मेरा गाँव मेरा देश

Thursday, May 29, 2008

जहां लगते हैं मजदूरों के भाव
पटना। खुले बाजार में आपने गाय, भैंस, बैल, बकरी आदि बिकने की बातें जरूर सुनी होगी लेकिन आपको यह बात सुनने मे थोड़ी अजीब लगे कि बिहार और झारखंड के कई जिलों में प्रतिदिन मजदूरों का भी बाजार लगता है। इन बाजारों में मजदूरों की बोली लगाई जाती है और फिर उन्हें काम के हिसाब से खरीदा जाता है।
प्रत्येक दिन इन हट्ठे-कट्ठे एवं स्वस्थ मजदूरों की खरीद-बिक्री होती है। हालांकि केंद्र और राज्य सरकार द्वारा मजदूरों को रोजगार उपलब्ध कराने तथा उनकी स्थिति में सुधार के लिए कई योजनाओं का संचालन किया जा रहा है, परंतु इन मजदूर बाजारों में मजदूरों की कमी नहीं हो रही है।
बिहार के छपरा, समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर, भागलपुर, खगडि़या, डिहरी सहित झारखंड के रांची, डालटेनगंज, बोकारो, हजारीबाग आदि जिला मुख्यालयों में ऐसे बाजार लगते हैं। ये बाजार खुलेआम सुबह के आठ बजते-बजते मजदूरों से सज जाते हैं।
इन शहरों के खास स्थानों में यह बाजार लगता है। इन स्थानों पर नौ बजते-बजते मजदूरों की संख्या 250-300 के लगभग हो जाती है। फिर इन मजदूरों को खरीदने के लिए ग्राहकों के आने का सिलसिला शुरू होता है। ग्राहकों के आते ही इन मजदूरों की खरीद-फरोख्त का दौर शुरू हो जाता है।
इलाके और काम के हिसाब से इन मजदूरों की कीमत तय होती है। निपुण मजदूर तो इन बाजारों में ही मिलते हैं। छत-ढलाई व अन्य निर्माण कार्यों के लिए मिलने वाले मजदूर यहां 100-150 रुपये में बिकते हैं। सामान्य श्रेणी के मजदूरों को यहां कम भाव में खरीदा जाता है। इनकी खरीद 90-100 रुपये में की जाती है।
आश्चर्य की बात यह है कि इन बाजारों में महिला मजदूरों की भी उपस्थिति अच्छी-खासी होती है। हालांकि इन्हें पुरूष मजदूरों से कम दामों में खरीदा जाता है। इन महिला मजदूरों की कीमत शादियों के मौसम में बढ़ जाती है।
डिहरी स्टेशन चौक पर लगे मजदूर बाजार में खड़े शंकर कहते हैं कि इस बाजार में आने से काम की किल्लत नहीं रहती। यहां आने से इतना तय होता है कि काम मिल ही जाएगा। उधर, पलामू के रेड़मा चौक पर खड़ी एक महिला मजदूर जीरवा देवी कहती हैं कि यहां मोल-भाव के बाद मजदूरी तय होती है। वह कहती हैं कि इधर-उधर काम के लिए भटकने से अच्छा है कि यहां आया जाए और आसानी से काम प्राप्त किया जाए।
साभार ः याहू.कॉम, फ़ोटोः गूगल

Saturday, May 24, 2008


बिदेसिया


बिदेसिया बिहार के पिश्चमी जिलों आरा, छपरा, तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिलों विशेषकर बलिया, देवरिया का लोकनाट्य रूप है। भिखारी ठाकुर ने बिदेसिया लोकनाट्य शैली को विकसित किया, जिसकी कथा संक्षेप में इस प्रकार है- कोई व्यक्ति जीविकोपार्जन के लिए विदेश कलकत्त, रंगून जाता है। उसकी पत्नी उसके वियोग के कारण अनेक कष्ट सहन करती है, जैसे गांव के जमींदार की बर्बरता आदि। अंत में किसी बटोही के द्वारा वह अपना दुखद संदेश पति के पास भेजती है, जिसे सुनकर वह अपनी नौकरी छोड़कर घर लौट आता है। बिदेसिया शैली में रचित लोकनाट्यों में इसी कथा को अलग अलग ढंग से दोहराया जाता है। इसी लोकनाट्य शैली में वह सुप्रसिद्ध लोकगीत उपलब्ध होता है, जो बिदेसिया, लोकगीत के नाम से जाना जाता है। चूंकी इस लोकगीत की प्रत्येक पंक्ति में बिदेसिया का नाम आता है, अत: यह इसी नाम से विख्यात है। इस गीत की कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं -


गवना कराई सइयां घर बइठवले से

अपने चलेले परदेस रे बिदेसिया।

चढ़ली जवनियां बेरिन मइली हमरी से के

मोर हरि है कलेस रे बिदेसिया।।

दिनवां बीतेला सइयां बटिया जोहत तौर

रतिया बीतेली जागि-जागि रे बिदेसिया।

घरी राति गइले पहर रात गइले से

धधके करेजवा में आगि रे बिदेसिया।।


भोजपुरी क्षेत्र में बिदेसिया लोकनाट्य का इतना अधिक प्रचार है कि सैकड़ों की तादाद में ग्रामीण दशZक इसे देखने के लिए एकत्रित होते हैं। इस लोकनाट्य में सामाजिक बुराइयों, विशेषकर बाल-विवाह और वृद्ध-विवाह की ओर जनता का ध्यान उन्ही की बोली भोजपुरी में आकर्षित किया जाता है। इसकी भाषा सरस और मधुर होती है। मीडिया लोकमाध्यमों के रूप में िशक्षा के प्रसार तथा अपनी बात आम जनता तक पहुंचाने के लिए इस प्रकार के माध्यम अत्यंत उपयोगी और कारगर हैं।

