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Friday, March 27, 2009

गांव में ही हो उच्च शिक्षा की व्यवस्था


संगीता शुक्ला
गुजरात को विकासोन्मुख राज्यों की श्रेणी में अग्रणी माना जाता है और राज्य के विकास में एक महत्वपूर्ण कारक गुजरातियों की विकासोन्मुख सोच भी है। गावों में उच्च शिक्षा संस्थानों की स्थापना की मांग गुजरातियों की इसी विकासात्मक सोच का परिचायक कही जा सकती है।
पंद्रहवीं लोकसभा के लिए चुनाव की उल्टी गिनती शुरु हो गई है। अब चंद दिनों बाद ही चुनाव प्रक्रिया भी शुरु हो जायेगी और नई लोकसभा का गठन होगा। नई लोकसभा का ताज किसके सर पर होगा यह कहना मुश्किल है लेकिन आजकल यह देखा जा रहा है कि सभी पार्टिया अपना पूरा जोर लगा रही है। शहरों में तो चुनावी माहौल चारों ओर दिख ही रहा है लेकिन गांवों में भी इन दिनों नेताओ की आवाजाही बढ गई है और गांव की जरुरतो पर खास ध्यान दिया जाता है। क्या उनके द्वारा दिये गये वचनो का पालन चुनाव जीतने के बाद होता है? या फिर नेताओं को जितनी फिक्र चुनाव से पहले गांव की होती है उतनी ही बाद में भी...गांवों के विकास की ओर सरकार क्या रुख अपनाती है इन्ही चंद सवालो का उत्तर जानने के लिए सोपान ने गुजरात के कच्छ, सौराष्ट्र और मध्य तथा उत्तर गुजरात के कुछ गांवो की मुलाकात ली और जाना कि गांवो के लोगों की क्या अपेक्षाएं है।
सबसे पहले सोपान ने कच्छ की मुलाकात ली और वहां के माहौल के बारे में हाजीभाई से बात की। हाजीभाई की उम्र 33 साल है और वे लोन्ड्री और बांधणी बनाने का धंधा करते हैं। जब हमने उनसे पूछा की आज देश में चारों ओर आर्थिक संकट छाया हुआ है तो इसकी असर क्या उनके धंधे पर भी हुई है? इसके जवाब में उन्होंने बताया कि हां, जरुर हुई है क्योंकि बांधणी बनाने के लिए जो कपडा वे खरीदते है वह महंगा हो गया है और साथ ही बाजार में अन्य चीजों की किंमते भी बढी है जिससे उन्हें आर्थिक संकट का सामना करना पडता है। चुनावी माहौल के बारे में पूछने पर उन्होंने बताया कि गुजरात की मौजुदा सरकार से वे खुश है क्योंकि इसके चलते उनके गांव का काफि विकास हुआ है और अब बिजली-पानी की किल्लत का सामना उन्हें बिल्कुल भी नहीं करना पडता है। जब हमने उनसे पूछा कि वे मतदान किस आधार पर करेंगें जाति या विकास ? तो उन्होंने बताया कि वे जातपात में नहीं मानते उन्हें केवल विकास चाहिये। नई सरकार से उनकी क्या अपेक्षाएं हैं इसके उत्तर मैं उन्होंने बताया कि यहां शिक्षा जरा कमजोर है इसलिए यदि नई सरकार शिक्षा की ओर अधिक ध्यान देगी तो उन्हें अच्छा लगेगा।
