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Saturday, July 11, 2009

मध्यप्रदेश बजट : फिर गांव-गरीब की ओर

भोपाल. वित्तमंत्री राघवजी शुक्रवार को सुबह साढ़े 10 बजे राज्य की भाजपा सरकार का छठवां बजट पेश कर दिया है। बजट में शामिल राज्य आयोजना का आकार 16114 करोड़ रखा गया है। आज प्रस्तुत बजट में कृषि, और ग्रामीण विकास पर बल दिया गया है। इसके साथ ही राज्य के विकास की गति को बनाए रखने के लिए योजना के आकार में पूर्व स्वीकृति की तुलना में 11।48 की बढोत्तरी की गई है। पुलिस विभाग के लिए बजट में पिछले साल की तुलना में 10 फीसदी की बढोत्तरी की गई है। सरकार ने कानून व्यवस्था को मजबूत करने के लिए अतिरिक्त थानों और आतंकवाद निरोध दस्ते के निर्माण पर बल दिया है।
क्या रहीं बजट की प्राथमिकताएँ
1.अधोसंरचना विकास
2. निवेश वृद्धि
3. कृषि को फायदे का व्यवसाय बनाना
4. शिक्षा और स्वास्थ्य
5. महिला सशक्तिकरण
6. सुशासन एवं संसाधन
7. कानून एवं
ग्रामीण विकास के लिए सरकार की योजना
  • रोजगार गारन्टी के लिए 5137 करोड
  • बैकवर्ड रीजन ग्रांट फंड : 546 करोड़
  • ग्रामीण आजीविका योजना : 95

कृषि के लिए क्या खास

  • पिछले साल की तुलना में इस साल 50 फीसदी का अधिक प्रावधान
  • कम्यूनिटी रेडियो स्टेशन की स्थापना
  • गेंहू के उपार्जन पर बोनस हेतु इस वर्ष रु 90 करोड़ का प्रावधान
  • ग्वालियर में कृषि विवि की स्थापना
  • कम्यूनिटी रेडियो स्टेशन की स्थापना
  • राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना में रु 48 करोड़
  • दीर्घकालीन साख हेतु रू 275 करोड़ का

शिक्षा : क्या खास

  • 684 माध्यमिक शाला भवन एंव 18500 अतिरिक्त कक्षों का निर्माण
  • 28000 शिक्षकों की नियुक्तियां
  • महाविद्यालय में शिक्षा गुणवत्ता सुधार के तहत विदेश भ्रमण हेतु 50000 की पुरस्कार योजना
  • नेशनल इंस्टीटच्यूट ऑफ फैशन टेक्नालॉजी हेतु रु 30 करोड़ का प्रावधान
  • जाति अनुसूचित जनजाति के छात्रों को पीईटी पीएमटी प्रवेश परीक्षा हेतु देय छात्रवृत्ति रु 375 प्र. मा. से बढ़ाकर 500 प्र.माह और छात्राओं के लिए 525 प्र. मा
  • निशक्त छात्रों के लिए छात्रवृत्ति योजना रु 500 प्र.

स्वास्थ्य : क्या खास

  • 161 उप स्वास्थ्स केन्द्र, 72 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, 15 सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र एवं10 जिला चिकित्सालय के भवन निर्माण को पूर्ण करने हेतु प्रावधान

महिला एंव बाल कल्याण

  • 9691 आगंनबाड़ी तथा 9820 मिनी आंगनबाड़ी केन्द्रो की स्थपाना
  • 86 नई एकीकृत बाल विकास परियोजनाएंपोषण आहार हेतु: 781.84 करोड़ का प्रावधान
  • छात्राओं के लिए नि: शुल्क साईकिल कन्यादान योजना :25 करोड़

आयोजन में कुछ महत्वपूर्ण प्रावधान

  • ग्रामीण विकास : रुपए 3483 करोड़ का
  • शिक्षा : रुपये 1497 करोड़ का
  • शहरी विकास : रुपए 854
  • स्वास्थ्य : रुपये 413 करोड़

सिचाई , सड़क, उर्जा

  • सड़क, भवन एवं सेतु के लिए 1843 करोड़ रुपये का प्रावधान
  • सिचाई के लिए रुपये 2485 करोड़ का प्रावधान
  • ऊर्जा क्षेत्र के लिए 1386 करोड़ का प्रावधान
  • कृषि क्षेत्र के लिए 1587 करोड़ का

साभार: दै.भा.

