मेरा गाँव मेरा देश

Sunday, October 7, 2007

बीजों पर अधिकार की मुहीम




उमाशंकार मिश्र
इंडिया फ़ांउडेशन फ़ार रूरल डेव्लप्मेंट स्टडीज
नयी दिल्ली
खेती पूरी प्रक्रिया का प्रथम चरण बीज ही होता है। इस बात को बीज कंपनियां भली भांति जानती हैं। जिसके चलते बीज जो कभी समुदाय की धरोहर हुआ करता था, आज उन पर कंपनियों द्वारा अधिकार की कवायद जोर पकड़ती जा रही है। परिणामत: वे किसानों की खोजों को हथियाने से भी नहीं चूकती।



बैशाख शुक्ल की तीज के दिन मनाया जाने वाला त्यौहार ``अक्ति´´ छत्तीसगढ़ के गांवों में मनाया जाने वाला एक परंपरागत त्यौहार है, जो इस आदिवासी बहुल राज्य के विभिन्न भागों में विविध स्वरूप लिए हुए है। दुर्ग जिले के गांवों में इस दिन किसान अपने घर से धान के बीज पलाश के पत्तों में लेकर एक सामूहिक पूजा स्थल पर एकत्रित होते हैं। सभी के लाए हुए बीजों को यहां पर एक साथ मिलाने के बाद पूजा की रस्म सम्पन्न की जाती है। तत्पश्चात् सभी लोग एकत्रित किए गए धान में से थोड़ा - थोड़ा लेकर जाते हैं और अपने खेतों में सांकेतिक बुआई की शुरुआत करते हैं। कुछ इसी तरह से चैत्र माह की द्वितिया को नगर सिहावा के बैगा आदिवासी दोने में रखकर बीज एक दूसरे को दिया करते हैं और ``अक्ति´´ में अपने पास से कुछ और बीजों को मिलाकर नए फसल वर्ष में बुआई की शुरुआत करते हैं।
इस पूरी प्रक्रिया में जो एक बात समान रूप से झलकती है, वह है बीजों का आदान प्रदान, जिसके कारण सदियों से फसलों में विविधता का विकास हुआ है। हमारे देश कुछ इसी तरह से किसान लम्बे समय से बीजों का आदान प्रदान करते रहे हैं। यही नहीं जरुरत के समय अनाज के आदान की परंपरा भी हमारे देश में रही है। लेकिन जबसे हरित क्रांति का शंखनाद हमारे देश में हुआ है, तभी से कृषकों के विकास की आड़ में बीजों के धंधे ने भी पांव पसारने शुरु कर दिए था। परिणामत: कृषि के क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कंपनियों का हस्तक्षेप भी बढ़ना शुरु हो गया था। आज वही कंपनियां बीजों के रखरखाव की इस परंपरा के चक्र को विखंडित करने पर तुली हुई हैं क्योंकि ऐसा करने पर ही किसान बीजों की जरुरत को पूरा करने के लिए इन कंपनियों पर निर्भर हो सकते थे। इस तरह की परिस्थिती के उत्पन्न होने से बीजों के संरक्षण की जो परंपरागत पद्धतियां छिन्न भिन्न होती चली गई। इस तरह जैसे जैसे कंपनियों के एकाधिकार की मुहिम तेज हुई, लूट का चक्र भी बढ़ता चला गया। इसक ताजा उदाहरण बहुराष्ट्रीय कंपनी मोन्सेंटों द्वारा भारत में देशी कपास के बीजों के स्थान पर अधिक उत्पादन के नाम पर जीन संविर्द्धत बीजों के प्रचार प्रसार के रूप में देखा जा सकता है। जबकि इस तरह के प्रतिकूल प्रभाव के कारण इसका चौतरफा विरोध हम देख चुके है। विदर्भ के किसानों के द्वारा की जा रही आत्महत्याओं का एक कारण इस तरह के बीजों के प्रयोग को भी माना जा रहा है। इस प्रकार बीज जो कभी समुदाय की धरोहर हुआ करता था, वह निजी संपत्ति बन कर बाजार की गिरफ़्त में आ गया। बीजों के बाजारीकरण के इस ताने बाने में बीजों के संरक्षण की देशी विधियों को निशाना बनाया गया। टर्मीनेटर तकनीक जिसके तहत बीजों के उत्पादन की बात कही गई है, इस बात को पुख्ता करता है। इस प्रकार के बीजों