कच्छ-भुज विस्तार से ही हमने हीनाबेन पोनल से भी बातचीत की। हीनाबेन का वहां फोटोग्राफी और विडियोग्राफी का स्टुडियो है। हीनाबेन ने हमें बताया कि 26 जनवरी 2001 को कच्छ में भयंकर भूकंप आने से सारा शहर तबाह हो गया था लेकिन सरकार तथा अन्य सेवा संस्थाओं की मदद से आज कच्छ का नवनिर्माण हुआ है और अब कच्छ के हरेक व्यक्ति के पास अपना मकान और रोजगार है, जिससे कच्छवासी काफि खुश है। मतदान किस आधार पर करेंगे ऐसा पूछने पर उन्होंने बताया कि हम विकास को और जो उम्मीदवार उनके विस्तार से खडा रहेगा उसकी काबिलियत को ध्यान में रखकर ही मतदान करेंगे किसी जाति या पक्ष को ध्यान में रखकर नहीं।
कच्छ के बाद राजकोट के विडनगर गांव के रसिकभाई प्रागजीभाई रुपारेल मूंगफली और पपीते की खेती करते हैं। उन्होंने हमें बताया की गुजरात सरकार की "ज्योतिग्राम योजना" से उन्हें बहुत लाभ हुआ है। खेती के लिए बिजली-पानी भरपूर मिलता है। गांव का भी विकास हुआ है और पक्की सडके, मकान बनाये गये है। उन्होंने बताया कि चुनाव नजदीक आते ही गांव में सांसदो का आनाजाना बढ जाता है और इन दिनों वे खास हमारा हालचाल जानने आते हैं, फिर चाहे वे पांच साल तक अपनी शक्ल भी न दिखाये। खैर, इन दिनों दिये गये वचनों का वे कितना पालन करते हैं इसके जवाब में उन्होंने बताया कि 50% वचन पूरे किये जाते है। राष्ट्रीय पक्षो से उनकी क्या अपेक्षा हैं? इसके जवाब में उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय पक्ष यदि एकजुट होकर काम करेंगे तभी देश का विकास हो सकेगा। मौजुदा राज्य सरकार से वे खुश है क्योंकि वास्तव में गांव का विकास हुआ है। नई सरकार से उनकी अपेक्षाओं के बारे में वे बताते हैं कि उनके गांव में 12 कक्षा तक स्कूल तो है लेकिन कोलेज की व्यवस्था नहीं हैं जिससे बच्चो को उच्च शिक्षा के लिए राजकोट शहर तक जाना पडता है। यदि गांव में ही उच्च शिक्षा की सुविधा मिल जाय तो बच्चो को आसानी रहेगी।
राजकोट शहर के ही एक अन्य गांव लाखावाड में भी हम गये। वहां एक बेरोजगार युवक रणजीतभाई मेर से हमने बातचीत की। रणजीतभाई की उम्र 22 वर्ष है और वे 10वीं पास है। उच्च शिक्षा नहीं ली क्योंकि गांव में सुविधा न थी और वे शहर जाना नहीं चाहते थे। उनके पिताजी कपास व मूंगफली की खेती करते है। रणजीतभाई ने हमें बताया कि वे खेती काम में ही पिताजी की मदद करते हैं क्योंकि नोकरी उन्हें मिल नहीं सकती। मतदान किस आधार पर करेंगे? इसके उत्तर में उन्होंने बताया कि वे उम्मीदवार को ही देखते हैं फिर वो किसी भी पक्ष या जाति का क्यों न हो इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पडता। बस, उम्मीदवार की नीयत उनके गांव का विकास करने की होनी चाहिये। पिछले पांच वर्षो में लाखावाड गांव में काफि विकास हुआ है।
आणंद जिल्ले के अदाण गांव के कल्पेशभाई मनुभाई पटेल की उम्र 36 वर्ष है और वे एग्रीकल्चर व फर्टीलाईझर मेन्युफेक्चरींग का काम करते हैं। उन्होंने बताया कि उनके गांव में कुछ लोग है जो जातिवाद को प्रोत्साहन देते हैं लेकिन वे उनमें नहीं हैं। राज्य सरकार ने उनके गांव का अच्छा विकास किया है। केन्द्र सरकार से उनकी अपेक्षा हैं कि किसी भी अंगुठा छाप व्यक्ति को कोई भी उच्च पद नहीं देना चाहिये। देश की कमान उन्हीं के हाथो सोंपनी चाहिये जो दूरदृष्टि रखता हों।
