मेरा गाँव मेरा देश

Monday, October 29, 2007

छोटी मगर असरदार पहल

उमाशंकर मिश्र
इंडिया फाउंडेशन फॉर रूरल डेव्लपमेंट स्टडीज
रूम नम्बर -406,
49-50 रेड रोज बिल्डिंग
नेहरू प्लेस, नई दिल्ली-११००१९
फोन-०९८७३२८६८०२
फैक्स-011-४१६०७२४८

देश में भूमिहीन कृषि-मजदूरों अथवा अल्प भूमि वाले किसानों की बहुत बड़ी संख्या है। पटना की नौबतपुर तहसील के गांव आजाद नगर की लालमुनी देवी भी ऐसे ही कृषकों की जमात का एक हिस्सा हैं। ऐसे कृषकों के पास खेती करने का हुनर और जज्बा तो होता है, लेकिन भूमिहीनता उन्हें बेबस बना देती है। मजबूरन उन्हें दैनिक मजदूरी कर अपना गुजर बसर करना पड़ता है। लेकिन लालमुनी देवी के साथ अब ऐसा नहीं है, क्योंकि उन्होंने अपने kaushal
बूते परिस्थितियों से लड़ना सीख लिया है। 40 लालमुनी देवी भले ही अल्प-षिक्षित हों, लेकिन उन्होंने भूमिहीनता के दंष का रोना नहीं रोया और घास-फूस से बने अपने घर की छप्पर को ही जीवन-यापन के साधन के तौर पर उपयोग करना सीख लिया। अब वे घर के गीले छप्पर में मषरूम की खेती करती हैं।
अपने इसी हुनर की बदौलत लालमुनी देवी आज न केवल अपने गांव की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने में सफल हुई हैं, बल्कि वे हजारों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बन चुकी हैं। यही नहीं, की खेती के उनके इस अनूठे तरीके को सात समंदर पार भी सराहा गया। गेहूं और ज्वार पर रिसर्च करने वाले मैिक्सको स्थित एक प्रसिद्ध संस्थान ने श्रीलंका, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान और भारत समेत सात एषियाई देषों के ऐसे 25 अग्रणी उद्यमीय कौषल वाले किसानों की सूची में लालमुनी देवी को सर्वोच्च स्थान दिया है।
अपनी इस उड़ान से पूर्व लालमुनी देवी को जीवन अत्यंत नीरस जान पड़ता था। आंखों से दुर्बल पति और एक विक्लांग बेटे समेत चार प्राणियों के परिवार का भरण-पोशण आसान नहीं था। बड़े बेटे की मजदूरी से जो थोड़ी बहुत आय होती थी, बस वही परिवार के गुजारे का सहारा थी।
लालमुनी देवी भले ही भूमिहीन हों, लेकिन मषरूम की खेती उनके जीवन में एक आषा की एक नई किरण बनकर आई। वे कहती हैं कि `ये तो मेरे लिए सोना-चांदी से कम नहीं है।´ यह सब बताते हुए लालमुनी भावुक हो जाती हैं, क्योंकि आज वे इस बात को लेकर आष्वस्त हैं कि अब उनकी बेटी के विवाह में कोई अड़चन नहीं आएगी। ऐसा आत्मविष्वास उन्हें मषरूम से होने वाली आय के कारण ही मिला है। हालांकि भूमिहीन लालमुनी देवी के लिए यह जानते हुए कि उनके पास जमीन नहीं है( मषरूम की खेती करने का फैसला आसान नहीं था। लेकिन उन्होंने हिम्मत नही हारी और 500 रुपये की छोटी से पूंजी से मषरूम उत्पादन का कार्य ‘ाुरु कर दिया।
गंगा किनारे के इस पूर्वी विषाल मैदानी भाग में जोतें आमतौर पर छोटी हैं और आबादी भी गरीब बहुल है। जहां लोग अपेक्षाकृत बड़े किसानों के खेतों में मेहनत-मजदूरी करके अपना जीवन-यापन करते हैं। चावल और गेहूं यहां की मुख्य फसलें हैं। बरसात के मौसम में चावल तो सिर्दयों के ‘ाुश्क मौसम में यहां गेहूं की खेती की जाती है। पटना से करीब घंटे भर का सफर तय करने पर ही स्थित है आजाद नगर गांव, जहां लालमुनी देवी का परिवार नमीयुक्त छप्पर वाले एक कमरे के घर में रहता है। उनके घर में प्रवेष करते ही अंदर हरेक कोने पर मषरूमों को देखा जा सकता है। ‘ाायद ही कोई स्थान बचा होगा जहां मषरूम न उगाया गया हो। इस सिलसिले की ‘ाुरुआत `इंडियन कौंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च संस्थान´ की पहल पर आयोजित एक ट्रेनिंग कार्यक्रम के दौरान हुई थी। इससे पहले लालमुनी देवी ने मषरूम के बारे में कभी सुना भी नहीं था। वे कहती हैं कि `हमें बताया गया था कि भारत के बड़े ‘ाहरों और विदेषों में भी इसकी काफी मांग है। ट्रेनिंग के पष्चात् उन्होंने इसे घर पर ही उगाने का फैसला कर लिया। ‘ाहर से अधिक दूरी नहीं होने के कारण लालमुनी देवी को अपने मषरूमों कोे बेचने के लिए बाजार भी आसानी से उपलब्ध हो गया। जिससे इस काम में उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली। आज वे गांव की 20-25 महिलाओं के समूह को घर पर ही मषरूम उगाने की ट्रेनिंग भी देती हैं।
एक सवाल उठता है कि गेहूं और ज्वार के प्रोत्साहन देने वाली एक एजेंसी ने ही आखिर लालमुनी देवी के इस प्रयोग को सराहने की पहल की। वह इसलिए क्योंकि गेहूं के भूसे का उपयोग मषरूम के उत्पादन के लिए किया जाता है। गेहूं के भूसे और सड़ी हुई घास से बनाए गोलों में मषरूम उगाना नििष्चत तौर पर काबिलेतारीफ है। इस तरह के गोलों को एक पॉलीथीन में डालकर नमीयुक्त छप्पर के नीचे लटका दिया जाता है। ऑइस्टर प्रजाति के मषरूम के पोशण हेतु आद्रZ वातावरण की आवष्यकता होती है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि इस तरह के दीघZकालीन उपायों से एक बहुत बड़े ग्रामीण समुदाय को फायदा पहुंच सकता है। ‘ाुरु के दो वशोZं तक तो `इंडियन कौंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च´ संस्थान ने ही मषरूम के बीज लालमुनी को उपलब्ध करवाए। लेकिन अब लालमुनी खुद 50 रुपये से 60 रुपये प्रति किलो की दर से बीज बाजार से खरीद लेती हैं। एक किलोग्राम बीज से करीब 10-14 किलो मषरूम का उत्पादन हो जाता है। `इंडियन कौंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च´ संस्थान के कृिश वैज्ञानिक एण्आरण् खान के बताते हैं कि `सिर्दयों में उगाई जाने वाली मषरूम की प्रजाति की कीमत आमतौर पर 50-60 रुपये प्रति किलो जबकि गर्मियों के मौसम में पैदा की जाने वाली किस्म की कीमत 80-120 रुपये प्रति किलो रहती है।´ आज लालमुनी देवी की मषरूम की प्रत्येक उपज करीब 20 हजार रुपये से 25 हजार रुपये तक पहुंच जाती है। मषरूम को तैयार होने में करीब तीन महीने का समय लग जाता है और किसी भी मौसम में इसकी खेती की जा सकती है।
