मेरा गाँव मेरा देश

Saturday, August 30, 2008

सूचना क्रांति और सशक्त ग्रामीण


अजय कुमार

Auद्दust 21, 2008

दृष्टिकोण। अकसर गांव के लोगों को जाति या जन्म प्रमाण-पत्र हासिल करने के लिए सैकड़ों किलोमीटर तक की यात्रा करना पड़ती है। इस कवायद में महज एक प्रमाण-पत्र प्राप्त करने के लिए उनका पूरा दिन बर्बाद हो जाता है।
उन्हें भू-अभिलेख (लैंड रिकॉर्ड) की एक प्रति हासिल करने के लिए पटवारियों के कई-कई दिन तक चक्कर काटने पड़ते हैं। यहां तक कि टेलीफोन या बिजली विभाग में शिकायत करना भी काफी मशक्कत का काम होता है। एफआईआर दर्ज करने की तो बात ही न की जाए तो बेहतर रहेगा।
सूचनाओं को अविलंब व न्यूनतम लागत पर लोगों को उपलब्ध करवाना शासन की जिम्मेदारी मानी जाती है। सरकारी क्षेत्रों में सूचना प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल कर इस अवधारणा को यथार्थ के धरातल पर उतारने के कई प्रयास किए गए हैं। इसे आजकल ई-प्रशासन (ई-गवर्नेस) के नाम से जाना जाता है।
भारतीय जनता ई-प्रशासन के लाभों का स्वाद कम्प्यूटरीकृत रेलवे आरक्षण, कर्नाटक में च्भूमि’ परियोजना के तहत भू-अभिलेख तक आसान पहुंच, आंध्रप्रदेश में ई-सेवा केंद्रों के जरिए बिजली बिलों इत्यादि का ऑनलाइन भुगतान, महाराष्ट्र में च्सरिता’ परियोजना के जरिए दस्तावेजों का शीघ्र पंजीयन और अन्य राज्यों में चल रही ऐसी ही कई परियोजनाओं के माध्यम से चख चुकी है।
सवाल यह है कि ऐसी सफल परियोजनाएं केवल एक या दो राज्यों तक ही सीमित क्यों रहना चाहिए? आखिर ई-प्रशासन के लाभ ग्रामीण जनता तक भी तो पहुंचें। इसी के मद्देनजर भारत सरकार ने राज्यों के साथ मिलकर राष्ट्रीय ई-प्रशासन योजना बनाई है। इसका मकसद ऐसी व्यवस्था बनाना है ताकि लोगों को कोई भी जानकारी पंचायत स्तर पर ही मिल जाए और उन्हें इधर-उधर भटकते हुए समय व पैसा बर्बाद न करना पड़े।
23 हजार करोड़ रुपए की इस योजना को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने वर्ष 2006 में मंजूरी दी थी और इसके 2009 तक अमल में आने की संभावना है। इस योजना के पीछे दृष्टिकोण (विजन) यही है कि च्आम जनता को सभी सरकारी सेवाएं उनके गांवों या कस्बों में एक ही आउटलेट के जरिए वहन करने योग्य कीमत पर उपलब्ध करवाना और इन सेवाओं की क्षमता, पारदर्शिता और विश्वसनीयता को बनाए रखना’।
सूचनाएं वास्तव में ग्रामीण जनता तक पहुंचें, इस बात को सुनिश्चित करने के लिए देश की सभी पंचायतों में लगभग एक लाख सिटीजन कियोस्क (ई-गुमटियां) स्थापित करने का प्रस्ताव है। इसमें निजी क्षेत्र व एनजीओ की भी मदद ली जाएगी। यह संभवत: पहला मौका होगा जब सूचना सेवाओं को गांवों पर केंद्रित किया गया है जहां देश की अधिसंख्य आबादी रहती है। ऐसी ही ई-गुमटियां इससे पहले पूर्वोत्तर राज्यों, जम्मू एवं कश्मीर और अंडमान व निकोबार द्वीप समूहों में स्थापित की जा चुकी हैं।