Friday, July 10, 2009

स्थानीय स्वशासन की प्रयोगशाला बनेगा सोनिया विहार

अब अपनी समस्याओं के समाधान के लिए लोगों को नेताओं और अधिकारीयों का मुंह ताकने की जरुरत नहीं रहेगी । शीघ्र ही लोग ख़ुद अपने हित और क्षेत्र की समस्याओं पर स्वयं निर्णय लेने लगेंगे, क्योंकि दिल्ली में स्थानीय स्वशासन की संकल्पना अब जमीन पर उतर चुकी है, और इसकी प्रयोगशाला बनी है राजधानी में होकर भी उपेक्षा की शिकार एक अनधिकृत कालोनी सोनिया विहार....
उमाशंकर मिश्र/दिल्ली
अभी कुछ समय पहले मैग्सेसे अवार्ड विजेता अरविन्द केजरीवाल से मुलाकात हुयी। बातचीत के दौरान उन्होंने बुद्धकालीन एक घटना के बारे में बताया जिसमे २ राज्यों में उनकी सीमा से होकर बहने वाली नदी के पानी के बंटवारे को लेकर विवाद था. पानी को लेकर आये दिन झगडा और तनाव रहता था. समस्या को लेकर जनता की मौजूदुगी में इस बारे में विचार विमर्श कर निदान खोजने की बात तय हुयी. सभा में स्वयं रजा सिद्दार्थ (बुद्ध) भी मौजूद थे. चर्चा शुरू हुयी तो लोगों ने सुझाव देना शरू किया कि नदी हमारे राज्य की सीमा से होकर बहती है, इसके पानी पर हमारा अधिकार है और हम अपने अधिकार को बलपूर्वक हासिल कर लेंगे. इस बात का बुद्ध ने विरोध करते हुए कहा कि हिंसा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि खून खराबे से कुछ हासिल नहीं होगा. लेकिन वहां मौजूद सभी लोगों ने पानी कि समस्या को ध्यान में रखते हुए बुद्ध के निर्णय को नकार दिया, जबकि वो राजा थे.वास्तव में इस कहानी के माध्यम से अरविन्द जी मुझे बताना चाहते थे कि जनता के फैसले के आगे राजा को भी झुकना पड़ गया. यही सच्चा लोकतंत्र है जहाँ जनता अपने हितों को लेकर फैसले लेने के लिए स्वतंत्र होती है. यही तो लोकशाही है? लेकिन एक लोक्तान्त्तिक देश होते हुए भी भारत में क्या लोगों इस तरह से निर्णय लेने कि स्वतंत्रता है? क्या जनता द्वारा चुने गए नेताओं द्वारा किये जाने वाले दुराचरण के बावजूद उन्हें पदच्युत करने कि ताकत जनता के पास है? बिलकुल नहीं, ऐसे तथाकथित जनप्रतिनिधियों को अगले ५ साल तक सहना मजबूरी बन जाती है. और यदि हम मजबूरी में जी रहे हैं और हमारी स्मस्याये जस कि तस बनी हुई हैं, उनका समाधान जनप्रतिनिधि नहीं कर रहे हैं तो कहे कि लोकशाही? शिव खेडा एक बात कहते हैं-जिस देश में हम अपनी पुलिस और अदालतों से डरते हों, क्या वहां लोकतंत्र हो सकता है? सवाल महत्वपूर्ण है, क्योंकि पुलिस और न्यायपालिका जनता की समस्याओं, विवादों का निपटारा कर एक न्यायमूलक समाज कि स्थापना के सूत्रधार होते हैं. लेकिन इन दोनों संस्थाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार के चलते आम आदमी की न्यायिक व्यवस्था से भी आस्था डगमगाने लगी है.अरविन्द केजरीवाल लोकतंत्र की टूटती इन सांसों को बचने की कोशिश में जुट गए हैं. पर्याप्त शोध के बाद वे लोकशाही को पुष्ट करने के लिए स्थानीय स्वशासन की संकल्पना को अमली जामा पहनाने में जुटे हैं. सूचना के अधिकार के प्रचार प्रसार से ख्याति अर्जित करने वाले अरविन्द स्थानीय स्वशासन और उसके महत्व का पाठ पढाने की पहल कर रहे हैं. इसकी शुरुआत राजधानी की एक अनधिकृत कालोनी सोनिया विहार से होने जा रही है. इसकी एक बैठक हाल ही में संपन्न भी हो चुकी है.