के प्रयोग से फसल तो होगी लेकिन अगली फसल के लिए किसानों के पास कुछ नहीं बचा रह पाता। अर्थात हर बार फसल की बीजाई के लिए किसान को बीज बाजार से ही खरीदना ही पड़ता है। इन बाजारू शातिर के परिणामस्वरूप बीज अब किसानों की पहुंच से दूर होते जा रहे हैं। संकर बीजों के प्रयोग से वास्तविक फायदा किसानों की अपेक्षा बीज कंपनियों, रसायन एवं यूरिया कंपनियों को होता है। क्योंकि इन बीजों के प्रयोग से रसायनिक खाद, कीटनाशकों और सिंचाई की अधिकतम आवश्यकता होती है। निरंतर इस चक्र के चलते रहने के कारण ही भूमि बांझपन की ओर बढ़ने लगती है। पंजाब के विभिन्न हिस्सों में भूमि का बंजर होना इसी बात का प्रमाण माना जा सकता है। खेती की पूरी प्रक्रिया का प्रथम चरण बीज ही होता है। सदियों से खेती का विकास बीजों की विविधता के संरक्षण एवं संवर्धन पर टिका रहा है। अलग अलग मिट्टी एवं पानी के कारण सैकड़ों वर्षों से फसलों की विविधता का विकास हुआ है। यही नहीं स्थानीय खेती की विशेष पारिस्थितिक जरूरतों को समझते हुए लोग फसलों की विविध किस्मों का संरक्षण करते रहे हैं। महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले की नागबीड़ तालुका के वयोवृद्ध किसान दादाजी रामाजी खोब्रागेड़े को इसी कड़ी एक हिस्सा माना जा सकता है। उन्होंने धान की पटेल-3 किस्म में होने वाले परिवर्तनों का लम्बे समय तक अवलोकन किया और अपनी पारखी दृिष्ट एवं लगन से धान की नई किस्म खोजकर उसे विकसित किया। आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में बहुतायत में पैदा किए जाने वाले धान का नाम एचएमटी है। 1990 में जब एचएमटी की खिली हुई फसल को आसपास के लोगों ने खोब्रागेड़े के खेतों में देखा तो उन्होंने भी इसकी मांग शुरु कर दी। एचएमटी की बढ़ती लोकप्रियता के कारण इसकी महक अकोला स्थित पंजाबराव देशमुख कृषि विद्यापीठ तक जा पहुंची और इसकी भारी मांग के चलते विद्यापीठ के शोधकर्ताओं के मुंह में भी पानी आ गया। विद्यापीठ के वैज्ञानिक खोब्रागेड़े से अनुसंधान के नाम पर कुछ बीज ले गए और उन बीजों का शुद्धिकरण कर पीकेवीएचएमटी के नाम से बाजार में जारी कर दिया और खोब्रागेड़े को उसकी खोज एवं योगदान के प्रतिफल से वंचित कर दिया। कुछ समय पूर्व ``राष्ट्रीय नवप्रर्वतन संस्थान´´ की ओर से महामहिम अब्दुल कलाम ने खोब्रागेड़े को सम्मानित किया। राष्ट्रीय अनुसंधान परिषद् ने भी खोब्रागेड़े की उपलब्धि को पुरस्कृत करने हेतु नामांकित किया था। लेकिन विद्यापीठ से अधिकृत मान्यता न दिए जाने के कारण खोब्रागेड़े को उन्हें पुरस्कार नहीं मिल सका। दूसरी ओर खोब्रागेड़े का दावा है कि शुद्धिकरण के बाद भी धान में कोई गुणात्मक सुधार विद्यापीठ ने नहीं किया है। इस तरह की परिस्थितियों का आरंभ तभी से हुआ है जबसे कृषि से संबंधित मदों का बेतहाशा बाजारीकरण किया जाने लगा। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में स्थित इंदिरा गांधी विश्वविद्यालय में पारंपरिक धान की 20 हजार से अधिक किस्मों का संग्रहण किया गया है। बहुराष्ट्रीय कंपनी सिंजेन्टा की गिद्धदृिष्ट लंबे समय से गड़ी हुई थी। कंपनी ने बीजों के संग्रह को हथियाने के लिए इंदिरा गांधी विश्वविद्यालय से साझा अनुसंधान के नाम पर एक समझौता कर लिया। जब इस बात का खुलासा हुआ तो छत्तीसगढ़ मे इसका पुरजोर विरोध होने लगा। अंतत: विश्वविद्यालय को इस समझौते से अलग होना पड़ा। अपने संसाधनों को संरक्षित रखने के लिए छत्तीसगढ़वासियों की भांति ही लोक-पहल की आवश्यकता है। छत्तीसगढ़ में पाई जाने वाली हजारों धान की किस्में गुणात्मक और पैदावार की दृिष्ट से काफी समृृद्ध हैं। धान की इन प्रजातियों का विकास किसी प्रयोगशाला में नहीं किया गया था। बल्कि स्थानीय किसानों ने मिट्टी से अपने जुड़ाव से सैकड़ों वर्षों से इस धरोहर को सजाया संवारा है। यहां सवाल यह उठता है कि फसलों की नई किस्मों का चयन, विकास एवं विभिन्न किस्मों के सुधार का अधिकार-क्षेत्र क्या कृषि वैज्ञानिकों, शोध संस्थानों और कार्पोरेट बीज कंपनियों तक ही सीमित है? क्या फसलों की किस्मों के विकास का श्रेय उन किसानों को नहीं मिलना चाहिए जिन्होंने धरती से अपने लगाव के चलते अपनी पारखी दृिष्ट एवं अनुभव से फसलों की अनगिनत किस्मों का विकास किया है। किसानों की पारंपरिक खोजों को बढ़ावा देने के लिए क्या कृषि वैज्ञानिकों, कृषि शोध संस्थानों द्वारा उन्हें प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए? लेकिन इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि किसानों को उनके योगदान के लिए प्रोत्साहित करने की बजाय तथाकथित कृषि वैज्ञानिक एवं शोध संस्थान ही किसानों की खोजों पर अपना लेबल लगाकर उनका श्रेय हासिल करने को आतुर रहते हैं। विश्व व्यापार संगठन के माध्यम से दुनिया भर की बहुराष्ट्रीय कंपनियां विभिन्न देशों के संसाधनों को अपनी पूंजी एवं तकनीक के माध्यम से हड़पने को आतुर हैं। विडंबना ही है कि हमारे देश में कानून भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की एकाधिकार की मुहिम को रोक पाने और स्थानीय समुदाय के अधिकारों की रक्षा करने में अक्षम जान पड़ते हैं। भारत मे जैव संसाधनों के विषय से संबंधित पेटेंट(द्वितीय संसोधन) अधिनियम 2002, पौध प्रजाति एवं कृषक अधिकार सुरक्षा अधिनियम-2001 एवें जैव विविधता बिल जैसे कानूनों की व्यवस्था की गई है। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि ये कानून इस तरह की जैव विविधता की धरोहरों पर पेटेंट की अनुमती प्रदान करते हुए कहीं न कहीं स्थानीय समुदायों को उनके नैसर्गिक अधिकारों से वंचित कर रहे हैं। वास्तव मे पेटेंट कानून पर यदि गौर करें तो इसका स्वरूप जैव विविधता को नष्ट करके उसमें एकरूपता कायम करते हुए बहुराष्ट्रीय कंपनियों के चुनिंदा बीजों की किस्मोंं पर निर्भरता को सुनििश्चत करते हैं। छत्तीसगढ़ स्थित ``रिछारिया किसानी संरक्षण एवं संवर्द्धन '' से सम्बद्ध जैकब नल्लिथनम हरित क्रांति की विसंगतियों को इस प्रकार की स्थिति के उत्पन्न होने के लिए जिम्मेदार मानते हैं। साथ ही वे इस पूरे ताने-बाने को राजनीतिज्ञों, नौकरशाहों और बड़ी कंपनियों की आपसी संाठगांठ का परिणाम बताते हुए कहते हैं कि इन लोगों ने अपने स्वार्थों की सििद्ध के लिए बहुसंख्य आबादी के समक्ष बहुत बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।

2 comments:

SRIJANSHEEL said...

bahut achchha prayaas hai!
keep it up

उन्मुक्त said...

यह विषय अपने में मुश्किल है। अच्छा हुआ कि आपने इस पर लिखा।