ई-प्रशासन की योजना में 27 परियोजनाएं मिशन के रूप में तैयार की गई हैं। इनमें से नौ परियोजनाएं केंद्र सरकार के अधीन होंगी जिनके तहत आयकर, कंपनी मामलों, पासपोर्ट, पेंशन, केंद्रीय सीमा एवं उत्पाद शुल्क इत्यादि विभागों का कम्प्यूटरीकरण किया जाएगा। अन्य कुछ परियोजनाओं पर राज्य सरकारें काम करेंगी जिनके तहत कृषि, भू-अभिलेख, पुलिस, कोषालय, संपत्ति कर, वाणिज्यिक कर, सड़क परिवहन जैसे विभागों और रोजगार कार्यालय, नगर निकायों व पंचायतों का कम्प्यूटरीकरण किया जाएगा। ई-अदालतें, ई-खरीद इत्यादि भी इस योजना के अंतर्गत हैं। राज्यों में इन ई-गुमटियों को डाटा केंद्र मदद करेंगे जबकि कनेक्टिविटी राज्य स्तरीय नेटवर्क च्स्वान’ द्वारा उपलब्ध करवाई जाएगी।
च्स्वान’ फाइबर ऑप्टिक आधारित होगा जो उच्च गति की ब्राडबैंड कनेक्टिीविटी राज्यों व जिलों से लेकर ब्लॉक मुख्यालय तक मुहैया करवाएगा। यह काम भी सार्वजनिक निजी भागीदारी के साथ किया जाएगा और इस पर 3,क्क्क् करोड़ रुपए से भी अधिक खर्च किए जाएंगे। ई-प्रशासन योजना के कुछ अन्य बिंदु जैसे सभी नागरिकों, व्यवसायों व संपत्ति के लिए एक विशेष पहचान कोड देना, प्रशिक्षण के जरिए कार्यकुशलता में इजाफा करना, प्रौद्योगिकी में अनुसंधान व विकास इत्यादि इसकी गुणवत्ता व सफलता को सुनिश्चित करेंगे। इस योजना में समग्र नजरिए के साथ निजी भागीदारी को भी आमंत्रित किया गया है ताकि सूचनाओं के संप्रेषण की यह प्रणाली टिकाऊ बनी रहे।
इस योजना की राह में कई बाधाएं भी हैं, जिनसे पार पाना होगा। अधिकांश ई-प्रशासन परियोजनाओं की सबसे बड़ी कमी यह है कि इनमें आम जनता को सूचनाएं उनकी स्थानीय भाषा में मुहैया नहीं करवाई जातीं। दूसरी बड़ी समस्या ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली की उपलब्धता आसान नहीं होना है जिससे इस योजना की रफ्तार कम होने की आशंका है।
तीसरी बड़ी समस्या यह है कि सरकारें अब भी मौजूदा प्रक्रियाओं एवं नियम-कायदों को बदलने से बच रही हैं जबकि इनके बदलाव से सूचनाओं के संप्रेषण की गति में सहायता ही मिलेगी। चौथी समस्या यह है कि इन परियोजनाओं के बारे में न तो प्रिंट और न ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से जनता में पर्याप्त जागरूकता फैलाई जा रही है। इसके अलावा ई-प्रशासन परियोजनाएं मोबाइल फोन के व्यापक दायरे में होने के बावजूद इसकी ताकत का पूरी तरह इस्तेमाल नहीं कर पा रही हैं।
इनसे भी बढ़कर सबसे अहम बात होगी सरकारी कर्मचारियों की मानसिकता में बदलाव करना। सरकारी कर्मचारियों की इस मानसिकता की वजह से कई ई-प्रशासन परियोजनाएं गति नहीं पकड़ पा रही हैं। इसके अलावा कार्यकुशलता बढ़ाने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम का अनुभव भी अच्छा नहीं रहा है। यह अनुभव बताता है कि कर्मचारियों को केवल प्रशिक्षण देने भर से काम नहीं बनता। सूचनाओं के आसान संप्रेषण के लिए कर्मचारियों को हर स्तर पर प्रोत्साहित करना भी जरूरी है।
च्सूचना ही शक्ति है’ और सरकारी कर्मचारी बिलकुल नहीं चाहेंगे कि आम जनता को इस शक्ति से लैस किया जाए। कुछ सरकारी कर्मचारियों के साथ मिलीभगत से कार्य करने वाले दलालों की रोजी-रोटी इन सेवाओं को उपलब्ध करवाने से चलती है।
ये दोनों एक ऐसा गुट बनाते हैं, जिसे तोड़ना काफी कठिन होगा। राष्ट्रीय ई-प्रशासन योजना की सफलता सुनिश्चित करते हुए अगर हम आम नागरिक की सूचना संबंधी जरूरतों को बेरोकटोक पूरा करना चाहते हैं तो इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक कुशलता और जनता व मीडिया का दबाव जरूरी है।

