Monday, April 13, 2009
बेटे की हत्या के बदले में है मां चुनाव मैदान में
यह हैं बसपा के विधायक रहे राजू पाल की मां रानी पाल जो प्रतापगढ़ लोकसभा सीट से निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर अपना दल के उम्मीदवार अतीक अहमद के खिलाफ चुनाव मैदान में हैं। अतीक हैं राजू पाल की हत्या के आरोपी जो अभी तक इलाहाबाद के नैनी जेल में बंद थे और उन्हें रविवार रात लखनऊ जेल भेजा गया है। रानी पाल का मकसद चुनाव जीतना नहीं बल्कि अतीक के हार की जमीन तैयार करना है।
तपती दोपहर, 70 साल की आराम करने की उम्र, आंखों पर चश्मा फिर भी रानी पाल थकती नहीं और हाथ में झाड़ू तथा राजू पाल के कुछ दोस्तों के साथ घर-घर अपने लिए नहीं बल्कि अतीक को वोट नहीं देने की लोगों से गुजारिश कर रही हैं। सुबह होते ही वह राजू के दोस्तों के साथ घर से निकल लेती हैं और फिर किसी घर की कुंडी खटखटा देती हैं। उनकी अपील होती है बस अतीक को वोट मत दो क्योंकि यह मेरे बेटे का हत्यारा है।
रानी पाल कहती हैं मुझे भले ही वोट मत दो लेकिन मेरे बेटे के हत्यारे को भी जीतने मत दो। उनके गले में एक तख्ती भी लटकी रहती है जिसमें उनके बेटे राजू पाल की हत्या का पूरा ब्योरा लिखा है। जनता को सभी कुछ समझा नहीं सकतीं इसलिए गले में लटकी तख्ती आगे कर देती हैं कि लिखे को लोग पढ़े और समझ जाएं।
रानी पाल ने कहा कि यह एक मां के इंतकाम की आग है, जो तब तक नहीं बुझ सकती जब तक अतीक का सब कुछ खत्म नहीं हो जाए। उन्होंनें कहा, वह जब तक जीवित रहेंगी तब तक अतीक जहां से भी चुनाव लड़ेगा उसके सामने मैं होऊंगी।
उन्होंने कहा कि जिस तरह झाडू से घर और सड़क की गंदगी साफ की जाती है उसी तरह वह राज्य और देश को अपराधी से राजनीतिज्ञ बने लोगों से मुक्ति दिलाना चाहती है। यह झाडू सफाई का प्रतीक है और ऐसे लोगों पर मार का भी जो समाज में गंदगी फैला रहे हैं।
राजू पाल इलाहाबाद पश्चिम सीट से 2002 में अतीक अहमद से विधानसभा का चुनाव हार गए थे। अतीक ने समाजवदी पार्टी के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ने के लिए विधानसभा की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया और फूलपुर सीट से सपा के सांसद बन गए। अतीक के त्यागपत्र देने के बाद नवंबर 2004 में हुए उपचुनाव में राजू पाल ने अतीक के भाई अजिज अशरफ को हरा दिया। यह हार ही दोनों की दुश्मनी का कारण हो गया। बाहुबलि अतीक इस हार को बर्दाश्त नहीं कर सके और 26 जनवरी 2005 को राजू पाल की दिन दहाड़े हत्या कर दी गई। राजू अपने साथियों के साथ गणतंत्र दिवस पर होने वाले समारोह में हिस्सा लेने अपने पैतृक गांव जा रहे थे। राजू पाल की चार दिन पहले ही शादी हुई थी। उनकी पत्नी मात्र चार दिन ही सुहागन रह पाई।
राजू पाल की हत्या के बाद हुए उपचुनाव में बसपा ने उनकी पत्नी पूजा पाल को उम्मीदवार बनाया, लेकिन वह जीत नहीं सकीं। विधानसभा के लिए 2007 में हुए चुनाव में पूजा ने अतीक के भाई अजिज को हराया।