आणंद जिल्ले के ही पीपलाव गांव की एक गृहिणी प्रेमिलाबेन फूनाभाई पटेल की उम्र 56 वर्ष हैं और वे अच्छी तरह जानती हैं कि वोट किसे देना चाहिये क्योंकि वे अनुभवी हैं। उनके पति खेती का व्यवसाय करते हैं और उनकी एक बेटी अमेरिका में हैं जिससे वे मोबाइल से बात करती है। प्रेमिलाबेन ने बताया कि गांवों में मोबाइल आ जाने से उन्हें काफि सुविधा हो गई है। गांव के विकास से और मौजुदा राज्य सरकार से वे खुश है। उन्होंने बताया कि यदि सरकार इसी प्रकार उनके गांव का विकास करती रहेंगी तो उन्हें उनसे कोई शिकायत नहीं है।
गुजरात गांवों का वास्तव में विकास हुआ हैं और वहां की प्रजा भी विकास से खुश है। भविष्य में भी वे यही चाहते है कि सत्ता की बागडोर उसे ही सोंपी जाय तो पढा-लिखा हो, जिसमें दूरदृष्टि हो, देश सेवा ही जिसका धर्म हो। वह देश विकास को ध्यान में रखे न कि स्वविकास को। गुजरात के आज सभी गांव में मोबाइल क्रांति आ चुकी है जिससे लोगों की नजदिकीयां बढी है। जातिवाद या ज्ञातिवाद को वे बिल्कुल भी महत्व देना नहीं चाहते हैं। गांववासियो की महत्वकांक्षाएं तो हमने देखी अब देखना यह है कि उनकी इन अपेक्षाओं पर कौन-कौन खरा उतरता है और सत्ता की बागडोर किसके हाथों में जाती है।
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Thursday, March 5, 2009

सूदखोर महाजनों के चंगुल में संताल परगना

- ग्‍लैडसन की विशेष रिपोर्ट -
दिशोम गुरू शिबू सोरेन और महाजनों का नाम संताल परगना के इतिहास में एक साथ विराजमान होगा। यह इसलिए कि यही महाजन सुदखोरों के खिलाफ लडते हुए गुरूजी ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत की थी और अंततः दो बार झारखण्ड की राजगद्दी पर बैठे। लेकिन चिंताजनक बात यह है कि आज भी महाजनी प्रथा संताल परगना में हावी है। यहां के संताल और पहाडया आदिवासियों को महाजनी प्रथा से मुक्ति नहीं मिली। आज आलम यह है कि आदिवासियों का एक भी गांव महाजनी प्रथा से मुक्त नहीं है और आदिवासी लोग मानसिक रूप से महाजनी प्रथा के गुलाम बन चुके हैं।
झारखण्ड के पाकुड जिलार्न्तगत महेशपुर प्रखण्ड स्थित दुमदुमी निवासी ४६ वर्शीय मारथा मूर्मु अपने गांव के ही महाजन से वर्श २००२ में ४ क्विंटल धान डेढाईया याने वार्शिक ५० प्रतिशत ब्याज के दर पर ली थी। मूलधन चुकाने के बाद भी आज कर्ज के रूप में उसे ३ क्विंटल धान महाजन को देना है। इसी तरह सुन्दर पहाडी प्रखण्ड के सोनाधोनी निवासी २० वर्शीय सुन्दरा पहाडया कर्ज में डूबकर अपनी मां के चंदी का जेवर के साथ अपना सबकुछ महाजन को सौंप चुका है। मारथा और सुन्दरा संताल परगना के प्रत्येक आदिवासी गाँव में विराजमान हैं। लेकिन कोई इसके खिलाफ बोलने को भी तैयार नहीं हैं।