जिस तरह गांवों में ग्रामसभा गाँव के निवासियों की बॉडी होती है और गाँव के विकास से सम्बंधित किसी निर्णय पर ग्रामसभा के सदस्यों का सहमत होना जरूरी होता है, उसी तरह से शहरों में एक मुनिसिपल वार्ड के तहत आने वाली कालोनियों में मोहल्ला सभाओं की रचना की जायेगी. इन मोहल्ला सभाओं में सथानीय लोग शामिल होंगे, जो अपने इलाके की समस्याओं को चिन्हित कर उस कारवाही करने के लिए कार्य करेंगे. सभी मोहल्ला सभाओं का चेयरमैन उस वार्ड का निगम पार्षद होगा. पार्षद को मिलने वाला फंड कहाँ खर्च हो रहा है, इसकी जानकारी लोगो को रहेगी, और प्राथमिकता के मुताबिक जहाँ ज्यादा जरुरत होगी विकास कार्य किये जायेंगे.यदि किसी राज्य की समस्त मोहल्ला सभाएं मिलकर किसी एक विषय पर एकमत हो जाती हैं तो सरकार उसपर कानून बनाने के लिए बाध्य होना पड़ेगा. इस तरह से कहा जाये तो जनप्रतिनिधि तो रहेंगे, लेकिन इस व्यवस्था के अस्तित्व में आ जाने से लोग अपने अधिकारों की मांग मोहल्ला कमेत्यों के माध्यम से करने लगेंगे तो नेताओं पर जनदबाव बढेगा और वे भी अभी जिम्मेदारी को निभाने के लिए बाध्य होंगे, क्योंकि उन्हें इस बात का आभास हो जायेगा की अब जनता एकजुट हो चुकी है और विकास कार्य न करने पर अगले चुनाव में लोग उन्हें सिरे से खारिज कर देंगे. ये डर नेताओं में आ जायेगा. शासकों और प्रशासकों को जनता का डर होता है तभी लोकशाही सही अर्थो में फलती फूलती है. लेकिन पिछले कुछ समय में तो इसका बिलकुल उलटा हुआ है, जनता अपने अधिकारों के प्रति सचेत नहीं रहती, जिसका फायदा उठाकर अपराधी भी संसद में पहुँच जाते हैं.बहरहाल सोनिया विहार की महिला निगम पार्षद अन्नपूर्ण मिश्र ने इस कार्य में पहल कर एक मिसाल कायम की है. हालाकिं उन्हें राजनितिक विरोधियों समेत पार्टी के स्तर पर भी विरोध का भय सता रहा है. लेकिन एक महिला होने के बावजूद उनका लीक से हटकर किया गया यह प्रयास मील का पत्थर साबित होगा. मैंने उन्हें जब पत्र लिखकर इस पर बधाई दी तो उनका फन मेरे पास आया, काफी देर तक बातचीत होती रही. कालोनी की समस्याओं से लेकर राजनितिक विरोध की बात भी हुयी. बातचीत के दौरान उन्होंने बताया की अरविन्द केजरीवाल के इस क्षेत्र में काम करने की बात से इलाके के आधिकारी भी सहम से रहे हैं. यही नहीं क्योंकि अब इस अभियान के लगातार चलने से अन्नपूर्ण मिश्र भी निरंतर इलाके के लोगों के संपर्क में रहेंगी, ऐसे में उनके राजनितिक विरोधियों को भी चिंता सताने लगी है. क्योंकि जनता से सीधा संवाद होने से अन्नपूर्ण जी के प्रति लोगों का रुझान बढ़ना भी स्वाभाविक है, इसलिए उनके विरोधी घबराए हुए हैं.बहरहाल इस अभियान के अभी रंग में आने में काफी समय है, लेकिन इसके प्रभाव को लेकर अंदरखाते बहस शुरू हो चुकी है. सोनिया विहार देश का पहला ऐसा इलाका होगा जहाँ इस तरह की शरुआत होने जा रही है. अरविन्द केजरीवाल के लिए यह अभियान एक ड्रीम प्रोजेक्ट की तरह होगा, क्योंकि यहाँ से मिलने वाली सफलता को वो एक माडल के तौर पर प्रस्तुत करना चाहेंगे. बहरहाल जो भी हो इन कवायदों को देखते हुए इतना कहा जा सकता है की यदि सच में लोग एकजुट होकर पाने अधिकारों और समस्याओं पर फैसले लेने लगे तो लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करना फिर दुस्वप्न न रह जायेगा. और ऐसा हुआ तो सेनिटेशन, बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोड इत्यादि बुनियादी सुविधाओं की कमी कि मार झेल रहे सोनिया विहार के निवासियों को आने वाले समय में नारकीय जीवन से मुक्ति मिल सकेगी.