सूचना प्रौद्योगिकी एवं ग्रामीण विकास मामलों के विशेषज्ञ हैं।

Wednesday, August 27, 2008

तेजी से फैलता जा रहा है इंटरनेट का दायरा

इशिता रसेल
इंटरनेट की जड़ें ग्रामीण इलाकों में और गहराती जा रही हैं। दरअसल क्षेत्रीय भाषाओं में वेबसाइटों की बढ़ती संख्या लोगों को इंटरनेट से जोड़ने में मददगार साबित हो रही है।
खासतौर से युवा इन वेबसाइटों के प्रति बहुत आकर्षित हो रहे हैं। इंटरनेट रिसर्च फर्म 'जक्स्टकंसल्ट' द्वारा किए गए एक ताजा सर्वे के मुताबिक इंटरनेट का उपयोग करने वाला प्रत्येक सातवां व्यक्ति ग्रामीण इलाके से ताल्लुक रखता है।इस सर्वे के मुताबिक गांवों में शहरों की तुलना में कम उम्र के लोग इंटरनेट का उपयोग कर रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में कुल इंटरनेट उपभोक्ताओं में से 61 फीसदी ऐसे लोग हैं जिनकी उम्र 25 साल से कम है जबकि शहरों के मामले में यह आंकड़ा 50 फीसदी है। ग्रामीण क्षेत्रों में 14 फीसदी किशोर इंटरनेट का उपयोग कर रहे हैं जबकि शहरी क्षेत्र में यह संख्या 8 फीसदी है। सर्वे के मुताबिक ग्रामीण इंटरनेट उपभोक्ताओं में 50 फीसदी की तादाद दक्षिण भारतीयों की है। इसमें यह तथ्य भी उभरकर आया है कि इंटरनेट उपयोग करने वाले 72 फीसदी लोग अपनी क्षेत्रीय भाषा को तरजीह देते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे लोगों की संख्या 82 फीसदी है तो शहरों में 70 फीसदी लोग ऐसा चाहते हैं। हालांकि केवल 33 फीसदी ग्रामीण इंटरनेट उपभोक्ता ही क्षेत्रीय वेबसाइटों का उपयोग करते हैं।वैसे अभी तक कुल इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या 3.5 करोड़ तक ही पहुंच पाई है इनमें से 30 करोड़ लोग शहरों में हैं जबकि केवल 5 करोड़ ग्रामीण लोग ही इंटरनेट से जुड़ पाए हैं। गांवों में लोग मुख्य रूप से साइबर कैफे के जरिये ही इंटरनेट तक पहुंच रहे हैं। शहरी उपभोक्ता शादी कराने के लिए मैट्रिमोनियल साइट्स की शरण लेते हैं तो ग्रामीण उपभोक्ताओं का भरोसा अब भी स्थानीय और नजदीकी लोगों में बना हुआ है। यह बात भी सामने आई है कि लोग अपने घरों की बजाय अपने ऑफिस से ही ऐसी साइट को सर्च करने को तरजीह देते हैं।

Monday, August 25, 2008

अन्धविश्वास के चलते बहनों ने खोली भाइयों के हाथ से राखी

बिजनौर/राजा का ताजपुर
अंधविश्वास की जड़ें समाज में काफी गहरी जम चुकी है। यही कारण है कि जनपद के कई गांवों में बहनों ने अपनी रक्षा का वचन लेते हुए जो राखी सुबह अपने हाथों से भाईयों की कलाई पर बाधी थी, उसे चंद्रग्रहण पर अनहोनी होने के अंधविश्वास के चलते रात्रि में खुद ही खोल दिया।
अफवाह कहें या चंद्रग्रहण का कोप क्षेत्र के कई गांवों में सैकड़ों परिवारों ने शनिवार रात भाईयों की कलाईयों से आनन फानन में राखियां खुलवा दीं। ग्रामीणों का कहना था कि रात्रि चंद्रग्रहण के चलते पशुओं के नीचे खून पड़ा देखा गया। यह अफवाह कई ग्रामों में सुनने को मिली।
शनिवार देर रात तक चंद्रग्रहण को लेकर क्षेत्र में सनसनी व अफवाहें फैली रहीं। रातों रात संबंधियों ने अपने परिजनों को कलाई पर बंधी राखी खुलवा दी। कस्बा ताजपुर निवासी अरविंद कुमार, अशुं रानी, अतुल कुमार, राजेश, महेश्वरी व ग्राम पौटा निवासी संजीव कुमार, अखिलेश, पदम सिंह, ग्राम नांगल निवासी अशोक कुमार, भरत सिंह, मिलक निवासी मुकेश कुमार आदि के अनुसार शनिवार चंन्द्रग्रहण के चलते कलाईयों पर राखियां बंधी होने से बाहर बंध रहे उन के पशुओं के नीचे जगह-जगह खून पड़ा दिखाई दिया। यही अफवाहें अन्य कुछ गांवों में भी सुनने को मिलीं।
[जागरण]

