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Thursday, November 29, 2007

सूचना का अधिकार और पारंपरिक जनसमाज










डा. स्मिता मिश्र
लोकतन्त्रिक व्यवस्था को समृद्ध और सुरक्षित बनाने के लिए नागरिकों के अधिकारों में एक और अधिकार जुड़ गया है; `सूचना पाने का अधिकार।´ इसका अर्थ है कि प्रत्येक नागरिक को अपने जीवन के लिये जरूरी सूचना प्राप्त करने का अधिकार है। ऐसा माना जा रहा है। इस अधिकार से जहां शासन की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता आने की संभावना है वहीं नागरिकों की लोकतन्त्रिक सक्रियता बढ़ाने का सर्वाधिक कारगर उपाय भी सिद्ध होगा। भारतीय पारंपरिक ग्रामीण जनसमाज जहां सूचना का अधिकार तो दूर की बात है `अधिकार´ शब्द की ही व्याप्ति नहीं है। और यदि है तो वह प्रभुता संपन्न लोगों तक ही सीमित है। तो यह सोचने की बात है कि `सूचना का अधिकार´ नामक कानून किस तरह उन लाखों-असंख्य लोगों तक पहुंचेगा और वे लोग किस प्रकार इससे लाभािन्वत हो सकेंगे! लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि कस्बों और गांवों के लोग नगरों या महानगरों से जागरूक नहीं होते। कस्बों और गांवों से ही अनेक नेता निर्वाचित होकर शहरों में आते हैं, विचार मंथन में शिरकत करते हैं और उसका प्रभाव लेकर वापिस गांव या कस्बे लौटते रहते हैं तो उन्हें भी अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए वहां के लोगों में विचार-मंथन निष्कर्षों को संप्रेषित करते रहना पड़ता ग्रामीण शैक्षिक संस्थाओं के व्यक्ति पुस्तकों, समाचारपत्राों, शहरी संपको± के द्वारा नयी चेतना से संपन्न होते रहते हैं। तीसरे पंचायतों में भी अब शिक्षित, विवेकवान लोग शामिल होते हैं। वे भी नये विचारों के संवाहक हो सकते हैं। इनके ही द्वारा जनता की पारंपरिक विचार जड़ता को तोड़ा जा सकता है। और विचार मंथन के क्षेत्रा में जो कुछ नया हो रहा है उसकी सूचना से उसे जोड़ा जा सकता है। अब विचारणीय है कि यह कार्य किस-किस स्वरूप में हो सकता है। ज़ाहिर है कि उपदेश या आदेश का प्रभाव स्थाई नहीं होता। जरूरत इस बात कि है कि जनता को प्रीतिकर ढंग से नवचेतना की ओर उन्मुख करना है। और इस कार्य के लिये वे माèयम अिध्क कारगर होंगे जो जनता की पारंपरिकता से जुड़े हों। इनमें सर्वप्रथम मैं लोकगीतों की भूमिका को रूपायित करना चाहूंगी। लोकगीतों का लोकजीवन में अत्यंत व्यापक महत्व है। इनमें उनके सुख-दु:ख, अभाव-संघर्ष, समस्याएं, वर्गचेतना, वर्णचेतना, नर-नारी की अद्भुत प्रभावशाली व्याप्ति दिखाई पड़ती है। ये लोकगीत जीवन के सुख दु:ख, उल्लास-विषाद्, )तु मौसम, क्रिया-कलाप आदि अनेक संदभो± से जुड़े होने के कारण संवेदना और रूप के वैविèय से आभोक्ति होती है। ऐसे शक्तिशाली माèयम का उपयोग नये कानून, नयी चेतना के विकास के लिये निश्चित रूप से किया जा सकता है। यहां सरकार और एनण्जीण्ओण् की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है कि वह लोगगायकों को पफैलोशिप आदि देकर नयी चेतना के गाने बनाये और उनका प्रसार करे। जैसे एक लोकगीत में बांझ स्त्राी अपने बांझपन के कारण घर-परिवार और समाज से प्रतािड़त होती है। और आत्महत्या करने के लिये नदी, बाघिन, आग आदि के पास जाती है और प्रार्थना करती है कि वे उसे मार दे किन्तु सभी यह कहकर मना कर देती हैं कि उसे मारने से वे भी बांिझन हो जाएंगी। अंत में ध्रती के पास जाती है। ध्रती तो मां है। वह उसे अपने में समा लेती है। अब यहां पर ध्रती के माèयम से स्त्राी की नयी उफर्जा को जाग्रत करने का संदेश दिया जा सकता है कि ध्रती उस स्त्राी को स्वाभिमान से जीने को प्रेरित करती है।बेटी ससुरा में रहिह तू चांद बनकर सबकि पुतरि के विचवा, पुरान बनकर भिनइ सबसे पहिले उठिह, ननद के मुंह से कबहु त लगिह ससुराजी के बाजे खरउफह, पानी लेके पहिले जइह। इस तरह के गीतों में जहां लड़की को ससुराल में मर्यादापालन सिखाया जा रहा है वहीं कर्तव्यबोध्, आत्मसम्मान भी जाग्रत किया जा सकता है। इन गायकों के अनेक मंच हो सकते हैं। गांव-गांव में छोटे-छोटे कवि सम्मेलन, सरकार के अनुाद से बाजार, हाट, मेला, उत्सव, स्कूल, पंचायत आदि मेें मजमा इकट्ठा कर अपनी बात कह सकते हैं। रेडियो, टीण्वीण् के माèयम से इन गीतों को निरंतर प्रसारित किया जा सकता है।