Thursday, July 9, 2009

परंपराओं का लोहा पीटते लोग

अपने पुरखों की विरासत को बचाए रखने के लिए लोग क्या कुछ नहीं करते। लेकिन आज हम आपसे चर्चा कर रहे हैं एक ऐसे समुदाय की जिसकी कई पीढ़ियां अपने पुरखों की एक क़सम को निभाने के लिए सड़क पर बंज़ारों की तरह जिंदगी गुज़ार चुकी है। गाड़िया लोहार कहलाने वाले ये लोग मुद्दतों से खानाबदोश ज़िंदगी जी रहे हैं। आइये जानते हैं राजस्थान की भूबिळया जाति की जीवनशैली और परंपराओं से जुड़े कुछ रोचक तथ्य.....
चिराग
जैन

तीन सौ साल पहले जब महाराणा प्रताप अक़बर से हार कर जंगल में चले गए थे तो उन्होंने यह क़सम खाई थी कि जब तक अपना राज्य जीत नहीं लूंगा तब तक न बिस्तरों पर सोऊँगा न घर बनाऊँगा, न कहीं छत डालूंगा न ही एक जगह चैन से बैठूंगा( सोने-चांदी के बर्तनों में खाना नहीं खाऊँगा, दीपक नहीं जलाऊँगा और सभी प्रकार की भोग विलासिता से दूर रहूँगा।अपने राजा के त्याग और आचरण से प्रेरित होकर महाराणा के कुछ साथियों ने भी अपना घर-बार छोड़ कर साधना और राष्ट्रप्रेम के पथ पर उनका साथ दिया और हर हाल में उनका साथ निभाने की शपथ ली। राणा और उनके साथियों की महानता तो उनके जीवन के साथ चली गई लेकिन उनके वंशज अपने पुरखों के इस बलिदान की यादों को ज़िंदा रखने के लिए आज भी वैसा ही जीवन जीने की कोशिशों में जुटे हैं।लोहे को पीट-पीट कर औजार बनाने वाले ये लोग मूलत: राजस्थान के चित्तौड़गढ़ के रहने वाले हैं। इनके पूर्वज महाराणा प्रताप के युद्ध-सहयोगी रहे हैं लेकिन अक़बर से युद्ध में हारने के बाद ये लोग बंजारों की ज़िंदगी जीने लगे और धीरे-धीरे चित्तौड़ से बहुत दूर निकल आए।ये लोग समूह में कारवां बनाकर, गांव-गांव घूमते रहते थे। इसी कारण इन्हें घुमंतू कहा जाता है। समूह के पुरुष दाढ़ी नहीं बनवाते थे। किसी एक जगह घर बनाकर रहने की समूह में मनाही थी। आपसी मेलजोल बढ़ाने के लिए यह नियम था कि सभी परिवार आपस में रोटियां बांट कर खाएंगे। बर्तनों में भोजन करने और दीपक जलाने की भी मनाही थी। लेकिन अब ये सब परंपराएं खत्म होनी शुरू हो गई हैं। लोगों ने झोंपड़ियां डालकर रहना शुरू कर दिया है।आज़ादी के बाद इस समुदाय ने बंजारो की तरह घूमने-फिरने की परंपरा छोड़ दी और बड़े-छोटे शहरों में झोंपड़ियां बनाकर रहना शुरू कर दिया। राजधानी दिल्ली के सराय रोहिल्ला में लगभग 58 साल से ऐसी ही एक बस्ती बसी हुई है। इसके अलावा कालका जी, पालम, शाहदरा, नोएडा, गा़ज़ियाबाद, अलवर, रोहतक, कानपुर, हिसार, अम्बाला, पानीपत, बीकानेर, झांसी, आगरा, अजमेर और जयपुर आदि स्थानोंं पर भी इनकी बस्तियां बनी हुई हैं, जहां हज़ारों की संख्या में गाड़िया लोहार अपना पुश्तैनी पेशा कर रहे हैं।इस समुदाय की जीवन शैली ही नहीं पहनावा, खानपान, भाषा, त्यौहार और रीति-रिवाज़ भी बेहद रोचक हैं। इनकी स्त्रियां घघरा-आंगी (एक प्रकार की परंपरागत लहंगा-चोली) पहनती हैं। हाथी दांत के सुंदर-सुंदर कड़े, चांदी के मोटे-मोटे आभूषण और चूड़ियों के साथ ताबीज आदि पहनना इन महिलाओं का विशेष शौक होता है। पुरुषों को धोती-कुर्ता और कानों में मुरकी (सोने की कड़ीदार बाली) पहने देखा जा सकता है। इसके अलावा रौबदार चेहरे और अच्छे डीलडौल वाले ये पुरुष अपने शरीर पर गुदवाकर कलाकृतियां बनवाने के शौकीन होते हैं। आज भी इनके पूरे शरीर पर ऐसी चित्रकारी देखी जा सकती है।इन लोगों की भाषा चित्तौड़, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान के अन्य प्रदेशों में प्रयोग की जाने वाली भाषा का मिश्रण है। ऐसा शायद इसलिए है कि अलग-अलग स्थानों पर रहने के कारण इनकी भाषा क्षेत्र विशेष की बोलियों से प्रभावित होती रही है। इस समुदाय के लोग सामान्यत: मांसाहारी भोजन करते हैं साथ ही चूल्हे की रोटियां इनका प्रिय भोजन है। राजस्थान की स्थानीय भाषाओँ में भूबिळये कहलाने वाले इस समुदाय को हम लोग गाड़िया लोहार के नाम से जानते हैं। कहीं-कहीं इन्हें घुमंतू तथा बंजारा भी कहा जाता है। रोज़मर्रा की ज़िंदगी जीते हुए इनके पूर्वज अक़बर से अपना राज्य वापस लेने की तैयारियां भी करते रहते थे। इसके लिए वे लोहे को गलाकर छोटे-बड़े हथियार बनाते थे ताकि युद्ध में हथियारों की कमी न पड़ जाए। बाद में रोजी-रोटी के लिए इसी लोहे में से इन्होंने लोहे के औजार बनाकर बेचना शुरू कर दिया, जो आज भी इस समुदाय का प्रमुख पेशा है।परिवार की महिलाएं व पुरुष दोनों ही औजार बनाने के काम में दक्ष होते हैं और आजीविका के लिए औज़ार बनाते हैं। चाकू, खुरपी, कुल्हाड़ी और छैनी से लेकर हथौड़ा, हंसिया, कुदाल और तसले तक वे सभी प्रकार के औजार व उपकरण जो लोहे से बनते हैं, इन लोगों से खरीदे जा सकते हैं। खेती के औजार बनाने में इन लोगों को विशेष कुशलता प्राप्त होती है। अब दिल्ली जैसे महानगरों में करोल बाग, सदर बाज़ार और चांदनी चौक जैसे कई बड़े बाज़ारों और मेलों में भी इनके बनाए औज़ार बिकते हुए देखे जा सकते हैं।सराय रोहिल्ला की बस्ती में रहने वाले साठ वर्षीय नेकीराम का मानना है कि यदि हमें साधन दिए जाएं तो हम औजारों के बाज़ार में बहुत अच्छा कर सकते हैं। लेकिन सरकार हमें कोई सहायता प्रदान करने के स्थान पर समय-समय पर हमारी इन बस्तियों को उजाड़ने के लिए आदेश निकालती रहती है।यह सच है कि न तो अब इस समुदाय में अपनी परंपराओं के प्रति पहले जैसी आस्था रह गई है न ही इन परंपराओं की आज की दुनिया में कोई आवश्यकता रह गई है। नाम न बताने की शर्त पर एक व्यक्ति ने यह भी जानकारी दी कि उसने राजधानी के बुध विहार इलाके में अपना मकान भी खरीद लिया है लेकिन अब भी वह इस बस्ती में इसलिए रह रहा है कि यहां रहकर वह अपने औजार ज्यादा बेहतर तरीके से बेच सकता है।कुछ भी हो लेकिन इन लोगों के बनाए औजारों में आज भी वही दम है। मल्टीनेशनल कंपनियां और बड़े-बड़े उद्योगपति आज एक से एक खूबसूरत औजार लेकर बाज़ार में उतर रही हैं। ये चाकू और छुरियां इतनी सुंदर होती हैं कि बड़े-बड़े लोगों के घरों में इन्हें डाइनिंग टेबल पर सजाकर रखा जाता है। बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों में बनने वाले ये औजार सुंदर तो होते हैं लेकिन उनमें इन हस्तनिर्मित औजारों वाली मजबूती नहीं होती। बेशक ये लोग औजारों के क्षेत्र में बेहद विकसित हैं क्योंकि इन्होंने लगभग तीन सौ साल अपनी परंपराओं का लोहा पीटा है।