सपनों में ओलंपिक पदक देखते हैं बच्चे

लखनऊ [सद्गुरु शरण]।
अभिषेक, राजकुमार, नासिर और मेहर सिंह दिन भर तो छह सितंबर से बठिंडा [पंजाब] में शुरू होने जा रही नेशनल बाक्सिंग चैंपियनशिप की तैयारी में जुटे रहते हैं, लेकिन थककर रात में सोते हैं, तो ओलंपिक के सपने आते हैं। मेरठ कैंप में अपने पंच पैने कर रहे यूपी के ऐसे ग्यारह बाक्सरों की नजर जाहिरा तौर पर अगले ओलंपिक पर है। पिछले साल नेशनल चैंपियनशिप व इससे पहले जूनियर चैंपियनशिप में कई मेडल जीत चुके अभिषेक हफ्ते भर पहले तक खुली आंखों से भी ओलंपिक का ख्वाब नहीं देखते थे, लेकिन यूपी पुलिस का यह बाक्सर अब आत्मविश्वास के साथ कहता है कि भिवानी का लड़का मैडल ला सकता है, तो हम यूपी वाले क्यों नहीं।
वास्तव में यूपी, बाक्सिंग और अभिषेक बीजिंग इंपैक्ट के प्रतीक भर हैं, अन्यथा शूटर अभिनव बिंद्रा, पहलवान सुशील कुमार तथा बाक्सरों अखिल, जितेंद्र व विजेंद्र ने बीजिंग में जो करिश्मा किया, उसने समूचे खेल परिदृश्य पर गहरी छाप छोड़ी।
लखनऊ साई सेंटर [स्पो‌र्ट्स अथारिटी आफ इंडिया] के बाक्सिंग कोच डगलस शेफर्ड बताते हैं कि अब तक पढ़ाई-लिखाई में कमजोर बच्चे ही यहां आते थे, जबकि कमजोर बौद्धिक क्षमता का असर खिलाड़ी के प्रदर्शन पर भी पड़ता है। बहरहाल, बीजिंग के सितारों पर जिस तरह धन और शोहरत बरस रही है, उसके बाद खेलों का कैरियर के तौर पर विकास तय है। अब कुशाग्र बुद्धि बच्चे भी खेलों को कैरियर बनायेंगे तो खेलों का स्तर अपने आप सुधरेगा। यही नजरिया पूर्व अंतरराष्ट्रीय हाकी खिलाड़ी एवं क्षेत्रीय क्रीड़ा अधिकारी आरपी सिंह का है, जिन्हें लगता है कि भिवानी के बाक्सरों से प्रेरणा लेकर निर्धन व मध्यवर्गीय परिवारों के बच्चे खेलों में कैरियर बनाने आयेंगे। वह कहते हैं कि पिछले ओलंपिक में शूटिंग में सिल्वर मेडल मिला था, इस बार गोल्ड। इस बार जिन खेलों में कांस्य पदक मिला है, अगली बार उनमें बड़े मेडल आ सकते हैं। आरपी सिंह कहते हैं कि दिमागी तौर पर मजबूत व होशियार बच्चे खेलेंगे, तो आश्चर्य नहीं कि हमने इस बार तीन मेडल जीते हैं, तो कभी हम तीस भी जीतें।
दरअसल, ताजा माहौल की सबसे खास बात यह है कि पहली बार क्रिकेट व हाकी से हटकर बाकी खेलों के लिए भी उत्साह-पूर्ण माहौल बना है। पूर्व राष्ट्रीय क्रिकेट चयनकर्ता आनंद शुक्ल बीजिंग में भारतीय खिलाडि़यों के प्रदर्शन से फूले नहीं समा रहे। उन्होंने कहा कि इससे ज्यादा खुशी किसी और चीज से नहीं मिल सकती। लड़कों ने दो बातें साबित कर दीं। पहली, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चमकने के लिए जोश और जुनून हो तो सुविधाओं की कमी बाधक नहीं। दूसरी, प्रतिभाओं की कमी नहीं है। अब यह सरकार व खेल संगठनों की जिम्मेदारी है कि वे प्रतिभाएं तलाशें और उन्हें सुविधाएं देकर तराशें। पूर्व अंतरराष्ट्रीय हाकी खिलाड़ी रजनीश मिश्र कहते हैं कि जब एक खिलाड़ी पदक जीतता है, तो उसके साथ वह खेल और पूरा देश ऊपर बढ़ता है। बीजिंग के प्रदर्शन से यही हुआ। कुछ साल पहले लोग तृतीय या चतुर्थ श्रेणी नौकरी के लालच में क्रिकेट या हाकी खेलते थे, लेकिन ओलंपिक के बाद बच्चे बाकी खेलों में भी कैरियर बनाने निकलेंगे।
खेल अधिकारी अनिल कुमार मानते हैं कि अब शूटिंग, बाक्सिंग व कुश्ती जैसे खेलों में बूम आना तय है। बाक्सिंग कोच संजय मिश्र की बात पर यकीन करें, तो बीजिंग इंपैक्ट ने पिछले एक हफ्ते में केडी सिंह बाबू स्टेडियम की उनकी कोचिंग में प्रशिक्षुओं की संख्या बढ़ा दी है। वह कहते हैं कि सानिया मिर्जा ने क्रिकेट व हाकी से हटकर जिस तरह टेनिस का ग्लैमर बढ़ाया, उसी तरह अब बाक्सिंग, कुश्ती व शूटिंग का भी रुतबा बढ़ेगा।
बाक्सर अभिषेक शाह भी कहते हैं कि बेशक अब बाक्सिंग में भी पैसा और शोहरत के दरवाजे खुल गए हैं। वुशू चाइनीज मार्शल आर्ट के कोच विजेंद्र सिंह कहते हैं कि इस माहौल का सबसे ज्यादा असर मीडिया पर पड़ेगा। वह क्रिकेट के मोहपाश से बाहर निकलेगा, तो उसे दिखेगा कि उसने अब तक कितने खेलों और कितनी प्रतिभाओं को नजरअंदाज कर रखा था। मीडिया बाकी खेल दिखायेगा, तो सरकार भी देखेगी और अपने बच्चों को खिलाड़ी बनाने को लालायित अभिभावक भी।
(याहू.कॉम)

