि ''अभी तक जिस तरह से छात्रों ने उत्साहपूर्वक एबीवीपी को समर्थन दिया है, उससे हमें अच्छे परिणाम की अपेक्षा है।'' जब उनसे पूछा जाता है कि चुनाव प्रचार किस तरह से किया जा रहा है तो नुपुर बताती हैं कि ''सबसे पहले तो हम छात्रों से रूबरू होते हैं और उन्हें ये बताने की कोशिश करते हैं कि 'दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ' के लिए वे 'अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद्' के प्रत्याशियों को ही क्यों चुनकर भेजें। इसके लिए विद्यार्थी परिषद् की ओर से ग्लैमर और मनी एवं मसल पावर से अलग हटकर छात्रों के बुनियादी मुद्दों को आधार बनाया जा रहा है और अभाविप के मुद्दे जमीनी हकीकत से जुड़े हुए हैं।
आज दिल्ली विश्वविद्यालय को वैश्विक रंग में रंगने की तैयारियां की जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर कॉलेजों के टॉयलेट से लेकर पुस्तकालय, आंतरिक मूल्यांकन, यू स्पेशल, छात्रावासों का निर्माण इत्यादि की स्थिति अभी भी संतोषजनक नहीं है। नुपुर कहती हैं कि यह बात काबिले-गौर है कि विगत छात्रसंघ प्रशासन की उपेक्षा से दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र त्रस्त हो चुके थे और इसी के चलते उन्होंने परिवर्तन का मन बना लिया है। बकौल नुपुर शर्मा 'इस बात की झलक छात्रों से बातचीत के दौरान देखने को मिल जाती है कि बुनियादी समस्याओं के लिए भी छात्रों को झूझना पड़ रहा है। आगे वे कहती हैं कि ''आज दिल्ली विश्वविद्यालय को वैश्विक रंग में रंगने की तैयारियां की जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर कॉलेजों के टॉयलेट से लेकर पुस्तकालय, आंतरिक मूल्यांकन, यू स्पेशल, छात्रावासों का निर्माण इत्यादि की स्थिति अभी भी संतोषजनक नहीं है। इस तरह के केन्द्रीय स्तर के विश्वविद्यालय में जहां विभिन्न स्रोतों से अनुदान मिल रहा हो, वहां यह सवाल ऐसे में उठना लाजमी है कि आख़िर यह पैसा कहां जा रहा है? इसलिए हम बेसिक मुद्दों को लेकर चल रहे हैं; क्योंकि हमारा मानना है कि पहल नीचे से ही करनी होगी, तभी इमारत मजबूत बनाई जा सकती है। दक्षिणी परिसर के कॉलेजों में बसों के न होने की समस्या को जोर शोर उठाते हुए नुपुर कहती हैं कि मेन रोड से अंदर कॉलेज तक पहुंचने में छात्रों को करीब एक से दो किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है, ऐसे में उनकी पूरी उर्जा पैदल चल कर कॉलेज पहुंचने में खर्च हो जाती है।हॉस्टल की बात करते हुए कहती हैं कि मैं 5 साल से संगठन में हूं और यहां रहकर मैने अन्य प्रदेशों से आने वाले छात्रों की समस्याओं को करीब से देखा है, जिन्हें पर्याप्त हॉस्टल न होने के कारण पीजी में रहना पड़ता है। नुपुर कहती हैं कि यह नहीं भूलना चाहिए कि हरेक छात्र की पारिवारिक पृष्ठभूमि ऐसी नहीं होती कि वह पीजी में रहने का खर्च वहन कर सके। इसलिए हमने हॉस्टलों को संख्या बढ़ाने के लिए मुहिम छेड़ने का फैसला किया है, जिससे छात्रों के रहने की समस्या को समाप्त किया जा सके। दूसरी ओर ओलंपिक जिस तरह से ग्रामीण पृष्ठभूमि से जुड़े युवा मेडल जीत कर लाए हैं उससे आशा की किरण तो दिखाई देती है, लेकिन इस बात पर विचार करना होगा कि एक अरब की आबादी में क्या हम सिर्फ तीन मेडल जीतने की ही कूव्वत रखते हैं?'' बकौल नुपुर; हमें यह भी सोचना होगा कि विश्वविद्यालयी स्तर पर किस तरह की सुविधाएं खिलाड़ियों को मिल पा रही हैं। फिलहाल विद्यार्थी परिषद् ने खेलों का स्तर सुधारने को अपनी प्रतिबध्दताओं