एक बहुत शक्तिशाली माèयम है नुक्कड़ नाटक का। नाट्य मंडलियां जगह-जगह नुक्कड़-नाटक आयोजित कर नयी चेतना का प्रसार करती रहती है। ये मंडिलियां देहात जाकर नये अिध्कार, नये कानून का प्रचार प्रसार करने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इसी प्रकार कठपुतली या बंदरों का खेल तमाशा में लोककथा का प्रसार होता है। इस लोककथा के ढांचे भी पारंपरिक स्वर के स्थान पर नये स्वर को प्रमुखता दी जा सकती है। इसके लिये सरकारी तंत्रा इन लोक कलाकारों को आर्थिक रूप से सहायता करके प्रचार माèयम के रूप में प्रयोग कर सकती है। पंचायत का भी विभिन्न तरीकों से इस्तेमाल हो सकता है। पंचों को सरकार नयी सूचनाओं से अप-टु-डेट करे। उनके वर्कशॉप हों ताकि वही पंच गांव को नयी सूचनाओं से अप-टू-डेट कर सके। इस अवसर पर आगे-पीछे मनोरंजक माèयमों का प्रयोग किया जा सकता है। यहां पिफल्म भी दिखाई जा सकती है। पिफल्म एक अत्यंत सशक्त माèयम है। ऐसी पिफल्में जहां ग्रामीणों ने, महिलाओं ने एकजुट होकर अपने हक की लड़ाई लड़ी हो चाहे वह मंथन हो, लगान हो या मिर्च मसाला। इसी प्रकार समाचार पत्राों की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण है। जैसे कुछ वर्ष पहले मèयप्रदेश के टीकमगढ़ जिले की पीपरा बिमारी ग्राम पंचायत की अनुसूचित जाति की सरपंच गुंदिया बाई को वहां के प्रभावशाली लोगों ने स्वतंत्राता दिवस पर झंडा पफहराने से रोकने पर वहां समाचार पत्राों ने इस घटना को भरपूर प्रचारित किया। परिणामस्वरूप आगामी स्वतंत्राता दिवस पर मुख्यमंत्राी ने स्वयं गुंदिया बाई के हाथों टीकमगढ़ जिला मुख्यालय पर झंडा पफहरवाया। इस दिशा में कथित राष्ट्रीय समाचार पत्राों की अपेक्षा छोटे पत्रा-पत्रिाकाएं बेहतर सि( हो रहे हैं। यहां एनण्जीण्ओण् की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। कई एनण्जीण्ओण् के द्वारा छोटी-छोटी जगहों से बेहतर समाचार-पत्रा-पत्रिाका निकाल रहे हैं। जैसे मèयप्रदेश में देवास जिले से एकलव्य संस्था - `पंचतंत्रा´ पत्रिाका, पीण्आईण्आईण् `ग्रासरफट´ निकालती है। `खबर लहरिया´ समाचार पत्रा को `चमेली देवी´ पुरस्कार मिला। तब इसकी संपादक मीरादेवी व संवाददाता दुगाZ मिथिलेश आज के पत्राकारों की तरह नहीं हैं, न इनके शरीर पर ग्लैमरस ड्रेस पोशक है न मेकअप। उप अपनी जमीन की भाषा में समाचार प्रस्तुत करने का जो अंदाज देवगांव वह बड़े-बड़े समाचारपत्राों में नहीं दिखाई पड़ती। आज हमारे अखबारी भाषा में जो तेवर गायब होते जा रहे हैं वे यहां पूरी ताकत के साथ मौजूद हैं। इनके विषयों में जहां विकासमूलक, स्थानीय मुद्दे हावी रहते हैं, वहीं राष्ट्रीय स्तर की हलचलों से भी ये नावाकिपफ नहीं रहते। इसे वायन की सहायता से भी प्रस्तुत किया जा सकता है। एपफण्एमण् पर इसे डाला जा सकता है। गांववालों की ही आवाज में गांव से जुड़े मुद्दों पर सूचना प्राप्त करने, उनपर विश्लेषण करने तथा राय बनाने में ये अखबार महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इसके अतिरिक्त धार्मिक सत्संग, अभियान जत्था, स्वयं सहायता ग्रुप आदि भी सूचना के अिध्कार को ग्रामीणों तक पहुंचाने में अत्यंत सहायक सि( होंगे। ये नारी संबंध्ी मुद्दे जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा, अिध्कार, स्वरोजगार आदि पर जागरूकता लाने के कापफी कारगर सि( होंगे। आखिर में एक कविता से बात खत्म करफंगी आकाश से बहती है एक नदी और उफपर ही उफपर पी लेता कोई उसे ध्रती प्यासी की प्यासी रहती है और कहने को आकाश से नदी बहती है। यदि सूचना का अिध्कार नामक कानून आकाश से उतरकर प्यासी ध्रती तक पहुंचेगा तभी लोकतंत्रा की सही पहचान होगी अन्यथा कागजी कानूनों की सूची में एक कानून और जुड़कर रह जाएगी।

(लेखिका दिल्ली विश्वविद्यलय मे लेक्चरर और मीडिया विश्लेषक हैं)

3 comments:

Sanjeeva Tiwari said...

बढिया लेख, बधाई इसे यहां पर देने के लिए ।

आरंभ
जूनियर कांउसिल

संजय तिवारी said...

प्रूफ की बहुत गलतिया हैं. लगता है आप जुगाड़ तकनीकि से हिन्दी में काम कर रहे हैं. आपको एक्सपी में डिफाल्ट तरीके से स्थापित इनस्क्रिप्ट की बोर्ड पर काम करना चाहिए. वह ज्यादा आसान है.

उमाशंकर मिश्र said...

sanjay ji aur sanjeev ji, aapki prtikriya utsaahvardhak rahi. sanjay ji mai filhaal takniki prayogon se bahut adhik parichit nahi hua hun.....aap yadi delhi me rahte hain to aapse jarur milna chahunga...