मेरा गाँव मेरा देश

Thursday, November 29, 2007

सूचना का अधिकार और पारंपरिक जनसमाज










डा. स्मिता मिश्र
लोकतन्त्रिक व्यवस्था को समृद्ध और सुरक्षित बनाने के लिए नागरिकों के अधिकारों में एक और अधिकार जुड़ गया है; `सूचना पाने का अधिकार।´ इसका अर्थ है कि प्रत्येक नागरिक को अपने जीवन के लिये जरूरी सूचना प्राप्त करने का अधिकार है। ऐसा माना जा रहा है। इस अधिकार से जहां शासन की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता आने की संभावना है वहीं नागरिकों की लोकतन्त्रिक सक्रियता बढ़ाने का सर्वाधिक कारगर उपाय भी सिद्ध होगा। भारतीय पारंपरिक ग्रामीण जनसमाज जहां सूचना का अधिकार तो दूर की बात है `अधिकार´ शब्द की ही व्याप्ति नहीं है। और यदि है तो वह प्रभुता संपन्न लोगों तक ही सीमित है। तो यह सोचने की बात है कि `सूचना का अधिकार´ नामक कानून किस तरह उन लाखों-असंख्य लोगों तक पहुंचेगा और वे लोग किस प्रकार इससे लाभािन्वत हो सकेंगे! लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि कस्बों और गांवों के लोग नगरों या महानगरों से जागरूक नहीं होते। कस्बों और गांवों से ही अनेक नेता निर्वाचित होकर शहरों में आते हैं, विचार मंथन में शिरकत करते हैं और उसका प्रभाव लेकर वापिस गांव या कस्बे लौटते रहते हैं तो उन्हें भी अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए वहां के लोगों में विचार-मंथन निष्कर्षों को संप्रेषित करते रहना पड़ता ग्रामीण शैक्षिक संस्थाओं के व्यक्ति पुस्तकों, समाचारपत्राों, शहरी संपको± के द्वारा नयी चेतना से संपन्न होते रहते हैं। तीसरे पंचायतों में भी अब शिक्षित, विवेकवान लोग शामिल होते हैं। वे भी नये विचारों के संवाहक हो सकते हैं। इनके ही द्वारा जनता की पारंपरिक विचार जड़ता को तोड़ा जा सकता है। और विचार मंथन के क्षेत्रा में जो कुछ नया हो रहा है उसकी सूचना से उसे जोड़ा जा सकता है। अब विचारणीय है कि यह कार्य किस-किस स्वरूप में हो सकता है। ज़ाहिर है कि उपदेश या आदेश का प्रभाव स्थाई नहीं होता। जरूरत इस बात कि है कि जनता को प्रीतिकर ढंग से नवचेतना की ओर उन्मुख करना है। और इस कार्य के लिये वे माèयम अिध्क कारगर होंगे जो जनता की पारंपरिकता से जुड़े हों। इनमें सर्वप्रथम मैं लोकगीतों की भूमिका को रूपायित करना चाहूंगी। लोकगीतों का लोकजीवन में अत्यंत व्यापक महत्व है। इनमें उनके सुख-दु:ख, अभाव-संघर्ष, समस्याएं, वर्गचेतना, वर्णचेतना, नर-नारी की अद्भुत प्रभावशाली व्याप्ति दिखाई पड़ती है। ये लोकगीत जीवन के सुख दु:ख, उल्लास-विषाद्, )तु मौसम, क्रिया-कलाप आदि अनेक संदभो± से जुड़े होने के कारण संवेदना और रूप के वैविèय से आभोक्ति होती है। ऐसे शक्तिशाली माèयम का उपयोग नये कानून, नयी चेतना के विकास के लिये निश्चित रूप से किया जा सकता है। यहां सरकार और एनण्जीण्ओण् की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है कि वह लोगगायकों को पफैलोशिप आदि देकर नयी चेतना के गाने बनाये और उनका प्रसार करे। जैसे एक लोकगीत में बांझ स्त्राी अपने बांझपन के कारण घर-परिवार और समाज से प्रतािड़त होती है। और आत्महत्या करने के लिये नदी, बाघिन, आग आदि के पास जाती है और प्रार्थना करती है कि वे उसे मार दे किन्तु सभी यह कहकर मना कर देती हैं कि उसे मारने से वे भी बांिझन हो जाएंगी। अंत में ध्रती के पास जाती है। ध्रती तो मां है। वह उसे अपने में समा लेती है। अब यहां पर ध्रती के माèयम से स्त्राी की नयी उफर्जा को जाग्रत करने का संदेश दिया जा सकता है कि ध्रती उस स्त्राी को स्वाभिमान से जीने को प्रेरित करती है।बेटी ससुरा में रहिह तू चांद बनकर सबकि पुतरि के विचवा, पुरान बनकर भिनइ सबसे पहिले उठिह, ननद के मुंह से कबहु त लगिह ससुराजी के बाजे खरउफह, पानी लेके पहिले जइह। इस तरह के गीतों में जहां लड़की को ससुराल में मर्यादापालन सिखाया जा रहा है वहीं कर्तव्यबोध्, आत्मसम्मान भी जाग्रत किया जा सकता है। इन गायकों के अनेक मंच हो सकते हैं। गांव-गांव में छोटे-छोटे कवि सम्मेलन, सरकार के अनुाद से बाजार, हाट, मेला, उत्सव, स्कूल, पंचायत आदि मेें मजमा इकट्ठा कर अपनी बात कह सकते हैं। रेडियो, टीण्वीण् के माèयम से इन गीतों को निरंतर प्रसारित किया जा सकता है।