नदी भारत की, तर पाकिस्तान

केलंग [हिमाचल,अशोक राणा]।
भारत-पाकिस्तान के रिश्तों की कड़वाहट बेशक आधी सदी गुजरने के बावजूद बरकरार है, लेकिन उन्मुक्त नदियां सरहदों और रिश्तों में खटास की परवाह कहां करती हैं। जीवंत उदाहरण है भारत के एक छोटे से कबायली क्षेत्र से निकलने वाली पौराणिक नदी चिनाब। पाकिस्तान के पूर्वी हिस्से का खुशबूदार बासमती चावल चिनाब के दम पर ही दुनिया में महक रहा है।
कुछ दिनों पहले हमने उन पाकिस्तानी नदियों के बारे में समाचार छापा था, जिनके पानी से भारत के खेत सींचे जाते हैं। इस बार ब्योरा भारत की एक ऐसी ही नदी का। लेकिन इस मामले में एक पेंच यह है कि करीब एक हजार मील लंबी चिनाब नदी भारत में 380 मील बहने के बाद जम्मू-कश्मीर के अखनूर से होकर पाकिस्तान में प्रवेश करती है। यानी हम नदी की इतनी लंबाई का फायदा नहीं ले पा रहे हैं।
दूसरी ओर पाकिस्तान के मुजरावाला के समीप सन् 1920 में निर्मित अप्पर पारी तथा लोअर बारी चिनाब नहर लाहौर व लायलपुर के अलावा पंजाब की दो लाख हेक्टेयर भूमि सींच रही है। लायलपुर चावल की विख्यात किस्म बासमती चिनाब के पानी से ही फल-फूल रही है। पाकिस्तान की दो बड़ी विद्युत परियोजनाएं भी चिनाब पर हैं।
आजादी के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तानी राष्ट्रपति जनरल अयूब खान के बीच हुई सिंधु जल संधि ने चिनाब के पानी से उसके उद्गम स्थल भारत को वंचित कर दिया। हिमाचल के कबायली क्षेत्र लाहुल व पांगी किलाड़ से चंद्राभाभा के नाम से बहने वाली चिनाब पाकिस्तान की कृषि के साथ बिजली परियोजनाओं के लिए भी संजीवनी बन चुकी है।
इधर भारत इस क्षेत्र में पानी की समस्या से जूझ रहा है। हाल ही में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने रितवाड़ में निर्मित जिस सलाल बिजली परियोजना का उद्घाटन किया है, पाकिस्तान की आपत्ति के चलते इस परियोजना को बनने में करीब तीस वर्ष का समय लगा। हालांकि लाहुल-स्पीति में इस नदी पर लगभग एक दर्जन बिजली परियोजनाओं को बनाने की योजना अंतिम चरण में है।
अंतरराष्ट्रीय मामला होने के कारण केंद्रीय जल आयोग के लोग खुलकर बात करने से कतराते हैं, लेकिन नाम न छापने की शर्त पर आयोग के एक अधिकारी ने बताया कि चिनाब नदी के पानी का औसतन मूल्य साठ हजार क्यूसेक फीट के आसपास रिकार्ड किया गया है।
लाहुल के वयोवृद्ध इतिहासकार छेरिंग दोरजे ने बताया कि लाहुल के बारालाचा दर्रे से निकलने वाली चिनाब नदी का जिक्र पुराणों में भी आया है। पुराणों में इसका नाम अस्किनी है। लाहुल-स्पीति के उपायुक्त सी पाल रासू का कहना है कि सिंधु जल संधि के मुताबिक झेलम, सतलुज और चिनाब नदियों के पानी पर पाकिस्तान का हक है। (याहू.कॉम)

एक जंग जिंदगी से

वाराणसी [प्रमोद मालवीय]।
मां ने कहा हिम्मत क्यों हारते हो। पहले उसने मेरे कटे हाथों की ठूंठ में रस्सी बांधी, फिर उससे फरसा बांधा और मुझे खेत में उतार दिया। इस तरह वह रोज खेत गोड़ने का अभ्यास कराती। धीरे-धीरे बिना रस्सी बांधे कांख में फरसे का बेंत फंसाकर काम करने की आदत पड़ गई..और अब तो ट्रैक्टर भी चला लेता हूं।
यह है वाराणसी का राम सहाय उर्फ बबलू, जिसकी कोहनी के पास से दोनों हाथ कटे हैं, लेकिन जब वह खेत की कोड़ाई-जुताई करता है, ट्रैक्टर चलाता है तो देखने वाले चकित हो जाते हैं। बबलू कर्मठ है, लेकिन उसकी सफलता में बड़ा हाथ उसकी मां शांति देवी का है। दलित और निर्धन परिवार की उस मां का, जिसने अपने जन्म से विकलांग बेटे को खुद पर दया दिखाने की यातना से बचाकर उसे अपने पैरों पर खड़ा होने का रास्ता दिखाया।
बबलू ने आज अगर नाउम्मीदी और अंधेरे की दुनिया से निकलकर जीने का संकल्प लिया, तो उसके साथ इसका श्रेय उसकी मां को भी है। अब खेती और मेहनत-मजदूरी उसके लिए मुश्किल काम नहीं रहा। दूसरों के लिए वह मिसाल तो बन ही चुका है।
विभिन्न अध्ययनों से भी यह बात सामने आई है कि अक्सर जीवन की दौड़ में आगे वही रहते हैं, जिन्हें सामाजिक, शारीरिक और आर्थिक अड़चनों का सामना करना पड़ता है। सेवापुरी विकास खंड के हाथी गांव में रहनेवाला 25 साल का बबलू जन्म से ही दोनों हाथों से लाचार है।
बनना तो वह शिक्षक चाहता था, लेकिन दलित परिवार में जन्म लेने के कारण एक तो गरीबी हिस्से में मिली, ऊपर से पिता की बीमारी ने हौसला तोड़ दिया। आठवीं पास करते ही बड़े परिवार का जिम्मा उसके सिर पर आ गया। पढ़ाई छोड़कर खेत न होते हुए भी जब उसने किसानी करने का संकल्प लिया, तो मां शांति देवी उसकी मार्गदर्शक बन गई।
बबलू बताता है कि बटाई पर दूसरों के खेत लेता हूं और उसकी जोताई-बोआई कर परिवार की नैया खींचता हूं। काम के लिए वह कछवां और भदोही के कुछ व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से भी संपर्क रखता है। बबलू के साथ एक दुर्योग यह भी जुड़ा है कि उसका दूसरा भाई कमलेश [16 वर्ष] मानसिक रूप से कमजोर है, लिहाजा उसका हाथ बंटानेवाला कोई नहीं। वह अपनी सारी हसरतें छोटी बहन किरन [10 वर्ष] को डाक्टर बनाकर पूरी करना चाहता है।
साहस और लक्ष्य के प्रति संकल्प के चलते विकलांगता उसके लिए अभिशाप नहीं है। बबलू अक्सर इस शेर के साथ लय मिलाता है- हिम्मत बुलंद है अपनी, पत्थर-सी जान रखते हैं। अपने हर इक कदम में हम सौ इंकलाब रखते हैं। (साभार : याहू)