नमी एवं उपयुक्त तापमान की अपेक्षित उपलब्धता से मैदानी भागों में भी मषरूम की खेती की जा सकती है। मषरूम को एक इन्डोर फसल के तौर पर जाना जाता है। इसके विकास के लिए 14 से 18 डिग्री सेिल्सयस तक तापमान और 85 प्रतिषत नमी की आवष्यकता होती है। मषरूम को गेहूं एवं धान के चारे, गेहूूं की भूसी, यूरिया, जिप्सम और चिकन मैन्योर को मिलाकर तैयार किए गए कम्पोस्ट पर उगाया जाता है। कीटों से बचाव के लिए डंसंजीपवद एवं ब्लचमतउमजीतपद जैसे रसायनों का छिड़काव किया जा सकता है। यही नहीं मषरूम उगाने की ट्रनिंग के लिए `राश्ट्रीय मषरूम अनुसंधान केन्द्र´ सोलन, हिमाचल प्रदेष में सम्पर्क किया जा सकता है। इसके अलावा राज्यों के कृिश- विष्वविद्यालयों से भी मषरूम उत्पादन के बारे में जानकारी हासिल की जा सकती है। नाबार्ड, नेषनल हार्टीकल्चर बोर्ड और बैंकिंग संस्थान भी मषरूम यूनिट्स एवं कम्पोस्ट मेकिंग यूनिट्स की स्थापना के लिए ऋण भी मुहैया करवाते हैं। मषरूम पौिश्टकता की दृिश्ट से भी महत्वपूर्ण है। इसमें प्रोटीन, फाईबर्स एवं फोलिक एसिड के तत्व समाहित होते हैं। इस तरह के तत्व आमतौर पर अनाज एवं सिब्जयों में कम ही पाए जाते हैं। आज मषरूम अपने इन्हीं गुणों के चलते प्रसििद्ध पाता जा रहा है, जिसके चलते इसका बाजार तेजी से बढ़ रहा है। व्हाइट-बटन मषरूम को फ्रेष अथवा डिब्बाबंद पैकिंग में आचार, कैंडी, बिस्कुट, मुरब्बा अथवा सूप पाउडर बनाकर भी आसानी से बेचा जा सकता है। ‘ाहरी बाजारों में इनकी खासी मांग है। इसके अलावा अब तो फर्मास्युटीकल कंपनियों में मषरूम की मांग की जाने लगी है। मषरूम की करीब दो हजार खाद्य प्रजातियों में से 280 किस्मों का भारत में उत्पादन किया जाता है। भारत मेें पैदा की जाने वाली सबसे महत्वपूर्ण मषरूम की किस्म गुच्छी को माना जाता है। घरेलू उपभोग की बजाय इसका एक बड़ा हिस्सा पाष्चात्य देषों को निर्यात कर दिया जाता है। यूएसए और स्विट्जरलैंड भारत से मषरूम का आयात करने वाले दो मुख्य देष हैं।
भारत में मषरूम उत्पादन का चलन कोई नई बात नहीं है। 1950 के दषक में हिमाचल प्रदेष सरकार ने राज्य के पहले `सहायक प्लांट पैथोलॉजिस्ट एवं माइकोलॉजिस्ट के तौर पर एसण्एसण् जैन को नियुक्त किया। हिमाचल प्रदेष के अंदरूनी हिस्से में फल उत्पादकों एवं किसानों को फसलों में लगने वाली बीमारियों के बारे में जानकारी देने का सफर ‘ाुरु किया तो उन्होंने पाया की राज्य के किसानों की हालत बहुत जर्जर थी और वे गरीबी में गुजर बसर कर रहे थे। उन्होंने किसानों की मदद करने का निष्चय किया। उन्होंने गौर किया तो पाया कि वहां फलों के वृक्षों की सड़ी हुई टहनियों, गेहूं के अनुपयोगी अंष और पषुओं के अपषिश्ट से मषरूम के उत्पादन की भरपूर संभावनाएं थी। इसी ने उन्हें खाद्य मषरूम के उत्पादन हेतु पे्ररित किया। उन्होंने सोलन में रहकर रिसर्च ‘ाुरु कर दी और जब वे सफल हो गए तो अपषिश्टों से मषरूम उत्पादन की विधि का राज्य में प्रसार किया। परिणामत: लोग मषरूम उत्पादन के लिए प्रोत्साहित होने लगे। इसी का ही परिणाम कहा जा सकता है कि आज `सोलन´ को भारत की `मषरूम सिटी´ के नाम से जाना जाता है।
मषरूम की बढ़ती हुई मांग और इसके उत्पादन में सीमांत किसानों की बढ़ती रुचि को देखते हुए एसोचैम के एग्रीकल्चर डिवीजन ने संभावना व्यक्त की है कि आगामी 5 वशोZं में देष में मषरूम का उत्पादन 10 गुना बढ़कर 5 लाख टन सालाना हो जाएगा और 2010 तक निर्यात 139 करोड़ से बढ़कर 170 करोड़ तक पहुंच जाएगा। फिलहाल तमिलनाडु, हरियाणा, उत्तर प्रदेष, उत्तरांचल, पंजाब, हिमाचल प्रदेष और जम्मू को मषरूम उत्पादन की दृिश्ट से अग्रणी माना जाता है।
ऐसा नहीं है कि अन्य राज्यों में मषरूम की खेती संभव नहीं है। लेकिन अभी भी व्यापक स्तर पर लोगों को इसके उत्पादन एवं प्रयोग के बारे में जानकारी न होने से इसकी पहुंच सीमित बनी हुई है। महाराश्ट्र जैसे राज्य जहां किसान आत्महत्या को मजबूर हैं, वहां मषरूम की खेती वरदान साबित हो सकती है। बषतेZ यह सुनििष्चत किया जाना आवष्यक है कि मषरूम की बिक्री के लिए बाजार कहां उपलब्ध हो सकेगा। इससे एक ओर तो छोटे किसानों एवं भूमिहीनों की दषा में सुधार का मार्ग प्रषस्त हो सकेगा, बल्कि प्रगतिषील किसानों को अपने कार्य के विस्तार एवं आगे बढ़ने का एक नया अवसर भी मिल सकेगा।
पटना की जिन 25 महिलाओं को `इंडियन कौंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च´ संस्थान द्वारा मषरूम की खेती की ट्रेनिंग देने हेतु चुना गया था( उनमें से करीब आधी महिलाओं ने संस्थान द्वारा बीज दिया जाना बंद करते ही इस काम से पल्ला झाड़ लिया। लेकिन आज जब लालमुनी सर्वत्र चर्चा का विशय बन चुकी हैं तो गांव की अन्य महिलाएं एक बार फिर से मषरूम की खेती को अपना कर लालमुनी देवी जैसा ही नाम कमाना चाहती हैं। कुछ समय पूर्व बिल गेट्स द्वारा संचालित `बिल एण्ड मिलिण्डा गेट्स फांउडेषन´ की एक टीम ने आजाद नगर का दौरा किया। फांउडेषन ने इस क्षेत्र में गरीब किसानों को ध्यान में रखते हुए इसी तरह की एग्रीकल्चर परियोजनाएं ‘ाुरु करने की इच्छा ज़ाहिर की है।
भले ही मषरूम के उत्पादन से देष के विकास एवं गरीबी उन्मूलन की अपार संभावनाएं हों, लेकिन जिस लालमुनी देवी ने अपनी प्रतिबद्धता के बूते अपने ही जैसे लाखों लोगों को आगे बढ़ने की प्रेरणा दी है, उसे सरकार ने ही उपेक्षित सा कर दिया है। भले ही लालमुनी देवी को उनके प्रयास के लिए अंतर्राश्ट्रीय स्तर पर सराहा गया हो, लेकिन भारतीय अथॉर्टिज का ध्यान वे अभी तक नहीं आकिशZत कर पाई हैं। इस वशZ अपै्रल में मुख्यमंत्री नीतीष कुमार की अध्यक्षता में देष के बड़े उद्योगपतियों वाली बीण्डीण्आईण्सीण् (बिहार डेवल्पमेंट एण्ड इन्वेस्टमेंट कौंसिल) की बैठक हुई, जिसमें राज्य में आर्थिक समृिद्ध लाने के उद्देष्य से कृिश एवं कृिश आधारित उद्योगों को चििन्हत किया गया। लेकिन लालमुनी देवी को उसके अनुभवों को साझा करने का मौका नहीं मिल सका। हाल ही मेंं एक बार फिर कृिश के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल करने वाले 25 उद्यमियों को राज्य सरकार द्वारा पुरस्कृत किया गया। लेकिन इस सूची से भी मषरूम-लेडी लालमुनी देवी का नाम नदारद था। इस तरह की उपेक्षा से लालमुनी देवी थोड़ी उदास तो हैं, लेकिन उन्हें गर्व है कि उन्होंने लोेगों को एक नई राह दिखाई है।