एक बहुत शक्तिशाली माèयम है नुक्कड़ नाटक का। नाट्य मंडलियां जगह-जगह नुक्कड़-नाटक आयोजित कर नयी चेतना का प्रसार करती रहती है। ये मंडिलियां देहात जाकर नये अिध्कार, नये कानून का प्रचार प्रसार करने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इसी प्रकार कठपुतली या बंदरों का खेल तमाशा में लोककथा का प्रसार होता है। इस लोककथा के ढांचे भी पारंपरिक स्वर के स्थान पर नये स्वर को प्रमुखता दी जा सकती है। इसके लिये सरकारी तंत्रा इन लोक कलाकारों को आर्थिक रूप से सहायता करके प्रचार माèयम के रूप में प्रयोग कर सकती है। पंचायत का भी विभिन्न तरीकों से इस्तेमाल हो सकता है। पंचों को सरकार नयी सूचनाओं से अप-टु-डेट करे। उनके वर्कशॉप हों ताकि वही पंच गांव को नयी सूचनाओं से अप-टू-डेट कर सके। इस अवसर पर आगे-पीछे मनोरंजक माèयमों का प्रयोग किया जा सकता है। यहां पिफल्म भी दिखाई जा सकती है। पिफल्म एक अत्यंत सशक्त माèयम है। ऐसी पिफल्में जहां ग्रामीणों ने, महिलाओं ने एकजुट होकर अपने हक की लड़ाई लड़ी हो चाहे वह मंथन हो, लगान हो या मिर्च मसाला। इसी प्रकार समाचार पत्राों की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण है। जैसे कुछ वर्ष पहले मèयप्रदेश के टीकमगढ़ जिले की पीपरा बिमारी ग्राम पंचायत की अनुसूचित जाति की सरपंच गुंदिया बाई को वहां के प्रभावशाली लोगों ने स्वतंत्राता दिवस पर झंडा पफहराने से रोकने पर वहां समाचार पत्राों ने इस घटना को भरपूर प्रचारित किया। परिणामस्वरूप आगामी स्वतंत्राता दिवस पर मुख्यमंत्राी ने स्वयं गुंदिया बाई के हाथों टीकमगढ़ जिला मुख्यालय पर झंडा पफहरवाया। इस दिशा में कथित राष्ट्रीय समाचार पत्राों की अपेक्षा छोटे पत्रा-पत्रिाकाएं बेहतर सि( हो रहे हैं। यहां एनण्जीण्ओण् की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। कई एनण्जीण्ओण् के द्वारा छोटी-छोटी जगहों से बेहतर समाचार-पत्रा-पत्रिाका निकाल रहे हैं। जैसे मèयप्रदेश में देवास जिले से एकलव्य संस्था - `पंचतंत्रा´ पत्रिाका, पीण्आईण्आईण् `ग्रासरफट´ निकालती है। `खबर लहरिया´ समाचार पत्रा को `चमेली देवी´ पुरस्कार मिला। तब इसकी संपादक मीरादेवी व संवाददाता दुगाZ मिथिलेश आज के पत्राकारों की तरह नहीं हैं, न इनके शरीर पर ग्लैमरस ड्रेस पोशक है न मेकअप। उप अपनी जमीन की भाषा में समाचार प्रस्तुत करने का जो अंदाज देवगांव वह बड़े-बड़े समाचारपत्राों में नहीं दिखाई पड़ती। आज हमारे अखबारी भाषा में जो तेवर गायब होते जा रहे हैं वे यहां पूरी ताकत के साथ मौजूद हैं। इनके विषयों में जहां विकासमूलक, स्थानीय मुद्दे हावी रहते हैं, वहीं राष्ट्रीय स्तर की हलचलों से भी ये नावाकिपफ नहीं रहते। इसे वायन की सहायता से भी प्रस्तुत किया जा सकता है। एपफण्एमण् पर इसे डाला जा सकता है। गांववालों की ही आवाज में गांव से जुड़े मुद्दों पर सूचना प्राप्त करने, उनपर विश्लेषण करने तथा राय बनाने में ये अखबार महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इसके अतिरिक्त धार्मिक सत्संग, अभियान जत्था, स्वयं सहायता ग्रुप आदि भी सूचना के अिध्कार को ग्रामीणों तक पहुंचाने में अत्यंत सहायक सि( होंगे। ये नारी संबंध्ी मुद्दे जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा, अिध्कार, स्वरोजगार आदि पर जागरूकता लाने के कापफी कारगर सि( होंगे। आखिर में एक कविता से बात खत्म करफंगी आकाश से बहती है एक नदी और उफपर ही उफपर पी लेता कोई उसे ध्रती प्यासी की प्यासी रहती है और कहने को आकाश से नदी बहती है। यदि सूचना का अिध्कार नामक कानून आकाश से उतरकर प्यासी ध्रती तक पहुंचेगा तभी लोकतंत्रा की सही पहचान होगी अन्यथा कागजी कानूनों की सूची में एक कानून और जुड़कर रह जाएगी।