Tuesday, May 20, 2008


एक झलक स्वर्णनगरी की


अक्सर कहा जाता है कि भारत गांवों में बसता हैं। महात्मा गांधी भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए जोर देते थे, क्योंकि उनका मानना था कि देश की तरक्की का मार्ग ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सुदृढ़ीकरण में ही समाहित है। भारत के विभिन्न अंचलों में विभिन्न ग्रामीण उद्योग लोगों की आजीविका का साधन रहे हैं और स्थानीय स्तर पर निर्मित इन उत्पादों की गुणवत्ता और उपयोगिता के आधार पर ही संबंधित स्थान को ख्याति प्राप्त होती थी। लेकिन समय के साथ ये कलाएं आधुनिकता की गर्त तले दबकर दम तोड़ने लगी हैं। मरुभूमि राजस्थान में स्वर्णनगरी जैसलमेर की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के साथ स्थानीय लोकजीवन में भी पट्टू का विशेष स्थान रहा है। पट्टू एक प्रकार की शॉल है, जिसे भेंड़ के ऊन से बनाया जाता है। एक समय था जब खादी एवं ग्रामोद्योग विभाग भी पट्टू की बुनाई के लिए बुनकरों को प्रोत्साहन दिया करता था। दूसरी तरफ जैसलमेर के लोकजीवन में भी इसका विशेष महत्व हुआ करता था। विशेष अवसरों जैसे शादी ब्याह इत्यादि में मेहमानों को पट्टू ओढ़वा कर उनका सम्मान किया जाता था। जैसलमेर का मुख्य व्यावसाय पशुपालन है। यहां लगभग 9 लाख भेड़ें हैं। एक भेंड़ पर एक साल में यदि एक किलोग्राम ऊन पैदा हो तो 9 लाख किलोग्राम ऊन का उत्पादन हो सकता है। जिला सूचना अधिकारी शंभू दान रतनू के मुताबिक पहले जब खादी की गतिविधियां अपने चरम पर थी तो उस दौरान करीब 15 हजार कतीने हुआ करते थे। जबकि बुनकरों की संख्या 15 सौ थी, जो इन कतीनों को बुनते थे। खिड़या पर पट्टू की बुनाई होती थी। पट्टू के विविध प्रकार होते हैं। हीरावल पट्टू अपनी डिजाईन मजबूती के लिए जाना जाता था। विभिन्न अवसरों पर अलग अलग रंगों के पट्टू का प्रयोग होता था। शादी ब्याह में गुलाबी एवं हरे पट्टू का उपयोग होता था। पट्टू की तरह ही एक अन्य शॉल होती है, जिसे बरडी कहा जाता है। इसके अलावा राजीव शॉल, बंधेज की शॉलें, कसीदाकारी की शॉलों का भी विशेष स्थान रहा है। यहां इन शॉलों को तैयार करके कसीदाकारी के लिए अमृतसर भेजा जाता था। इस तरह से स्थानीय बुनकरों, खादी संस्थाओं और इस कार्य में जुटे अन्य लोगों को करीब 5 करोड़ रुपये की आमदनी हो जाया करती थी। जैसलमेर जैसे मरुप्रदेश में जीवन की कठिन परिस्थितियों के बीच इस तरह की कलाओेंं ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है। यहां राजपूतों में शादी ब्याह की दिक्कत होने के कारण शाटा प्रथा का प्रचलन है। शाटा प्रथा में लड़कियों की अदला बदली की जाती है। अथाZत यदि कोई अपनी बेटी ब्याहता है तो वर पक्ष की ओर से भी बेटी देनी पड़ती है। ऐसे में अक्सर यहां बेमेल विवाह हो जाया करते थे। बेमेल विवाह के कारण कई बार पुरुष की असमय मृत्यु हो जाती थी। पर्दा प्रथा का प्रचलन था, ऐसे समय में महिलाएं घर पर रहकर ही कुछ न कुछ काम करके गुजर बसर करती थी। खड़ी से इन महिलाओं को रोजगार मिल जाया करता था। लेकिन समय के साथ पट्टू अपनी पहचान खोता जा रहा है। मशीनीकरण से बुनकरों और ग्रामीण दस्तकारों के हाथ कट गए हैंं। एक तो अधिक मेहनत के कारण हाथ की बुनाई में समय लगता है तो दूसरी और इसकी कीमत भी इसके कारण बढ़ जाती है। देसी ऊन मोटी होने के कारण थोड़ी चुभती है, समय के साथ इसमें बदलाव नहीं किया जा सका। अब तो पट्टू भी इम्पोटेZड फाईबर्स की बनने लग गई है। लेकिन आज भी ग्रामीण को रोजगार प्रदान करने में इन पारंपरिक कलाओं का कोई सानी नहीं हैं। थोड़ा ही सही लेकिन इस तरह के उद्योगों से लोगों को रोजगार मिलता रहा है और यही शायद यही कारण था कि भारत अपनी ग्रामीण आत्मनिर्भरता के लिए जाना जाता था। लेकिन अंग्रजी शासन के दौरान वे परंपराएं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का चक्र विखंडित हो गया। जिससे हमारे गांंव आज भी उबर नहीं पाए हैं। यही कारण है कि लोगों को अपना घर परिवार छोड़कर रोजी रोटी की तलाश में पलायन करना पड़ता है। घर पर रहने वाली महिलाओं और बच्चों का दबंगों द्वारा शोषण किया जाता है। जबकि घर का पालनकर्ता परदेस में रहकर दो जून की रोटी जुटाने के लिए हर पल जलता रहता है। हमें ग्रामीण अर्थव्यवस्था के उन सूत्रों को तलाशना होगा जिसके कारण हमारे गांव आत्मनिर्भर रहे हैं। और उन्हीं सूत्रों का अनुसरण करते हुए हमें एक बार फिर ग्रामीण अर्थव्यवस्था में प्राण फूंकने की पहल करनी होगी।