Wednesday, July 8, 2009

यहां दलित भी बनते हैं पुजारी

अवधेश कुमार मल्लिक
क्या आप सवर्ण हैं? यदि हां तो क्या आप अपने लड़के या लड़की शादी किसी दलित परिवार में करना चाहेंगें? क्या ऐसे रिश्ते आपको स्वीकार्य होंगे। गौरतलब है आजादी के आज 60से भी अधिक साल हो गये पर ऐसे सवालों का उत्तर आज भी ना में ही आते हैं। ऐसा क्यों? शादी की बात तो बहुत दूर की बात है, दलितों को आज भी जब धार्मिक स्थलों और कर्मकाण्ड से जुड़ी मामलों में बराबरी का दर्जा नहीं मिला है। गलती से इस मसले पर गर चर्चा भी हो जाए तो धरातल पर स्थिति वही ढ़ाक के तीन पात रहती है। पर चर्चा करने वाला जरुर हेय दृष्टि से देखा जाने लगता है, ऐसा क्यों? क्या इसलिए की गरीब दलित सदियों से शोषित होते आए हैं या मनुवादी समाज ने उनको जो कार्य सौंपे वो काफी घृणित और निचले स्तर के आज भी होते हैं? कारण जो भी हो पर वास्तविकता यह है की आज भी वे समाज को स्वीकार्य नहीं है। ऐसे में दलित धार्मिक पुर्नजागरण का मशाल बिहार थाम ले तो आप को हैरत होगी। पर यह बिलकुल सोलह आने सच है। वर्षों से बिहार अपनी कुप्रथाओं दलित विरोधी किस्से कहानियंा और गरीबी और पिछड़ेपन के कारण बदनाम होते आया है। परंतु प्रगतिवादी दक्षिण भारत, जहां दलित पार्टीयों का अपना एक व्यापक जनाधार व दबदबा है ।सरकार में हिस्सेदारी है फिर भी विडंबना यह है कि आज भी वहां दलितों को मंदिरों मेें जाने से रोका जाता है । इन्हें प्रताड़ित करने के नये नये हथकंडे अपनाए जाते हैं । कुछ दिनों पहले तक बिहार में भी यही स्थिति थी । पर आज अति रूढ़ीवादी और पिछड़ा कहे जाने वाला बिहार में इसके विपरीत परिवर्तन की हवा चल रही है। यह हवा है समाज में दलितों की सामाजिक और धार्मिक स्वीकार्यता बढ़ाने की। इन्हें प्रतिष्ठा दिलाने का। इसकी शुरूआत की गई प्रदेश की राजधानी पटना के भव्य एवम् अति प्रतििष्ठत महावीर मंदिर से। दलितों को ब्राह्मणों के समकक्ष लाने हेतु 1993 में भारतीय पुलिस सेवा के तेज तर्रार अधिकारी किशोर कुणाल के निर्देशन में महावीर मंदिर ट्रस्ट की स्थापना हुई और यहां नियुक्त हुआ देश का प्रथम दलित पुजारी श्री फलहारी दास । वर्तमान में श्री फलहारी दास महावीर मंदिर के प्रधान पुजारी हैं। प्रचलित रिवाजों के अनुसार मंदिरों में पुजारी के रूप में अधिकृत होने के अधिकार केवल ब्राह्मणों को है। ऐसे में किसी दलित का पुजारी के रूप में किसी प्रतििष्ठत मंदिर में नियुक्ति होने का सामाचार सदियों से चली आ रही ब्राह्मणवाद उच्चवर्गीय सत्ता को खुली चुनौती थी। दूसरे अर्थों में कहे तो यह एक खूनी संघर्ष और व्यापक जनविरोध का आमंत्रण था।इस चुनौती को किशोर कुणाल ने बखूबी निभाया और ऐसा कुछ नहीं हुआ। कोई अनहोनी घटीत नहीं हुई। लोग भौंचक्के थे। बिहारी खबर पटना के संपादक संतोष सुमन के अनुसार छिटपुट विरोध के बाद लोगों ने इसे सच स्वीकार कर लिया। इसका मुख्य कारण था लोगों में कुणाल की छवि एक निडर और स्वच्छ चरित्र वाले व्यक्ति होना , दूसरा पटना का शहर होना और तीसरा महावीर मंदिर के निर्माण में किशोर कुणाल के अहम भूमिका में होना था। इस घटना के बाद दलित उत्थान के नाम पर भाषणबाजियां चलती रही। दलित नेताएं जीतते रहे पर दलितों की धार्मिक स्वीकृति वाले मुद्दे इन सब के बीच ं न जानें कहीं दब गई। 14 साल बाद अब जो खबर अखबारों की सुिर्खयां बनी वो अपने आप में खास है। यह घटना है पटना से 40 किलोमिटर दूर देहात पालीगंज की। यहां के प्रतििष्ठत राम-जानकी मंदिर में कबीर जयंती के दिन दलित पुजारी जनार्दन मांझी की नियुक्ति हुई । मंदिर के 300 वषाZें से ज्यादा के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ। पालीगंज अपने धार्मिक कट्टरपन के लिए पूरे बिहार मे कुख्यात है। क्यूंकि यहां पर धर्मभीरु उंचे रसूख वाले ब्राहमणों की कमी नहीं है और अच्छी खासी संख्या में उच्च जाति के लोग यहां निवास करते हैं। इस बात को लेकर कुणाल भी आशंकित थे की उनके इस कदम का यहां पर भारी विरोध होगा। इन सब विसंगतियों के बाद बावजूद परिणाम इसके विपरीत निकले। विरोध तो दूर की बात है इसबार लोगों ने उनके इस कार्य की जमकर सराहना की। इतना ही नहीं इस कार्य की खुसी में आयोजित भोज (पंगतद्ध मे करीब दस हजार लोगों ने भाग लिया। क्या यह हैरत वाली बात नहीं हैं , बिहार जहां सियासत की लड़ाईयों में आज भी हार जीत का फैसला जातिय आधार पर होता है। जाति वचZस्वता कायम रखने और रक्त शुðता के नाम पर लोग मारने काटने तक से भी गुरेज नहीं करते। इसकी रक्षा करने के लिए लोग खून की नदीयां बहा देते हैं। वहां की धार्मिक सत्त में सेंध लग गई और विरोध के स्वर भी नहीं उठे। इस पर टिप्पणी करते हुए पटना के ए.एन. सिन्हा ईन्सीट्यूट में कार्यरत प्रख्यात मानव विज्ञानी एवं प्रोफेसर नीलरतन ने कहा की - विरोध न होने का मुख्य वजह है शिक्षा के स्तर में सुधार और प्रसार, ग्लोबलाइजेशन और व्यक्तिवाद का बढ़ता प्रभाव´। उनके अनुसार शिक्षा के प्रसार व ग्लोबलाईजेशन के कारण व्यक्तियों के मानसिक सोच में काफी परिवर्तन आया है। व्यक्ति आज सामाजिक कम और व्यिक्वादी ज्यादा हो गया हो गया है। जिसके कारण सामाजिक पकड़ पहले से काफी ढ़ीले हो गए हैं। उस पर से सरकार, गैरसरकारी संगठन व मीडिया का सकारात्मक रवैया और इन सब का संयुक्त प्रयास के चलते दलितों के प्रति समाजिक दृष्टिकोण में काफी बदलाव आया है। जबकी पटना के ए.