(लेखिका दिल्ली विश्वविद्यलय मे लेक्चरर और मीडिया विश्लेषक हैं)

Wednesday, November 28, 2007

सोपान का सफर


ग्रामीण विकास को समर्पित पत्रिका सोपान step दो वर्ष से भी ज्यादा का सफर तय कर चुकी है। इस सफर में हमने न केवल ग्रामीण अंचलों की समस्याओं; बल्कि ग्रामीण परिवेश के निवासियों की उपलब्धियों और मुद्दों के आलावा विकास से जुडे राष्ट्रीय मुद्दों से आपको भी जोड़ने का प्रयास किया है। अपने लड़खड़ाते हुए क़दमों के बावजूद साहस नहीं खोया और धीरज से अपने काम में जुटे रहे। शायद इसी का परिणाम है कि सोपान को आज आप सब की प्रशंसा प्राप्त हो रही है। छ्होते से इस सफर मी हमने ढेरों अनुभव भी बटोरे हैं, कभी मिलकर साझा करेंगे कि, मीडिया जब विकास कि बात करता है तो उसके सामने किस तरह कि चुनोतियाँ आती हैं इस व्यावसायिक युग में; यह सोचने का विषय है। कितना सहयोग अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों का विकास पत्रकारों को इस गलैमरस मीडिया के युग मे मिलता है, इस पर भी चर्चा करेंगे, बस आप अपनी प्रतिक्रिया भेजकर हमारे उत्साह को इसी तरह बनाए रखने की कृपा करते रहें....