Thursday, May 15, 2008



दुनिया का बोझ उठा, बेटे को बनाया सीए


लखनऊ। जिंदगी भर गरीबी का दंश झेलने के बावजूद रज्जाब अली ने हालात के सामने घुटने नहीं टेके। पेशे से कुली रज्जाब ने सारी दुनिया का बोझ उठाने वाले हाथों से अपने बेटे के टूटते सपनों को भी विपरीत परिस्थितियों में सहारा दिया। बेटे ने भी अपने पिता की कुर्बानी का मान रखा और नतीजे में वह तोहफा दिया, जिसे पाकर हर पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो जाए।
कानपुर सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर 55 साल के रज्जाब पिछले 40 साल से कुली का काम कर रहे हैं। वह रेलवे कुली परिषद के कोषाध्यक्ष भी हैं। उनके तीन लड़के और तीन लड़कियां हैं। हर महीने तीन हजार रुपये कमाने वाले रज्जाब ने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा, लेकिन स्टेशन पर जब भी पढ़े-लिखे लोगों को देखते तो बस मन में एक ही ख्याल आता कि काश वह भी अपने बच्चों को इस काबिल बना सकते।
रज्जाब भूखे पेट सोये, लेकिन बच्चों की परवरिश में कोई कमी नहीं आने दी। उन्होंने बड़े बेटे नूरूद्दीन को ग्रेजुएशन करने के लिए अलीगढ़ भेजा। वहां से उसने चार्टर्ड एकाउटेंट (सीए) में अपना कैरियर बनाना चाहा, लेकिन घर के हालात देख मन मसोस कर रह गया। मगर बेटे के अरमान देखकर रज्जाब ने मन में ठान लिया कि वह उसे सीए बनाकर ही दम लेंगे।
नूरुद्दीन ने भी पिता की उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए रात-रात भर मोमबत्ती जलाकर पढ़ाई की। अपनी मेहनत और लगन से उसने सीए की हर परीक्षा पहली बार में ही पास कर ली और सीए बन गया। रज्जाब कहते है कि उनके बेटे ने उनका सपना पूरा कर दिया। पेशे के प्रति ईमानदारी की इससे अच्छी मिसाल और क्या होगी कि बेटे के सीए बन जाने के बाद भी रज्जाब अली ने कुली का काम नहीं छोड़ा है।


Jan 16, 08:५८, साभार:याहू.कॉम

Saturday, May 10, 2008


अभी भी नहीं रुक रहे बाल विवाह
बाल विवाह रोकने की सरकारी कोशिशों, नियमों और क़ानून के बावजूद राजस्थान में इस बार भी आखातीज (अक्षय तृतीया) पर बाल विवाह हुए है.सरकार का कहना है की पहले के मुक़ाबले इस बार बाल विवाह में कमी आई है क्योंकि बाल विवाह की रोकथाम के लिए नया क़ानून बना दिया गया है. सरकार ने अगले तीन साल में बाल विवाह पुरी तरह रोकने का कार्यकर्म बनाया है लेकिन महिला संगठनों का कहना है की जब तक समाज मे लड़कियों को बराबरी का दर्जा नहीं मिलेगा, इसे रोकना मुश्किल होगा. आखातीज पर बैंड-बाजों की गूँज के बीच यूँ तो हज़ारों विवाह हुए मगर उनमें कुछ ऐसे भी थे जो बाली उमर में शादी की डोर में बाँध दिए गए. सरकार ने बाल विवाह रोकने के लिए पुख्ता इंतज़ाम तो किए थे लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों मे कुछ ऐसे इलाके भी है जहाँ न तो क़ानून पहुँचा और न ही जागरूकता। प्रशासन के मुताबिक कोई एक दर्जन मामलों में बाल विवाह होने की सूचना मिली थी. उन्हें रूकवा दिया गया है. पिछले साल क़रीब 700 शिकायतें मिली थीं. इसबार भी राज्य के दूर दराज इलाकों में चोरी-छिपे नौनिहालों को विवाह सूत्र में बाँध दिया गया. कमी तो आई, मगर...महिला एवं बाल कल्याण सचिव अल्का काला के मुताबिक पहले से बाल विवाहों मे कमी आई है. नए क़ानून में जो भी ऐसे विवाह में भाग लेगा या मदद करेगा, उसे सज़ा होगी. मगर उनका कहना था की ये बुराई तभी रुकेगी जब जनचेतना पैदा होगी. महिला कल्याण विभाग में सलाहकार मुक्ता अरोड़ा कहती है, "पिछले एक दशक में हालात बहुत बदले हैं. हम ये नहीं कहते कि बाल विवाह बिल्कुल बंद हो गए हैं मगर अब ऐसा नहीं है कि खुलेआम बच्चों की शादियाँ हो रही हैं." मुक्ता अरोड़ा कहती हैं, "अनेक मामलों में लड़की ख़ुद आगे आईं और बाल विवाह के विरोध मे खड़ी हो गईं. अब उनमें हिम्मत आई है." महिला सचिव अल्का काला कहती हैं कि ऐसी दो लड़कियों को तो राष्ट्रपति ने पुरस्कृत भी किया है. हाल में अजमेर की स्कूली छात्रा ज्योति को जब पता चला की उसकी शादी की जा रही तो उसने अपनी शिक्षिका से गुहार लगाई. ज्योति के घरवाले मान गए हैं और ज्योति को अब पढ़ने का मौका मिलेगा. नए क़ानून में बाल विवाह कराने या उसमें भाग लेने वालों के लिए अधिकतम दो साल की सज़ा और एक लाख तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया है. बहरहाल, नारों और इश्तिहारों में इस बुराई से लड़ा जा रहा है. पर हकीक़त ये है की लोक व्यहार में बेटी को पराया धन समझा जाता है. इसीलिए माँ-बाप कच्ची उमर में उनके हाथ पीले कर देते है. सवाल फिर वहीं है.क्या नया क़ानून इस सामाजिक मान्यता को बदल पाएगा.
शुक्रवार, 09 मई, 2008 को 11:54 GMT तक के समाचारनारायण बारेठ बीबीसी संवाददाता, राजस्थान

