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Tuesday, July 7, 2009

पहचान के संघर्ष से आत्मनिर्भरता की ओर

सामाजिक तौर पर बहिष्कृत, अनवरत् मानसिक यंत्रणा का दंश झेल रही और गलियों में भीख मांगकर दो वक्त की रोटी जुटाने वाली वृंदावन की विधवा महिलाओं को कई बार शारीरिक शोषण का भी शिकार होना पड़ता है, इस सामाजिक निष्ठुरता एवं सरकारी उपेक्षा के बीच इन महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाकर उनमें जीवन के प्रति सम्मान एवं उत्साह जगाने की कोशिश की जा रही है।
उमाशंकर मिश्र/मथुरा
समाज से परित्यक्त और सरकारी उपेक्षा की शिकार वृंदावन में रहने वाली करीब 10 हजार विधवा महिलाओं के दुख और मानसिक यंत्रणा की कहानियों को सैकड़ों पत्रकारों और फिल्मकारों ने कई बार उकेरा है। अब तो मीडिया संस्थान के संपादकीय विभागों में बैठे प्रबुद्ध संपादकों को भी अब यह विषय घिसा-पिटा सा जान पड़ता है, लेकिन इन महिलाओं की दुखद दास्तान से हटकर उनके सशक्तिकरण और मनोबल को ऊंचा उठाने को लेकर भी प्रयास किये जा रहे हैं। दि गिल्ड फॉर सर्विसेज की अध्यक्ष वी.मोहिनी गिरी और `युनाईटेड नेशन्स डेव्लपमेंट फंड फॉर वुमेन´ (यूनीफेमद्ध मिलकर इस काम के लिए धन जुटाने हेतु एक फोटो प्रदर्शनी आयोजन कर रही हैं। `Lonely Images, lasting Impressions-A journey of widows of vrindavan and varanasi´ की थीम पर आधारित इस प्रदर्शनी में देश विदेश के अनेक फोटोग्राफर्स इन असहाय महिलाओं की व्यथा को अपने कैमरे में कैद कर दुनिया को उससे रूबरू करा रहे हैं। बकौल मोहिनी गिरी-`यह प्रयास इन महिलाओं की दुखद परिस्थितियों पर फिल्म बनाकर परोसने की बजाय उन्हें एक सम्मानजनक जीवन जीने के लिए प्रेरित करेगा।´ हर तरफ से ठुकराई जा चुकी इन महिलाओं की जिंदगी उत्साहविहीन और नीरस बन जाती है। दो वक्त की रोटी के लिए भीख मांगना और हरि भजन कर समय बिताना वृंदावन में रहने वाली विधवा महिलाओं की दिनचर्या का हिस्सा होता है। नितांत अकेलेपन के बीच न कोई आत्मसम्मान का भाव, न जीवन के प्रति कोई लगाव और न ही कुछ नया करने का उत्साह, बहते पानी की तरह इन महिलाओं की जिंदगी होती है, जहां ढाल मिला बहते चल दिये। ये महिलाएं सिर्फ फिल्मकारों की पटकथा की विषयवस्तु बन कर न रह जायें इसके लिए इन्हें विभिन्न प्रकार की व्यावसायिक गतिविधियों से जोड़ने की तैयारी की जा रही है। मोहिनी गिरी के मुताबिक-`इन महिलाओं को आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर और मानसिक तौर पर लचीला बनाने के लिहाज से नर्सिंग, सिलाई, आचार, पापड़, साबूदाना, धूपबत्ती, दोने और धार्मिक पोशाकें बनाने का प्रशिक्षण दियाा जा रहा है।´ आगे वे कहती हैं कि `आज ऐसी असहाय महिलाओं की संख्या निरंतर बढ़ रही है तो सिर्फ व्यवस्था को कोसने से काम नहीं चलेगा, बल्कि परंपरागत सोच से ऊपर उठकर काम करना होगा।´ सफेद धोती में लिपटी इन महिलाओं के कंठ से निकलने वाली आवाज और टकटकी लगाकर निहारती आंखों में तैरता पानी इनकी पीड़ा की कहानी कहता है। सब कुछ ठीक रहा तो अब शायद ऐसा नहींं रहेगा। कॉटेज इंडस्ट्री आधारित प्रशिक्षण, हैल्थकेयर, साक्षरता और सुरक्षित वातावरण से अब इन महिलाओं के आर्थिक एवं सामाजिक सशक्तिकरण की राह प्रशस्त हो रही है। वृंदावन में गिल्ड ऑफ सर्विस के एक नये प्रकल्प मॉं धाम में इसी तरह की 120 असहाय विधवा महिलाएं रह रही हैं। भोजन एवं आवास जैसी मूलभूत सुविधाओं के अलावा मॉं धाम में इन महिलाओं की जीवन में गुणात्मक सुधार हेतु कैपेसिटी बििल्डंग कार्यक्रम भी चलाये जाते हैं। वोकेशनल ट्रेनिंग सेंटर, डेयरी फार्म, तुलसी फार्म और हल्दी की खेती भी गिल्ड की कार्यसूची में शामिल है। यह शर्म की बात है कि इन महिलाओं की ओर समाज और सरकार किसी का ध्यान नहीं जाता। राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा 1998 में किए गए एक सर्वे के मुताबिक वृंदावन की गलियों में 10 से भी अधिक विधवा महिलाएं रह रही हैं, जिन्हें बहिष्कृत जीवन जीने के साथ साथ शारीरिक शोषण का भी दंश झेलना पड़ता है। यही नहीं जीवन यापन के लिए उन्हें भजन गाकर भीख मांगने के अलावा वेश्यावृत्ति के लिए भी मजबूर होना पड़ता है। बहुत अधिक उम्र के कारण कई महिलाएं तो चलने फिरने में भी असमर्थ होती हैं। मंदिरों की नगरी कहे जाने वाले वृंदावन की गलियों में देश-दुनिया से मन और आत्मा की शांति की आस लिए हजारों लोग आतें हैं, अपने प्रिय श्रीकृष्ण की स्तुति में मंत्रों का जाप और स्तुति गायन करते हैं और अंतत: आश्चर्यचकित निगाहों से इन विधवाओं को ताकते हुए वापस लौट जाते हैं। यह सिलसिला निरंतर कई वर्षों से चलता आ रहा है। हालांकि वृंदावन की विधवाओं की नीरस जिंदगी को जीवनपर्यन्त भीख और दर-दर की ठोकरों से बचाने की गिल्ड ऑफ सर्विस की कवायद आशा की एक नई किरण जान पड़ती है।

3 comments:

अंशुमाली रस्तोगी said...

वे अपने-अपने ईश्वरों की खोज में मगन हैं और उनका ईश्वर उन्हें देखता-पूछता तक नहीं।

Udan Tashtari said...

दुखद!

अनुनाद सिंह said...

धन्य हैं वे लोग जो इन विधवाओं को आत्मनिर्भर बनाने का यत्न कर रहे हैं।