की सूची में शामिल कर लिया है, जिससे कि गांव-गांव में कुश्ती और दंगलों वाले इस देश को आत्मविश्वास से लबरेज युवाओं को भविष्य में इस तरह वर्षों तक धोबी पछाड़ न खानी पड़े। नुपुर हिन्दू कॉलेज में रही हैं और फिलहाल वे लॉ-सेन्टर-1 की छात्रा हैं। वे बताती हैं कि ''लॉ स्टूडेंट होने के नाते मैंने कई जगह काम किया है, इसलिए अपने अनुभवों के आधार पर मैंने यह महसूस किया है कि तकनीक आधुनिक युग की आवश्यकता है और दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे संस्थान के छात्रों को अब तकनीक की दुनिया से जोड़ने का वक्त आ गया है। रामजस कॉलेज ने वायरलेस इंटरनेट का प्रयोग शुरु भी कर दिया है। नुपुर अपने छात्र जीवन के अनुभवों को आधार बताते हुए आगे कहती हैं कि न केवल रिसर्च बल्कि डाटा स्टोरेज एवं अध्ययन में भी कंप्यूटर एक अनिवार्य आवश्यकता बन चुका है। ऐसे में छात्रों को लैपटॉप पर अध्ययन करने को यदि मिल जाए तो निश्चित तौर पर इसके चमत्कारिक परिवर्तन देखने को मिलेंगे। दिन भर की भागम-भाग के बावजूद भी ताजगी नुपुर के चेहरे पर बनी रहती है और बड़ी ही चुस्ती से वे सवालों के जवाब आत्मविश्वासपूर्ण लहजे में देती हैं। वे बताती हैं कि प्रचार के दौरान हम छात्रों के बीच जाकर उन्हें अपने बारे में बताते हैं और छात्र जब विस्तार से कुछ जानना चाहते हैं तो उसके बारे में भी बताकर उनको संतुष्ट करने का प्रयास किया जाता है। जब उनसे छात्र राजनीति में आने के बारे में सवाल पूछा जाता है तो वे कहती हैं कि ''हिन्दू कॉलेज में रहकर मैंने एक्टिविज्म को सीखा है, क्योंकि इस कॉलेज के छात्रों में सामाजिक एवं राष्ट्रीय मुद्दों को लेकर भी न केवल चर्चा चलती रहती है, बल्कि उनको लेकर काम भी किया जाता है। इस तरह से नुपुर के एक्टिविज्म का सफर हिन्दू कॉलेज के कॉरीडोर से शुरु होकर डूसू के पायदन तक आ पहुंचता है और वे पूरे विश्वविद्यालय के हजारों छात्रों की अगुआ के रूप मे उभर कर सामने आती हैं। वे बताती हैं कि उन दिनों हमने जेसिका लाल मर्डर केस के आरोपियों को लेकर बरती जा रही पुलिसिया कोताही को लेकर आवाज उठाई थी। इसके लिए एक ग्रुप बनाकर ब्लाग पर इसके खिलाफ अभियान चलाया गया और ई-मेल के जरिये हमने करीब 5 हजार लोगों से जेसिका को न्याय दिलाने के लिए आगे आने की अपील की। नुपुर बताती हैं कि इस तरह के अभियानों का असर यह हुआ कि इससे सिर्फ कॉलेज के दोस्त ही नहीं; बल्कि स्कूल के पुराने दोस्तों को भी जब इन गतिविधियों के बारे में पता चला तो वे भी इसका हिस्सा बनने के लिए आने लगे। एबीवीपी से जुड़ने के कारणों में नुपुर संगठन की विचारधारा और दृष्टिकोण को महत्व देती हैं। वे कहती हैं कि परिषद् छात्रों के सामाजिक, व्यैक्तिक और अकादमिक स्तर पर विकास की प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए कार्य करती है। जबकि अन्य छात्र संगठनों में ऐसा नहीं है। नुपुर शर्मा एक लम्बी आह भरते हुए कहती हैं कि ''विद्यार्थी परिषद् में रहकर मैंने सीखा कि जिसे अन्य लोग छात्र राजनीति से जोड़कर देखते हैं, उसे परिषद् में एक्टिविज्म कहा जाता है। बस फिर क्या था, मेरे भीतर के एक्टिविस्ट को अब एक मंच मिल गया था। परिषद् ने भी मेरी क्षमताओं को परखकर दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों के प्रतिनिधि के तौर पर चुनने का फैसला किया।'' चुनाव में ग्लैमर को नुपुर महत्व नहीं देती। वे कहती हैं कि अपनी छाप छात्रों पर छोड़ने के लिए लीडरशिप क्वालिटी होना बेहद जरूरी