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Wednesday, October 3, 2007

राजनीतिकरण से हुई है सहकारिता की दुर्गति


सहकारिता आर्थिक संगठन का एक रूप है। भारत में सदियों से चली आ रही संयुक्त परिवार प्रणाली को भी सहकारिता के सिध्दांतों पर ही आधारित माना जाता है। लेकिन जब देश में पश्चिमी सभ्यता ने अपने पांव पसारने शुरु कर दिये तो देश में सहकारिता के स्थान पर व्यक्तिवाद का उदय होने लगा। परिणामत: सहयोग के स्थान पर प्रतिस्पर्धा की भावना बलवती होने लगी। परिणामत: किसानों एवं गरीब लोगों की स्थिती पर भी उसका असर साफ नजर आने लगा। इसी को ध्यान में रखते हुए 19 वीं सदी के आरंभ में सहकारिता की नींव रखने का फैसला किया गया था। विभिन्न आर्थिक प्रणालियों - व्यक्तिगत एवं सार्वजनिक क्षेत्रों की आर्थिक प्रणालियों में पाए जाने वाले दोषों का निवारण करने का उपाय ही सहकारिता है। सहकारिता इन दोनों के मध्य की स्थिति है। 'मैकलेन समिति' के अनुसार, सहकारिता का सिध्दांत संक्षेप में यह दर्शाता है कि एक अकेला एवं साधन-रहित व्यक्ति भी अपने स्तर के व्यक्तियों का संगठन बनाकर, एक दूसरे के सहयोग से एवं नैतिक विकास व पारस्परिक समर्थन से अपनी कार्यक्षमता के अनुसार, धनवान, शक्तिशाली व साधन संपन्न व्यक्तियों को उपलब्ध सभी भौतिक लाभ समान स्तर पर प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार साधन रहित व्यक्ति अपना विकास सहकारिता के माध्यम से कर सकता है।

व्यक्ति के शामिल होने के लिए उसकी स्वेच्छाचारिता, लोकतांत्रिक प्रबंधन, सदस्यों का आर्थिक, सामाजिक एवं नैतिक उत्थान, स्वावलंबन एवं परस्पर सहयोग, सेवा भावना और राजनीति, धर्म जाति एवं राष्ट्रीयता के प्रभाव से तटस्थता सहकारिता के मूल सिध्दांत माने जाते हैं।

लेकिन! सहकारिता के वर्तमान स्वरूप पर यदि नज़र दौड़ाएं तो क्या यह कहा जा सकता है कि सहकारिता का आज मूल स्वरूप एवं सिध्दांत आज भी जीवित हैं! जवाब निश्चित तौर पर ना में ही होगा। हाल ही में महाराष्ट्र के जलगांव स्थित प्रतिभा महिला सहकारी बैंक और मुक्ताबाई सहकारी चीनी मिल के प्रकरण ने सहकारिता के कलुषित होते स्वरूप को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। एक प्रश्न कोऑपरेटिव सोसायटियों के कामकाज, उनकी सामाजिक जिम्मेदारी और राजनीतिक घुसपैठ के कारण सहकारिता के मूल स्वरूप पर मंडराते खतरे के रूप में सामने आया है। जिसने हमें एक बार फिर से चेताया है कि किस तरह से प्रभावशाली लोगों ने अपने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए इन जनसंस्थाओं पर तानाशाहीपूर्वक कब्जा कर जनता को उनके अधिकारों से बेदखल करने का काम किया है। महाराष्ट्र में शरद पवार और गोपीनाथ मुंडे जैसे राजनीतिज्ञ चीनी कोऑपरेटिव मिलों के जरिए राजनीति चमकाने वालों में जाने जाते हैं। 1973 में स्थापित प्रतिभा महिला सहकारी बैंक में अध्यक्ष के सगे संबंधियों को ही पदों की बंदरबांट कर दी गई। यहां तक कि आरक्षित पदों पर की जाने वाली नियुक्तियों की भी उपेक्षा की गई और धड़ल्ले से संबंधियों एवं करीबी लोगों को ऋण प्रदान किया गया। 1995 में रिजर्व बैंक ने इस सहकारी बैंक को कमजोर बैंकों की सूची में डाल दिया। लेकिन हद तो तब हो गई जब इसी बैंक के अध्यक्ष की पहल पर ही स्थापित मुक्ताबाई कोऑपरेटिव चीनी मिल के शेयर खरीदने लिए प्रतिभा महिला सहकारी बैंक से ही ऋण दिया जाने लगा और अंतत: बैंक दिवालियेपन के कगार पर पहुंच गया। यह वर्तमान सहकारिता के स्वरूप का ही एक हिस्सा है। आखिर उन गरीब महिलाओं का क्या होगा, जो अपनी बेटी की शादी या फिर बुढ़ापे के लिए अपनी गाढ़ी कमाई को इस तरह के सहकारी बैंकों में जमा करते हैं। क्या अपने सदस्यों के प्रति इन संस्थानों की कोई जिम्मेदारी नहीं है?