एन. कॉलेज के प्रींसीपल एस आर सिंह कुणाल के कार्य को क्रांतिकारी कदम मानते हैं। सराहनीय कदम है। इस बात की चर्चा वो इसका श्रेय शिक्षा के प्रसार और समाज में आ रही जागृति को देतें हैं। ध्यान देने वाली बात है आजादी के बाद संविधान निर्माता डा. बी. आर. अंबेडकर भी इसी प्रकार की धार्मिक स्वीकृति चाहते थे जिसके ना मिलने के कारण अम्बेडकर ने अपने लाखों अनुयायियों के साथ बौ( धर्म अपना लिया। तब से लेकर आज तक धार्मिक स्वीकृति के नाम पर छिटपुट आंदोलन तो चलते रहे लेकिन इस प्रकार के साहसिक कदम उठाने का साहस किसी ने नहीं किया । इसलिए कुणाल के कदम पर प्रतिक्रिया जानने के लिए जब बिहार प्रशासनिकसेवा के एक दलित अधिकारी से संपर्क साधा तो नाम न छापने के शर्त पर बताया की वो दरभंगा जिले से हैं आज से 12 साल पहले उनकी बहन की शादी हुई, शादी पर बुलाए पंडित ने काफी आग्रह करने पर भोजन कर लिया। इस बात की खबर जब उनकी बिरादरी वाले को हुई तो सबने मिलकर उन्हें जाति से बेदखल करने की भरपूर कोशिश किया । जबकी यह जानते थे की मैं एक प्रशासनिक अधिकारी हूं। अत: मेरे दखल देने और मेरे द्वारा घोषणा करने पर की पंडितजी ने मेरे यहां भोजन ग्रहण नहीं किया तब जाकर मामला शांत हुआ। एक प्रशासनिक अधिकारी का यह हाल है तो सोचा जा सकता है कि निधर्न व कमजोर दलितों के साथ क्या होता होगा। भले ही संविधान में अस्पश्Zयता निषेध है पर आज भी गांवो में यह खूब चलता है। ऐसी घटनाएं आज भी घटती है लेकिन उनकी संख्या कम है । उच्चवर्ग के चपरासी आज भी अपने दलित अफिसर को चाय पानी यहां तक की उनकी हुक्म बजाने में आज भी आना-कानि करते हैं। डा. सिच्चदानंद द्वारा लिखि गई पुस्तक हरिजन ईलाइट में ऐसे कई घटीत वर्णन मिलते हैं। कुणाल के इस कदम के बारेमें कहा की हम सब उत्साहित हैं और हम इसका स्वागत करते हैं।हकीकत में संविधान और सरकार आरक्षण और कानून कस निमार्ण तो कर सकती है पर पालना तो जनता ही को करना है। कुणाल भी इस बात को स्वीकार करते हैं बिहार के मिथलाचंल कहे जाने वाले जिलों में अभि इस प्रकार की नियुक्ति संभव नहीं है समयानूकूल होने पर वो इससे पीछे नहीं हटेंगें। स्वंयं सेवी संस्था प्रयास से सबंध रखने वाले संजय सिंह का कुणाल मामले अलग राय रखते हैं। उनका कहना था बिहार के गांवो में लोग रहते ही कहां है। अधिकाशं लोग खासकर उच्च वर्ग के लोग शहरों में रहना पसंद करते हैं। वहां जाति से ज्यादा व्यक्तिगत स्थिति का ज्यादा महत्व होता है। इसलिए गांवों में भी लोग अब व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को ज्यादा महत्व देते हैं। जबकी दरभंगा के सुरेन्द्र नारायण दास जमींदारी प्रथा का जाति प्रथा जोड़ते हुए कहते हैं। अब जबकी जमिंदारी ही नहीं रही तो धीरे धीरे यह उंच नीच भी खत्म हो जाएगा लेकिन अमीर गरीब की खाई अवश्य रहेगी। मधुबनी के भवनाथ झा कहते हैं हमें दलितों से परहेज नहीं है पर उनके पारंपरिक कार्यों से अवश्य है। अगर व्यक्ति वेद मंत्रों का सही उच्चारण कर सकता है अगर कर्मकाण्ड का सही ज्ञान है तो उस से पूजा करवाने में क्या हर्ज है। पूजा करवाने के मसले पर किशोर कुणाल कहतें हैं यह एक मिथ्या प्रचार है की दलित अगर पूजा करेंगें तो धर्म भ्रष्ट हो जाएगा। मैंने अपनी 300 से ज्यादा पृष्ठों की पुस्तक दलितो देवो भव् में स्पष्ट लिखा है दलितों को भी ईश्वरीय अराधना करने का उतना ही अधिकार जितना की एक ब्राहमण को । इसको प्रमाणित करने के लिए मैंने वेद स्मृति समस्त पुराणो और विभिन्न प्रकार के धार्मि का ग्रंथो का सार लिया है जिसमें कहीं भी दलितो द्वारा पूजा को अवैध अनैतिक ठहराया गया है या प्रतिबंधित नहीं किया गया है। वैसे भी ईश्वर के दरबार में सब बराबर है तभी तो कबीर दास ने कहा था `जात पात न पूछे कोई हरि के भजै से हरि के होई´। अपने उपलब्धि से उत्साही किशोर कुणाल जो वर्तमान में बिहार राज्य धार्मिक ट्रस्ट बोर्ड (बी. आर. टी .बीद्धके अध्यक्ष हैं ने कहा की आनेवाले समय में बिहार के तमाम मंदिरों में पुजारी क ेरूप में दलित ही नियुक्त होंगें और इसके लिए वो प्रयासरत हैं। आंकड़ो के अनुसार बिहार में कुल रजिस्टर्ड मंदिरों की संख्या कुल 3000 है, और मंदिरों की संख्या करीब 50000 तक है। दूसरे अर्थो में यह समझा जा सकता है कि आने वाले समय में बिहार में दलित कुल पुजारियों की संख्या 50000 या उससे अधिक हो जाएगी। जो अपने आपमें एक बड़े बदलाव का द्योतक है। इसलिए हमें प्राथ्Zाना करनी चाहीए की कुणाल के प्रयास अवश्य रंग लाए । अगर ऐसा होता है तो निश्चय ही बिहार पूरे भारत में एक ऐसी क्रांति का नेतृत्व करेगा जिसका की इंतजार भारत को वर्षों से था। कुणाल के इस कदम को हम जाति रहित समाज निर्माण ओर बढ़ने वाला कदम मान सकते हैं जहां मानवता और कर्म की पूजा होती है न किसी जाति विशेष की। अगर हमें 2020 तक भारत को विकसित राष्ट्रों की सूची में लाना है तो ऐसे कदम उठाने ही होंगें । इसलिए विवेकानंद ने भारत विकास के संदर्भ में कहा `दीन-दलित-दुखी देवो भव्´