अतीक ने लोकसभा में पिछले 22 जुलाई को हुए शक्ति परीक्षण में पार्टी व्हिप का उल्लंघन करते हुए सरकार के खिलाफ मत दिया था इसलिए सपा ने उसकी सदस्यता खत्म कराने का आवेदन किया। फूलपुर के इस सांसद ने बसपा से भी लोकसभा टिकट लेने के लिए जोर लगाया लेकिन पार्टी ने अपने विधायक के हत्यारे को टिकट देने से मना कर दिया। हत्या के बाद से ही अतीक इलाहाबाद के नैनी जेल में बंद हैं और उनकी जमानत नहीं हुई है। रविवार रात उन्हें नैनी जेल से लखनऊ जेल लाया गया है। हत्या के मामले में अदालत का फैसला चाहे जो भी हो लेकिन एक मां अपने बेटे की हत्या का बदला लेने मतदाताओं के पास पहुंच गई है।
साभार: याहू, दैनिक जागरण
Saturday, April 11, 2009
कितने हितकारी होंगे ग्राम न्यायलय
प्रीति पाण्डेय /दिल्ली ग्राम न्यायलय बिल के द्वारा देश भर में करीब 3000 हजार ग्राम न्यायालय स्थापित करने की घोषणा हाल ही में केन्द्रीय मंत्री हंसराज भारद्वाज ने की है। क्या सच में यह बिल गांवों में सुख-शांति का बीज बो पाएगा? गांवों की न्यायिक व्यवस्था की बात चलती है तो `जिसकी लाठी, उसकी भैंस´ की कहावत अनायास ही ध्यान में आ जाती है। ऐसे में गरीब एवं पिछड़े ग्रामीणों को तो दबंगों के सामने आत्मसर्पण करना ही पड़ता है। 2007 में संसद में ग्राम न्यायलय का प्रस्ताव रखा गया, जिसे जनवरी 2009 में मंजूरी दी गईं। कानून पैसे वाले का होता है, सबके मन में पलने वाली इस धारणा पर ग्राम न्यायालय की संकल्पना क्या आशा की नई किरणा जान पड़ती है? क्या है जानकारों की राय और ग्राम न्यायलय गावों के लिए कितने हितकारी होंगे?आईये जानें...
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डॉ युधिष्ठिर शर्मा, न्यायधीश-जिला न्यायालय, गाजियाबाद
`ग्राम न्यायलय योजना´ सरकार द्वारा उठाया गया एक बहुत ही अच्छा कदम है। इससे ग्राम स्तर पर बढ़ रहे अपराधिक मामलों को यकीनन लगाम लगाया जा सकता है। गांवों के लोग अक्सर अन्याय सहते रहते हैं चूंकि उनकी नजर में न्याय का मतलब सालों-साल न्यायलय के चक्कर लगाने पर भी न्याय न मिलने से ही है। पहले गांव के कुछ पंच मिलकर पंचायत बैठाते थे जिसमें न्याय दिया जाता था लेकिन धीरे-धीरे इसका असर कम हो गया क्योंकि ग्राम पंचायतों पर से लोगों का विश्वास कम होता जा रहा था। और लोग न्यायलयों पर भरोसा करने लगे। इसलिए ग्राम न्यायलय का खुलना गांव वासियों को उनके अधिकार के प्रति न्याय दिलाने में एक यंत्र का काम कर सकता है। इससे तीन तरह के लाभ होंगे1. लोगों को उनके घर पर जाकर न्याय दिया जाएगा यानि जसटिस ऑन वील , जसटिस ऑन डोर:- ग्राम न्यायलय की योजना के अन्तर्गत इस बात का खास ध्यान रखा गया है कि प्रत्येक व्यक्ति के लिए न्याय उसके द्वार पर पहुंचे और एक से दो सुनवाई मेंं ही उसे न्याय मिलें।2. इस व्यवस्था से सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसमें न्याय मांगने वाले व्यक्ति का खर्चा कम से कम हो। सीमित साधनों के चलते गांव के लोग आर्थिक तौर पर काफी पिछड़े होते हैं इसीलिए वह न्याय के लिए दस्तक नहीं कर पाते लेकिन ग्राम न्यायलय के द्वारा अब वह कम से कम खर्चे पर न्याय प्राप्त कर सकते हैं। यहां तक की यदि किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिती बहुत ज्यादा खराब है तो सरकार स्वयं उसे सरकारी वकील मुहैया कराएगी और उसका सारा खर्चा सरकार द्वारा ही वहन किया जाएगा।