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Wednesday, July 2, 2008

नहीं है सलवा जुडूम जैसा जनविरोध : महेंद्र कर्मा


महेन्द्र कर्मा छत्तीसगढ़ में विपक्ष के नेता हैं, लेकिन कर्मा को आज हजारों आदिवासियों द्वारा नक्सलियों के खिलाफ छेडे गए जन-आन्दोलन सलवा जुडूम के अगुआ के नाते अधिक जाना जाता है। कांग्रेस और भाजपा की लडाई से इतर नक्सवाद जैसे जनमुद्दों पर सरकार के दृष्टिकोण की हाँ में हाँ मिलाने वाले कर्मा; सरकार की कुछ नीतियों से असंतुष्ट भी हैं। वे कहते हैं की सरकार में इच्छाशक्ति की कमी है। हाल ही में रायपुर में उनसे मिलने का अवसर प्राप्त हुआ तो सलवा जुडूम को लेकर उनसे काफ़ी बातचीत हुई...प्रस्तुत है कुछ अंश ......


सलवा जुडूम एक प्रतिबद्ध नाम है जो बुनियादी तौर पर आतंकवाद का विरोध करता है। उसके सिर्फ एक पहलू को दिखाने की कोशिश की गई है। नक्सलवाद आज हर जगह फैल रहा है, सभी राज्य इससे इससे ग्रसित हैं, लेकिन इसका जनविरोध कहां है? यह जानते हुए कि इसका अंतिम दुश्मन लोकतंत्र है इसके खिलाफ आखिर क्यों हम नैतिक साहस नहीं जुटा पाते हैं? अगर नक्सलवाद इसी तरह से फैलता रहा तो लोकतंत्र को बचाना मुश्किल हो जाएगा। सलवा जुडूम आंदोलन आदिवासियों की नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई भर नहीं है, बल्कि यह नक्सली बनाम लोकतंत्र की लड़ाई है। इस देश के नेता जो व्यवस्था के लिए बड़ी बड़ी बातें करते हैं आज वह प्रजातांत्रिक व्यवस्था नक्सलवाद के कारण ख़तरे में है। यह किसी राज्य की समस्या नहीं है। देश के 13 राज्यों के 165 जिलों में फैल चुका रेड कॉरीडोर आज राष्ट्रीय समस्या बन चुका है। लेकिन यह विडंबना है कि आज आदिवासियों द्वारा नक्सलियों के खिलाफ अपने हक के लिए छेड़े गए आंदोलन को सच मानने के लिए कोई तैयार नहीं है। आदिवासी नैसर्गिक प्राणी है, वह अपनी परंपरागत एवं प्रशासनिक संस्थाओं से बंधा होता है। नक्सली कहतें हैं कि अपनी परंपरा छोड़कर कामरेड बन जाओ। ऐसे में आदिवासी खुद को कलंगी कटे हुए मुर्गे की तरह महसूस करते हैं। आज जब वही आदिवासी अपनी पहचान, परंपरा एवं संस्कृति को बचाने के लिए उठ खड़े हुए हैं तो नक्सली इस बात को सहन नहीं कर पा रहे हैं। आतंकवाद के खात्मे के लिए जनदबाव का होना बेहद जरूरी है। सलवा जुडूम को लेकर जो आतंक का तांडव आज हो रहा है, वो दर्शाता है कि किसी भी तरह का आतंकवाद जनता से डरता है। इस देश में नक्सलवाद एक जन आंदोलन के विकल्प के रूप में विकसित हुआ था जो आज गन-आंदोलन बनकर उभरा है। ये गन- मूवमेंट चलाने वाले लोग सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ खड़े होकर चुनौति प्रस्तुत करते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि वो सही हैं तो क्या हम गलत हैं? राहत कैम्पों में रह रहे आंदोलनकारियों की हिफाजत सरकार की जिम्मेदारी है। सिर्फ आंदोलनकारियों