Friday, October 26, 2007

अहसास

कभी सोचा था कि एक दिन नयी दुनिया बसाएँगे
सितारे होंगे मुट्ठी में, चाँद पर घर बनायेंगे
कि अब एहसास के साए में ठहरी जिंदगानी है,
अभी क्या जाने खोना है और क्या जाने पायेंगे!

Thursday, October 11, 2007

प्रतापगढ़ स्थित सई नदी के किनारे पर ऎतिहासिक बेल्हा माई का मंदिर

छाया ः गूगल से साभार

भई बहुत रिस्की है ! !



- उमाशंकर मिश्र
ऐसा बहुत कम ही देखने को मिलता है, जब कोई मीडिया संस्थान अपने ही कुनबे के किसी सदस्य पर उंगली उठाने की हिमाकत कर सके, क्योंकि एक उंगली अगर सामने वाले पर उठती है तो तीन उंगलियों का रुख स्वयं की ओर ही होता है। इस तरह से यह काम भी बिल्ली के गले में घंटी बांधने से कम नहीं कहा जा सकता। शायद यही कारण है कि दबे कुचलों की आवाज बनने का दंभ भरने वाले मीडिया संस्थानों में ही जब कर्मचारियों का शोषण होने लगे तो उसकी खिलाफत करने के लिए कोई आगे नहीं आता। लेकिन यह स्वाभाविक तौर पर कहा जा सकता है कि जैसे मीडिया को बस उपदेश देने का हक है। खबरें क्या होंगी, यह टीआरपी तय करती है। जरा सी गलती हुई नहीं कि आसमान सिर पर उठा लिया जाता है और बार बार किसी खबर को इस तरह से दबाव देकर दिखाया जाता है, जिससे खबर अगंभीर होते हुए भी गंभीर बन जाती है। लेकिन टीआरपी के फेर में और सनसनी फैलाने तथा वाहवाही बटोरने की कवायद में जो गलतियां मीडिया करता है, उसका पोस्टमार्टम कौन करेगा? यह एक बहुत बड़ा सवाल है। प्रख्यात पत्रकार रामशरण जोशी का कथन उल्लेखनीय है कि ``19 वीं एवं 20 शताब्दी में पत्रकारिता को एक मिशन के रूप स्वीकार किया गया था, अब मिशनरी पत्रकारिता पर आधारित युग समाप्त हो गया है। सर्जनात्मक पत्रकारिता पर आधारित संपादकीय संस्थान कोमा में चले गए हैं, उनकी जगह एक ऐसी बाजारू पत्रकारिता ने लिया है, जिसने नए पूंजीवाद का जन्म दिया है। पुरानी परंपराओं को तोड़ नई अपसंस्कृति विकसित की जा रही है। इससे जनता का विष्वास पत्रकारिता पर कम होता जा रहा है।´´
इस तरह से कहा जा सकता है कि आज मीडिया की लगाम विज्ञापनदाताओं के हाथ में ही है। एक बात याद आती है, जब एक पत्रकार मित्र ने किसी कंपनी के डेयरी उत्पाद में फफूंद पाए जाने की षिकायत एक मीडिया संस्थान में नमूनों के साथ की। मीडिया संस्थान में डील करने वाले महाषय भी उनके मित्र थे। उन्होंने स्पश्ट बता दिया कि जब कंपनी से हमें करोड़ों का विज्ञापन मिलता है तो ऐसे में रिस्क नहीं लिया जा सकता। लेकिन शायद इस खबर को यदि तान दिया जाता तो उक्त कंपनी से भी अधिक विज्ञापन इस जनहित से जुड़ी खबर के बूते मिल सकते थे। लेकिन कोई रिस्क क्यों लेगा? जब पहले से ही अपना कोटा पूरा हो। अभी ज्यादा समय नहीं बीता जब एक प्रतििश्ठत मीडिया संस्थान के कर्मचारियों की भारी संख्या में छंटनी कर दी गई। रोजी रोटी से महरूम सैकड़ों कर्मचारी सड़क पर महीनों डेरा डाले पड़े रहे कि शायद प्रबंधन का दिल पसीज जाए। लेकिन ऐसे मेें मीडिया के लिए रामशरण जोशी की बात में एक बात और जोड़ने की जरुरत महसूस होती है। वह है संवेदनहीनता, जो उन सैकड़ों कर्मचारियों के प्रति दिखाकर तथाकथित संस्थान ने दिखा दिया कि समकालीन पत्रकारिता में कितना खोखलापन है। एक तरफ तो ढेरों कागज इस बात के लिए काले किए जाते हैं, लेकिन जब बात खुद पर आती है तो सामाजिक जिम्मेदारी का बहरूपियापन सामने आ जाता है।
रामषरण जोषी की बात को फॉलोे करते हुए अगर कहा जाए तो आज प्रोफेषनलिज्म के नाम पर ये जो ट्रेंड चल पड़ा है, कहीं ना कहीं इससे मीडिया के अपेक्षित वजूद और भावी पत्रकारों के भटकाव का सिलसिला शुरु होने की संभावना बढ़ जाती है। आज ऐसा जान पड़ता है मानों पत्रकारिता एक याचक की सी स्थिती में सकुचाती हुई `ग्लैमराई मीडिया´ से अपने वजूद की भीख मांग रही हो। जो लोग पत्रकारिता की पढ़ाई करके इस पेषे को अपना रहे हैं, उन्होंने इसके सिद्धांतों को जरूर पढ़ा होगा। ऐसे नवांकुर पत्रकार भी समझते हैं कि आज पत्रकारिता के पवित्र पेषे में व्यवसायिकता की दीमक लग गई है। हर राजनेता, उद्योगपती और समाज का अन्यत्र प्रभावषाली वर्ग मीडिया को अपनी जेब में रखना चाहता है। परिणामत: कुकुरमत्तों की तरह मीडिया संस्थान एवं प्रषिक्षण केन्द्र खुलने लगे। पहले ऐसा माना जाता था कि पत्रकार पैदा होता है, पैदा तो अब भी होता है। लेकिन धीरे धीरे यह धारणा स्थापित कर दी गई कि पत्रकार पैदा नहीं होता, बल्कि अब वह मैन्युफैक्चरिंग का आइटम बन गया है। इस धारणा के बूते प्रषिक्षण अनिवार्य कर दिया गया। लेकिन नौकरी देने की अनिवार्यता सुनिश्चत हो सकी है। ऐसा जान पड़ता है कि अब पत्रकारिता भी एमबीए, इंजीनियरिंग और एमबीबीएस की तरह गरीब एवं मध्यमवर्गीय तबके से दूर हो जाएगी, भले ही कैन्डीडेट प्रतिभासंपन्न तबके से दूर हो जाएगी। ऐसे में इस पेषे को निरा व्यावसाय ना बनने देने की जिम्मेदारी आखिर किस पर है? यह सवाल मुंह बाये खड़ा हुआ है।
बात मीडिया की है तो सरकार भी धो पोंछकर ही हाथ लगाने का प्रयास भर करती है, लगाती नहीं। कुछ समय पूर्व एक कार्यक्रम में सूचना एवं प्रसारण मंत्री जयपाल रेड्डी ने मीडिया की गिरती हुई साख पर चिंता भर ज़ाहिर करते हुए मीडिया कमीशन बनाने की बात कही थी। वे आंध्र प्रदेश भवन में ``क्या मीडिया में लक्ष्मण रेखा खींची जानी चाहिए´´विषय पर बोल रहे थे। काल, पात्र एवं स्थान का उस समय उन्होंने बखूबी ध्यान रखते हुए भाषण दिया। रेड्डी ने तो बुतप्राय पे्रस परिशद् के अधिकारों को भी बढ़ाने की इच्छा भर कर डाली और बड़ा ही चिकना और चुपड़ा हुआ वक्तव्य देते हुए कहा कि ``मीडिया शुरुआती दिनों से ही चाहे वह चर्च रहा हो, राजशही रही हो या फिर सरकार हो उसके खिलाफ लड़ाई लड़ती रही है और उसकी अपनी एक साख रही है। लेकिन आज किसी और से नहीं बल्कि मीडिया को खतरा उसके अपने अंदर से ही है। मीडिया समाचारों को बढ़ा चढ़ाकर सनसनी फैलाने की वजह से अपनी साख खोता जा रहा है।´´ कुछ भी हो जयपाल रेड्डी ने मीडिया की हकीकत को समझा तो सही। भले ही हकीकत से हम सबको रूबरु भर करवाया हो। इस फिसलनदार भाषण से कानून मंत्री हंसराज भारद्वाज फिसल पड़े। उनके अंदर की नैतिकता जाग उठी। मीडिया पर लगाम लगाने वाले कानून का खुला विरोध करते हुए कह दिया कि यदि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने ऐसा कोई विधेयक तैयार भी किया है तो वह उनके मंत्रालय से आगे नहीं बढ़ पाएगा। अपनी बात को पुख्ता करते हुए उन्होंने यह भी कह डाला कि सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी इसके पक्ष में नहीं हैं। तत्कालीन उपराष्ट्रपती भैरो सिंह शेखावत द्वारा हैदराबाद में इंडिया मीडिया सेंटर के उद्घाटन के अवसर पर कही गई बात उल्लेखनीय है कि ``तथ्यों को पक्षपात रहित प्रस्तुत करने के लिए मीडिया को खुद पर ही आचार संहिता लागू करने की आवश्यकता है। मीडिया की निष्प्क्ष रिपोर्ट ही लोगों का दिल जीत सकती है।´´ बात महत्वपूर्ण तो जरूर है, लेकिन क्या प्रैिक्टकल भी है? यह सोचने का विषय है, जो उन्होंने छोड़ दिया है। लेकिन बेहतर होगा कि मीडिया की बेहतरी के लिए मीडियाकर्मी ही आगे आकर यह सोचें कि मीडिया किस तरह से हमें खुद ही इसके लिए एक लक्ष्मण रेखा तय करनी है। ना सरकार और ना ही कोई अन्य इस मामले में हाथ डालना चाहेगा, `क्योंकि काम बहुत रिस्की है।´

रेत में दूब के अंकुर



थाईलैंड के साथ हुए एक करार के तहत फाउंडेशन ने हाल ही में केंचुओं की पहली खेप का निर्यात भी किया है। इस तरह दक्षिण एशिया में दस्तक दे चुका यह संस्थान शीघ्र ही यूरोपीय देशों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने जा रहा है। फाउंडेशन की सबसे बड़ी उपलब्धि जैविक कृषि, वर्मीकम्पोस्ट और वर्मीकल्चर भले ही रही हो लेकिन संसाधनों के प्रबंधन, स्वास्थ्य, शिक्षा समेत कई क्षेत्रों में भी फाउंडेशन ने महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं।

