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Thursday, March 5, 2009

सूदखोर महाजनों के चंगुल में संताल परगना

- ग्‍लैडसन की विशेष रिपोर्ट -
दिशोम गुरू शिबू सोरेन और महाजनों का नाम संताल परगना के इतिहास में एक साथ विराजमान होगा। यह इसलिए कि यही महाजन सुदखोरों के खिलाफ लडते हुए गुरूजी ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत की थी और अंततः दो बार झारखण्ड की राजगद्दी पर बैठे। लेकिन चिंताजनक बात यह है कि आज भी महाजनी प्रथा संताल परगना में हावी है। यहां के संताल और पहाडया आदिवासियों को महाजनी प्रथा से मुक्ति नहीं मिली। आज आलम यह है कि आदिवासियों का एक भी गांव महाजनी प्रथा से मुक्त नहीं है और आदिवासी लोग मानसिक रूप से महाजनी प्रथा के गुलाम बन चुके हैं।
झारखण्ड के पाकुड जिलार्न्तगत महेशपुर प्रखण्ड स्थित दुमदुमी निवासी ४६ वर्शीय मारथा मूर्मु अपने गांव के ही महाजन से वर्श २००२ में ४ क्विंटल धान डेढाईया याने वार्शिक ५० प्रतिशत ब्याज के दर पर ली थी। मूलधन चुकाने के बाद भी आज कर्ज के रूप में उसे ३ क्विंटल धान महाजन को देना है। इसी तरह सुन्दर पहाडी प्रखण्ड के सोनाधोनी निवासी २० वर्शीय सुन्दरा पहाडया कर्ज में डूबकर अपनी मां के चंदी का जेवर के साथ अपना सबकुछ महाजन को सौंप चुका है। मारथा और सुन्दरा संताल परगना के प्रत्येक आदिवासी गाँव में विराजमान हैं। लेकिन कोई इसके खिलाफ बोलने को भी तैयार नहीं हैं।
दूसरी ओर महाजनों की चांदी है। महेशपुर प्रखण्ड के चक्काधर निवासी महाजन रामजी भगत महेशपुर एवं पाकुडया प्रखण्ड को अपने कब्जे में रखते हैं। वे प्रतिवर्श दो सौ क्विंटल धान कर्ज में लगाते ह। उनकी कई बैलगाडयां चलती हैं, जो मुख्यता कर्ज वसूली के समय धान की ढुलाई के लिए है। संताल परगना में इनके तरह कई महाजन मिलेंगे जो लोटा और लाठी लेकर गांवों में घुसे थे लेकिन महाजनी प्रथा ने उन्हें गांवों का सबसे ताकतवर व्यक्ति बना दिया है। आजकल महाजनी प्रथा में एक नया बदलाव देखने को मिल रहा है। दिक्कू महाजनों के खिलाफ लडने वाले कुछ आदिवासी भी उनका नकाल करते हुए सूदखोर महाजन बन गये हैं। महेशपुर प्रखण्ड के नोनबट्टा निवासी एस० किश्कू उनमें से एक हैं। वे प्रतिवर्श १०० क्विंटल धान कर्ज में लगाते हैं, जिससे उन्हें ५० क्विंटल मुनाफा मिलता है। इसके अलावा पैसा लगाते हैं वह अलग है।
यहां तीन तरह की महाजनी चलती है। इसमें ’’डेढाईया‘‘ सबसे ज्यादा प्रचलित है, जिसके तहत कर्ज का ब्याज ५० प्रतिशत प्रतिवर्श निर्धारित है। इसमें ज्यादातर अजान ही कर्ज में दिया जाता है। लेकिन खास बात यह है कि अगर कोई अपना कर्ज एक महिने के अन्दर भी चुकाना चाहता है तो उसे ५० प्रतिशत ब्याज देना पडेगा और अगर कोई एक साल बाद कर्ज नहीं चुका पाता है तो ब्याज अगले वर्श मूलधन में परिवर्तित हो जाता