3. ग्राम न्यायलय का तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण लाभ है कि इस व्यवस्था के अन्र्तगत न्याय की गति काफी तीव्र है। गांव के लोगों को न्याय मिलने में सालों नहीं लगेगे बल्कि उन्हें 6 माह के अन्दर ही यानि एक से दो सुनवाई में ही न्याय मिल जाएगा। इस प्रकार ग्राम न्यायलय एक ऐसी खुली अदालत होगी जिसमें प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह कितना ही गरीब क्यों न हो, वह भी न्याय मांगने के लिए जज के सामने खड़ा हो सकता है। वरना आमतौर पर व्यक्ति को अपनी बात जज तक पहुंचाने का मौका ही नहीं मिल पाता। इसलिए यकीनन इस व्यवस्था से गांव के लोगों को बहुत लाभ होगा और उनके छोटे-मोटे मामले गांव में ही सुलझ जाएंगे।
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मनीष सिसोदिया, सामाजिक कार्यकर्ता
(गैर सरकारी संस्था कबीर से सम्बद्ध)
सरकार द्वारा चलाई गई प्रत्येक योजना सफल ही हो ऐसा जरूरी नहीं है। योजनाएं तो लाखों हैं लेकिन उनमें से नाममात्र ही ऐसी होती हैं जो अपने उद्देश्य को पूरा कर पाती हैं। ग्राम न्यायलय बहुत प्रभावित होगा यह कहना मेरे लिए थोड़ा मुश्किल है, हाँ ग्राम न्यायलय गांव के लिए काफी प्रभावित हो सकता है इस बात में कोई अंदेशा नहीं है बशर्ते व्यवस्था सुव्यवस्थित ढंग से की जाएं तो। गांवों के आपसी झगड़ों को गांव के अन्दर ही सुलझाना बरसों से चली आ रही परंपरा रही है। जिसमें ग्राम पंचायत के आधार पर न्याय किया जाता था। यहां तक कि अंग्रेजों ने भी भारतीय ग्राम पंचायत को भारत की रीढ़ की हड्डी कहा है। ग्राम पंचायते जिन्हें पहले सरकार द्वारा मान्यता होती थी कि वह बिना किसी का पक्ष लिए बिना ही निष्पक्ष होकर न्याय करती थी। लेकिन समय के साथ-साथ ग्राम पंचायतों की मान्यता समाप्त होती गई क्योंकि लोगों का इनपर से विश्वास ही उठ गया था। लेकिन सरकार ने ग्राम न्यायलय को भी ग्राम पंचायत के आधार पर ही बनाया है। मेरा मानना है कि एक या दो व्यक्ति को न्यायलय की बागडोर देने से न्यायलय असल में न्याय ही देगा यह कहना थोड़ा मुश्किल है। उस व्यवस्था में जब तक समाज की भागीदारी नहीं और पारदर्शिता नहीं होगी तब तक लोगों को शुद्ध न्याय नहीं मिल सकता । भारी पक्ष से कमजोर पक्ष को दबना ही पडेगा। ग्राम न्यायलय में भागीदार जज और वकील अन्य वकील और जज की तरह रिश्वत नहीं लेते हों इसकी क्या गारंटी? आए-दिन घूसखोरी के मामले सामने आते हैं जिन्हें देखते हुए किस पर भरोसा किया जाए और किस पर नहीं यह कहना थोड़ा मुश्किल है। इसलिए जहां तक मैं समझता हूं ग्राम न्यायलय में ग्राम सभा को ही यह अधिकार दिया जाए कि वह अपने पूरे गांव में से किसी पढ़े-लिखे और समझदार व्यक्ति जिस पर पूरा गांव भरोसा करता हो, उसे ही अपना जज चुनें और ग्राम न्यायलय के द्वारा उस चुने गए जज और