एक समय था सहकारिता के कारण महाराष्ट्र के किसानों को एक नई दिशा मिली थी और उनके लिए तरक्की की राह प्रशस्त हो सकी थी। लेकिन समय के साथ भ्रष्टाचार के कारण बड़ी जोत वाले किसानों का दबदबा सहकारी मिलों पर बढ़ता चला गया और इस तरह से मिलों के नियंत्रात्मक ढांचे में बदलाव आने लगे। अब आम सदस्य किसानों के अधिकार धूमिल होने लगे थे। शुगर फैक्ट्रियों में गवर्निंग बॉडी चुनावों में धन महत्वपूर्ण कारक बनता जा रहा था और धनाढय एवं शक्तिशाली किसान अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष जैसे पदों को हथियाने लगे थे। जबकि अधिसंख्य किसान छोटी जोतों वाले गरीब किसानों की थी। 1996 में महाराष्ट्र स्थित 15 सदस्यों वाली संगमनेर फैक्ट्री के गवर्निंग बॉडी चुनावों में एस.तानपुरे ने चुनाव लड़ने का फैसला किया। फैक्ट्री में करीब 14 हजार सदस्य ऐसे थे जिनकी जोतें बहुत छोटी थीं। तानपुरे भी उन्हीं में से एक था। तानपुरे न केवल चुनाव हार गया, बल्कि उसे प्रबंधकों के गुस्से का शिकार भी बनना पड़ा। उसको सबक सिखाने के लिए उसके खेतों से गन्ने को खरीदने से मना कर दिया गया। अगर नियंत्रात्मक ढांचे को कोई सदस्य प्रभावित करने का प्रयास करता है तो उसे इसी तरह से परेशान किया जाता है। पानी एवं बिजली के कनेक्शन कटवा दिये जाते हैं, क्रेडिट रोक दिया जाता है या फिर गन्ने की खरीद में टाल-मटोल किया जाता है। कई स्थानों पर तो किसानों को वाजिब मूल्य नहीं मिल पाने से गुड़ बनाने वाले अन्य व्यापारियों को गन्ना बेचना पड़ता है। सवाल उठता है कि आखिर ऐसे में इस तरह के कोऑपरेटिव संस्थानों की क्या प्रासंगिकता रह जाती है जो अपने सदस्यों के कल्याण्ा के लिए कार्य नहीं कर रहे हों? एक आधिकारिक सूत्र के मुताबिक महाराष्ट्र में कोई भी ऐसा कोऑपरेटिव नहीं है, जिस पर राजनीति एवं राजनीतिज्ञों का नियंत्रण न हो। वे बताते हैं कि महाराष्ट्र की 5 प्रतिशत चीनी मिलों पर भारतीय जनता पार्टी और 95 प्रतिशत पर कांग्रेस का कब्जा है। जिसमें से 60 प्रतिशत अब सिर्फ राष्ट्रवादी कांग्रेस के हिस्से में आती हैं।

हालांकि महाराष्ट्र जैसे राज्यों आज भी बहुधा ऐसे लोग मिल जाते हैं जो सहकारिता के गुणगान की डींगे हांकते नहीं थकते। लेकिन हकीकत तो ये है कि इसके लिए राज्य के खजाने को भारी कीमत चुकानी पड़ती है। शुगर कोऑपरेटिव सोसायटियों की संरचना कुछ इस तरह से है कि लाभ तो सदस्यों में बांट दिया जाता है, लेकिन हानि का बोझ सरकार पर डाल दिया जाता है। जिसका फायदा मिल मालिक बखूबी उठाते हैं और संस्थान को घाटे में दिखाकर जहां एक ओर सदस्यों को उन्हें मिलने वाले प्रतिफल से वंचित कर दिया जाता है, वहीं सरकार से हानि की भरपाई करने के लिए अनुदान भी मिल जाता है। इसी तरह कोऑपरेटिव संस्थानों की स्थापना के लिए प्रमोटर्स को सिर्फ 10 प्रतिशत लागत ही जुटानी होती है। जबकि शेष राशि सरकार से लोन के तौर पर मिल जाती है। जबकि इन सहकारी संस्थानों द्वारा लोन न चुकाए जाने के मामले समय समय पर सुनने को मिलते रहे हैं। ऐसी स्थिति में लोन का भुगतान राज्य सरकार को करना पड़ता है। 2004 तक की बात यदि करें तो इस तरह के बकाया लोन की गारंटी राशि 665 करोड़ रुपये बताई जाती है।