दूसरी ओर महाजनों की चांदी है। महेशपुर प्रखण्ड के चक्काधर निवासी महाजन रामजी भगत महेशपुर एवं पाकुडया प्रखण्ड को अपने कब्जे में रखते हैं। वे प्रतिवर्श दो सौ क्विंटल धान कर्ज में लगाते ह। उनकी कई बैलगाडयां चलती हैं, जो मुख्यता कर्ज वसूली के समय धान की ढुलाई के लिए है। संताल परगना में इनके तरह कई महाजन मिलेंगे जो लोटा और लाठी लेकर गांवों में घुसे थे लेकिन महाजनी प्रथा ने उन्हें गांवों का सबसे ताकतवर व्यक्ति बना दिया है। आजकल महाजनी प्रथा में एक नया बदलाव देखने को मिल रहा है। दिक्कू महाजनों के खिलाफ लडने वाले कुछ आदिवासी भी उनका नकाल करते हुए सूदखोर महाजन बन गये हैं। महेशपुर प्रखण्ड के नोनबट्टा निवासी एस० किश्कू उनमें से एक हैं। वे प्रतिवर्श १०० क्विंटल धान कर्ज में लगाते हैं, जिससे उन्हें ५० क्विंटल मुनाफा मिलता है। इसके अलावा पैसा लगाते हैं वह अलग है।
यहां तीन तरह की महाजनी चलती है। इसमें ’’डेढाईया‘‘ सबसे ज्यादा प्रचलित है, जिसके तहत कर्ज का ब्याज ५० प्रतिशत प्रतिवर्श निर्धारित है। इसमें ज्यादातर अजान ही कर्ज में दिया जाता है। लेकिन खास बात यह है कि अगर कोई अपना कर्ज एक महिने के अन्दर भी चुकाना चाहता है तो उसे ५० प्रतिशत ब्याज देना पडेगा और अगर कोई एक साल बाद कर्ज नहीं चुका पाता है तो ब्याज अगले वर्श मूलधन में परिवर्तित हो जाता है। इसमें दूसरा है ’’सोटा‘‘ जिसमें व्याज सप्ताहिक १० प्रतिशत है। याने प्रतिमाह ४० प्रतिशत और वार्शिक ४८० प्रतिशत, जिसके तहत कर्ज में सिर्फ पैसा ही लगाया जाता है। महाजनी का तिसरा रूप ’’बानकी‘‘ कहलाता है, जो सबसे खतरनाक है। इसके तहत कर्ज के बदले महाजन के पास जेवर, जमीन व मवेशी रखा जाता है। इसमें सबसे मजेदार बात यह है कि जेवर, जमीन व मवेशी का कीमत सही मूल्य से ४०० फिसदी कम निर्धारित होता है तथा निर्धारित समय पर कर्ज वापस नहीं करने की स्थिति में जेवर, जमीन व मवेशी महाजन का हो जाता है। अधिकांश मामलों में कर्ज वापस नहीं होता है। इस तरह से समाज का एक बडा तबका कर्ज का जीवन जीता है और महाजन इसका लाभ उठाते ह तथा सत्ता सिर्फ मूकदर्शक बना रहता है।
ऐतिहासिक रूप से देखें तो संताल परगना बाबा मिलका मांझी एवं सिदो-कान्हो द्वारा अन्याय के खिलाफ विद्रोह हेतु प्रसिद्ध है। इस धरती ने महाजनों के खिलाफ लडने वाले शिबू सोरेन के अलावा साईमन मरांडी, थोमस हांसदा, स्टेफन मरांडी, हेमलाल मुर्मू जैसे कदावर नेता पैदा किया। लेकिन इन नेताओं ने सत्ता में रहते हुए महाजनी प्रथा के खिलाफ कोई ठोस कदम नहीं उठाया और न ही कोई कानून बनाया। फलस्वरूप महाजनी प्रथा संताल परगना के संस्कृति का हिस्सा बन गया है। यहां के लोग महाजनों को अपना दुःख का साथी मान बैठे हैं। सामाजिक कार्यकर्ता मनोज किश्कू कहते हैं कि जागरूकता का अभाव एवं बैंकों से लोन लेने हेतु कागजी दावपेंच लोगों को जरूरत के समय महाजनों के पास जाने हेतु मजबूर कर देता है।