-उमाशंकर मिश्र


जैविक खेती भारत में नई नहीं है। वेदों में भी इसका जिक्र आता है। 500 ईसा पूर्व लिखी अपनी पुस्तक में वराहमिहिर ने दर्शाया है कि किस फसल में किस खाद का प्रयोग करना चाहिए। मोहनजोदाड़ों के धान के भंडार बताते हैं कि भारत में उन्नत किस्म की खेती होती थी। आज राजस्थान के शेखावटी अंचल में जैविक खेती एवं वर्मीकल्चर के व्यापक प्रयोगों से एक बार फिर बदलने लगी है फिजां और अब बंजर भूमि में भी अंकुर फूटने लगे हैं।नवलगढ़ तहसील, जिला झुंझनू( राजस्थान के किसान मुरलीधर की जैविक पद्धति से किसानी आज न केवल उनकी समृिद्ध का पर्याय बन गई है बल्कि अन्य किसानों के लिए भी वे आदर्श बन गए हैं। करीब 7 वर्ष पूर्व इस तरह की स्थिति उनके लिए नहीं थी। लगातार रसायनिक खाद के प्रयोग से उनके खेतों की रेतीली मिट्टी पथरा कर अपनी उर्वरा शक्ति खो चुकी थी। ऐसे में उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए जिससे एक भरे-पूरे संयुक्त परिवार के भरण-पोषण का मार्ग प्रशस्त किया जा सके। इसी दौरान वे शेखावटी अंचल में जैविक खेती के प्रोत्साहनार्थ कार्य करने वाली संस्था मोरारका रूरल रिसर्च फांउडेशन के संपर्क में आए, जिससे उन्हें अपने खेतों की माटी को पुन: कृषि योग्य बनाने के लिए जैविक खेती अपनाये जाने को कहा गया। पहले तो मुरलीधर को विश्वास नहीं हो रहा था कि जैविक खेती और वर्मीकम्पोस्ट खाद इतना फायदेमंद हो सकता है। लेकिन कोई चारा न देख उन्होंने फाउंडेशन के लोगों की बात मान ली और जैविक खेती प्रारंभ कर दी। सर्वप्रथम कठोर हो चुकी खेतों की मिट्टी को उजाउू बनाना था। इसके लिए केंचुआ खाद का आवश्यकतानुसार उपयोग किया गया, जिससे खेतों की मिट्टी में पोषक तत्व एवं नमी पुन: स्थापित हो गए और मिट्टी पहले की अपेक्षा भुरभुरी हो गई। इस तरह की मिट्टी में किस तरह की फसलें ली जा सकती हैं, यह भी फांउडेशन की ओर मुरलीधर को समझाया गया। एक जागरूक किसान की तरह मुरलीधर की रूचि भी इस कार्य में बनी हुई थी और उन्होंने सिब्जयों की खेती शुरु कर दी। आज वे अपने खेतों में गोभी, मूली, मटर, प्याज, बैंगन और पत्ता गोभी बाजरा, मिर्च, ग्वार, पालक, इत्यादि की भरपूर फसल लेने लगे हैं। जबकि वर्ष 2000 से पूर्व पानी की कमी के चलते उन्हें खेतों को परती छोड़ना पड़ता था। लेकिन आज जैविक खेती और केंचुआ खाद के प्रयोग से पानी की आवश्यकता भी पहले की अपेक्षा कम हो गई है। आज मुरलीधर ने रसायनिक खाद और केमीकल्स के प्रयोग को पूरी तरह से नकार दिया है। वे बताते हैं कि उत्पादन भी पहले की अपेक्षा डेढ़ गुना बढ़ गया है। यही नहीं वर्ष 2000 से पूर्व उनकी सालाना आय पौने दो लाख रुपये थी, जो आज बढ़कर 3 लाख रुपये तक पहंुंच गई है। यही नहीं वर्ष 2003में जैविक खेती का मानक प्रमाण पत्र मिल जाने से कार्य और भी आसान हो गया। आज मुरलीधर ने पांच किसानों का एक समूह बनाकर खेती करना आरंभ कर दिया है और उनकी सिब्जयां सतलुज नामक मार्कीटिंग एजेंसी की मार्फत दिल्ली तथा जयपुर तक जाने लगी हैं। यही नहीं वे अपने समूह के किसानों के साथ मिलकर संगठित तौर पर अपने उत्पादों की मार्कीटिंग करने के लिए विचार कर रहे हैं।मोरारका फ़ांउडेशन के प्रतिनिधियों की प्रेरणा से उन्होंने अपने फार्म पर ही अब केंचुआ खाद खुद ही तैयार करनी शुरु कर दी है। फांउडेशन की ओर से इस कार्य के लिए ट्रेनिंग के साथ साथ आरंभिक चरण में केंचुए भी दिये गये, जिन्हें कुशल मुरलीधर ने कई गुना कर लिया है। वे बताते हैं कि विशेषज्ञ कहते थे कि शुष्क माटी में वर्मीकलर संभव नहीं है। क्योंकि नमी न होने से केंचुए मर जाएंगे और ऐसे में प्रयोग असफल होकर रह जाएग। लेकिन मोरारका फांउडेशन के प्रतिनिधियों ने अपने तकनीकी कौशल के द्वारा इस बात को गलता साबित कर दिखाया है। गोबर के ढेर मेें व्यवस्थित तरीके से केंचुओं को डालकर गीले टाट से ढक दिया जाता है, जहां प्रजनन द्वारा उनकी संख्या में निरंतर वृिद्ध होती रहती है। इस तरह से उनका प्रयोग जैविक खाद के निर्माण में किया जाता है। मुरलीधर गोबर की आवश्यकता भी उसके द्वारा पाले गए जानवरों से ही पूरी हो जाती है। इसके लिए किसी और पर निर्भर रहने की आवश्यकता मुरलीधर को नहीं है। वे बताते हैं कि खाद अब खरीदनी नहीं पड़ती और बीज के अतिरिक्त कोई खर्च भी नहीं आता। इसके अलावा फसलों पर लगने वाले कीड़ों से बचाव के लिए जैविक स्प्रेे के निर्माण की तकनीक भी उन्होंने सीख ली है। इसके लिए आवश्यक गौमूत्र एवं आक के पत्तों जैसी जरूरी आगतें आसानी से उपलब्ध हो जाती हैंं। आज मुरलीधर के गांव चेलासी में करीब 20 से 25 घर ऐसे हैं, जिन्होंने उनकी तरह ही खेती के प्रयोगों को अपनाना शुरु कर दिया है। वयोवृद्ध मदन सिंह भी ऐसे ही किसानों में से एक हैं। 48 बीघे के काश्तकार मदन सिंह ने बाजरा, ग्वार, मोठ, मूंग का उत्पादन पूरी तरह से जैविक खेती के द्वारा शुरु कर दिया है। इसके लिए उनका सर्टीफीकेशन भी हो चुका है। सर्टीफीकेशन जैसी तमाम तकनीकी और उनकी उपयोगिता संबंधी जानकारियां किसानों तक पहुंचाने का काम भी मोरारका फांउडेशन के ही प्रतिनिधी करते हैं।वर्षों तक कार्य करने के बाद मोरारका फाउंडेशन की आर्गेनिक फार्मिंग विंग ने अपने अनुभवों से अपनी कार्य-पद्धति को भी नये आयाम दिये हैं। किसानों को उनके कौशल के आधार पर विभक्त किया है, जिसमें उन्हें स्टार रेटिंग दी जाती है। ऐसा किसान जो सिर्फ फाउंडेशन के आर्गेनिक फार्मिंग कार्यक्रम से परिचित है या फिर इसमें शामिल होने का इच्छुक है, उसे सिंगल स्टार रेटिंग दी जाती है। जबकि किसी जागरूकता कार्यक्रम में हिस्सा ले चुके और पंजीकरण के इच्छुक किसानों को दो स्टार श्रेणी में रखा जाता है। आर्गेनिक फार्मिंग के विस्तार कार्यक्रम को बखूबी समझने वाले पंजीकृत किसानों को तीन स्टार रेटिंग की श्रेणी में रखा जाता है। इस श्रेणी के अंर्तगत कार्य करने वाले किसान अपेक्षाकृत तौर पर जैविक खेती के बारे में बेहतर समझ हासिल कर चुके होते हैं। इसी तरह से किसानों को उनकी दक्षता के आधार पर सात स्तरों पर रेटिंग दी गई है।मुरलीधर की भांति ही शेखावटी के जिलों सीकर के 43 और झुंझनू के 67 गांवोंं में सर्टीफीकेशन एजेन्सी से रजिस्टर्ड करीब 10,214 किसान हैं, जिन्होंने जैविक खेती को अपनाया है। थाईलैंड के साथ हुए एक करार के तहत फाउंडेशन ने हाल ही में केंचुओं की पहली खेप का निर्यात भी किया है। इस तरह दक्षिण एशिया में दस्तक दे चुका यह संस्थान शीघ्र ही यूरोपीय देशों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने जा रहा है। मोरारका फाउंडेशन की सबसे बड़ी उपलब्धि जैविक कृषि, वर्मीकम्पोस्ट और वर्मीकलर भले ही रही हो लेकिन संसाधनों के प्रबंधन, स्वास्थ्य, शिक्षा समेत कई क्षेत्रों में भी फाउंडेशन ने महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं।

Tuesday, October 9, 2007

जैविक खाद से बदली तकदीर

उमाशंकर मिश्र
इन्डिया फ़ांउडेशन फ़ार रूरल डेव्लपमेन्ट स्टडीज
नई दिल्ली
मध्य प्रदेश में बैतूल जिला मुख्यालय से करीब 70 किमीटर की दूरी पर पहाड़ों से घिरा हुआ ग्राम है, चिल्हाटी। दूरदराज के इस गांव में करीब डेढ़ सौ किसानों के घर हैं। नत्थू हजारे और जीवन लाल हिंगवे भी इसी गांव में रहने वाले कृषक हैं। जिन्हें करीब दो दो लाख रुपए का कर्ज विरासत में मिला था। उन्हें सूझ नहीं रहा था कि कैसे कर्ज के इस अभिशाप से मुक्ति पाई जाए। आमदनी कम होने के कारण परिवार का भरण पोषण भी कठिन हो गया था। लेकिन सरकारी अनुदान पर लगने वाले गोबर गैस संयंत्र और जैविक खाद से न केवल इन दोनों किसानो की तकदीर बदल गई बल्कि पूरा गांव इस तरह के प्रयोग से आत्मनिर्भर बनने की ओर अग्रसर है। जीवन लाल हिंगवे एक एकड़ जमीन के काश्तकार हैं। उनके घर पर दो घन मीटर और चार घन मीटर का गोबर गैस संयंत्र बना हुआ है। जिससे पैदा होने वाली गैस का उपयोग वे घर में खाना बनाने के लिए तो करते हैं। इसके अलावा उन्होंने 200 रुपए प्रति माह के हिसाब से इस संयंत्र से दो लोगों को कनेक्शन भी दिया है। इसी तरह से केंचुआ खाद से वे साल भर में डेढ़ लाख रुपए तक कमा लेेते हैं और करीब 30 हजार रुपए की कमाई केंचुए बेचने से हो जाती है। चिल्हारी गांव मे कुल 41 नाडेप टांके बने हैं और यहां सालाना दो सौ टन गोबर खाद एवं 100 टन केंचुआ खाद का उत्पादन हो रहा है। इस तरह के प्रयोग से गांव के किसानों को खेती के अलावा आय का एक वैकल्पिक जरिया मिल गया है। जिससे ग्रामीणों की आय में वृिद्ध होने के साथ साथ खेतों में जैविक खाद के प्रयोग से फसलों की उपज भी भरपूर हो रही है। इसी का परिणाम है कि नत्थू हजारे और जीवन लाल हिंगवे जैसे किसान आज बेहतर जीवन जी रहे हैं। हिंगवे ने तो खाद से होने वाली आय की बदौलत एक आटा चक्की भी लगा ली है। इसके अलावा गाय पालन के साथ सिंचाई के लिए एक ट्यूबवैल भी लगवा लिया है। इस तरह जैविक खाद के उत्पादन से किसानों किसानोें के जीवनस्तर को सम्मानजनक स्थिती में पहुंचा दिया है। गांव की पूर्व सरपंच दुर्गाबाई ने भी एक गोबर गैस और चार नाडेप टांंके बनवाए हैं। इनमें से दो नाडेप टांके तो सरकारी अनुदान से बने हैं। बकौल दुर्गाबाई पहले हजारों रुपए की लकड़ियां ईंधन के रूप में जल जाती थी और खेतों में रसायनिक खाद डालने के लिए भी धन का काफी खर्च होता था। लेकिन अब इन मदों पर होने वाले खर्च की बचत का उपयोग ग्रामीण अन्य कामों मे करने लगे हैं। जैविक खाद के प्रयोग से फसल उत्पादन में वृिद्ध के अलावा कीटों के प्रकोप का खतरा भी कम हो गया है। कृमि अर्थात् केंचुओं को मृदा में डालना या उनमें कृमि खाद बनाना अत्यंत प्राचीन प्रक्रिया है। इसे अन्य प्रचलित प्रक्रियाओं में सर्वोत्तम भी माना गया है। इस तरह से देखा जाए तो जैविक खाद के प्रयोग से न केवल रसायनिक उर्वरकों पर होने वाले खर्च से बचा जा सकता है। बल्कि यह पर्यावरण हितकारी भी है। केंचुओं की खाद बनाने वाली प्रजाती जमीन में रहने वाली समान्य प्रजाति से भिन्न होती है। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि इसके लिए अच्छी प्रकार के केंचुएं प्रयोग किए जाएं। इसके लिए तीन प्रकार की प्रजातियां प्रचलित हैं। अफ्रीकन नाइट क्राउजर, टाईगर वर्म और इंडियन ब्लू वर्म इसमें प्रमुख है।