आपका

उमाशंकर मिश्र
इंडिया फाऊंडेशन फॉर रूरल डेव्ल्प्मेंट स्टडीज


४९-५० रेड रोज बिल्डिंग, रूम नंबर-४०६

नेहरू प्लेस, नई दिल्ली -११००१९

फोन- ०११-४१६०७२४८
ई मेल- umashankar19mishra@gmail.com


कालीन नगरी भदोही से





Monday, November 26, 2007

कैसे पटेगी गरीबी और अमीरी की खाई


आर्थिक नीतियां ही नहीं राजनीतिक संस्कृति भी उच्च तथा निम्न वर्गों के बीच बढ़ रही खाई के लिए जिम्मेदार है। इसके लिए व्यक्तिगत रूप से कांग्रेस को जिम्मेदार माना जा सकता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि कांग्रेस ने लैपटॉप का चेहरा बनाया और तेवर भी वैसे ही दिखाए, लेकिन आचरण में कमजोर तबकों के उत्थान के लिए कोई ठोस काम नहीं किया। नतीजा ये हुआ कि इस देश में नक्सलवाद जैसे उग्रवाद को आदिवासी और वंचित समूहों जगह बनाने और उनकी सहानुभूति और एक हद तक सहयोग अर्जित करने में सफलता मिली। ऐसे में जहां-जहां पर भूमि सुधार नहीं हुए छोटा किसान अपना अस्तित्व बनाए रखने में विफल रहा है तथा राजनैतिक तथा प्रशासनिक भ्रष्टाचार बेलगाम होने लगा है।
1985 में जो आर्थिक नीतियां अपनाई गई, उससे देश में आर्थिक विकास तो हुआ, लेकिन उस विकास का कितना लाभ जरूरतमंदों को मिला है, यह देखना होगा। वास्तविकता तो यह है कि कुछ चतुर और सबल लोगों को ही इस तरह के विकास का लाभ मिल रहा है। इस तरह से एक बहुत बड़ा समुदाय आर्थिक विकास के लाभ से वंचित रहा है। उसके बारे में न तो सोचा गया और न ही कोई व्यवहारिक नीति बनाई गई। चंद बड़ों को संपन्नतम बनाने की जो नीतियां सरकार अपना रही है, वही लोग भविष्य में सरकारों को बनाने बिगाड़ने का भी काम करने लगेंगे। आज सरकार के हाथ से न केवल आर्थिक शक्ति, बल्कि सरकारों के स्वरूप के निर्धारण करने की भी शक्ति निकलती जा रही है। इस तरह की परिस्थिति देश के लिए भयंकर साबित होगी। जिन देशों में आर्थिक असामनता की खाई चौड़ी होती है, वहां जनअसंतोष भी किसी न किसी उपलब्ध मुहाने से फूट निकलता है। मिसाल के तौर पर पाकिस्तान को लिया जा सकता है, असमानता बढ़ने लगी तो इस्लामिक आतंकवाद का जन्म हो गया। आज इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं कि पाकिस्तान के एक तिहाई हिस्से पर कानून का शासन ही समाप्त हो गया है। विडंबना ही है कि जनता ने तो बदलना तो सीखा, लेकिन सरकारें एक दूसरे का पर्याय ही बनकर रह गईं, वे विकल्प कभी नहीं बन सकीं। जब तक कि हम लोग भारतीय परंपरा, परिवेश की मूल आवश्यकताओं और समाज के करीब 75 प्रतिशत लोगों को ध्यान में रखकर आर्थिक एवं प्रशासनिक तथा िशक्षा की नीतियां नहीं बनाएंगे, स्थिति में सुधार होना असंभव है। बदली हुई परिस्थिति के अनुरूप आज भी गांधी का आर्थिक, सामाजिक और नैतिक चिंतन इस चक्रव्यूह से बाहर निकलने का एकमात्र मार्ग दिखाई देता है। ताजा प्रसंग परमाणु समझौते का लिया जा सकता है, जिसमें सारा प्रचार तंत्र उसी पर केंद्रित हो गया, लेकिन किसान मर रहा है( ये न तो बहस का और न ही जनता की चिंता का विषय है। बात थोड़ी आप्रसंगिक हो सकती है, लेकिन जब तक भारतीय जीवनशैली की बातें राजनीतिक जीवन में नहीं उतरेंगी इस तरह की स्थिति में सुधार की संभावना कम ही जान पड़ती है। आज इसी तरह के नैतिक आग्रह की जरूरत है। गरीब तथा अमीर, गांव तथा शहर के बीच का फर्क तभी मिट सकता है, जब गांवों से पलायन रुके और लोगों को स्थानीय स्तर पर ही रोजगार के अवसर उपलब्ध हो सकें। इससे गांव का किसान भी मजबूत होगा। इसके अलावा प्रशासनिक, राजनितिक भ्रष्टाचार( जो दलालों को पैदा करता है, योजनाओं में बटमारी भी वंचितों को अधिक वंचित बनाती है। इस तरह देश में एक बहुत बड़ा विभाजन हो रहा है।

( जैसा कि वरिष्ट पत्रकार और रायपुर हरिभूमी के सलाहकार संपादक रमेश नैयर ने उमाशंकर मिश्र से कहा....)