संताल परगना में एन०जी०ओ० का भी भरमार है, जो लाखों रूपये का परियोजना प्राप्त करने हेतु महाजनी प्रथा के खिलाफ बडी-बडी बातें करते हैं। लेकिन वास्ताव में ये एन०जी०ओ० वृक्षारोपन, शौचालय निर्माण एवं सफाई जैसे परियोजनाओं की ठेकेदारी करते हैं। साथ ही साथ एन०जी०ओ० कार्यकर्ता गांवों में डियूटी बजाने का ही काम करते ह। उनके पास महाजनी प्रथा से ग्रामीणों को मुक्ति दिलाने की कोई ठोस योजना नहीं है। जबकि एक-एक गांव में कई एन०जी०ओ० कार्यरत हैं। उनमें एक बदलाव जरूर दिखाई देता है कि कभी साईकिल से चलने वाले एन०जी०ओ० कार्यकर्ता अब मोटर साईकिल और चार पहिया में घुमते हैं।
सबसे बडा सवाल यह है कि क्या दिशोम गुरू शिबू सोरेन महाजनी प्रथा को भूल गये या वोट की राजनीति के चलते सूदखोर महाजन ही उनके अपने हो गये? क्या महाजनी प्रथा से मुक्ति के बगैर संताल परगना का भला होगा? क्या गरीबों का खून चूसने वाले महाजनों के खिलाफ सत्ताधीश लोगों की नींद कभी खूलेगी? क्या संताल परगना को महाजनी प्रथा से कभी मुक्ति मिलेगी?
- ग्‍लैडसन डुंगडुंग एक स्‍वतंत्र पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं। - (साभार : न्यूजविंग.कॉम)

Sunday, March 1, 2009

कश्मीरी पण्डित चाहते हैं पृथक होमलैण्ड

उमाशंकर मिश्र/जम्मू
पेशे से अध्यापक मनोज कुमार कौल बताते हैं कि हम `छोटा लंदन´ के नाम से विख्यात सोपोर के रहने वाले हैं, लेकिन आज नरक में रहना पड़ रहा है। वहां का वातावरण ही ऐसा था कि अन्य किसी परिवेश में जाकर वहां के लोगों का जीवन यापन आसान नही था, जलवायु परिवर्तन का भी असर देखने को मिला। यहां गर्मी थी, लेकिन पैसा नहीं थी कि एक पंखा खरीद सकें। वे बताते हैं कि पिताजी घर छूटने के सदमे को बर्दाश्त नहीं कर सके और चल बसे, उन्होंने बड़ी गरीबी में एक-एक पाई जोड़कर घर बनाया था। वे आगे कहते हैं कि "मैं सरकारी नौकरी में था, लेकिन लम्बे समय तक मुझे सिर्फ बेसिक वेतन ही मिलता रहा, जबकि कश्मीर में सरकारी नौकरियां छोड़कर आए विस्थापित पंडितों के रिक्त पदों पर अब अन्य लोग काबिज हो गए हैं।" मनोज कहते हैं कि हम वोट बैंक नहीं हैं न, इसलिए सरकार हमारी नहीं सुनती। वे बताते हैं कि विस्थापन के करीब दो दशकों के दौरान हमारे समुदाय के एक भी बच्चे को प्रतिभशाली होने के बावजूद सरकारी नौकरी नहीं मिली है। हालांकि मनोज जैसे कुछ लोग पहले से ही सरकारी नौकररियों में थे तनख्वाह तो पूरी नहीं मिलती थी, गुजारा जैसे तैसे चलता रहा। बाद में वेतन में कुछ सुधार भी हुआ और इन्होंने कबूतरखाने को अपने तरीके से परिवार की जरूरतों के मुताबिक ढाल लिया है। लेकिन इन शिविरों में रहने वाले सभी लोगों के साथ ऐसा नहीं है। बकौल मनोज इतने पर भी हमारे सिर पर तलवार लटकती रहती है, हमारे पास अपनी कोई प्रोपर्टी नहीं रही है और सरकार जब चाहे इस कबूतरखाने से भी हमें बेदखल कर सकती है। वे कहते हैं कि ये जो मरम्मत वगैरह हमने करवाई है इसका कोई मुआवजा तक हमें नहीं मिलेगा, एक आदेश पर सब कुछ छोड़कर जाना पड़ेगा। सतही तौर पर न देखते हुए मानवीय संवेदना के स्तर पर उतर इन लोगों की पीड़ा को समझने की जरूरत है, तभी वास्तविकता का आभास हो सकेगा। 