Tuesday, July 7, 2009

पहचान के संघर्ष से आत्मनिर्भरता की ओर

सामाजिक तौर पर बहिष्कृत, अनवरत् मानसिक यंत्रणा का दंश झेल रही और गलियों में भीख मांगकर दो वक्त की रोटी जुटाने वाली वृंदावन की विधवा महिलाओं को कई बार शारीरिक शोषण का भी शिकार होना पड़ता है, इस सामाजिक निष्ठुरता एवं सरकारी उपेक्षा के बीच इन महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाकर उनमें जीवन के प्रति सम्मान एवं उत्साह जगाने की कोशिश की जा रही है।
उमाशंकर मिश्र/मथुरा
समाज से परित्यक्त और सरकारी उपेक्षा की शिकार वृंदावन में रहने वाली करीब 10 हजार विधवा महिलाओं के दुख और मानसिक यंत्रणा की कहानियों को सैकड़ों पत्रकारों और फिल्मकारों ने कई बार उकेरा है। अब तो मीडिया संस्थान के संपादकीय विभागों में बैठे प्रबुद्ध संपादकों को भी अब यह विषय घिसा-पिटा सा जान पड़ता है, लेकिन इन महिलाओं की दुखद दास्तान से हटकर उनके सशक्तिकरण और मनोबल को ऊंचा उठाने को लेकर भी प्रयास किये जा रहे हैं। दि गिल्ड फॉर सर्विसेज की अध्यक्ष वी.मोहिनी गिरी और `युनाईटेड नेशन्स डेव्लपमेंट फंड फॉर वुमेन´ (यूनीफेमद्ध मिलकर इस काम के लिए धन जुटाने हेतु एक फोटो प्रदर्शनी आयोजन कर रही हैं। `Lonely Images, lasting Impressions-A journey of widows of vrindavan and varanasi´ की थीम पर आधारित इस प्रदर्शनी में देश विदेश के अनेक फोटोग्राफर्स इन असहाय महिलाओं की व्यथा को अपने कैमरे में कैद कर दुनिया को उससे रूबरू करा रहे हैं। बकौल मोहिनी गिरी-`यह प्रयास इन महिलाओं की दुखद परिस्थितियों पर फिल्म बनाकर परोसने की बजाय उन्हें एक सम्मानजनक जीवन जीने के लिए प्रेरित करेगा।´ हर तरफ से ठुकराई जा चुकी इन महिलाओं की जिंदगी उत्साहविहीन और नीरस बन जाती है। दो वक्त की रोटी के लिए भीख मांगना और हरि भजन कर समय बिताना वृंदावन में रहने वाली विधवा महिलाओं की दिनचर्या का हिस्सा होता है। नितांत अकेलेपन के बीच न कोई आत्मसम्मान का भाव, न जीवन के प्रति कोई लगाव और न ही कुछ नया करने का उत्साह, बहते पानी की तरह इन महिलाओं की जिंदगी होती है, जहां ढाल मिला बहते चल दिये। ये महिलाएं सिर्फ फिल्मकारों की पटकथा की विषयवस्तु बन कर न रह जायें इसके लिए इन्हें विभिन्न प्रकार की व्यावसायिक गतिविधियों से जोड़ने की तैयारी की जा रही है। मोहिनी गिरी के मुताबिक-`इन महिलाओं को आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर और मानसिक तौर पर लचीला बनाने के लिहाज से नर्सिंग, सिलाई, आचार, पापड़, साबूदाना, धूपबत्ती, दोने और धार्मिक पोशाकें बनाने का प्रशिक्षण दियाा जा रहा है।´ आगे वे कहती हैं कि `आज ऐसी असहाय महिलाओं की संख्या निरंतर बढ़ रही है तो सिर्फ व्यवस्था को कोसने से काम नहीं चलेगा, बल्कि परंपरागत सोच से ऊपर उठकर काम करना होगा।´ सफेद धोती में लिपटी इन महिलाओं के कंठ से निकलने वाली आवाज और टकटकी लगाकर निहारती आंखों में तैरता पानी इनकी पीड़ा की कहानी कहता है। सब कुछ ठीक रहा तो अब शायद ऐसा नहींं रहेगा। कॉटेज इंडस्ट्री आधारित प्रशिक्षण, हैल्थकेयर, साक्षरता और सुरक्षित वातावरण से अब इन महिलाओं के आर्थिक एवं सामाजिक सशक्तिकरण की राह प्रशस्त हो रही है। वृंदावन में गिल्ड ऑफ सर्विस के एक नये प्रकल्प मॉं धाम में इसी तरह की 120 असहाय विधवा महिलाएं रह रही हैं। भोजन एवं आवास जैसी मूलभूत सुविधाओं के अलावा मॉं धाम में इन महिलाओं की जीवन में गुणात्मक सुधार हेतु कैपेसिटी बििल्डंग कार्यक्रम भी चलाये जाते हैं। वोकेशनल ट्रेनिंग सेंटर, डेयरी फार्म, तुलसी फार्म और हल्दी की खेती भी गिल्ड की कार्यसूची में शामिल है। यह शर्म की बात है कि इन महिलाओं की ओर समाज और सरकार किसी का ध्यान नहीं जाता। राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा 1998 में किए गए एक सर्वे के मुताबिक वृंदावन की गलियों में 10 से भी अधिक विधवा महिलाएं रह रही हैं, जिन्हें बहिष्कृत जीवन जीने के साथ साथ शारीरिक शोषण का भी दंश झेलना पड़ता है। यही नहीं जीवन यापन के लिए उन्हें भजन गाकर भीख मांगने के अलावा वेश्यावृत्ति के लिए भी मजबूर होना पड़ता है। बहुत अधिक उम्र के कारण कई महिलाएं तो चलने फिरने में भी असमर्थ होती हैं। मंदिरों की नगरी कहे जाने वाले वृंदावन की गलियों में देश-दुनिया से मन और आत्मा की शांति की आस लिए हजारों लोग आतें हैं, अपने प्रिय श्रीकृष्ण की स्तुति में मंत्रों का जाप और स्तुति गायन करते हैं और अंतत: आश्चर्यचकित निगाहों से इन विधवाओं को ताकते हुए वापस लौट जाते हैं। यह सिलसिला निरंतर कई वर्षों से चलता आ रहा है। हालांकि वृंदावन की विधवाओं की नीरस जिंदगी को जीवनपर्यन्त भीख और दर-दर की ठोकरों से बचाने की गिल्ड ऑफ सर्विस की कवायद आशा की एक नई किरण जान पड़ती है।