Sunday, October 7, 2007

बीजों पर अधिकार की मुहीम




उमाशंकार मिश्र
इंडिया फ़ांउडेशन फ़ार रूरल डेव्लप्मेंट स्टडीज
नयी दिल्ली
खेती पूरी प्रक्रिया का प्रथम चरण बीज ही होता है। इस बात को बीज कंपनियां भली भांति जानती हैं। जिसके चलते बीज जो कभी समुदाय की धरोहर हुआ करता था, आज उन पर कंपनियों द्वारा अधिकार की कवायद जोर पकड़ती जा रही है। परिणामत: वे किसानों की खोजों को हथियाने से भी नहीं चूकती।



बैशाख शुक्ल की तीज के दिन मनाया जाने वाला त्यौहार ``अक्ति´´ छत्तीसगढ़ के गांवों में मनाया जाने वाला एक परंपरागत त्यौहार है, जो इस आदिवासी बहुल राज्य के विभिन्न भागों में विविध स्वरूप लिए हुए है। दुर्ग जिले के गांवों में इस दिन किसान अपने घर से धान के बीज पलाश के पत्तों में लेकर एक सामूहिक पूजा स्थल पर एकत्रित होते हैं। सभी के लाए हुए बीजों को यहां पर एक साथ मिलाने के बाद पूजा की रस्म सम्पन्न की जाती है। तत्पश्चात् सभी लोग एकत्रित किए गए धान में से थोड़ा - थोड़ा लेकर जाते हैं और अपने खेतों में सांकेतिक बुआई की शुरुआत करते हैं। कुछ इसी तरह से चैत्र माह की द्वितिया को नगर सिहावा के बैगा आदिवासी दोने में रखकर बीज एक दूसरे को दिया करते हैं और ``अक्ति´´ में अपने पास से कुछ और बीजों को मिलाकर नए फसल वर्ष में बुआई की शुरुआत करते हैं।
इस पूरी प्रक्रिया में जो एक बात समान रूप से झलकती है, वह है बीजों का आदान प्रदान, जिसके कारण सदियों से फसलों में विविधता का विकास हुआ है। हमारे देश कुछ इसी तरह से किसान लम्बे समय से बीजों का आदान प्रदान करते रहे हैं। यही नहीं जरुरत के समय अनाज के आदान की परंपरा भी हमारे देश में रही है। लेकिन जबसे हरित क्रांति का शंखनाद हमारे देश में हुआ है, तभी से कृषकों के विकास की आड़ में बीजों के धंधे ने भी पांव पसारने शुरु कर दिए था। परिणामत: कृषि के क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कंपनियों का हस्तक्षेप भी बढ़ना शुरु हो गया था। आज वही कंपनियां बीजों के रखरखाव की इस परंपरा के चक्र को विखंडित करने पर तुली हुई हैं क्योंकि ऐसा करने पर ही किसान बीजों की जरुरत को पूरा करने के लिए इन कंपनियों पर निर्भर हो सकते थे। इस तरह की परिस्थिती के उत्पन्न होने से बीजों के संरक्षण की जो परंपरागत पद्धतियां छिन्न भिन्न होती चली गई। इस तरह जैसे जैसे कंपनियों के एकाधिकार की मुहिम तेज हुई, लूट का चक्र भी बढ़ता चला गया। इसक ताजा उदाहरण बहुराष्ट्रीय कंपनी मोन्सेंटों द्वारा भारत में देशी कपास के बीजों के स्थान पर अधिक उत्पादन के नाम पर जीन संविर्द्धत बीजों के प्रचार प्रसार के रूप में देखा जा सकता है। जबकि इस तरह के प्रतिकूल प्रभाव के कारण इसका चौतरफा विरोध हम देख चुके है। विदर्भ के किसानों के द्वारा की जा रही आत्महत्याओं का एक कारण इस तरह के बीजों के प्रयोग को भी माना जा रहा है। इस प्रकार बीज जो कभी समुदाय की धरोहर हुआ करता था, वह निजी संपत्ति बन कर बाजार की गिरफ़्त में आ गया। बीजों के बाजारीकरण के इस ताने बाने में बीजों के संरक्षण की देशी विधियों को निशाना बनाया गया। टर्मीनेटर तकनीक जिसके तहत बीजों के उत्पादन की बात कही गई है, इस बात को पुख्ता करता है। इस प्रकार के बीजों के प्रयोग से फसल तो होगी लेकिन अगली फसल के लिए किसानों के पास कुछ नहीं बचा रह पाता। अर्थात हर बार फसल की बीजाई के लिए किसान को बीज बाजार से ही खरीदना ही पड़ता है। इन बाजारू शातिर के परिणामस्वरूप बीज अब किसानों की पहुंच से दूर होते जा रहे हैं। संकर बीजों के प्रयोग से वास्तविक फायदा किसानों की अपेक्षा बीज कंपनियों, रसायन एवं यूरिया कंपनियों को होता है। क्योंकि इन बीजों के प्रयोग से रसायनिक खाद, कीटनाशकों और सिंचाई की अधिकतम आवश्यकता होती है। निरंतर इस चक्र के चलते रहने के कारण ही भूमि बांझपन की ओर बढ़ने लगती है। पंजाब के विभिन्न हिस्सों में भूमि का बंजर होना इसी बात का प्रमाण माना जा सकता है। खेती की पूरी प्रक्रिया का प्रथम चरण बीज ही होता है। सदियों से खेती का विकास बीजों की विविधता के संरक्षण एवं संवर्धन पर टिका रहा है। अलग अलग मिट्टी एवं पानी के कारण सैकड़ों वर्षों से फसलों की विविधता का विकास हुआ है। यही नहीं स्थानीय खेती की विशेष पारिस्थितिक जरूरतों को समझते हुए लोग फसलों की विविध किस्मों का संरक्षण करते रहे हैं। महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले की नागबीड़ तालुका के वयोवृद्ध किसान दादाजी रामाजी खोब्रागेड़े को इसी कड़ी एक हिस्सा माना जा सकता है। उन्होंने धान की पटेल-3 किस्म में होने वाले परिवर्तनों का लम्बे समय तक अवलोकन किया और अपनी पारखी दृिष्ट एवं लगन से धान की नई किस्म खोजकर उसे विकसित किया। आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में बहुतायत में पैदा किए जाने वाले धान का नाम एचएमटी है। 1990 में जब एचएमटी की खिली हुई फसल को आसपास के लोगों ने खोब्रागेड़े के खेतों में देखा तो उन्होंने भी इसकी मांग शुरु कर दी। एचएमटी की बढ़ती लोकप्रियता के कारण इसकी महक अकोला स्थित पंजाबराव देशमुख कृषि विद्यापीठ तक जा पहुंची और इसकी भारी मांग के चलते विद्यापीठ के शोधकर्ताओं के मुंह में भी पानी आ गया। विद्यापीठ के वैज्ञानिक खोब्रागेड़े से अनुसंधान के नाम पर कुछ बीज ले गए और उन बीजों का शुद्धिकरण कर पीकेवीएचएमटी के नाम से बाजार में जारी कर दिया और खोब्रागेड़े को उसकी खोज एवं योगदान के प्रतिफल से वंचित कर दिया। कुछ समय पूर्व ``राष्ट्रीय नवप्रर्वतन संस्थान´´ की ओर से महामहिम अब्दुल कलाम ने खोब्रागेड़े को सम्मानित किया। राष्ट्रीय अनुसंधान परिषद् ने भी खोब्रागेड़े की उपलब्धि को पुरस्कृत करने हेतु नामांकित किया था। लेकिन विद्यापीठ से अधिकृत मान्यता न दिए जाने के कारण खोब्रागेड़े को उन्हें पुरस्कार नहीं मिल सका। दूसरी ओर खोब्रागेड़े का दावा है कि शुद्धिकरण के बाद भी धान में कोई गुणात्मक सुधार विद्यापीठ ने नहीं किया है। इस तरह की परिस्थितियों का आरंभ तभी से हुआ है जबसे कृषि से संबंधित मदों का बेतहाशा बाजारीकरण किया जाने लगा। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में स्थित इंदिरा गांधी विश्वविद्यालय में पारंपरिक धान की 20 हजार से अधिक किस्मों का संग्रहण किया गया है। बहुराष्ट्रीय कंपनी सिंजेन्टा की गिद्धदृिष्ट लंबे समय से गड़ी हुई थी। कंपनी ने बीजों के संग्रह को हथियाने के लिए इंदिरा गांधी विश्वविद्यालय से साझा अनुसंधान के नाम पर एक समझौता कर लिया। जब इस बात का खुलासा हुआ तो छत्तीसगढ़ मे इसका पुरजोर विरोध होने लगा। अंतत: विश्वविद्यालय को इस समझौते से अलग होना पड़ा। अपने संसाधनों को संरक्षित रखने के लिए छत्तीसगढ़वासियों की भांति ही लोक-पहल की आवश्यकता है। छत्तीसगढ़ में पाई जाने वाली हजारों धान की किस्में गुणात्मक और पैदावार की दृिष्ट से काफी समृृद्ध हैं। धान की इन प्रजातियों का विकास किसी प्रयोगशाला में नहीं किया गया था। बल्कि स्थानीय किसानों ने मिट्टी से अपने जुड़ाव से सैकड़ों वर्षों से इस धरोहर को सजाया संवारा है। यहां सवाल यह उठता है कि फसलों की नई किस्मों का चयन, विकास एवं विभिन्न किस्मों के सुधार का अधिकार-क्षेत्र क्या कृषि वैज्ञानिकों, शोध संस्थानों और कार्पोरेट बीज कंपनियों तक ही सीमित है? क्या फसलों की किस्मों के विकास का श्रेय उन किसानों को नहीं मिलना चाहिए जिन्होंने धरती से अपने लगाव के चलते अपनी पारखी दृिष्ट एवं अनुभव से फसलों की अनगिनत किस्मों का विकास किया है। किसानों की पारंपरिक खोजों को बढ़ावा देने के लिए क्या कृषि वैज्ञानिकों, कृषि शोध संस्थानों द्वारा उन्हें प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए? लेकिन इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि किसानों को उनके योगदान के लिए प्रोत्साहित करने की बजाय तथाकथित कृषि वैज्ञानिक एवं शोध संस्थान ही किसानों की खोजों पर अपना लेबल लगाकर उनका श्रेय हासिल करने को आतुर रहते हैं। विश्व व्यापार संगठन के माध्यम से दुनिया भर की बहुराष्ट्रीय कंपनियां विभिन्न देशों के संसाधनों को अपनी पूंजी एवं तकनीक के माध्यम से हड़पने को आतुर हैं। विडंबना ही है कि हमारे देश में कानून भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की एकाधिकार की मुहिम को रोक पाने और स्थानीय समुदाय के अधिकारों की रक्षा करने में अक्षम जान पड़ते हैं। भारत मे जैव संसाधनों के विषय से संबंधित पेटेंट(द्वितीय संसोधन) अधिनियम 2002, पौध प्रजाति एवं कृषक अधिकार सुरक्षा अधिनियम-2001 एवें जैव विविधता बिल जैसे कानूनों की व्यवस्था की गई है। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि ये कानून इस तरह की जैव विविधता की धरोहरों पर पेटेंट की अनुमती प्रदान करते हुए कहीं न कहीं स्थानीय समुदायों को उनके नैसर्गिक अधिकारों से वंचित कर रहे हैं। वास्तव मे पेटेंट कानून पर यदि गौर करें तो इसका स्वरूप जैव विविधता को नष्ट करके उसमें एकरूपता कायम करते हुए बहुराष्ट्रीय कंपनियों के चुनिंदा बीजों की किस्मोंं पर निर्भरता को सुनििश्चत करते हैं। छत्तीसगढ़ स्थित ``रिछारिया किसानी संरक्षण एवं संवर्द्धन '' से सम्बद्ध जैकब नल्लिथनम हरित क्रांति की विसंगतियों को इस प्रकार की स्थिति के उत्पन्न होने के लिए जिम्मेदार मानते हैं। साथ ही वे इस पूरे ताने-बाने को राजनीतिज्ञों, नौकरशाहों और बड़ी कंपनियों की आपसी संाठगांठ का परिणाम बताते हुए कहते हैं कि इन लोगों ने अपने स्वार्थों की सििद्ध के लिए बहुसंख्य आबादी के समक्ष बहुत बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।