37 वर्षीय तेजकिशन भट्ट 19 साल से शिक्षा विभाग में 600 रुपये वेतन पर वॉचमैन के पद पर हैं, जबकि अभी तक नियमित कर्मचारी नहीं बन सके हैं। तेजकिशन के साथ उनके भाई का परिवार भी रहता है। ऐसे में कैसे गुजर-बसर होती होगी, अंदाजा लगाया जा सकता है। अनंतनाग निवासी तेजकिशन बताते हैं कि गांव में उनका मकान, जमीन, बाग बगीचा सब खत्म हो गया है। आगे वे कहते हैं कि ``1990 में आतंकवाद बढ़ गया तो हमें अपना घर छोड़ना पड़ गया। पहले तो उधमपुर में 5 सालों तक हमको परिवार सहित टैन्टों में रहना पड़ा। जब बरसात का मौसम आता तो डंडे पकड़कर न जाने कितनी ही रातें हमने काटी हैं। बहुत से लोगों की मौत तो सांप और बिच्छुओं के ज़हर से हो गई। 1995 में बट्टर वालियां में हमें एक कमरा मिला था, बाद में हम जम्मू आ गए और तबसे यहीं रह रहे हैं।´´ तेजकिशन बताते हैं कि युवाओं का तो अब कोई भविष्य ही नहीं रह गया है। मां-बाप जैसे तैसे करके बच्चों को पढ़ाते हैं, लेकिन नौकरी के लिए कोई फार्म ही स्वीकार नहीं होता है। विस्थापितों के लिए कोई कोटा नहीं है, जबकि सरकार को हालातों की पूरी जानकारी है। तेजकिशन अपने किसी संबंधी के बेटे वीर जी भट्ट का हवाला देते हुए बताते हैं कि उसका चयन टीचर के लिए हुआ था और वह इंटरव्यू के लिए श्रीनगर गया था, लेकिन वहां से वीर जी भट्ट जिंदा लौटकर नहीं आया। डॉ चौधरी कहते हैं- 'इन हालातों में तो बस हम यही कह सकते हैं कि हम अपना संघर्ष जारी रखेंगे, आयरलैंड और इस्राईल की मिसाल देते हुए डॉ. चौधरी कहते हैं कि जब कश्मीर का फैसला हो जाएगा तो कश्मीरी पंडितों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे यहां के मूल निवासी हैं।'
गुग्लुसा गांव, कुपवाड़ा के निवासी प्रेमनाथ भट्ट कहते हैं कि `राहत शिविर असल में हमारे गुजारे की जगह नहीं हो सकती, हमें तो कश्मीर में अपनी जमीन मिल जाती तो बेहतर होता।´ प्रेमनाथ के तीन बच्चे हैं जो अभी पढ़ रहे हैं, जबकि भाई के बच्चे ओवर-एज हो गए हैं और उन्हें नौकरी नहीं मिल सकी है। प्रेमनाथ बताते हैं कि `बच्चे खुद को नफ़रत भरी नजरों से देखते हैं। बच्चों के भविष्य की ओर देखते हैं तो लगता है कि सब खत्म हो गया है, कहीं खुदकुशी न करनी पड़े।´
पंडिता बताते हैं कि यहां कश्मीरी पंडितों का विभिन्न स्तरों पर जितना मानवाधिकार हनन हुआ उतना कहीं नहीं हुआ होगा। वे सवाल उठाते हैं कि क्या भिन्न-भिन्न समुदायों का मानवाधिकार अलग अलग होता है। वे कहते हैं कि `इस भेदभाव के बावजूद भी इस समुदाय के लोगों ने धैर्य नहीं खोया। आर.के. पंडिता कहते हैं कि 20 सालों में किसी कश्मीरी पंडित ने प्रतिशोध में बंदूक नहीं उठाई, क्योंकि इस समुदाय के लोगों ने गन-मूवमेंट की बजाय पेन-मूवमेंट को अधिक तरजीह दी है, लेकिन सरकार हमारी बात नहीं सुनती, वह तो सिर्फ बंदूक के इशारों पर चलती है। यहां तक कि लोगों को प्रशासनिक आतंकवाद का भी सामना करना पड़ा है।