की ही नहीं बल्कि जो आंदोलन में शामिल नहीं हैं, उनकी भी जिम्मेदारी सरकार की है। नक्सली अगर आगे बढ़ रहे हैं तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है? इस पर भी सोचना होगा कि क्या दंतेवाड़ा मॉडल स्वीकार है अथवा नहींऋ यदि दमन चक्र में आदिवासियों का आंदोलन खत्म हुआ तो यह एक दुर्भाग्य होगा। अब प्रो-नक्सल एनजीओ गोलबंद हो रहे हैं, जो समस्या को और भी जटिल बनाने में जुटे हैं। नक्सलवादियों का वर्ग चरित्र और उनके जो आम दुुश्मन, हैं वो तो बड़े पूंजीपति, शोषक वर्ग है, लेकिन उनकी लड़ाई लंगोटी वाले आदिवासी से क्यों हो रही है। आखिर वे किसके लिए व्यवस्था परिवर्तन चाहते हैं। आज कम्युनिस्ट भी कह रहे हैं कि नक्सली जनविरोध के कारण हिंसक हो रहेहैं तो ऐसे में सवाल उठता है कि उनका मूल चरित्र क्या है? आदिवासियों की हर यात्रा में मैं पहले नंण् पर था, तो नक्सली मेरे ऊपर क्यों नहीं आरोप लगाते। मैने किसी अराजक भीड़ का नेतृत्व नहीं किया है, सलवा जुडूम एक अहिंसक आंदोलन है जिसे बदनाम किया गया है। कई बार सवाल उठता है कि नक्सलियों की मांगे क्या हैं? इस पर कर्मा कहते हैं कि वे कोई मांग नहीं करते, उन्हें विकास से कोई लेना देना नहीं है, वे तो क्रांति के माध्यम से सत्ता की हवस में ईंधन के तौर पर लोगों का इस्तेमाल कर रहे हैं। दोरनापाल में 40-45 घरों को आग लगा दी गई। ये सब नक्सलियों द्वारा किसी बड़ी लड़ाई के बायप्राड्क्टस हैं। आज आदिवासियों के मेले, मंडई, बाजार, गांव सब नक्सलवाद की भेंट चढ़ते जा रहे हैं। दूसरी बात जो नक्सलियों के लिए सिरदर्द बनी हुई है, वो है एसपीओ। एसपीओ सलवा जुडूम का हिस्सा नहीं है। वह तो सलवा जुडूम को मुख्यधारा में लाने का काम करता है और नक्सलियों के नेटवर्क को तोड़ता है। एसपीओ शु( रूप से गांव का लड़का है, जिसके बाप, भाई को मारा गया है, बहन की इज्जत लूटी गई हैऋ इसलिए नक्सलियों के खिलाफ उसमें जो अक्रामकता है वह किसी में नहीं है। एसपीओ प्रशासनिक व्यवस्था का एक अंग है, एक सैनिक है। जबकि सलवा जुडूम से जुड़े लोग आम आदिवासी हैं। यह कहा जाना गलत है कि एसपीओ को हथियार थमा दिये गए हैं। वैसे भी वह सरकार के पे-रोल पर है। अगर पुलिस को हथियार नहीं देगें तो क्या दिया जाएगा? इस समस्या से निपटने के लिए सरकार बस सोचती रहती है, किया कुछ नहीं जाता है। हम लोग समस्याओं के निदान की बजाय उसकी व्याख्या पर ज्यादा समय खर्च करते हैं। किसी समस्या से निपटने के लिए आपको मैदान में जाकर उसका सामना करना होगा, उससे निपटने की तकनीक और तरीका मैदान में मिलेगा, बंद कमरे में नहीं। आज सरकार और विपक्ष के बीच संवादहीनता की स्थिति आज पूरे देश में घातक बनती जा रही है। मुद्दों पर साझी आम सहमती कायम करके समस्याओं के निदान की जो शैली रही है, उसे हम पीछे छोड़ आए हैं।

1 comment:

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