है। इसमें दूसरा है ’’सोटा‘‘ जिसमें व्याज सप्ताहिक १० प्रतिशत है। याने प्रतिमाह ४० प्रतिशत और वार्शिक ४८० प्रतिशत, जिसके तहत कर्ज में सिर्फ पैसा ही लगाया जाता है। महाजनी का तिसरा रूप ’’बानकी‘‘ कहलाता है, जो सबसे खतरनाक है। इसके तहत कर्ज के बदले महाजन के पास जेवर, जमीन व मवेशी रखा जाता है। इसमें सबसे मजेदार बात यह है कि जेवर, जमीन व मवेशी का कीमत सही मूल्य से ४०० फिसदी कम निर्धारित होता है तथा निर्धारित समय पर कर्ज वापस नहीं करने की स्थिति में जेवर, जमीन व मवेशी महाजन का हो जाता है। अधिकांश मामलों में कर्ज वापस नहीं होता है। इस तरह से समाज का एक बडा तबका कर्ज का जीवन जीता है और महाजन इसका लाभ उठाते ह तथा सत्ता सिर्फ मूकदर्शक बना रहता है।
ऐतिहासिक रूप से देखें तो संताल परगना बाबा मिलका मांझी एवं सिदो-कान्हो द्वारा अन्याय के खिलाफ विद्रोह हेतु प्रसिद्ध है। इस धरती ने महाजनों के खिलाफ लडने वाले शिबू सोरेन के अलावा साईमन मरांडी, थोमस हांसदा, स्टेफन मरांडी, हेमलाल मुर्मू जैसे कदावर नेता पैदा किया। लेकिन इन नेताओं ने सत्ता में रहते हुए महाजनी प्रथा के खिलाफ कोई ठोस कदम नहीं उठाया और न ही कोई कानून बनाया। फलस्वरूप महाजनी प्रथा संताल परगना के संस्कृति का हिस्सा बन गया है। यहां के लोग महाजनों को अपना दुःख का साथी मान बैठे हैं। सामाजिक कार्यकर्ता मनोज किश्कू कहते हैं कि जागरूकता का अभाव एवं बैंकों से लोन लेने हेतु कागजी दावपेंच लोगों को जरूरत के समय महाजनों के पास जाने हेतु मजबूर कर देता है।
संताल परगना में एन०जी०ओ० का भी भरमार है, जो लाखों रूपये का परियोजना प्राप्त करने हेतु महाजनी प्रथा के खिलाफ बडी-बडी बातें करते हैं। लेकिन वास्ताव में ये एन०जी०ओ० वृक्षारोपन, शौचालय निर्माण एवं सफाई जैसे परियोजनाओं की ठेकेदारी करते हैं। साथ ही साथ एन०जी०ओ० कार्यकर्ता गांवों में डियूटी बजाने का ही काम करते ह। उनके पास महाजनी प्रथा से ग्रामीणों को मुक्ति दिलाने की कोई ठोस योजना नहीं है। जबकि एक-एक गांव में कई एन०जी०ओ० कार्यरत हैं। उनमें एक बदलाव जरूर दिखाई देता है कि कभी साईकिल से चलने वाले एन०जी०ओ० कार्यकर्ता अब मोटर साईकिल और चार पहिया में घुमते हैं।
सबसे बडा सवाल यह है कि क्या दिशोम गुरू शिबू सोरेन महाजनी प्रथा को भूल गये या वोट की राजनीति के चलते सूदखोर महाजन ही उनके अपने हो गये? क्या महाजनी प्रथा से मुक्ति के बगैर संताल परगना का भला होगा? क्या गरीबों का खून चूसने वाले महाजनों के खिलाफ सत्ताधीश लोगों की नींद कभी खूलेगी? क्या संताल परगना को महाजनी प्रथा से कभी मुक्ति मिलेगी?
- ग्‍लैडसन डुंगडुंग एक स्‍वतंत्र पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं। - (साभार : न्यूजविंग.कॉम)

1 comment:

amit said...

Kafi Accha blog hai bhai..... gud

All the best.