Thursday, May 8, 2008

गाँव
लेखक -रोहित
खेत मुझे कभी अपने नहीं लगे सदा एक दूरी बनी रही
जैसे गांवों से जुदा-जुदा रहा पूरी उम्र शहर में जन्म हुआ,परवरिश हुई / शहर की परिधि पर खेत थे
लेकिन, लगातार कम होते जाने को अभिशप्त शहर में गांव वाले ही ज़्यादा थे और उनके बीच भी मैं कैसे शहरी हो गया यह अब भी एक अनसुलझा सवाल बना हुआ है मेरे लिए ऐसा नहीं था कि/ उन्होंने गांवों को उनकी जगह पर ही छोड़ दिया
वे उन्हें शहर लेकर आए थे जितना बसों और रेलगाड़ियों में अंट सकता था / भाषा भी लाए थे वेखरी-खरी, जीवित और जीवंत और पुरानी मकई के कुछ बोरे,ठसक भरी धूप/ घनी हरियाली,जलावन की आग जो ठंड को मज़ेदार बना देती है और सरसों के तेल की तीखी गंध क्यों बेअसर रहा / यह सबकुछ मुझ परइसके कारणों की / कोई शिनाख़्त नहीं हो सकी इन दिनों छपरा, मुजफ़्फ़रपुर / बेगसूराय, समस्तीपुर परभारी पड़ रहा है पटना और पटने पर / भारी पड़ रही है दिल्ली शायद, गांवों के लुप्त होने की कथायहीं से शुरू होती शहरों में छोटे-छोटे गांवों के बनने की भी उतना भी गांव नहीं हैमेरे भीतर जितना मेरे शहर में मौजूद है मुझे गांव जाना है मुझे खेतों को अपना बनाना है़