निर्मल ग्राम शिवपुरी, दोंगार्गढ़ ब्लॉक, जिला राजनांदगाँव, छत्तीसगढ़- ग्राम सरपंच, ब्लॉक महिला एवं बाल विकास आधिकारी के साथ में ...




Wednesday, November 14, 2007

महंगाई और मुद्रास्फीति का सच


इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि अर्थव्यवस्था में लैपटॉप सस्ते हो रहे हैं, लेकिन आलू प्याज के दाम निरंतर बढ़ते जा रहे हैं, वहीं 9 प्रतिशत की विकास दर से सरकार फूली नहीं समा रही है। दूसरी ओर हमारी खाद्य निर्भरता विदेशों पर आश्रित होती जा रही है और एक बार फिर देश `िशप टू माउथ´ की स्थिति में लौटता हुआ जान पड़ता है, ऐसे में क्या इस थोथी विकास की दर से लोगों का पेट भर जायेगा? पढ़िये `उमाशंकर मिश्र´ की विशेष रिपोर्ट -
हाल में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने मुद्रास्फीति की दर में गिरावट की घोषणा की गई थी। इस तरह की कवायदों के पीछे कुछ निहितार्थ भी छुपे होते हैंं, जिन पर धूर्तता की परतें चढ़ी हुई होती हैं। मुद्रास्फीति की दर के कम होने से क्या महंगाई में भी कमी होती है, यह एक बहुत बड़ा सवाल है, जो आम आदमी नहीं सोच पाता। समाचार माध्यमों की मार्फत मुद्रास्फीति में गिरावट की बात को ब्रम्हावाक्य मानते हुए आम इंसान अपने मन मस्तिष्क में आत्मसात् कर लेता है। जबकि हकीकत को आंकड़ों की चादर में कुछ इस तरह से ढक दिया जाता है, मानोे यही सत्य है। महंगाई के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ है। जब बढ़ती महंगाई ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया तो सरकार ने मुद्रास्फीति की दर को कम बताकर यह जताने का प्रयास किया कि सब कुछ समान्य है। लेकिन इस बात की क्या इसी तरह से सहजता से लिया जा सकता है? अभी ज्यादा समय नहीं बीता जब एक सर्वेक्षण में यह बात सामने आई कि देश की 79 प्रतिशत आबादी की आय 20 रुपये प्रतिदिन से भी कम है। ऐसे में महंगाई के बढ़ने से क्या देश की बहुसंख्य आबादी की खाद्य सुरक्षा खतरे में नहीं पड़ जाएगी? दूसरी ओर देश की 60 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है और इस आबादी का मुख्य व्यवसाय कृषि है, जहां किसान आत्महत्या करने को विवश हैं। लेकिन सरकार का ध्यान वहां नहीं जाता। बल्कि किसानों को मरता हुआ छोड़कर सरकार कार्पोरेट कंपनियों के खेमे में खड़ी हुई जान पड़ती है। जिस तरह से विदर्भ के कपास किसानोें को मरता हुआ छोड़कर कॉटन मिलों को खड़ा करने की रणनीति अपनाई गई और जिस तरह से पिश्चमी महाराष्ट्र में चीनी मिलों को सिब्सडी दी जा रही है उससे सरकार का रवैया समझा जा सकता है। मुख्यधारा के अखबारों ने कृषि खाद्य उत्पादों की महंगाई से जुड़ी खबरों को प्रमुखता से छापा है, जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि ग्रामीण ही नहीं बल्कि शहरी एवं अर्द्धशहरी आबादी भी महंगाई की मार से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी है। देश भर की मंडियों में प्याज 28 से 35 रुपये किलो बिक रहा है तो आलू की कीमत 12 रुपये प्रतिकिलो से 18 रुपये किलो तक है। सिब्जया,ें फलों, ग्रोसरी और अन्य कृषि उत्पादों के दामों में वृिद्ध ने आम आदमी को त्रस्त कर दिया है। ग्रामीण इलाकों की बहुसंख्य गरीब आबादी पहले ही प्रशासनिक उदासीनता की िशकार रही है, उस पर महंगाई की मार ने उन गरीबों कमर तोड़ कर रख दी है।
सबसे पहले तो मुद्रास्फीति की दर को मापने वाली थोक सूचकांक की अवधारणा ही गलत है। ग्राहकों की परिस्थितियों का आकलन तभी ठीक प्रकार से हो सकता है जब सूचकांक खुदरा मूल्यों पर आधारित हों। सरकार मुद्रास्फीति की दर पर लगाम लगाने के लिए कई तरह के कदम उठाती है। उल्लेखनीय है कि अर्थव्यवस्था में यदि पैसे का प्रवाह बढ़ता है तो उसकी वैल्यू कम हो जाती है। ऐसे में सरकार बैंकों की ब्याज दरें बढ़ा दी जाती है, जिससे लोग कम ऋण लेते हैं और प्रवाह कम होने लगता है। जब पैसे का प्रवाह बाजार में कम हो जाता है तो इससे थोक मूल्य सूचकांक कम हो जाता है। महंगाई जब भी बढ़ती है, सरकार यही नीति अपनाकर लोगों को आश्वस्त करने का काम करती है। जबकि विशेषज्ञ इस तरह की बात को छलावे का नाम देते हैं। देविंदर शर्मा जैसे कृषि मामलों के जानकार तो इस मुद्दे पर रिजर्व बैंक को भी कटघरे में खड़ा करते हुए जवाबदेही की मांग करते हैं। सरकार ने हमेशा से ही इस तरह के मुद्दों को लेकर गोलमोल रवैया अपनाया है। महंगाई की सबसे अधिक मार गरीबों पर पड़ती है, लेकिन सरकार ने हमेशा से ही उनके प्रति उदासीन रवैया अपनाया है। 