जनता कर रही है डी.एम. से जवाब-तलब




विमल कुमार सिंह/आजमगढ़-उत्तरप्रदेश
अबू सलेम और सिमी आतंकवादियों की जन्मस्थली का कलंक झेल रहे आजमगढ़ के लोगों ने अपने जिले में एक अनोखी पहल की शुरुआत की है। दिनांक 13 अगस्त, 2008 को आजमगढ़ के कुछ नागरिकों ने एक अभियान के तहत डी.एम. अर्थात जिलाधिकारी से सवाल पूछना शुरू किया है कि पिछले चार महीनों में उन्हें जनता की ओर से कुल कितने आवेदन प्राप्त हुए? इसी के साथ पूछा जा रहा है कि आवेदन किसकी ओर से और कब दिया गया? आवेदन में क्या मांग की गयी? आवेदन पर जांच करने की जिम्मेदारी किस अधिकारी को और कब दी गयी? अंत में जिलाधिकारी से प्रत्येक आवेदन पर की गयी कार्रवायी का संक्षिप्त विवरण मांगा गया है। इसी तरह जिलाधिकारी को प्राप्त शिकायती पत्रों के बारे में भी जानकारी मांगी जा रही है।

आजमगढ़ के कोने-कोने से लोग सूचना के अधिकार के तहत यही सूचना जिलाधिकारी से मांग रहे हैं। सूचना के अधिकार के क्षेत्र में काम कर रहे देश भर के कार्यकर्ताओं ने भी इस अभियान को अपना समर्थन दिया है। 29 अगस्त को मैगसैसे पुरस्कार विजेता एवं सूचना के अधिकार को प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले श्री अरविन्द केजरीवाल तथा वरिष्ठ पत्रकार श्री रामबहादुर राय सहित देश भर के कई सामाजिक कार्यकर्ता जिला मुख्यालय में जाकर जिलाधिकारी से वही सवाल पूछेंगे जो सवाल जिले की जनता जिलाधिकारी से इन दिनों पूछ रही है। इससे पहले 28 अगस्त को ये लोग जिले के मार्टिनगंज ब्लाक में जाकर वहां के कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाएंगे।

डी.एम. से ही सवाल-जवाब क्यों, यह पूछे जाने पर अभियान की योजना बनाने वालों में से एक मार्टिनगंज ब्लाक के ही इंद्रसेन सिंह ने बताया कि जिले में नौकरशाही का बहुत खौफ है। सूचना मांगने वालों का परेशान करने की घटनाएं यहां आम हैं। खुद उन्हें गांव में आए पैसे का हिसाब मांगने के कारण ग्रामप्रधान और स्थानीय अधिकारियों के गुस्से का शिकार होना पड़ा। उन्हें एक फर्जी मुकद्दमें में फंसा कर दो महीने जेल के लिए जेल भेज दिया गया। ऐसी स्थिति में जरूरी था कि लोगों का डर दूर करने के लिए सीधे स्थानीय प्रशासन के मुखिया यानि डी.एम. से ही सवाल-जवाब किया जाए और वह भी सामूहिक रूप से। संगठित अभियान होने के कारण जहां नौकरशाही सवाल पूछने वालों को परेशान नहीं कर पाएगी, वहीं लोगों के बीच इस कानून को लेकर जागरूकता भी फैलेगी। इसका परिणाम होगा कि लोग आने वाले समय में बिना डरे इस कानून का इस्तेमाल कर सकेंगे। नौकरशाही को भी साफ संदेश जाएगा कि वे अब अपने उच्च अधिकारियों एवं राजनीतिक आकाओं के साथ-साथ जनता के प्रति भी जवाबदेह है।
(लेखक भारतीय पक्ष-मासिक पत्रिका के संपादक हैं)
मोबाइल - 9868303585
vimal.mymail@gmail.com

साहूकार-मुक्‍त गॉंव



मराठवाडा ग्रामीण बैंक द्वारा भविष्‍यकालीन र्शन...



