मेरा गाँव मेरा देश

Thursday, October 11, 2007

भई बहुत रिस्की है ! !



- उमाशंकर मिश्र
ऐसा बहुत कम ही देखने को मिलता है, जब कोई मीडिया संस्थान अपने ही कुनबे के किसी सदस्य पर उंगली उठाने की हिमाकत कर सके, क्योंकि एक उंगली अगर सामने वाले पर उठती है तो तीन उंगलियों का रुख स्वयं की ओर ही होता है। इस तरह से यह काम भी बिल्ली के गले में घंटी बांधने से कम नहीं कहा जा सकता। शायद यही कारण है कि दबे कुचलों की आवाज बनने का दंभ भरने वाले मीडिया संस्थानों में ही जब कर्मचारियों का शोषण होने लगे तो उसकी खिलाफत करने के लिए कोई आगे नहीं आता। लेकिन यह स्वाभाविक तौर पर कहा जा सकता है कि जैसे मीडिया को बस उपदेश देने का हक है। खबरें क्या होंगी, यह टीआरपी तय करती है। जरा सी गलती हुई नहीं कि आसमान सिर पर उठा लिया जाता है और बार बार किसी खबर को इस तरह से दबाव देकर दिखाया जाता है, जिससे खबर अगंभीर होते हुए भी गंभीर बन जाती है। लेकिन टीआरपी के फेर में और सनसनी फैलाने तथा वाहवाही बटोरने की कवायद में जो गलतियां मीडिया करता है, उसका पोस्टमार्टम कौन करेगा? यह एक बहुत बड़ा सवाल है। प्रख्यात पत्रकार रामशरण जोशी का कथन उल्लेखनीय है कि ``19 वीं एवं 20 शताब्दी में पत्रकारिता को एक मिशन के रूप स्वीकार किया गया था, अब मिशनरी पत्रकारिता पर आधारित युग समाप्त हो गया है। सर्जनात्मक पत्रकारिता पर आधारित संपादकीय संस्थान कोमा में चले गए हैं, उनकी जगह एक ऐसी बाजारू पत्रकारिता ने लिया है, जिसने नए पूंजीवाद का जन्म दिया है। पुरानी परंपराओं को तोड़ नई अपसंस्कृति विकसित की जा रही है। इससे जनता का विष्वास पत्रकारिता पर कम होता जा रहा है।´´
इस तरह से कहा जा सकता है कि आज मीडिया की लगाम विज्ञापनदाताओं के हाथ में ही है। एक बात याद आती है, जब एक पत्रकार मित्र ने किसी कंपनी के डेयरी उत्पाद में फफूंद पाए जाने की षिकायत एक मीडिया संस्थान में नमूनों के साथ की। मीडिया संस्थान में डील करने वाले महाषय भी उनके मित्र थे। उन्होंने स्पश्ट बता दिया कि जब कंपनी से हमें करोड़ों का विज्ञापन मिलता है तो ऐसे में रिस्क नहीं लिया जा सकता। लेकिन शायद इस खबर को यदि तान दिया जाता तो उक्त कंपनी से भी अधिक विज्ञापन इस जनहित से जुड़ी खबर के बूते मिल सकते थे। लेकिन कोई रिस्क क्यों लेगा? जब पहले से ही अपना कोटा पूरा हो। अभी ज्यादा समय नहीं बीता जब एक प्रतििश्ठत मीडिया संस्थान के कर्मचारियों की भारी संख्या में छंटनी कर दी गई। रोजी रोटी से महरूम सैकड़ों कर्मचारी सड़क पर महीनों डेरा डाले पड़े रहे कि शायद प्रबंधन का दिल पसीज जाए। लेकिन ऐसे मेें मीडिया के लिए रामशरण जोशी की बात में एक बात और जोड़ने की जरुरत महसूस होती है। वह है संवेदनहीनता, जो उन सैकड़ों कर्मचारियों के प्रति दिखाकर तथाकथित संस्थान ने दिखा दिया कि समकालीन पत्रकारिता में कितना खोखलापन है। एक तरफ तो ढेरों कागज इस बात के लिए काले किए जाते हैं, लेकिन जब बात खुद पर आती है तो सामाजिक जिम्मेदारी का बहरूपियापन सामने आ जाता है।
रामषरण जोषी की बात को फॉलोे करते हुए अगर कहा जाए तो आज प्रोफेषनलिज्म के नाम पर ये जो ट्रेंड चल पड़ा है, कहीं ना कहीं इससे मीडिया के अपेक्षित वजूद और भावी पत्रकारों के भटकाव का सिलसिला शुरु होने की संभावना बढ़ जाती है। आज ऐसा जान पड़ता है मानों पत्रकारिता एक याचक की सी स्थिती में सकुचाती हुई `ग्लैमराई मीडिया´ से अपने वजूद की भीख मांग रही हो। जो लोग पत्रकारिता की पढ़ाई करके इस पेषे को अपना रहे हैं, उन्होंने इसके सिद्धांतों को जरूर पढ़ा होगा। ऐसे नवांकुर पत्रकार भी समझते हैं कि आज पत्रकारिता के पवित्र पेषे में व्यवसायिकता की दीमक लग गई है। हर राजनेता, उद्योगपती