Wednesday, October 3, 2007

राजनीतिकरण से हुई है सहकारिता की दुर्गति


सहकारिता आर्थिक संगठन का एक रूप है। भारत में सदियों से चली आ रही संयुक्त परिवार प्रणाली को भी सहकारिता के सिध्दांतों पर ही आधारित माना जाता है। लेकिन जब देश में पश्चिमी सभ्यता ने अपने पांव पसारने शुरु कर दिये तो देश में सहकारिता के स्थान पर व्यक्तिवाद का उदय होने लगा। परिणामत: सहयोग के स्थान पर प्रतिस्पर्धा की भावना बलवती होने लगी। परिणामत: किसानों एवं गरीब लोगों की स्थिती पर भी उसका असर साफ नजर आने लगा। इसी को ध्यान में रखते हुए 19 वीं सदी के आरंभ में सहकारिता की नींव रखने का फैसला किया गया था। विभिन्न आर्थिक प्रणालियों - व्यक्तिगत एवं सार्वजनिक क्षेत्रों की आर्थिक प्रणालियों में पाए जाने वाले दोषों का निवारण करने का उपाय ही सहकारिता है। सहकारिता इन दोनों के मध्य की स्थिति है। 'मैकलेन समिति' के अनुसार, सहकारिता का सिध्दांत संक्षेप में यह दर्शाता है कि एक अकेला एवं साधन-रहित व्यक्ति भी अपने स्तर के व्यक्तियों का संगठन बनाकर, एक दूसरे के सहयोग से एवं नैतिक विकास व पारस्परिक समर्थन से अपनी कार्यक्षमता के अनुसार, धनवान, शक्तिशाली व साधन संपन्न व्यक्तियों को उपलब्ध सभी भौतिक लाभ समान स्तर पर प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार साधन रहित व्यक्ति अपना विकास सहकारिता के माध्यम से कर सकता है।

व्यक्ति के शामिल होने के लिए उसकी स्वेच्छाचारिता, लोकतांत्रिक प्रबंधन, सदस्यों का आर्थिक, सामाजिक एवं नैतिक उत्थान, स्वावलंबन एवं परस्पर सहयोग, सेवा भावना और राजनीति, धर्म जाति एवं राष्ट्रीयता के प्रभाव से तटस्थता सहकारिता के मूल सिध्दांत माने जाते हैं।

लेकिन! सहकारिता के वर्तमान स्वरूप पर यदि नज़र दौड़ाएं तो क्या यह कहा जा सकता है कि सहकारिता का आज मूल स्वरूप एवं सिध्दांत आज भी जीवित हैं! जवाब निश्चित तौर पर ना में ही होगा। हाल ही में महाराष्ट्र के जलगांव स्थित प्रतिभा महिला सहकारी बैंक और मुक्ताबाई सहकारी चीनी मिल के प्रकरण ने सहकारिता के कलुषित होते स्वरूप को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। एक प्रश्न कोऑपरेटिव सोसायटियों के कामकाज, उनकी सामाजिक जिम्मेदारी और राजनीतिक घुसपैठ के कारण सहकारिता के मूल स्वरूप पर मंडराते खतरे के रूप में सामने आया है। जिसने हमें एक बार फिर से चेताया है कि किस तरह से प्रभावशाली लोगों ने अपने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए इन जनसंस्थाओं पर तानाशाहीपूर्वक कब्जा कर जनता को उनके अधिकारों से बेदखल करने का काम किया है। महाराष्ट्र में शरद पवार और गोपीनाथ मुंडे जैसे राजनीतिज्ञ चीनी कोऑपरेटिव मिलों के जरिए राजनीति चमकाने वालों में जाने जाते हैं। 1973 में स्थापित प्रतिभा महिला सहकारी बैंक में अध्यक्ष के सगे संबंधियों को ही पदों की बंदरबांट कर दी गई। यहां तक कि आरक्षित पदों पर की जाने वाली नियुक्तियों की भी उपेक्षा की गई और धड़ल्ले से संबंधियों एवं करीबी लोगों को ऋण प्रदान किया गया। 1995 में रिजर्व बैंक ने इस सहकारी बैंक को कमजोर बैंकों की सूची में डाल दिया। लेकिन हद तो तब हो गई जब इसी बैंक के अध्यक्ष की पहल पर ही स्थापित मुक्ताबाई कोऑपरेटिव चीनी मिल के शेयर खरीदने लिए प्रतिभा महिला सहकारी बैंक से ही ऋण दिया जाने लगा और अंतत: बैंक दिवालियेपन के कगार पर पहुंच गया। यह वर्तमान सहकारिता के स्वरूप का ही एक हिस्सा है। आखिर उन गरीब महिलाओं का क्या होगा, जो अपनी बेटी की शादी या फिर बुढ़ापे के लिए अपनी गाढ़ी कमाई को इस तरह के सहकारी बैंकों में जमा करते हैं। क्या अपने सदस्यों के प्रति इन संस्थानों की कोई जिम्मेदारी नहीं है?

एक समय था सहकारिता के कारण महाराष्ट्र के किसानों को एक नई दिशा मिली थी और उनके लिए तरक्की की राह प्रशस्त हो सकी थी। लेकिन समय के साथ भ्रष्टाचार के कारण बड़ी जोत वाले किसानों का दबदबा सहकारी मिलों पर बढ़ता चला गया और इस तरह से मिलों के नियंत्रात्मक ढांचे में बदलाव आने लगे। अब आम सदस्य किसानों के अधिकार धूमिल होने लगे थे। शुगर फैक्ट्रियों में गवर्निंग बॉडी चुनावों में धन महत्वपूर्ण कारक बनता जा रहा था और धनाढय एवं शक्तिशाली किसान अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष जैसे पदों को हथियाने लगे थे। जबकि अधिसंख्य किसान छोटी जोतों वाले गरीब किसानों की थी। 1996 में महाराष्ट्र स्थित 15 सदस्यों वाली संगमनेर फैक्ट्री के गवर्निंग बॉडी चुनावों में एस.तानपुरे ने चुनाव लड़ने का फैसला किया। फैक्ट्री में करीब 14 हजार सदस्य ऐसे थे जिनकी जोतें बहुत छोटी थीं। तानपुरे भी उन्हीं में से एक था। तानपुरे न केवल चुनाव हार गया, बल्कि उसे प्रबंधकों के गुस्से का शिकार भी बनना पड़ा। उसको सबक सिखाने के लिए उसके खेतों से गन्ने को खरीदने से मना कर दिया गया। अगर नियंत्रात्मक ढांचे को कोई सदस्य प्रभावित करने का प्रयास करता है तो उसे इसी तरह से परेशान किया जाता है। पानी एवं बिजली के कनेक्शन कटवा दिये जाते हैं, क्रेडिट रोक दिया जाता है या फिर गन्ने की खरीद में टाल-मटोल किया जाता है। कई स्थानों पर तो किसानों को वाजिब मूल्य नहीं मिल पाने से गुड़ बनाने वाले अन्य व्यापारियों को गन्ना बेचना पड़ता है। सवाल उठता है कि आखिर ऐसे में इस तरह के कोऑपरेटिव संस्थानों की क्या प्रासंगिकता रह जाती है जो अपने सदस्यों के कल्याण्ा के लिए कार्य नहीं कर रहे हों? एक आधिकारिक सूत्र के मुताबिक महाराष्ट्र में कोई भी ऐसा कोऑपरेटिव नहीं है, जिस पर राजनीति एवं राजनीतिज्ञों का नियंत्रण न हो। वे बताते हैं कि महाराष्ट्र की 5 प्रतिशत चीनी मिलों पर भारतीय जनता पार्टी और 95 प्रतिशत पर कांग्रेस का कब्जा है। जिसमें से 60 प्रतिशत अब सिर्फ राष्ट्रवादी कांग्रेस के हिस्से में आती हैं।