90 के दशक में जिन लोगों को 2400 कैलोरी तक भोजन प्रतिदिन मिलता था, उन्हें गरीबी रेखा से नीचे रखा गया था। लेकिन योजना आयोग ने हेर-फेर कर इस सीमा को घटाकर 1800 कैलोरी प्रतिदिन कर दिया। इसी तरह पहले करीब 278 रुपये प्रतिमाह कमाने वाले को गरीबी रेखा से नीचे रखा गया था। लेकिन अब सुधार करने पर भी यह सीमा 350 रुपये तक ही पहुंच सकी है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या 350 रुपये महीना कमाने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है? यह नहीं भूलना चाहिए कि 9 प्रतिशत की विकास दर हासिल कर लेने से इस देश के गरीबों का पेट नहीं भर जायेगा। अमेरिका-परस्त सरकार को न्यूक्लीयर डील करने में अधिक दिलचस्पी है, भले ही इस डील में अमेरिका की मंशा अपने परमाणु कार्यक्रम को रिवाइव करने की ही क्यों न हो, लेकिन खाद्य सुरक्षा को लेकर सरकार विदेशों पर निर्भर होती जा रही है और विशेषज्ञों की मानें तो देश एक बार फिर `िशप टू माउथ´ की स्थिति में अग्रसर हो रहा है। इस तरह की खुले बाजार की नीति से क्या देश की खाद्य सुरक्षा को बचाया जा सकेगा? कार्पोरेट कंपनियों को बिचौलियों की भूमिका में लाकर खड़ा कर देने से क्या इस देश की गरीब जनता का उद्धार हो जाएगा? यह नहीं भूलना चाहिए कि हम अपनी खाद्य सुरक्षा खोते हैं राजनीतिक प्रधानता भी गंवा देते हैं।
इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि अर्थव्यवस्था में लैपटॉप सस्ते हो रहे हैं, लेकिन आलू प्याज के दाम निरंतर बढ़ते जा रहे हैं। उदारीकरण के बाद सकल घरेलू उत्पाद में कृषि की भागीदारी 33 प्रतिशत से घटकर 19 प्रतिशत रह गई है। बजट में भी सिंचाई के लिए 1ण्3 प्रतिशत तो टेलीकॉम के लिए 13 प्रतिशत रािश खर्च की जा रही है। स्पष्ट कि सरकार देश की 60 प्रतिशत ग्रामीण जनता को उपेक्षित दृिष्ट से देखती है। इन सब बातों से सरकार की दोगली नीतियां स्पष्ट हो जाती हैं। यह नहीं भूलना चाहिए कि विकास दर आंकड़ों की थोथी इबारत से काम नहीं चलने वाला सौ करोड़ लोगों के भोजन के लिए भी सोचना पड़ेगा।
सरकार नहीं चाहती कि इस देश के किसान खेती करें जिन्दा रहें। यह नहीं भूलना चाहिए कि पिछले करीब एक दशक में देश के करीब डेढ़ लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं। इसके बावजूद भी सरकारों का सामंती चेहरा नंदीग्राम की खूनी होली के रूप में सामने आता है, जहां अपनी जमीन का हक मांगने वाले किसानों पर गोलियां बरसाई जाती हैं। यह इस देश की हकीकत है। सरकार यह तो नहीं करती कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली को बेहतर बनाकर भूखों के लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम करे, सरकार यह भी नहीं करती कि बेरोजगार युवाओं की भीड़ को रोजगार उपलब्ध करवाकर उनकी हताशा को कम करने का प्रयास करे और न ही सरकार कृषि की दशा सुधारने को प्रतिबद्ध जान पड़ती है। सरकार को फिक्र है तो सिर्फ और सिर्फ न्यूिक्लयर डील की, जिससे उसकी अमेरिका-परस्ती बची रहे आका नाराज न हों ( गेहूं तो आस्ट्रेलिया अथवा अमेरिका से आयात कर ही लिया जाएगा।
अक्सर लोग कहते हुए मिल जाएंगे कि आज लोगों की परचेजिंग पावर बढ़ गई है। 84 करोड़ लोग जिनकी आय 20 रुपये प्रतिदिन होने की बात कही जा रही है, उनकी परचेचिंग पावर कितनी बढ़ी होेगी, इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है। मुकेश अंबानी आज बीवी के जन्मदिन पर करीब 3 अरब रुपये का उपहार दे देते है, तो दूसरी ओर देश की बहुसंख्य आबादी रोटी को मोहताज है। विसंगतिपूर्ण विकास का इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा कि देश की करीब 26 प्रतिशत आबादी 9 प्रतिशत की विकास दर के बावजूद भी गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर कर रही है। गरीबी रेखा का मापदंड भी सरकार ने अपनी सहूलियत के हिसाब से निर्धारित कर लिया है अन्यथा यह आंकड़ा बढ़ भी सकता था।
सेंसेक्स के उछलते आंकड़े और विकास दर वास्तविकता बयां नहीं करते, इस देश का नागरिक जब वोट देने जाता है तो वह विकास दर नहीं रोटी, कपड़ा, मकान की बात पहले सोचता है, इसे भी उसकी अपनी ही सरकार चमकदार विकास की दमक दिखाकर आज छीन लेना चाहती है।