और समाज का अन्यत्र प्रभावषाली वर्ग मीडिया को अपनी जेब में रखना चाहता है। परिणामत: कुकुरमत्तों की तरह मीडिया संस्थान एवं प्रषिक्षण केन्द्र खुलने लगे। पहले ऐसा माना जाता था कि पत्रकार पैदा होता है, पैदा तो अब भी होता है। लेकिन धीरे धीरे यह धारणा स्थापित कर दी गई कि पत्रकार पैदा नहीं होता, बल्कि अब वह मैन्युफैक्चरिंग का आइटम बन गया है। इस धारणा के बूते प्रषिक्षण अनिवार्य कर दिया गया। लेकिन नौकरी देने की अनिवार्यता सुनिश्चत हो सकी है। ऐसा जान पड़ता है कि अब पत्रकारिता भी एमबीए, इंजीनियरिंग और एमबीबीएस की तरह गरीब एवं मध्यमवर्गीय तबके से दूर हो जाएगी, भले ही कैन्डीडेट प्रतिभासंपन्न तबके से दूर हो जाएगी। ऐसे में इस पेषे को निरा व्यावसाय ना बनने देने की जिम्मेदारी आखिर किस पर है? यह सवाल मुंह बाये खड़ा हुआ है।
बात मीडिया की है तो सरकार भी धो पोंछकर ही हाथ लगाने का प्रयास भर करती है, लगाती नहीं। कुछ समय पूर्व एक कार्यक्रम में सूचना एवं प्रसारण मंत्री जयपाल रेड्डी ने मीडिया की गिरती हुई साख पर चिंता भर ज़ाहिर करते हुए मीडिया कमीशन बनाने की बात कही थी। वे आंध्र प्रदेश भवन में ``क्या मीडिया में लक्ष्मण रेखा खींची जानी चाहिए´´विषय पर बोल रहे थे। काल, पात्र एवं स्थान का उस समय उन्होंने बखूबी ध्यान रखते हुए भाषण दिया। रेड्डी ने तो बुतप्राय पे्रस परिशद् के अधिकारों को भी बढ़ाने की इच्छा भर कर डाली और बड़ा ही चिकना और चुपड़ा हुआ वक्तव्य देते हुए कहा कि ``मीडिया शुरुआती दिनों से ही चाहे वह चर्च रहा हो, राजशही रही हो या फिर सरकार हो उसके खिलाफ लड़ाई लड़ती रही है और उसकी अपनी एक साख रही है। लेकिन आज किसी और से नहीं बल्कि मीडिया को खतरा उसके अपने अंदर से ही है। मीडिया समाचारों को बढ़ा चढ़ाकर सनसनी फैलाने की वजह से अपनी साख खोता जा रहा है।´´ कुछ भी हो जयपाल रेड्डी ने मीडिया की हकीकत को समझा तो सही। भले ही हकीकत से हम सबको रूबरु भर करवाया हो। इस फिसलनदार भाषण से कानून मंत्री हंसराज भारद्वाज फिसल पड़े। उनके अंदर की नैतिकता जाग उठी। मीडिया पर लगाम लगाने वाले कानून का खुला विरोध करते हुए कह दिया कि यदि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने ऐसा कोई विधेयक तैयार भी किया है तो वह उनके मंत्रालय से आगे नहीं बढ़ पाएगा। अपनी बात को पुख्ता करते हुए उन्होंने यह भी कह डाला कि सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी इसके पक्ष में नहीं हैं। तत्कालीन उपराष्ट्रपती भैरो सिंह शेखावत द्वारा हैदराबाद में इंडिया मीडिया सेंटर के उद्घाटन के अवसर पर कही गई बात उल्लेखनीय है कि ``तथ्यों को पक्षपात रहित प्रस्तुत करने के लिए मीडिया को खुद पर ही आचार संहिता लागू करने की आवश्यकता है। मीडिया की निष्प्क्ष रिपोर्ट ही लोगों का दिल जीत सकती है।´´ बात महत्वपूर्ण तो जरूर है, लेकिन क्या प्रैिक्टकल भी है? यह सोचने का विषय है, जो उन्होंने छोड़ दिया है। लेकिन बेहतर होगा कि मीडिया की बेहतरी के लिए मीडियाकर्मी ही आगे आकर यह सोचें कि मीडिया किस तरह से हमें खुद ही इसके लिए एक लक्ष्मण रेखा तय करनी है। ना सरकार और ना ही कोई अन्य इस मामले में हाथ डालना चाहेगा, `क्योंकि काम बहुत रिस्की है।´

2 comments:

आशीष said...

sahi hain umashankar ji

sineor said...

Well I not says that TV chennals not shows any advertisement but there to be some limit. I live in Hong Kong, here Broadcasting Authority has a rule that any TV programme 10 minutes interval between Commercial break for advertisements. also they have a limit in one hour can show only 10 minutes advertisements. Just be fair.