हालांकि महाराष्ट्र जैसे राज्यों आज भी बहुधा ऐसे लोग मिल जाते हैं जो सहकारिता के गुणगान की डींगे हांकते नहीं थकते। लेकिन हकीकत तो ये है कि इसके लिए राज्य के खजाने को भारी कीमत चुकानी पड़ती है। शुगर कोऑपरेटिव सोसायटियों की संरचना कुछ इस तरह से है कि लाभ तो सदस्यों में बांट दिया जाता है, लेकिन हानि का बोझ सरकार पर डाल दिया जाता है। जिसका फायदा मिल मालिक बखूबी उठाते हैं और संस्थान को घाटे में दिखाकर जहां एक ओर सदस्यों को उन्हें मिलने वाले प्रतिफल से वंचित कर दिया जाता है, वहीं सरकार से हानि की भरपाई करने के लिए अनुदान भी मिल जाता है। इसी तरह कोऑपरेटिव संस्थानों की स्थापना के लिए प्रमोटर्स को सिर्फ 10 प्रतिशत लागत ही जुटानी होती है। जबकि शेष राशि सरकार से लोन के तौर पर मिल जाती है। जबकि इन सहकारी संस्थानों द्वारा लोन न चुकाए जाने के मामले समय समय पर सुनने को मिलते रहे हैं। ऐसी स्थिति में लोन का भुगतान राज्य सरकार को करना पड़ता है। 2004 तक की बात यदि करें तो इस तरह के बकाया लोन की गारंटी राशि 665 करोड़ रुपये बताई जाती है।

भारत सरकार के पूर्व गृह सचिव माधव गोडबोले और अर्थशास्त्री डा. प्रदीप आपटे जैसे लोग इस तरह की गारंटी दिए जाने के सख्त विरोधी हैं। वे कहते हैं कि आखिर सरकार को इस तरह की गारंटी देने की क्या जरूरत है? माधव गोडबोले कहते हैं कि ''जो राजनीतिक सुलभ वही आज सहकार बन कर रह गया है। और सत्ताा प्राप्ति का साधन और कुप्रबंधन के शिकार इन सहकारी संस्थानों पर लगाम कसी जा सके, इतनी ताकत लचर कानूनों में नहीं है।'' वे कहते हैं कि सरकार का नियंत्रण इस तरह की संस्थाओं पर नहीं रह गया है। गोडबोले सहकारी संस्थानों की दशा में सुधार हेतु वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाए जाने की बात पर जोर देते हुए कहते हैं कि इन संस्थानों को अधिकतम लाभ हेतु सुदृढ़ करने की जरुरत है। डा. प्रदीप आपटे कहते हैं कि लोग सहकारी संस्थाओं के सदस्य तो हैं, लेकिन सिवाय वोटिंग के उनके पास कोई और अधिकार नहीं है और व्यावसायिक तथ्यों की यहां हमेंशा अवहेलना हुई है। यहां व्यावसायिक बोध और व्यावहारिकता की बात करने वाले को विकास विरोधी करार दे दिया जाता है। दूसरी ओर राजनीतिकरण को जनस्वीकृति भी मिल चुकी है। इसी तरह बैकुण्ठ मेहता नेशनल कोऑपरेटिव इंस्टीटयूट, पुणे से सम्बध्द एस.पी. भोंसले कहते हैं कि सहकारी संस्थानों में होने वाले चुनाव कामकाज में बाधा पहुंचाते हैं और उन पर जमकर पार्टी पॉलीटिक्स हावी रहती है। वे कहते हैं कि महाराष्ट्र असेंबली में 80 प्रतिशत लोग ऐसे मंत्री हैं, जो किसी न किसी रूप में कोऑपरेटिव सोसायटियों से जुड़े हुए हैं। जबकि गोआ विश्वविद्यालय के पूर्व उपकुलपति डा. पद्माकर दुभाषी कहते हैं कि- ''सहकारी संस्थाआेंं में लोकशाही की बजाय घरानाशाही का दौर चल पड़ा है। आम लोगों के बीच एक धारणा बन चुकी है कि फलां सहकारी कारखाना अथवा संस्थान लोगों का नहीं बल्कि अमुक व्यक्ति का है।'' ऐसे में सहकारिता में राजनीतिज्ञों एवं प्रभावशाली लोगों की घुसपैठ का अंदाजा स्वत: लगाया जा सकता है।

समितियों की सिफारिशें
1901 - अकाल आयोग की सिफारिशों पर कृषकों को ऋण उपलब्ध करवाने के सुझाव पर सरकार ने एडवर्ड लॉ की अध्यक्षता में नियुक्त समिति की राय ली। इस समिति ने सहकारी समितियां गठित करने का सुझाव दिया।
1937 - रिजर्व बैंक के कृषि ऋण विभाग ने सहकारी आंदोलन पर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की, जिसमें बहुउद्देश्यीय समितियों के विकास करने का सुझाव दिया गया।
1945 - ''सरैय्या सहकारी नियोजन समिति'' ने सहकारी संस्थाओं को सरकार के द्वारा वित्ताीय सहायता तथा अन्य सुविधाएं देकर उन्हें सुदृढ़ बनाने हेतु सुझाव दिए।
1954 - श्री गोरवाला की अध्यक्षता में नियुक्त ''अखिल भारतीय ग्रामीण ऋण सर्वेक्षण समिति'' ने मत प्रकट किया कि 'भारत में सहकारिता असफल रहा है, किन्तु उसे सफल बनाना होगा', क्योंकि कृषकों की स्थिति में सुधार लाने के लिए वर्तमान में सहकारिता के अतिरिक्त अन्य कोई विक
1991 - सहकारी समितियों के सदस्यों में परस्पर विश्वसनीयता कायम करने, स्वायत्ताता और लोकतांत्रिक पध्दति से संचालन हेतु ''ब्रम्हा प्रकाश कमेटी'' ने एक मॉडल कोऑपरेटिव लॉ का सुझाव दिया।

सहकारिता- सब एक के लिए, एक सब के लिए


विश्व भर में करीब 800 मिलियन लोग कोऑपरेटिवस के सदस्य हैं, और अनुमान है कि इनमें करीब 100 मिलियन लोगों को रोजगार मिला हुआ है।

सहकारिता को अगर जमीनी स्तर पर समझने के लिए किसी आदर्श वाक्य में पिरोया जाए तो कहा जा सकता है कि ''सब एक के लिए, एक सब के लिए।'' इसी तरह जनता को पारस्परिक सहयोग के आधार पर स्वावलंबन एवं आत्मनिर्भर जीवन जीने के लिए तैयार करने का उद्देश्य सहकारिता के मूल में समाया हुआ है। जबसे स्वयं-सहायता समूहों ने अपनी सफलता के परचम फहराकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सुदृढ़ीकरण की ओर कदम बढ़ाने शुरु किए हैं; तो सरकार को भी लम्बे समय तक उपेक्षित पड़े रहने वाले सहकारी क्षेत्र की सुध हो आई और आज 4 प्रतिशत की कृषि विकास दर हासिल करने की राह में सहकारिता को महत्वपूर्ण माना जाने लगा है। उल्लेखनीय है कि हाल ही में राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (एन.सी.डी.सी.) ने 2006-07 के लिए डेयरी, हथकरघा और ढांचागत सुविधाओं से संबंधित मदों पर सहकारी संस्थाओं को 4009 करोड़ रुपए की राशि आवंटित की है, जो पहले की अपेक्षा 74 फीसदी अधिक है। इसके अलावा राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम द्वारा वर्ष 2007-08 के लिए 2000 करोड़ रुपये के कार्यक्रमों को मंजूरी दी गई है। ये कार्यक्रम विपणन एवं वितरण, प्रसंस्करण सुविधाओं के समेकन, बीमार इकाइयों के पुर्नस्थापन, डेयरी, कोल्ड स्टोर और हथकरघा क्षेत्र से संबंधित हैं। ऐसे में इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि सहकारिता के मूल में ग्रामीण आर्थिक संरचना को मजबूत करने का सूत्र निहित है।

कुछ समय पूर्व कृषि मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा था कि देश भर के छोटे छोटे उत्पादकों को संगठित करने में सहकारी समितियों की भूमिका महत्वपूर्ण साबित हो सकती है और बाजार की स्थिति के मुताबिक ग्रामीण उद्यमियों के हितार्थ मानकों के निर्धारण में भी सहकारी समितियां उल्लेखनीय योगदान दे सकती हैं। सहकारिता समितियों के विषय में कहा जाता है कि ये '्'समान आर्थिक कठिनाइयों का सामना करने वाले व्यक्तियों के ऐसे संगठन हैं, जिसमें समान अधिकारों एवं उत्तारदायित्वों के आधार पर स्वेच्छापूर्वक मिलकर इसके सदस्य कठिनाइयों को दूर करने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार बनाए गए समूह के संचालन का आधार सदस्यों के परस्पर हस्तांतरण्ा पर आधारित होता हैं और इस प्रक्रिया में निहित जोखिम भी उन्हीं का होता है, जिससे इसका भौतिक एवं नैतिक लाभ संगठन के सदस्यों को बराबर मिलता रहे।''

हालांकि 20 वीं सदी के आरंभिक वर्षों में जब देश को अकाल के भीषण दौर से गुजरना पड़ा तो सहकारी साख समितियों के गठन की अत्यंत आवश्यकता महसूस की गई थी। सन् 1900 में मैक्ग्लेन और डुपलैक्स ने मिलकर पहली ऋण समिति बनाई। 1901 में अकाल आयोग की रिपोर्ट एवं एडवर्ड मैक्लेगन की सिफारिशों के आधार पर एडवर्ड लॉ की अध्यक्षता में भारत सरकार ने सहकारी साख समितियों के गठन पर मुहर लगा दी। सन् 1903 में सेन्ट्रल असेम्बली में एक बिल लाया गया, परिणामत: 1904 में ''सहकारी साख अधिनियम'' असतित्व में आया। भारत में सहकारिता आंदोलन का आरंभ कृषि एवं इससे संबंधित सहायक क्षेत्रों से माना जाता है। 1904 में बने सहकारी साख अधिनियम के बाद ही भारतीय सहकारिता आंदोलन की विधिवत् शुरुआत हुई। इस अधिनियम का उद्देश्य किसानों, कारीगरों तथा सीमित साधनों वाले व्यक्तियों में बचत , स्व-सहायता तथा सहकारिता की भावना को जागृत करना था, जिससे वे निर्धनता से उबर सकें। इस अधिनियम की कमियों में सुधार हेतु ''सहकारी समिति अधिनियम 1912'' पारित किया गया। वर्ष 1914 में एडवर्ड मैक्ग्लेन की अध्यक्षता में बनाई गई समिति की सिफारिशों के आधार पर किसी भी सहकारी समिति के गठन में पूरी तरह से सावधानी बरतने की बात कही गई। सन् 1919 तक सहकारिता की जड़ें और भी मजबूत होने लगी थी। इसी वर्ष सहकारिता को मोंटेग्यू चेम्सफोर्ड रिपोर्ट में राज्य के विषय के रूप में शामिल कर लिया गया और उन्हें अपनी सुविधानुसार कानून बनाने का अधिकार भी दे दिया गया।