संपर्क : द्वारा, समकालीन जनमत, मदनधारी भवन, एसपी वर्मा रोड, पटना-800001

Wednesday, May 7, 2008


आज हार गए नया दौर के तांगे वाले
May 03, 12:41 am
बुलंदशहर। जिस तांगे ने बसंती की इज्जत बचाई, नया दौर में जिसने मोटर को मात दी, एक बेसहारे को मर्द तांगेवाला बनाकर जीने का सहारा दिया, उसके सहारे जिंदगी की गाड़ी खींचने वाले तांगे-इक्केवान आज मोटरों की होड़ में थके-हारे नजर आ रहे है। जिन्होंने लगाम अभी भी थाम रखी है, उनके पास या तो कमाई का दूसरा जरिया नहीं है या वे बाप-दादा की विरासत को जिंदा रखने का संकल्प पूरा करने की जद्दोजहद में लगे हुए है।
एक समय था, जब दो सौ से भी ज्यादा तांगे मोतीबाग से काहिरा, मरगूपुर और जालखेड़ा, मचकौली, मुगलपुरा, धीमरी, दोस्तपुर जैस देहात के इलाकों समेत शहर के सभी रूटों पर चलते थे। आज इनकी संख्या सभी रूटों को मिलाकर चार-छह दर्जन है तो, लेकिन स्थिति एकदम पलट गई है। अब वही लोग तांगे पर बैठते है, जिन्हे या तो दूसरा साधन नहीं मिलता या जिनके रूट पर ऑटो नहीं चलते। नया दौर में तो दिलीप कुमार मोटर से आगे निकल गए थे, लेकिन आज इनका मुकाबला तीन सौ से ज्यादा ऑटो, करीब पांच सौ जुगाड़ व दोपहिया-चौपहिया जैसे निजी वाहनों से है। इसलिए आगे निकलने और उनके साथ चलने की बात ही नहीं सोची जा सकती।
तांगे वालों के हालात पर बात करे तो अनूपशहर बस अड्डे से कालाआम तक चलने वाले चिक्सान निवासी हरपाल का दस लोगों से ज्यादा का परिवार है। कूबत न होने से मां-बाप पढ़ा तो पाए नहीं और जब जिम्मेदारी आई तो कमाई के लिए वही पुश्तैनी धंधे घोड़े और लगाम का सहारा दिखा। शुरुआत में तो किसी तरह गाड़ी चलती रही, लेकिन अब आलम यह है कि सौ रुपये से ज्यादा घोड़े के घास और दाने का ही खर्चा आता है। हरपाल कहते है कि आज तांगा ही दस हजार में मिलता है। घोड़ा खरीदना तो और मुश्किल, लिहाजा कई लोग खच्चर से काम चलाते है। खर्चा न निकलने की वजह से इनके गांव के तीस से ज्यादा तांगे वालों ने मजूदरी की राह पकड़ ली।
दूसरा काम न आने, खेती के लिए जमीन और व्यापार के लिए जरिया न होने से तांगे वाले एक तरह से कुंआ खोदकर पानी पी रहे है। इसी के चलते कालाआम चौराहे अनूपशहर अड्डे तक ऑटो प्रति सवारी जहां पांच रुपये लेता है, वहीं तांगे वाले तीन रुपये लेकर सवारियों का जुगाड़ करते है। तीस साल से तांगा हांक रहा सराय निवासी अल्लाह राजी विकलांग है। पांच बेटियों की शादी के लिए पचास हजार का कर्जा लिया था। उसे कैसे चुकाएगा के सवाल पर ऊपर वाले की ओर हाथ उठाता है। राजी कहते है कि किसी-किसी दिन एक ही फेरा लग पाता है और मिलते है मात्र पचास रुपये। ऐसे में क्या खुद खाएं और क्या परिवार वालों को खिलाएं। दिनभर जाड़ा, गर्मी, बरसात सहने के बावजूद कुछ नसीब न होने की वजह से इनके गांव में 50 की जगह आज दो तांगे वाले बचे है। एक तो सवारी नहीं, दूसरे पुलिस वाले अलग डंडा फटकारते है। सामान ढोने का काम अभी जहां-तहां मिल जाता है, लेकिन भार वाहन इसे भी अपना निवाला बना रहे है। तांगेवान सुरेश कहता है कि मेहनत करके भी रोटी मिलने का जरिया छिन जाए तो कैसा सुराज? सरकार कुछ न करे तो कम से कम हम लोगों की रोजी पर लात तो न मारे। कोई रूट तय कर दे, जिससे हमारा गुजर हो सके। बहरहाल, बग्घी और घोड़े कभी शान-शौकत की सवारी मानी जाती थी। मेले-ठेलों और इलाहाबाद आदि कुछ शहरों सावन में घोड़े-तांगों की दौड़ प्रतियोगिता होती थी। अब तो फिल्मों में भी बसंती तांगे वाली और मर्द तांगे वाला नजर नहीं आता। धूल-धक्कड़ से दूर वह सुरक्षित सवारी आज जल्दी की दौड़ में न केवल पीछे छूटती जा रही है, बल्कि तांगे-इक्के की ग्रामीण संस्कृति और उसे जीवित रखने वाले तांगेवानों
की रोजी-रोटी पर भी ग्रहण लग गया है।
साभार : याहू.कॉम