Monday, July 6, 2009

अब प्रणब दादा की बारी

उमाशंकर मिश्र
ममता दीदी के रेल बजट के बाद अब प्रणब दादा की बारी थी। मंदी के दौर और खेती के चौपट होने की मार झेल रही ग्रामीण जनता को नई सरकार से काफी उम्मीदें थी। कृषि क्षेत्र के लिए कम से कम चार प्रतिशत की विकास दर का लक्ष्य रखते हुए अर्थव्यवस्था के लिए नौ प्रतिशत की विकास दर का लक्ष्य रखा गया है। वित्त मंत्री द्वारा प्रस्तुत बजट में कार्पोरेट जगत को ज्यादा कुछ नहीं दिया गया लेकिन आम भारतीय और देश के लिए महत्वपूर्ण इकाइयों के लिए काफी कुछ प्रावधान किए गए हैं। बजट में कृषि जगत का खास ध्यान रखा गया है और रेल तथा सड़क तंत्र के विकास की बात की गई है।
हालांकि अंतरीम बजट में सामाजिक सरोकारों को लेकर सरकार प्रतिबद्ध जान पड़ रही थी, लेकिन अब जब प्रणब दादा का पिटारा खुल चुका है तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर नज़र रखने वाले पैरोकारों समेत विभिन्न अर्थशास्त्री कृषि की घोर उपेक्षा का आरोप सरकार पर लगा रहे हैं। . एग्रीकल्चर ट्रेड एण्ड पॉलिसी एक्सपर्ट-भास्कर गोस्वामी बजट के दो पहलुओं की ओर ध्यान केंद्रित करते हुए कहते हैं कि राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना की राशि में 144 फीसदी की बढ़ोत्तरी कर 39 हजार करोड़ किए जाने को सही ठहराते हैं। वे कहते हैं कि-यदि सही तरीके से इसे लागू किया गया तो बेरोजगारों के साथ साथ किसानों को भी फायदा मिल सकता है। दूसरी ओर उर्वरक सब्सिडी के लिए 49980 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। फर्टीलाइजर्स पर दी जाने वाली सिब्सडी सीधे किसानों को दिये जाने की बात को भी जानकार उचित कदम मान रहे हैं। लेकिन इससे फर्टीलाइजर्स के उपभोग पैटर्न में आने वाले एक डेढ़ सालों में क्या परिवर्तन होंगे यह देखने की बात होगी। कृषि ऋण पर ब्याज दर घटाकर 4 प्रतिशत के स्तर पर लाये जाने की आशा अर्थशास्त्रियों को थी। लेकिन ऐसा न होने पर भास्कर गोस्वामी जैसे जानकारों कहना है कि-दीघZकालीन खेती की ओर सरकार का ध्यान बिल्कुल नहीं है और किसी न किसी बहाने सरकार खेती से अपना हाथ खींचकर उसे कार्पोरेट कंपनियों के हवाले कर देने में जुटी हुईZ है। वे कहते हैं-वर्तमान हालातों को देखते हुए किसानों के लिए आय की गारंटी से जुड़ी किसी घोषणा की उम्मीद थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। एक और बात हाईब्रिड बीजों के दुष्प्रभावों को देखते हुए इस पर सख्त कदम उठाने की अपेक्षा भी थी, लेकिन इस पर भी कुछ नहीं हुआ। फिलहाल जानकारों की मानें तो इस बजट से खेती में किसी तरह के सुधार की आशा नहीं की जानी चाहिए। इस बीच कर्ज माफी योजना को दिसंबर तक बढ़ाये जाने को किसानों को राहत पहुंचाने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वित्त मंत्री ने महाराष्ट्र में इस योजना से वंचित उन किसानों के लिए कार्य बल गठन करने का ऐलान किया जिन्होंने महाजनों से ऋण लिया हुआ है। इसके अलावा सरकार ने उन किसानों के लिए 6 फीसदी की दर से कर्ज देने की घोषणा की जो अपने कर्ज का भुगतान समय पर करते हैं। यह दर दूसरों से लिए जाने वाले ब्याज दर से एक फीसदी कम है। केन्द्र ने इस उद्देश्य के लिए अंतरिम बजट के मुकाबले इस बजट में 411 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि का आवंटन किया है। मुखर्जी का कहना है कि सरकार अल्पकालिक फसल कर्ज के लिए ब्याज सब्सिडी देना जारी रखेगी। तीन लाख रुपये तक के ऋण पर किसानों को 7 फीसद ब्याज देना होगा। सरकार ने वित्त वर्ष 2009.10 के लिए कृषि ऋण का लक्ष्य बढ़ाकर ३,2500 करोड़ रुपये कर दिया है।
बहरहाल राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना की राशि में बढ़ोत्तरी एवं राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन का आरंभ करने के साथ 1.2 करोड़ नौकरियां प्रतिवर्ष देने को संतोषजनक माना जा रहा है। राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना 2009-10 में 63 फीसदी की वृद्धि के साथ 8.800 करोड़ रुपये का आवंटन, प्रधानमंत्री आदशZ ग्राम योजना में 100 करोड़ का प्रावधान, महिला साक्षरता के लिए राष्ट्रीय मिशन प्रारंभ करने की बात सरकार कर रही है। लेकिन जिस तरह से पेट्रोलियम पद्धार्थों के दामों में बढ़ोत्तरी हो रही हे, उसे नकारात्मक माना जा रहा है। आज उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पहले ही 10 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच चुका है, जानकारों के मुताबिक ऐसे में आने वाले समय में इसका सीधा असर कमोडिटी दामों पर पड़ेगा।
सरकार ने वित्त वर्ष २००९-10 में कृषि क्षेत्र के लिए लक्ष्य बढाकर ३,२५,000 करोड़ रुपये कर दिया है। पिछले वित्तीय वर्ष में यह लक्ष्य 280000 करोड़ रुपये रखा गया था। हालांकि कृषि क्षेत्र के लिए कर्ज के तौर पर २,८७,000 करोड़ रुपये दिए गए। लेकिन कमल नयन काबरा जैसे अर्थशास्त्रियों की नज़र में यह नाकाफी है। वे कहते हैं कि जरूरत को देखते हुए ग्रामीण क्षेत्र की तो घोर उपेक्षा की गई है। आधार संरचना में जीडीपी के 9 फीसदी के निवेश की बात पर वे कहते हैं कि भारत के 60 लाख गांवोंं में औसतन यदि 10 लाख रुपये भी लगा दिये जाये ंतो कुछ होने वाला नहीं है। सेनीटेशन की समस्या का हवाला देते हुए कहते हैं कि आज भी औरतों को कष्ट सहना पड़ता है। बकौल काबरा एक ओर तो सरकार आलीशान फलाईओवर्स बना रही है, बाम्बे में बाढ़ राहत के लिए 500 करोड़ रुपये दिये जा रहे है, लेकिन बिहार एक बार फिर बाढ़ के मुहाने पर खड़ा है, उसके लिए कुछ नहीं किया गया। आम आदमी की बात करते हुए काबरा कहते हैं कि गरीब के पल्ले अंतत: कुछ नहीं पड़ता, सब बिचौलियोंं की जेबों में चला जाता है। वे कहते हैं कि आज जरूरत है खेती के कार्पोरेटाइजेशन को रोकने और सीमांत एवं गरीब किसानों के हित में कदम उठाये जाने की।