है। इसके साथ साथ इंटीलेक्चुअल एवं बेहतर पर्सनैल्टी का होना भी आवश्यक है, जिससे कि वह दृढ़ता से छात्रों के हित की बात प्रशासन के समक्ष रख सके। लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों को लेकर नुपुर की प्रतिक्रिया मिलीजुली है। वे कहती हैं कि इसके बहुत पहलुओं से तो चुनाव सुधारों को बल मिलता है, लेकिन कुछेक ऐसे पहलू भी हैं जो समझ से परे हैं। वे सवाल उठाते हुए कहती हैं कि 5 हजार रुपये खर्च की सीमा में रहकर 51 कॉलेजों में प्रचार करना आसान नहीं है। लेकिन हमने हार नहीं मानी है और इसी के चलते हम रिक्शे में बैठकर भी छात्रों तक पहुंच रहे हैं। हारे हुए उम्मीदवारों को दोबारा टिकट न दिया जाना एक जहां एक ओर अलोकतांत्रिक है, वहीं दूसरी ओर चुनाव लड़ने के लिए उपस्थिति की सीमा को बढ़ा देना भी सही नहीं कहा जा सकता है। 'छात्र राजनीति' या फिर नुपुर के शब्दों में कहें तो 'एक्टिविज्म' से हटकर मुख्यधारा की राजनीति में जाने की मंशा फिलहाल नुपुर की नहीं है। अभी वे और पढ़ना चाहती हैं। नुपुर को चाहे वह राजनीति हो, एक्टिविज्म या फिर पढ़ाई सभी स्तरों पर परिवार का पूरा सपोर्ट मिलता है। इसके लिए वे माता-पिता और ईश्वर को धन्यवाद देते हुए गर्दन हिलाकर फिर से वही औपचारिक मुस्कान बिखेरती हैं और मुझे भी धन्यवाद देते हुए बैग उठाकर चल पड़ती हैं।

Wednesday, July 2, 2008

नहीं है सलवा जुडूम जैसा जनविरोध : महेंद्र कर्मा


महेन्द्र कर्मा छत्तीसगढ़ में विपक्ष के नेता हैं, लेकिन कर्मा को आज हजारों आदिवासियों द्वारा नक्सलियों के खिलाफ छेडे गए जन-आन्दोलन सलवा जुडूम के अगुआ के नाते अधिक जाना जाता है। कांग्रेस और भाजपा की लडाई से इतर नक्सवाद जैसे जनमुद्दों पर सरकार के दृष्टिकोण की हाँ में हाँ मिलाने वाले कर्मा; सरकार की कुछ नीतियों से असंतुष्ट भी हैं। वे कहते हैं की सरकार में इच्छाशक्ति की कमी है। हाल ही में रायपुर में उनसे मिलने का अवसर प्राप्त हुआ तो सलवा जुडूम को लेकर उनसे काफ़ी बातचीत हुई...प्रस्तुत है कुछ अंश ......


सलवा जुडूम एक प्रतिबद्ध नाम है जो बुनियादी तौर पर आतंकवाद का विरोध करता है। उसके सिर्फ एक पहलू को दिखाने की कोशिश की गई है। नक्सलवाद आज हर जगह फैल रहा है, सभी राज्य इससे इससे ग्रसित हैं, लेकिन इसका जनविरोध कहां है? यह जानते हुए कि इसका अंतिम दुश्मन लोकतंत्र है इसके खिलाफ आखिर क्यों हम नैतिक साहस नहीं जुटा पाते हैं? अगर नक्सलवाद इसी तरह से फैलता रहा तो लोकतंत्र को बचाना मुश्किल हो जाएगा। सलवा जुडूम आंदोलन आदिवासियों की नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई भर नहीं है, बल्कि यह नक्सली बनाम लोकतंत्र की लड़ाई है। इस देश के नेता जो व्यवस्था के लिए बड़ी बड़ी बातें करते हैं आज वह प्रजातांत्रिक व्यवस्था नक्सलवाद के कारण ख़तरे में है। यह किसी राज्य की समस्या नहीं है। देश के 13 राज्यों के 165 जिलों में फैल चुका रेड कॉरीडोर आज राष्ट्रीय समस्या बन चुका है। लेकिन यह विडंबना है कि आज आदिवासियों द्वारा नक्सलियों के खिलाफ अपने हक के लिए छेड़े गए आंदोलन को सच मानने के लिए कोई तैयार नहीं है। आदिवासी नैसर्गिक प्राणी है, वह अपनी परंपरागत एवं प्रशासनिक संस्थाओं से बंधा होता है। नक्सली कहतें हैं कि अपनी परंपरा छोड़कर कामरेड बन जाओ। ऐसे में आदिवासी खुद को कलंगी कटे हुए मुर्गे की तरह महसूस करते हैं। आज जब वही आदिवासी अपनी पहचान, परंपरा एवं संस्कृति को बचाने के लिए उठ खड़े हुए हैं तो नक्सली इस बात को