क्‍या हम कभी भारत के ग्रामीण लोगों को साहूकारों के पंजों से छुडा सकते हैं\ जवाब है एक जोरदार हॉं ! ! दरअसल यह पहले से ही मनीलेंडर-फ्री विलेज (साहूकार मुक्‍त गॉंव) (MLFV) में हो रहा है। यह योजना महाराष्‍ट्र राज्‍य के नांदेड जिले में मराठवाडा ग्रामीण बैंक (MGB) के पायलट प्रकल्‍प के तहत कार्य कर रही है। SHG प्रवेश के आधार पर नौ गॉंवों का चुनाव कर लिया गया था। यह योजना अप्रैल 2004 में प्रस्‍तुत की गई थी।
इस योजना का मुख्‍य उद्देश्‍य निजी तौर पर कर्ज देनेवाली गैर-संस्‍थात्‍मक, सूदखोर, शोषणपूर्ण ग्रामीण ऋण यंत्रणा को खत्‍म करना है। ग्रामीण लोगों को SHGs और MGB द्वारा कर्ज मिल सकता है।

वास्‍तविकता
बैंकों पर सामाजिक नियंत्रण की अवधारणा भारतीय बैंकिंग प्रणाली में सब को कर्ज मिले इस उद्देश्‍य से सोची गई थी। खास तौर पर गरीब लोगों को, वहनीय शुल्‍क के साथ, ताकि निजी साहूकारों की मनमानी खत्‍म की जा सके। 1977 में, ग्रामीण कर्ज प्रणाली को सशक्‍त करने के लिये क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्‍‍थापना की गई। इस प्रकार सही मायने में, किसानों और अन्‍य लोगों का निजी क्षेत्र से कर्ज लेना यदि पूरी तरह खत्‍म न भी किया गया तो भी, कम करने के लिये यह योजना बनाई गई थी।
लेकिन 28 वर्षों के बाद, जब हम पीछे मुड कर देखते हैं, तो मालूम होता है कि हालात में ज्‍यादा बदलाव नहीं आया है। ग्रामीण अभी भी संस्‍थागत या गैर संस्‍थात्‍मक साहूकारों के कर्ज के नीचे पिसते रहते हैं। किसान नियमों की अधिकता के कारण संस्‍थात्‍मक कर्ज लेने के लिये तेजी से अपात्र हो रहे हैं। जिसके परिणामस्‍वरूप वे निजी साहूकारों के पास जाते हैं जो आखिर तक उनका शोषण करते हैं।
अवधारणा
MLFV की अवधारणा सरल है। इस पहल के तहत, SHGsMGB के विस्‍तार के रूप में काम करती हैं बिलकुल दूर के क्षेत्रों में भी ग्रामीणों से संपर्क करती हैं। बैंकों के ग्रामीणों तक न पहुँच पाने के कारणों में भौतिक सीमाओं का होना भी है। साथ ही छोटे खातों के रखरखाव में ज्‍यादा खर्च आता है। SHG ग्रामीण अर्थ के लिये बहुत सशक्‍त, शुल्‍क प्रभावित फिर भी लोकतांत्रिक और पारदर्शी संरचना प्रस्‍तुत करती हैं। ये बैंक और किसानों के बीच मध्‍यस्‍थ का काम करती है जिस से ग्रामीण ऋण निजी साहूकारों की जगह ले सकता है।

काम का तरीका
MGB ने SHGs को सशक्‍त बनाने की नीति अपनाई हुई है। पहले इन्‍होंने SHGs का अपने योगदान से संवर्धन किया। इसके तहत उनके द्वारा SHGs को बढावा देने के लिये, स्‍वयंसेवकों की सूची बनाने, विशेषत: महिलाओं की, आंतरिक तौर पर ऋण देने के लिये, एक छोटी ऋण सीमा निर्धारित कर दी गई। बाद में, MGBSHGs की यह सीमा बढा देती है, और उन्‍हें ग्रामीणों की जरूरतों को पूरा करने के लिये बढावा देती है, जब बैंक की औपचारिकताऍं सामान्‍य तौर पर उन्‍हें साहूकारों के पास जाने को विवश करती हैं।
MGB, जहॉं बैंक उपलब्‍ध होते हैं वहॉं लोगों को संस्‍थात्‍मक ऋण देने के लिये ग्रामीण ऋण योजना तैयार करती है। यह SHGs के काम का सभा, ओरिएन्‍टेशन कैंप के जरिये निरंतर निरीक्षण करती है। अनुभवों को बॉंटने के लिये कार्यशाला का प्रबंध करती है और स्‍वैच्छिक प्रशिक्षण तथा गैर सरकारी संस्‍थाओं से परिचित कराती है। इस पूरी प्रणाली के दौरान, समयानुसार प्रगति का पुनरावलोकन किया जाता है। इस प्रकार का पहला पुनरावलोकन 17 सितंबर, 2004 में किया गया था। यह एक संमिश्र कार्यशाला थी जिसमें SHGs के सभी नेता, स्‍थानीय किसान क्‍लब के स्‍वयंसेवक, NGOs और सामाजिक यांत्रिकी के विशेषज्ञों ने हिस्‍सा लिया। इसके अलावा, चेयरमन संबंधित गॉंवों में सभाऍं लेते हैं ताकि ग्रामीणों से जमीनी स्‍तर का (वास्‍तविक) प्रत्युत्तर मिल सके।