गांधीवाद, गीता दर्शन और गाँधीगीरी
गौर करें तो हम पाएंगे कि पहली नज़र में गांधीवाद हिन्दू धर्म पर आधारित नज़र आता है। गांधी जी का भी कहना था कि उनके सिद्धांत गीता पर बहुत हद तक आधारित हैं। निर्विवाद रूप से गीता आध्यात्मिक साहित्य के महानतम रत्नों में से एक है और हिन्दू धर्म का आधार ग्रंथ है। एक ओर गीता जहां अहिंसा की बात करती है तो दूसरी ओर हिंसा को दूसरी ओर परिस्थितिवष गीता जरूरी भी मानती है। लेकिन गांधीजी ने गीता से केवल अहिंसा का सिद्धांत लेकर बाकी सब कुछ नकारने की चेश्टा की है।गीता की पर दृष्टिपात करने से कहा जा सकता है कि गीता हर हालत में अहिंसा का प्रतिपादन नहीं करती है। अर्जुन तो खुद अहिंसा की बात कर रहा था। लेकिन भगवान कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध के लिए प्रेरित किया। लेकिन गांधी कहते हैं कि महाभारत का युद्ध ऐतिहासिक नहीं, वरन एक आध्यात्मिक घटना है।
महाभारत में मनुष्य की सद्व्रुतियों एवं बुरी वृत्तियों के बीच युद्ध को आलंकारिक तौर पर दर्शाया गया है। ऐसा अगर मान भी लिया जाए तो भी नहीं कहा जा सकता कि गीता में हिंसा निषेध किया गया है।
जहां सत्य और धर्म की रक्षा के लिए अहिंसा कारगर ना हो, वहां हिंसा जायज है। दरअसल गांधी जी का अहिंसा का सिद्धांत वह नहीं है, जो हिन्दू धर्म द्वारा प्रतिपादित है। बल्कि यह सिद्धांत ईसाईयत से उधार लिया गया है। जिन्होंने सत्य के प्रयोग पढ़ी है, वे जानते होंगे कि गांधी जी ईसाईयत से बहुत प्रभावित थे। उन्होंने इंग्लैंड मेें ईसाईयत अपनाने की इच्छा भी जाहिर की थी और बाईबल का विषेश अध्ययन किया। साथ ही उनका पालन पोशण जैन रीति रिवाजों हुआ। हिन्दू धर्म में अहिंसा का सिद्धांत लचीला है। अथाZत् अपरिहार्य कारणों में हिंसा को गलत नहीं माना गया है।
मनुस्मृति में भी कहा गया है कि यदि ब्राम्हण भी आपको ‘ाारीरिक हानि पहुंचाने की मंषा से आए तो उसकी हत्या करना पाप नहीं है। अकर्मण्यता इस उधार के सिद्धांत का सहज फल है। इस तरह कुछ लोगों ने यह भी कहा है कि गांधीवाद का यह सिद्धांत अकर्मण्यता को भी बढ़ावा देता है।
इस विशय पर स्वामी विवेकानंद का कथन उल्लेखनीय है कि ``ईसा मसीह ने यूरोप को सिखाया कि `किसी बैर मत करो, जो तुम्हे गाली दे( उसे आषीर्वाद दो, कोई एक गाल पर थप्पड़ मारे तो दूसरा भी आगे कर दो, सब कामकाजों को त्याग कर परलोक की तैयारी करो।´´
इसके विपरीत गीता ‘ात्रुओं के विनाष और महान उत्साह से काम करने की प्रेरणा देती है। लेकिन ईसा जो चाहते थे, उसका ठीक उल्टा हो गया। यूरोपवासियों ने ईसा मसीह के ‘ाब्दों को ‘ाायद गंभीरतापूर्वक नहीं लिया। सदैव कार्यषील स्वभाव अपनाकर अत्यंत प्रचण्ड रजोगुण से सम्पन्न होकर वे बड़े उत्साह और युवकोचित उत्सुकता के साथ विष्व के विभिन्न देषों के सुख और विलासों को बटोर रहे हैं और मन भर कर उन्हें भोग रहे हैं। हम! हम एक कोने में बैठे, अपने सब साज सामान के साथ दिन रात मृत्यु का ही आन्हान कर रहे हैं और गा रहे हैं-
नलिनिदलगतजलमतितरलंतद्वज्जीवनमतियचपलम्
अथाZत् ``कमलपत्र पर पड़ी हुई जल की बूंदे जितनी चंचल और अस्थिर हैं उतनाही यह मानव जीवन क्षीण और चलायमान है।´´ इस सबका परिणाम हुआ है कि म ृत्युराज यम के भय से हमारी धमनियों का रक्त ठण्डा पड़ जाता है। अब कहो! गीता का उपदेष किसने सुना? यूरोपियनों ने। और ईसा की इच्छानुसार कौन आचरण कर रहे हैंं? भगवान कृश्ण के वंषज। यूरोपवासियों ने ईसा के उन वचनों का परित्याग कर दिया और संतोश की सांस ली। लेकिन हम अन्जाने में आज तक उससे चिपके हुए हैं। इस तरह से देखा जाए तो भारत में एक बार फिर रजोगुण उद्दीप्त हो रहा है और यही कर्माकांक्षा हिन्दू हिन्दू धर्म और गीता का मूल है। ऐसे में गांधीगिरी के ये उपदेष हमें फिर एक बार अकर्मण्यता की ओर धकेल देगें। जिससे निकलने का हम यत्न कर रहे हैं। हालांकि गांधीवाद बिल्कुल बेकार हो, ऐसा नहीं है। लेकिन उसका दायरा बहुत सीमित है और व्यापक तौर पर उसका प्रयोग करना ठीक उसी तरह मूर्खतापूर्ण होगा, जिस तरह से सब्जी काटने के चाकू का इस्तेमाल युद्धक्षेत्र में करना। हिन्दू धर्म के गीता में प्रतिपादित सिद्धांत हर देष-काल कार्य रूप में परिणत किए जा सकते हैं और गांधीगिरी की तरह सीमित नहीं है।
इस तरह कहा जा सकता है कि वर्तमान संदर्भ में गांधीवाद जैसी चीजें कतई कारगर नहीं हो सकतीं पर यदि राजनीति के चरित्र की बात करें तो उस संदर्भ में वाकई आज गांधीवाद मनन करने की आवष्यकता है। गांधीवाद यों भी जीवनषैली नहीं अपितु विचारधारा है। वह कोई हरा नहीं, दिषा प्रदषZक है। मगर रास्ते के पत्थरों एवं गड्ढों का अगर आप ख्याल ना रहें तो दिषा निर्देषक की क्या गलती।