सहन नहीं कर पा रहे हैं। आतंकवाद के खात्मे के लिए जनदबाव का होना बेहद जरूरी है। सलवा जुडूम को लेकर जो आतंक का तांडव आज हो रहा है, वो दर्शाता है कि किसी भी तरह का आतंकवाद जनता से डरता है। इस देश में नक्सलवाद एक जन आंदोलन के विकल्प के रूप में विकसित हुआ था जो आज गन-आंदोलन बनकर उभरा है। ये गन- मूवमेंट चलाने वाले लोग सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ खड़े होकर चुनौति प्रस्तुत करते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि वो सही हैं तो क्या हम गलत हैं? राहत कैम्पों में रह रहे आंदोलनकारियों की हिफाजत सरकार की जिम्मेदारी है। सिर्फ आंदोलनकारियों की ही नहीं बल्कि जो आंदोलन में शामिल नहीं हैं, उनकी भी जिम्मेदारी सरकार की है। नक्सली अगर आगे बढ़ रहे हैं तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है? इस पर भी सोचना होगा कि क्या दंतेवाड़ा मॉडल स्वीकार है अथवा नहींऋ यदि दमन चक्र में आदिवासियों का आंदोलन खत्म हुआ तो यह एक दुर्भाग्य होगा। अब प्रो-नक्सल एनजीओ गोलबंद हो रहे हैं, जो समस्या को और भी जटिल बनाने में जुटे हैं। नक्सलवादियों का वर्ग चरित्र और उनके जो आम दुुश्मन, हैं वो तो बड़े पूंजीपति, शोषक वर्ग है, लेकिन उनकी लड़ाई लंगोटी वाले आदिवासी से क्यों हो रही है। आखिर वे किसके लिए व्यवस्था परिवर्तन चाहते हैं। आज कम्युनिस्ट भी कह रहे हैं कि नक्सली जनविरोध के कारण हिंसक हो रहेहैं तो ऐसे में सवाल उठता है कि उनका मूल चरित्र क्या है? आदिवासियों की हर यात्रा में मैं पहले नंण् पर था, तो नक्सली मेरे ऊपर क्यों नहीं आरोप लगाते। मैने किसी अराजक भीड़ का नेतृत्व नहीं किया है, सलवा जुडूम एक अहिंसक आंदोलन है जिसे बदनाम किया गया है। कई बार सवाल उठता है कि नक्सलियों की मांगे क्या हैं? इस पर कर्मा कहते हैं कि वे कोई मांग नहीं करते, उन्हें विकास से कोई लेना देना नहीं है, वे तो क्रांति के माध्यम से सत्ता की हवस में ईंधन के तौर पर लोगों का इस्तेमाल कर रहे हैं। दोरनापाल में 40-45 घरों को आग लगा दी गई। ये सब नक्सलियों द्वारा किसी बड़ी लड़ाई के बायप्राड्क्टस हैं। आज आदिवासियों के मेले, मंडई, बाजार, गांव सब नक्सलवाद की भेंट चढ़ते जा रहे हैं। दूसरी बात जो नक्सलियों के लिए सिरदर्द बनी हुई है, वो है एसपीओ। एसपीओ सलवा जुडूम का हिस्सा नहीं है। वह तो सलवा जुडूम को मुख्यधारा में लाने का काम करता है और नक्सलियों के नेटवर्क को तोड़ता है। एसपीओ शु( रूप से गांव का लड़का है, जिसके बाप, भाई को मारा गया है, बहन की इज्जत लूटी गई हैऋ इसलिए नक्सलियों के खिलाफ उसमें जो अक्रामकता है वह किसी में नहीं है। एसपीओ प्रशासनिक व्यवस्था का एक अंग है, एक सैनिक है। जबकि सलवा जुडूम से जुड़े लोग आम आदिवासी हैं। यह कहा जाना गलत है कि एसपीओ को हथियार थमा दिये गए हैं। वैसे भी वह सरकार के पे-रोल पर है। अगर पुलिस को हथियार नहीं देगें तो क्या दिया जाएगा? इस समस्या से निपटने के लिए सरकार बस सोचती रहती है, किया कुछ नहीं जाता है। हम लोग समस्याओं के निदान की बजाय उसकी व्याख्या पर ज्यादा समय खर्च करते हैं। किसी समस्या से निपटने के लिए आपको मैदान में जाकर उसका सामना करना होगा, उससे निपटने की तकनीक और तरीका मैदान में मिलेगा, बंद कमरे में नहीं। आज सरकार और विपक्ष के बीच संवादहीनता की स्थिति आज पूरे देश में घातक बनती जा रही है। मुद्दों पर साझी आम सहमती कायम करके समस्याओं के निदान की जो शैली रही है, उसे हम पीछे छोड़ आए हैं।