भारत सरकार के पूर्व गृह सचिव माधव गोडबोले और अर्थशास्त्री डा. प्रदीप आपटे जैसे लोग इस तरह की गारंटी दिए जाने के सख्त विरोधी हैं। वे कहते हैं कि आखिर सरकार को इस तरह की गारंटी देने की क्या जरूरत है? माधव गोडबोले कहते हैं कि ''जो राजनीतिक सुलभ वही आज सहकार बन कर रह गया है। और सत्ताा प्राप्ति का साधन और कुप्रबंधन के शिकार इन सहकारी संस्थानों पर लगाम कसी जा सके, इतनी ताकत लचर कानूनों में नहीं है।'' वे कहते हैं कि सरकार का नियंत्रण इस तरह की संस्थाओं पर नहीं रह गया है। गोडबोले सहकारी संस्थानों की दशा में सुधार हेतु वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाए जाने की बात पर जोर देते हुए कहते हैं कि इन संस्थानों को अधिकतम लाभ हेतु सुदृढ़ करने की जरुरत है। डा. प्रदीप आपटे कहते हैं कि लोग सहकारी संस्थाओं के सदस्य तो हैं, लेकिन सिवाय वोटिंग के उनके पास कोई और अधिकार नहीं है और व्यावसायिक तथ्यों की यहां हमेंशा अवहेलना हुई है। यहां व्यावसायिक बोध और व्यावहारिकता की बात करने वाले को विकास विरोधी करार दे दिया जाता है। दूसरी ओर राजनीतिकरण को जनस्वीकृति भी मिल चुकी है। इसी तरह बैकुण्ठ मेहता नेशनल कोऑपरेटिव इंस्टीटयूट, पुणे से सम्बध्द एस.पी. भोंसले कहते हैं कि सहकारी संस्थानों में होने वाले चुनाव कामकाज में बाधा पहुंचाते हैं और उन पर जमकर पार्टी पॉलीटिक्स हावी रहती है। वे कहते हैं कि महाराष्ट्र असेंबली में 80 प्रतिशत लोग ऐसे मंत्री हैं, जो किसी न किसी रूप में कोऑपरेटिव सोसायटियों से जुड़े हुए हैं। जबकि गोआ विश्वविद्यालय के पूर्व उपकुलपति डा. पद्माकर दुभाषी कहते हैं कि- ''सहकारी संस्थाआेंं में लोकशाही की बजाय घरानाशाही का दौर चल पड़ा है। आम लोगों के बीच एक धारणा बन चुकी है कि फलां सहकारी कारखाना अथवा संस्थान लोगों का नहीं बल्कि अमुक व्यक्ति का है।'' ऐसे में सहकारिता में राजनीतिज्ञों एवं प्रभावशाली लोगों की घुसपैठ का अंदाजा स्वत: लगाया जा सकता है।

समितियों की सिफारिशें
1901 - अकाल आयोग की सिफारिशों पर कृषकों को ऋण उपलब्ध करवाने के सुझाव पर सरकार ने एडवर्ड लॉ की अध्यक्षता में नियुक्त समिति की राय ली। इस समिति ने सहकारी समितियां गठित करने का सुझाव दिया।
1937 - रिजर्व बैंक के कृषि ऋण विभाग ने सहकारी आंदोलन पर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की, जिसमें बहुउद्देश्यीय समितियों के विकास करने का सुझाव दिया गया।
1945 - ''सरैय्या सहकारी नियोजन समिति'' ने सहकारी संस्थाओं को सरकार के द्वारा वित्ताीय सहायता तथा अन्य सुविधाएं देकर उन्हें सुदृढ़ बनाने हेतु सुझाव दिए।
1954 - श्री गोरवाला की अध्यक्षता में नियुक्त ''अखिल भारतीय ग्रामीण ऋण सर्वेक्षण समिति'' ने मत प्रकट किया कि 'भारत में सहकारिता असफल रहा है, किन्तु उसे सफल बनाना होगा', क्योंकि कृषकों की स्थिति में सुधार लाने के लिए वर्तमान में सहकारिता के अतिरिक्त अन्य कोई विक
1991 - सहकारी समितियों के सदस्यों में परस्पर विश्वसनीयता कायम करने, स्वायत्ताता और लोकतांत्रिक पध्दति से संचालन हेतु ''ब्रम्हा प्रकाश कमेटी'' ने एक मॉडल कोऑपरेटिव लॉ का सुझाव दिया।

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