कल ऑफिस में होली पर एक विशेष पेज तैयार करना था, विचार किया गया की क्यों न होली के मौके पर चुनावी रंग से भीगी कुछ कविताएं चस्पा कर होली के जायके को बरकरार रखा जाये. कुछ मित्रों तुकबंदी की और कविताएं चाँद पलों में तैयार हो गई. कुछ पंक्तियों का ओपरेशन किया तो लगा कि यार कवि तो हम भी बन सकते हैं. वैसे भी आजकल कवि बनने का ट्रेंड सा चल पड़ा है. संक्रमण की आंधी कुछ ऐसी है कि कॉमर्स और साइंस पढने वाले बच्चे भी जब पत्रकारिता पढने कॉलेज जाते हैं, पत्रकारिता कि पढाई तो दूर कवि पहले बन जाते है. भई मौका होलिका हो और पूरे कुएं में ही भांग हो तो, कुछ तो असर पड़ेगा ही...सो हमने भी शाम मेट्रो में सफ़र करते हुए दे एक दे मारी.....
आप भी पढ़िए और कविता के कीड़े को प्रोत्साहित करने क़ी परम्परा के मुताबिक दाद भी दीजिये
फूल खिले हैं, भँवरे गाएं
रंगों भरी फुहार है.
लेकिन तेरे बिन लगता मौसम ये बेकार है
मोर, पपीहा कोयल कूके
वीणा क़ी झंकार है
तेरी मीठी बोली हो तो मिसरी भी बेकार है
चन्दन महके, कलियाँ चहकें
खुशबु भरी बयार है
लेकिन तेरे बिन तो ये गुलशन भी बेकार है
इधर गया मैं, उधर गया मैं
भीड़ भरा बाज़ार है
तू न हो तो लगती दुनिया ये बेकार है
रूठ न जाना, दूर न जाना
आंसुओं क़ी धार है
क्योंकि तेरे बिन लगता मौसम ये बेकार है
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Wednesday, March 7, 2012
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