सफलता की कहानी
SHGs और एक प्रेरित ग्रामीण स्‍वयंसेविका, श्रीमती विजया धुरंधरे को धन्‍यवाद। पायलट प्रकल्‍प के तहत गॉंवों में से एक गॉंव साठेवाडी ने अपने आप को 18 अक्‍तूबर, 2004 को साहूकारमुक्‍त घोषित किया। पूरा गॉंव SHGs में शामिल होता है; कम से कम एक परिवार से एक व्‍यक्ति SHGs का सदस्‍य है। 1500 की आबादी वाले इस गॉंव में अब 28 SHGs हैं। उन्‍होंने अब तक बचत खाते में रू.4,80,000/- (11,000 यूएस डॉलर) का कारोबार किया है। MGB ने SHGs को रू.1 मिलियन (23,000 यूएस डॉलर) से भी ज्‍यादा धन दिया है। ग्रामीण महिलाऍं और युवा SHGs से स्‍वैच्छिक रूप में, व्‍यवसाय के लिये और कृषि संचलन के लिये कर्ज लेते हैं। अब कोई भी आर्थिक जरूरतों के लिये निजी साहूकारों पर निर्भर नहीं है। अब यह एक साहूकार मुक्‍त गॉंव है।

संभावना
रोजगार, अर्थ व्‍यवस्‍था और संसाधनों के मामले में ग्रामीणों को स्‍वायत्त बनाने के लिये MLFV योजना का विस्‍तार किया जा सकता है। यह इस प्रकार होगा:
· जिन उत्‍पादों को उच्‍च तकनीक और भारी लागत की जरूरत नहीं होती है, उनके उत्‍पादन और उन्‍हें बाजार में लाने के लिये अग्रिम व पीछे की ओर कडियॉं स्‍थापित करना; ऐसे बहुत से उत्‍पाद हैं जिनकी ग्रामीण बाजारों में बहुत बडी मांग है और जिनका गॉंवों में ही थोडे से प्रशिक्षण से उत्‍पादन किया जा सकता है जैसे, कपडा, स्‍टेशनरी की चीजें, और रोमर्रा के उपयोग की घरेलू वस्‍तुऍं। एक ही गॉंव या बस्‍ती की विभिन्‍न SHGs एक विशेष प्रकार की समूह गतिविधि चला सकती है जिस से कि उन्‍हें कच्‍चे माल के लिये और उनकी तैयार चीजों के लिये बाहर की एजन्‍सी पर निर्भर न रहना पडे।
· गॉंवों में स्‍व-रोजगार के लिये वोकेशनल प्रशिक्षण देना। उदा.:साठेवाडी के युवाओं और पुरूषों को इस साल गन्‍ने की फसल उगाने की जरूरत नहीं पडी क्‍योंकि उनके अपने गॉंव में ही बढी हुई आर्थिक गतिविधियों के कारण रोजगार की उपलब्‍धता बनी रही।
· आर्थिक परिमाणों तक पहुँचने के लिये SHGs के जरिये सामूहिक खेती को बढावा देना। प्राकृतिक संसाधनों का सही उपयोग, विशेषत: पानी और जमीन; जल प्रबंधन और सामूहिक ग्रामीण योजनाके तहत सामाजिक जंगलों की देखभाल।
· सामाजिक अभियांत्रिकी समूहों को ग्रामीण स्‍वास्‍थ्‍य कर्मचारियों को सफाई, स्‍वास्‍थ्‍य और प्राथमिक उपचार के बारे में प्रशिक्षण देने के लिये ज्‍यादा सहभागियों को शामिल करना।

अवसर
MLFV (साहूकार मुक्‍त गॉंव) योजना के तहत मुडाव के बहुत सारे अवसर हैं क्‍योंकि भारत में अब SHG गतिविधि सशक्‍त हो चुकी है। भारत का नैशनल बैंक फॉर ऍग्रीकल्‍चर एण्‍ड रूरल डेवलपमेन्‍ट (NABARD) काफी सारी एजेन्सियों को बहुत ही अच्‍छा समर्थन दे रहा है। इस खामोश फिर भी ताकतवर क्रांति में कुछ 3,024 भागीदार शामिल हैं।
आज, परिसूचित व्‍यावसायिक बैंकों की करीब 60,000 ग्रामीण, सेमी-अर्बन और शहरी शाखाऍं हैं। जिनमें से केवल 35,000 शाखाऍं SHG-बैंक लिंकेज कार्यक्रम में प्रत्‍यक्षरूप से भाग लेती हैं। यदि इन 60,000 शाखाओं ने हिस्‍सा लिया तो जबरदस्‍त परिणाम मिलेंगे। भारत में करीब 6,00,000 गॉंव हैं। यदि एक शाखा ने एक वर्ष में एक गॉव को चार साल के लिये गोद ले लिया, सभी 6,00,000 गॉंवों में पहुँच हो सकती है। इस प्रकार भारत के सभी ग्रामीण लोगों को बैंकिंग क्षेत्र के छत्र के नीचे लाया जा सकता है और निजी साहूकारी के श्राप से मुक्त किया जा सकता है।
(साभार : महिंद्रा किसान मित्र)