Sunday, November 4, 2007

बाज़ार पर नियंत्रण नही रखना चाहती सरकार






प्रो अरुण कुमार, अर्थशास्त्री
मुद्रास्फीति की दर बढ़ने का मतलब दाम बढ़ना नहीं है। बल्कि दर का काम या ज्यादा होना महंगाई की रफ़्तार को दर्शाता है। दूसरी ओर महंगाई मापने के पैमाने भी विभिन्न स्तरों पर अलग अलग हैं। शहरी, प्रांतीय, यहाँ तक की गरीब, अमीर के आधार पर भी पैमाने बने हुए हैं। सर्विस सेक्टर में ५५ प्रतिशत उत्पादन होता है, लेकिन इसे इंडेक्स में शामिल ही नहीं किया जाता। इस तरह से यह सिर्फ ४० प्रतिशत अर्थव्यवस्था को दर्शाता है। एक तरफ लोग पहले से अधिक उपभोक्तावादी हुए हैं, दूसरी ओर सरकार भी बाजार को खुला छोड़ देना चाहती है,...नियंत्रण ही नहीं रखना चाहती सरकार बाज़ार पर। जिससे मुद्रा का प्रवाह से बाज़ार लबालब रहे और जान पडे की भारत की गरीबी अब दूर हो गयी। गांधी जी अन्तिम व्यक्ति को प्रथम पायदान पर रखकर विकास की बात करते थे। आज इसी तरह की नीति की जरूरत है।
जैसा प्रो अरुण कुमार ने उमाशंकर मिश्र से कहा