भारतीय सहकारिता आंदोलन में सहकारी समितियों की अहम् भूमिका मानी जाती है। भारत का सहकारी क्षेत्र विश्व के वृहदतम सहकारी क्षेत्रों में शुमार किया जाता है। ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों में सहकारी समितियों का जाल देश भर में फैला हुआ है। हालांकि इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता है कि नाबार्ड , नैफेड, कृभको, इफको, अमूल, एनएफआईसी, ट्राईफेड, फिश कापफेड, नेशनल फेडरेशन ऑफ लेबर कोऑपरेटिव जैसे चंद गिने चुने संस्थानों को छोड़कर सहकारिता के क्षेत्र में कुछ विशेष नहीं किया जा सका हैं। मार्च 2003 के आंकड़ो के मुताबिक 5.41 लाख समितियां भारतीय सहकारी क्षेत्र का हिस्सा थी, जिनकी पहुंच देश के शत् प्रतिशत गांवों तक बताई जाती है। इन समितियों के 22.15 करोड़ सदस्य होने की बात भी कही जाती है। इतना सब कुछ होते हुए भी लम्बे समय तक देश की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बने रहे किसान आत्महत्या को आज विवश हो रहे हैं, तो निश्चित तौर पर कहीं न कहीं कुछ कसर रह गई थी जिसके कारण देश की करीब 25 प्रतिशत आबादी अभी भी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने को विवश है।

यद्यपि अतीत पर नज़र दौड़ाएं तो स्थिती इतनी लचर नहीं कही जा सकती है। आधुनिक सहकारिता का उद्भव स्वतंत्रता के बाद देखने को मिलता है। आजादी के कुछ ही समय बाद सहकारिता के सिध्दांतों पर आधारित सामुदायिक विकास योजनाओं की शुरुआत की गई। गरीबी उन्मूलन एवं सामाजिक आर्थिक विकास में सहकारी क्षेत्र की भूमिका को महत्वपूर्ण माना जाने लगा था। यही कारण था कि पंचवर्षीय योजनाओं की शुरुआत के समय सहकारिता को इसमें समग्र रूप शामिल कर लिया गया और कहा गया कि पंचवर्षीय योजना कि सफलता सहकारी समितियों की सहभागिता पर बहुत हद तक निर्भर करेगी। 1954 में आई ''ऑल इंडिया रूरल क्रेडिट सर्वे कमेटी'' की रिपोर्ट में सहकारी समितियों द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले ऋण को ग्रामीण आर्थिक संरचना के सुदृढ़ीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण बताते हुए इसमें सरकार की भागीदारी की सिफारिश भी की गई थी। सन् 1958 में राष्ट्रीय विकास परिषद् ने सहकारिता को लेकर एक राष्ट्रीय नीति बनाने की अनुशंसा की और इस तरह से भारतीय सहकारिता आंदोलन गति पकड़ने लगा था। 1950-51 में सभी प्रकार के सहकारी संस्थानों की संख्या 1.81 लाख आंकी गई है, जबकि 1996-97 में 4.53 लाख संस्थानों के होने की बात कही जाती है। इसी तरह इन समितियों के सदस्यों में भी खासी बढ़ोत्तारी देखने को मिलती है। इसी कालखंड में सदस्यों की संख्या 1.55 करोड़ से बढ़कर 20.45 करोड़ हो गई।

इस विशेष और विशाल सहकारी आंदोलन को सरकारी समर्थन देने के लिए राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम का गठन किया गया है। निगम का उद्देश्य कृषि सहकारी समितियों को सुदृढ़ और विकसित करना है और उनकी आय को बढ़ाने के लिए फसलोपरांत सुविधाएं मुहैया करवाना है। निगम ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि आदानों, प्रसंस्करण, भंडारण एवं कृषि उत्पादों के विपणन तथा उपभोक्ता वस्तुओं की आपूर्ति संबंधी कार्यक्रम पर ध्यान दे रहा है। गैर कृषि क्षेत्र में कमजोर तबकों को प्रोत्साहन देने के लिए भी निगम प्रयासरत है। इसके लिए वह हथकरघा, कुक्कुट पालन, मात्स्यिकी, अनुसूचित जनजाति की सहकारी समितियों से संबंधित कमजोर वर्गों पर विशेष ध्यान दे रहा है। राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (संशोधन) अधिनियम, 2002 के पारित हो जाने के पश्चात् राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम का कार्यक्षेत्र बढ़ गया है। इसमें पशुधन, कुक्कुट और ग्रामीण उद्योग, हस्तशिल्प, ग्रामीण्ा शिल्प तथा कुछ अधिसूचित सेवाओं को भी शामिल कर लिया गया है। इस अधिनियम के तहत सहकारी समितियों को ज्यादा स्वायत्ताता दी गई है।

इसी दिशा में एक और पहल के रूप में राज्यों केंद्र शासित प्रदेशों के परामर्श से केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय सहकारिता नीति तैयार की है। इसका उद्देश्य देश में सहकारी समितियों के चहुंमुखी विकास को बढ़ावा देना है। इसके अंतर्गत सहकारिताओं को आवश्यक समर्थन, प्रोत्साहन और सहायता दी जाएगी ताकि वे स्वायत्ताशासी, आत्मनिर्भर और लोकतांत्रिक संस्थाओं के रूप में कार्य कर सकें। वे अपने सदस्यों के प्रति पूर्ण रूप से जवाबदेह हों। वे राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में विशेषकर देश में गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले बड़े वर्ग, जिनके लिए सार्वजनिक भागीदारी और सामुदायिक प्रयासों की जरूरत होती है, के उत्थान में एक विशेष योगदान कर सकें। इस नीति के अंतर्गत सरकार की भूमिका समय पर चुनाव करवाने, सहकारी संस्थाओं की लेखा परीक्षा करवाने और सदस्यों तथा सहकारिताओं से सम्बध्द अन्य पक्षों के हितों की सुरक्षा करने तक सीमित होगी। सहकारिता के आधार पर चल रही चीनी मिल, कोल्ड स्टोर, इफको और कृभको के विशाल उर्वरक कारखाने कृषकों को आवश्वस्त कर रहे हैं। गुजरात के अमूल दुग्ध उत्पादन ने सहकारी क्षेत्र पर अपनी धाक जमा रखी है। किसानों को ऋण, बीज, खाद, कीटनाशक दवाइयों, कृषि उपकरणों के वितरण, उनके उत्पादों के प्रसंस्करण, भंडारण और विपणन से सहकारिता जुड़ चुकी है। किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य दिलवाने में भी सहकारिता का योगदान है। 'ऑपरेशन फ्ल्ड' सहकारिता से ही संभव हो पाया है।

सहकारी साख (नाबार्ड), सहकारी विपणन (नैफेड), खाद एवं प्रसंस्करण सहकारिता (कृभको, इफको), दुग्ध सहकारिता (अमूल), महिला सहकारिता (एनएफआईसी), आदिवासी सहकारिता (ट्राइफेड), खाद्य सहकारिता (फिश कापफेड), श्रमिक सहकारिता (नेशनल फेडरेशन ऑॅफ लेबर को-ऑपरेटिव) और सहकारिता संगठन (एनसीडीसी तथा एनसीयूआई), भारत में सहकारिता की सफलता की गाथा दर्ज करवा चुके हैं। सहकारी समितियों में समयबध्दता, पारदर्शिता, व्यवहारशीलता तथा सहभागिता का समावेश होना आवश्यक है। गांवों और किसानों के विकास के सपने को साकार करने के लिए 11वीं पंचवर्षीय योजना में सहकारिता को अधिक महत्व दिया जाएगा। कृषि ऋण को बढ़ावा देने के लिए सहकारिता एक बेहतर माध्यम है। सहकारिता कृषि और ग्रामीण विकास एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। कृषि ऋण के विभिन्न आयामों; मसलन-क्रेडिट, उत्पादन, प्रसंस्करण, मार्किटिंग, इन्पुट्स का वितरण, हाउसिंग, डेयरी और टेक्सटाईल इत्यादि में आज सहकारी संस्थानों की महत्वपूर्ण भागीदारी है। कुछ क्षेत्रों जैसे - डेयरी, अर्बन बैंकिग एवं हाउसिंग, चीनी एवं हैण्डलूम इत्यादि में सहकारी संस्थानों ने अपनी उपलब्धि दर्ज करवाई है। देश में सहकारी आंदोलन की असफलता के पीछे इसके सदस्यों की निष्क्रियता एवं प्रबंधन में सक्रिय सहभागिता का अभाव रहा है। सहकारी साख समितियों की उधारी बाकी, आंतरिक संसाधनों को इकट्ठा करने की इच्छाशक्ति का अभाव, सहकारी सहयता पर अधिक निर्भरता, व्यवसायिक प्रबंध तंत्र का अभाव, प्रशासनिक अंकुश, प्रबंधन में अनावश्यक दखलंदाजी भी इसकी असफलता के लिए कम दोषी नहीं है। निहित स्वार्थी लोगों के सहकारी समितियों पर छाए रहने के कारण भी आम लोगों तक सहकारी आंदोलन का प्रभाव महसूस नहीं होता। इस कारण यह अपने उद्देश्य को पाने में असफल रहती है। अत: इस आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाने के लिए समुचित वैधानिक एवं नीतिगत उपाय करने होंगे।