Saturday, May 3, 2008


मरुभूमि में आशा और आस्था की नदी
उमाशंकर मिश्र/सांचौर से लौटकर
नहर में पानी कैसे आता है? इस तरह का सवाल कोई नादान बच्चा ही कर सकता है। लेकिन जालौर जिला राजस्थान की सांचौर तहसील के लोगों ने जब ये सुना की उनके इलाके में नहर का पानी आने वाला है और इससे उनकी रेगिस्तानी धरती लहलहा उठेगी तो जिज्ञासावश लोगों ने इसी तरह के सवाल वहां कार्यरत इंजीनियरों से पूछने शुरु कर दिये। जिससे उन लोगों के भोलेपन का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। साथ ही यह भी पता चलता है कि पानी के नहर जैसे स्रोतों तक के बारे में स्थानीय लोगों में जानकारी का अभाव था। इस तरह मरुभूमि राजस्थान के दूरदराज इलाके में पानी की दुर्लभता और इसके चलते जनजीवन पर पड़ने वाले प्रभाव की कहानी का पता चलता है। कुछ समय पूर्व जब गुजरात के सरदार सरोवर बांध से नर्मदा नहर निकाल कर राजस्थान की प्यासी धरती कोतर की करने की चर्चा छिड़ी थी, तो इस मरुभूमि के निवासियों मे एक नई आस जगने लगी थी। लेकिन अन्य परियोजनाओं की तरह जब लम्बे समय तक कार्ययोजना पर अमल नहीं हो पा रहा था स्थानीय बुजुगोZं की अपनी धरती पर पानी देखने की आस छूटने लगी थी, कुछेक बुजुगोंZं ने तो यहां तक कहना शुरु कर दिया था कि अब शायद मेरे मरने के बाद ही इस नहर में पानी आयेगा।
राजस्थान में 1993 में नर्मदा नहर का काम शुरु किया गया था। सरदार सरोवर बांध से राजस्थान की सीमा तक नर्मदा नहर का 458 किलोमीटर मार्ग तैयार करने के लिए गुजरात सरकार को राजस्थान सरकार की ओर से एक निश्चित राशि का भुगतान करना था। उस समय परियोजना की लागत करीब 467ण्53 करोड़ रुपये आंकी गई थी। इस परियोजना को 2002-2003 में ही पूरा हो जाना था। लेकिन समय पर राशि काभुगतान न हो पाने से परियोजना की लागत बढ़ती चली गई। 2004 में गुजरात सरकार को बकाया 335 करोड़ रुपये की राशि का भुगतान कर दिया गया। जिससे परियोजना के काम में तेजी आई और नतीजा आज इसका पानी राजस्थान के जालौर जिले की सांचौर तहसील के सीलू गांव में पहुंच चुका है। वर्तमान में परियोजना का कार्य पूर्ण गति से चल रहा है और 1975 करोड़ रुपये की संशोधित अनुमानित लागत के साथ इसे 2009-10 में पूर्ण किये जाने की बात कही जा रही है। परियोजना में सतही प्रवाह प्रणाली एवं लिट सिस्टमदोनों का प्रयोग किया गया है। परियोजना में 74 किलोमीटर लम्बी मुख्य नहर एवं 1719 किलोमीटर लम्बी वितरण प्रणाली का निर्माण किया जा रहा है। परियोजना में अब तक मुख्य नहर का काम पूरा हो चुका है। सतही प्रणाली 932 किलोमीटर लम्बी होगी। फिलहाल 535 किलोमीटर लम्बी सतही वितरण प्रणाली और 94 किलोमीटर लम्बी जलोत्थान वितरण प्रणाली का कार्य पूर्ण कर लिया गया है। इस परियोजना से जालौर एवं बाड़मेर जिले के 233 गांवों की 2ण्46 लाख हेक्टेयर भूमि को सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो सकेगी।
सांचौर तहसील के गांव डेड़वा निवासी करीब 60 वषीZय हरिराम बिश्नोई बताते हैं कि उन्होंने बचपन से ही पानी को लेकर इस इलाके में अभाव देखा है, जो आज भी कायम है। वे बताते हैं कि यहां का पानी बहुुत खारा है। पीने का पानी लेने के लिए उन्हें 15 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है अथवा 300 रुपये से लेकर 500 रुपये तक की लागत से टैंकर मंगाया जाता है। इस तरह टैंकर से लाये गये पानी को घर के पास बनाये गये टांके में इकट्ठा कर लिया जाता है। पानी की मात्रा बढ़ जाये इसलिए टैंकर द्वारा लाये गये पानी में कुछ खारा पानी मिलाकर उपयोग किया जाता है। इस तरह एक टैंकर से करीब सप्ताह भर काम चल जाता है। पशुओं का भी वही पानी पिलाया जाता है। अमूमन सभी घरों में इसी तरह की देखने को मिलती है। आज जब महंगाई के जमाने में आटा दाल लोगों केे लिए मुश्किल होता जा रहा है, वहीं यदि पानी के लिए भी इस तरह से कीमत चुकानी पड़ती हो तो परिस्थितियों का अंदाजा स्वत: ही लगाया जा सकता है।
20 बीघे के काश्तकार हरिराम बताते हैं कि खेती हमारे यहां पूरी तरह से वषाZ पर निर्भर है। पानी खारा है इसलिए पम्प सैट से भी सिंचाई नहीं की जा सकती। इस तरह देखा जाय तो सिंचाई न हो पाने से इलाके में कृषि न के बराबर ही देखने को मिलती है। वरुण देव की कृपा हुई तो बाजरा, ग्वार इत्यादि की फसल मिल जाती है। पिछले दो सालों से वषाZ की अनियमितता से वह भी ठीक से नहीं प्राप्त हो सका है। परियोजना अधिकारी आरण्सीण् गुप्ता बताते हैं कि इस जमीन में 10 से 12 फुट नीचे लवणीयता है और यदि सतही सिंचाई की जाती है तो इससे न केवल पानी अधिक व्यय होगा बल्कि जमीन की उपजाऊ शक्ति पूरी तरह से क्षीण हो जाने की संभावना बढ़ जायेगी। इसलिए िस्प्रंकलर सिस्टम पर जोर दिया जा रहा है। इस बात को लोग भी जानते हैं। गुप्ता बताते हैं कि स्थानीय लोग पहले से ही फव्वारा प(ति से सिंचाई करते रहे हैं।
बागचन्द्र बिश्नोई भी करीब 50 बीधे के काश्तकार हैं। लेकिन इतनी जमीन होने के बावजूद सिंचाई की समस्या के चलते उनके खेत प्यासे ही रहे। वे कहते हैं कि यदि कहीं मीठे पानी का कुंआ मिल भी जाता है तो तीन चार महीने बाद नये कुएं की तलाश करनी पड़ती है, क्योंकि उस कुएं का पानी या तो खारा होने लगता है यह फिर सूख जाता है। इसी के चलते इस रेगिस्तानी इलाके में पशुपालन लोगों का मुख्य व्यावसाय रहा है। बकौल बागचंद्र बिश्नोई फसल अच्छी नहीं होने से कभी कभी तो छ: महीने का भी राशन नहीं निकल पाता है। किसानी यहां कोई मायने नहीं रखती थी, ऐसे में लोगों मजदूरी करनी पड़ती थी। लेकिन नहर का पानी आ जाने से अब लोगों की आंखों में एक नई तरह की चमक देखने को मिलती है। उनमें एक आस जगी है। इसी आस के भरोसे अब लोग कहते हैं कि `हम तो कमर कस कर तैयार बैठे हैं, कब पानी मिलना शुरु हो और हम खेती कर सकें।´ पानी मिलने से ज्वार, मोठ और हाईब्रिड बाजरा जैसी तीसरी फसल के बारे मेें भी लोग सोचने लगे हैं। जरा सी उम्मीद दिखाई देने पर मन कितनी ही परिकल्पनाएं गढ़ लेता हैऋ यह सांचौर के लोगों से बतियाने पर साफ झलकता है कि उन्होंने नहर के पानी को लेकर न जाने क्या क्या अपने मन में सोच रखा है।
आरण्सीण् गुप्ता बताते हैं कि जब हम यहां काम करने के लिए आते थे तो लोगों को विश्वास नहीं होता था कि नहर का काम कभी पूरा हो सकेगा। लोग खुंटियां उखाड़ देते थे और हमें भगा देते थे। लेकिन जब लोगों को नहर में पानी आने की खबर मिली तो दूर दूर से आये देखने वालों का तांता लग गया। हर कोई सबसे पहले उस दृश्य को अपनी आंखों में कैद कर लेना चाहता था तो कोई उस पानी को छू लेना चाहता था। जिससे वह वापस जाकर बता सके कि उसने सबसे पहले नहर के पानी को छुआ है। शीतला सप्तमी को रणोदर गांव के मेले में लोगों ने नर्मदा नहर के पानी को चरणामृत की तरह बांटा। मीठी बेरी में ढोल नगाड़ों से तो महिलाओं ने कलश यात्रा निकाल कर नहर का स्वागत किया।
यह अब मात्र नहर नहीं रह गई है इस थोड़े से समय के दौरान ही नर्मदा नहर मरुभूमि के लोगों के बीच आस्था का पर्याय बनती जा रही है। दूल्हा बारात लेकर जाने से पूर्व अब इस आस्था की नदी में नारियल प्रवाहित करना चाहता है, जिससे शुभ कार्य में कोई विष्न न हो। बुजुर्ग कहते हैं कि पहले जब किसी का देहांत हो जाता था तो हम उसे गंगा जी लेकर जाया करते थे और वहां से गंगाजली भर कर लाया करते थे। लेकिन आज वे यह बताते हुए भावुक हो जाते हैं कि गंगा मइया आज उनकी देहरी पर आ गई हैं। सबकी अपनी अपनी मंशाएं हैं। 60 वर्ष की उम्र पार कर चुके भीखाराम कहते हैं कि हमारे यहां तो तीर्थ यहीं आ गया अब हमें गंगा जी जाने की जरूरत नहीं है। किसान नहर के पानी को देखकर अपने लहलहाते हुए खेतों का ख्वाब संजोने लगते हैैैं तो महिलाएं सिर पर गागरी रख कर पानी ढोने की बात को अब भुला देना चाहती हैं। जबकि बच्चे बहते हुए पानी में किल्लोल करना चाहते हैं, छपा-छप खेलना चाहते हैं। यह जीवन से पानी के सरोकार की कहानी है, जो बताती है कि `जल ही जीवन है´।
फव्वारा पद्धति से सिंचाई की क्रांतिकारी पहल

