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Saturday, November 3, 2007

क्या आज नेहरू के सुपर डुपर विकास के माडल कि समीक्षा की जरुरत है.


आज बड़ी परियोजनाओं के कारण हजारो लोगो को विस्थापित होन पड़ रहा है] तो हाल ही के एक सर्वेक्षण के मुताबिक यह बात सामने आयी है कि देश के 84 करोड़ लोगो की आय 20 रुपये से भी कम है. संभव है कि ये आंकड़े पूरी तरह से सही न हो लेकिन पूरी तरह से गलत भी नही ठहराये जा सकते. यह देश कि वास्तविक हकीकत है. 1993 से लेकर अब तक देश के अन्नदाता कहे जाने वाले डेढ़ लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं. और हम अनाज विदेशों से आयात करने की स्थिति मे आ चुके हैं. दूसरी ओर सरकार कहती है कि विकास कि दर 9 प्रतिशत से अधिक है. मुद्रास्फ़ीति की दर भी कम हुई है. शेयर बाजार छ्लांगे मार कर 20 ह्ज़ार के जादुई आँकड़े को छू रहा है] लेकिन इतने पर भी क्या हमारी सरकार ये दावे से कह सकती है , कि इस देश की पूरी नहि सिर्फ़ आधी आबादि को भी दो वक्त का पर्याप्त भोजन मिल रहा है. सरकारी नुमाइन्दे निश्चित तौर पर इस तरह का सवाल सुनकर बगलें झांकने लगेन्गे. हो सकता है कि भारतीय सन्ख्यकीय संगठन और योजना आयोग ने ऐसे सवालों का जवाब देने के लिये भारत के खोखले और विसन्गतिपूर्ण विकास की थोथी इबारतों का पोथा तैयार कर लिया हो. जिस पर चर्चा करने के लिये इस देश के तथाकथित रहनुमाओं की जमात एकत्रित होकर सार्वजनिक पैसे से आयोजित भोज का शायद आनंद भी ले चुकी होगी. इस तरह की हकीकत से आप रुबरू हुए होंगे. लेकिन यहां मुद्दा कुछ और है. मुद्दा एक वैक्ल्पिक सोच को खड़ा करने का है. जिसमे आप सबकी भागीदारी की जरुरत होगी..

सवाल है कि वर्तमान परिवेश को देखते हुए क्या ये कहा जा सकता है कि आज नेहरू के सुपर डुपर विकास के माडल कि समीक्षा की जरुरत है.

1 comment:

संजीव कुमार सिन्हा said...

देश की आजादी के बाद पं.नेहरू ने भारतीय विचार के संवाहक महात्‍मा गांधी के विचार को दरकिनार कर दिया और समाजवाद को अपनाया। हर देश की समस्‍याओं के प्रश्‍न-पत्र अलग होते है। इसके उत्‍तर स्‍थानीय परिवेश में ही ढूढने पडते है। लेकिन पं.नेहरू ऐसा नहीं कर पाए। भारतीय विचारों के बजाए उन्‍होंने पाश्‍चात्‍य विचारों को ज्‍यादा अहमियत दी। इसी का परिणाम है कि आज देश के 84 करोड़ लोगो की आय 20 रुपये से भी कम है. निश्चित रूप से पं.नेहरू के सुपर डुपर विकास के मॉडल की समीक्षा की जरुरत है.