´ डॉ. के.एल. चौधरी इस तरह के भेदभाव को अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की नीति बताते हुए कहते हैं कि इससे जातीय भेदभाव को गहराता जा रहा है। हमें सिर्फ इसलिए कश्मीर से बाहर निकाल दिया गया, क्योंकि हम सच्चे भारतीय हैं, जिन्हें एजेंट का नाम दिया जाता है। ये देश के लिए अच्छी बात नहीं है। डॉण् चौधरी मीडिया पर भी सवाल उठाते हैं। वे कहते हैं कि मीडिया स्टोरी-बैंलेस करने के फेर में मुद्दे की बात ही नहीं करता, यह `वन-साइडेड मीडिया´ है। डॉ. चौधरी इस समस्या को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में जोड़कर देखते हैं और सरकार तथा राजनेताओं की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि क्यों चरमपंथ पर सरकार मौन है? आखिर न्यूक्लियर डील मुस्लिम विरोधी कैसे है? यासिन मलिक जैसे लोगों को इंडिया कान्क्लेव में भाषण देने के लिए बुलाने से आखिर लोकतंत्र की क्या गरिमा बचती है? उनसे पूछा जाता है कि आप लोगों कि मांगे क्या हैं? जवाब में वे कहते हैं कि इतने सालों के बाद भी हमें माईग्रेटेड कहा जाता है, जबकि हम लोगों को इंटरनली डिस्पलेस्ड पीपुल्स का दर्जा दिया जाना चाहिए और इसी आधार पर संयुक्त राष्ट्र के मानकों के अनुसार व्यावहार होना चाहिए, क्योंकि माईग्रटेड तो वे लोग कहे जाते हैं जो अपनी इच्छा से रोजी रोटी की तलाश में घर छोड़ते हैं। यहां तो जबरन हम लोगों को निकाला गया है।
सरकार कैम्पों में कुछ राहत देती है, स्कूल और डिस्पैन्सरी भी बनी है और अब तो कुछ फ्लैट भी बन रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कश्मीरी पंडितों के लिए उनकी अपनी जन्मभूमि पर लौटने की संभावनाएं समाप्त की जा रही हैं? डॉ. के.एल. चौधरी इस पर कहते हैं कि यह तो सभी जानते हैं कि ये फ्लैट गिने-चुने लोगों के लिए ही होंगे, क्योंकि इससे समस्या खत्म नहीं होगी। जबकि सरकार को यह कहने का अवसर मिल जाएगा कि कैम्प खत्म अर्थात समस्या भी खत्म और इस तरह से सरकार अपनी जिम्मेदारी को ताक पर रख इस समस्या से हाथ धो लेना चाहती है। मजबूरन लोगों ने अपनी जमीनों को बेचना शुरु कर दिया है।
कश्मीरी पंडितों की मांग है कि कश्मीर में उन्हें भी मुसलमानों के समान ही अधिकार और हमारा हक दिया जाय। ये लोग कश्मीर वापस तो जाना चाहते हैं लेकिन पहले कि तरह बिखर कर नहीं रहना चाहते, बल्कि अब वे वहां पृथक होमलैण्ड की मांग कर रहे हैं जो कि भारत के संविधान तथा केन्द्र के शासनाधीन हो, क्योंकि राज्य सरकार से इन लोगों की आस्था भंग हो चुकी है। डॉ.चौधरी कहते हैं कि सरकार इस पर कभी कोई सकारात्मक जवाब नहीं देती, असल में वह चरमपंथियों से डरती है और कश्मीर में वह मुसलमान चरमपंथियों का सामना करने की हिम्मत नहीं रखती।