रेगिस्तान में पानी का मोल क्या होता है, यह तो स्थानीय लोग ही समझ सकते हैं। इस बात को ध्यान में रखते हुए नर्मदा नहर के पानी के दक्षतापूर्ण उपयोग की रणनीति तैयार की गई हैऋ जिससे पानी के अपव्यय को रोका जा सके। जल के दक्षतापूर्ण उपयोग हेतु परियोजना में फव्वारा पद्धति के उपयोग को अनिवार्य किया गया है। इस हेतु डििग्गयों के निर्माण एवं प्रत्येक डिग्गी पर पम्प सेट की स्थापना का कार्य परियोजना लागत में सिम्मलित किया गया है। डिग्गी से किसानों के खेत तक पानी पहुंचाने के लिए पारंपरिक जल धोरों के स्थान पर भूमिगत पाईप लाईनें बिछाई जा रही हैंं। इससे पानी की क्षति को रोका जा सकेगा। जिससे सिंचाई क्षेत्र में वृद्धि होगी। अब तक 30 हजार हैक्टेयर भूमि में पाईपलाईन बिछाने का कार्य किया जा चुका है जो सिंचाई के लिए तैयार है। परियोजना में डिग्गी निर्माण, पिम्पंग यूनिट की स्थापना एवं डिग्गी से कृषकों के खेत तक पाईप लाईन बिछाने के कार्य पर 13,500 रुपये प्रति हैक्टेयर की अनुमानित लागत आंकी गई है। कृषकों द्वारा िस्प्रंकलर सैट के माध्यम से अपने खेत में सिंचाई की जायेगी, इसके लिए 50 प्रतिशत खर्च राज्य सरकार द्वारा वहन किया जा रहा है। बिजली की लुका-छिपी का इस कार्यप्रणाली पर प्रभाव न पड़े इसके लिए परियोजना क्षेत्र में बिजली की विशिष्ट लाईनों का जाल भी बिछाया गया है। मुख्य परियोजना अधिकारी एन आर राय के मुताबिक यह भारत ही नहीं अपितु दुनिया का इतने बड़े पैमाने पर शुरु किया जाने वाला िस्प्रंकलर सिस्टम होगा।