मुद्रास्फीति की दर और आम आदमी





''आलू प्याज ने सेंसेक्स को पछाडा है''
- आलोक पुराणिक
"गाड़ लाइज इन डिटेल्स"; दरअसल महंगाई कम बताने वाले एक आंकडे की डिटेल्स में शैतान की तरह डराने वाले आंकडे भी बसते हैं। थोक मूल्य सूचकांक का सरकारी आंकडा खासा महत्वपूर्ण माना जाता है। रिजर्व बैंक इससे लेकर चिंतित रहता है। वित्त मंत्रालय भी इसे लेकर चिंतित रहता है। पर ३.७ फीसदी का आंकडा ऐसा नहीं है, जिसे लेकर चिंतित हुआ जाये। पर "डेविल लाइज इन डिटेल्स", इस आंकडे के पीछे के आंकडों को देंखे तो दह्सत होती है। उपभोक्ता की जेब में छेड़ करती महंगाई बताती है कि इतनी कम महंगाई की दर के पीछे कुछ भेद हैं। और वह भेद यह है कि काहने पीने की चीजों ने जो उन्चाइयां छुई हैं, वो सेंसेक्स की छलांग को पीछे छोड़ गयी है।
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Saturday, November 3, 2007

क्या आज नेहरू के सुपर डुपर विकास के माडल कि समीक्षा की जरुरत है.


आज बड़ी परियोजनाओं के कारण हजारो लोगो को विस्थापित होन पड़ रहा है] तो हाल ही के एक सर्वेक्षण के मुताबिक यह बात सामने आयी है कि देश के 84 करोड़ लोगो की आय 20 रुपये से भी कम है. संभव है कि ये आंकड़े पूरी तरह से सही न हो लेकिन पूरी तरह से गलत भी नही ठहराये जा सकते. यह देश कि वास्तविक हकीकत है. 1993 से लेकर अब तक देश के अन्नदाता कहे जाने वाले डेढ़ लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं. और हम अनाज विदेशों से आयात करने की स्थिति मे आ चुके हैं. दूसरी ओर सरकार कहती है कि विकास कि दर 9 प्रतिशत से अधिक है. मुद्रास्फ़ीति की दर भी कम हुई है. शेयर बाजार छ्लांगे मार कर 20 ह्ज़ार के जादुई आँकड़े को छू रहा है] लेकिन इतने पर भी क्या हमारी सरकार ये दावे से कह सकती है , कि इस देश की पूरी नहि सिर्फ़ आधी आबादि को भी दो वक्त का पर्याप्त भोजन मिल रहा है. सरकारी नुमाइन्दे निश्चित तौर पर इस तरह का सवाल सुनकर बगलें झांकने लगेन्गे. हो सकता है कि भारतीय सन्ख्यकीय संगठन और योजना आयोग ने ऐसे सवालों का जवाब देने के लिये भारत के खोखले और विसन्गतिपूर्ण विकास की थोथी इबारतों का पोथा तैयार कर लिया हो. जिस पर चर्चा करने के लिये इस देश के तथाकथित रहनुमाओं की जमात एकत्रित होकर सार्वजनिक पैसे से आयोजित भोज का शायद आनंद भी ले चुकी होगी. इस तरह की हकीकत से आप रुबरू हुए होंगे. लेकिन यहां मुद्दा कुछ और है. मुद्दा एक वैक्ल्पिक सोच को खड़ा करने का है. जिसमे आप सबकी भागीदारी की जरुरत होगी..

सवाल है कि वर्तमान परिवेश को देखते हुए क्या ये कहा जा सकता है कि आज नेहरू के सुपर डुपर विकास के माडल कि समीक्षा की जरुरत है.