पूरे गांव की सहमती के आधार पर ही फैसला हो। यह एक खुला न्यायलय होना चाहिए जहां पूरे जन-समुदाय के सामने मुद्दा रखा जाए और लोगों की राय भी जाननी जाए की उनकी नजर में कौन गलत और कौन सही है। जिस प्रकार भारत जैसे लोकतंत्र देश में जनता से, जनता द्वारा और जनता के लिए नेता को चुना जाता है। उसी प्रकार गांव से गांव द्वारा और गांव के लिए- के आधार पर न्याय किया जाए तो ज्यादा बेहतर रहेगा। एक व्यक्ति को पावर देना गलत है। अपने गांव को और अपने गांव की समस्याओं को जितने अच्छे तरीके से गांव का व्यक्ति सुलझा सकता है, उतना बाहर से आए या सरकार द्वारा भेजे गए जज नहीं।
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शांति भूषण वरिष्ठ अधिवक्ता, उच्चतम न्यायालय
ग्राम न्यायलय एक बहुत ही अच्छी योजना है जो यकीनन सफल होगी। यह सरकार द्वारा उठाया गया एक प्रशंसनीय कार्य है जिसका परिणाम बहुत प्रभावशाली होगा और गांव में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को राहत पहुंचाएगा। जहां पहले गांव वाले अपने अधिकारों और अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाने से डरते थे वहीं वह अब स्वयं न्यायधीश के सामने अपनी बात रख सकते हैं। जहां कोई उनके बीच में बात काटने वाला नहीं होगा। दोनों पक्षों को अपनी-अपनी बात न्यायधीश के सामने रखने का पूरा-पूरा समय मिलेगा। न्यायधीश भी दोनों पक्षों के प्रत्येक पहलू पर नजर रखते हुए ही और सच्चाई की जड़ तक पहुंचने के बाद ही न्याय करेगा। इस व्यवस्था में वकील का कोई रोल नहीं होगा यहां न्याय देने वाला और न्याय मांगने वाले की डारेक्ट बात होगी। यह ऐसा मोबाइल कोर्ट होगा जिसमें पूरा जन-समुदाय मौजूद होगा और खुले मंच के तौर पर न्याय दिया जाएगा। मेरा मानना है प्रत्येक योजना तब तक सफल नहीं हो सकती जब तक वहां का नागरिक उस योजना का सफल न बनाएं। ग्राम न्यायलय से आने वाले समय में गांव काफी हद तक अपराध मुक्त हो जाएंगे। क्योंकि जहां न्याय की गति इतनी तेज होगी वहां अपराध कैसे ठहर सकता है। अपनी बात को खत्म करते हुए मैं यही कहुंगा कि ग्राम न्यायलय के आने से गांवों का बहुत जल्दी विकास होगा चूंकि जहां की न्यायिक व्यवस्था ठीक होती है वहां विकास का होना तय है।
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रामबहादुर रायसंपादक-प्रथम प्रवक्ता
ग्राम न्यायलय का बिल पास हुआ है यह एक अच्छी बात है बशतेZ इसे पास करने के पीछे अच्छी मंशा भी हो। यह फैसला सही दिशा में हो तो यकीनन इसका परिणाम सकारात्मक ही होगा लेकिन सरकार की परिक्षा तो तब होगी जब चुनाव हो चुके होंगे। तब असली काम नजर आता है। जहां तक मुझे लगता है अभी तक जहां भी न्याय की बात होती है वहां न्याय के नाम पर निर्णय किए जाते हैं इसलिए किसी जगह के लिए न्यायलय व्यवस्था देने से ज्यादा जरूरी है न्याय प्रणाली में सुधार! इन बिलों को पास करके प्रत्येक सरकार यह साबित करना चाहती है कि वह कितनी गरीबप्रस्त है फिर भले ही उनके चुनावी घोषणा पत्र में गरीब का जिक्र तक न किया गया हो। जो गरीब भूखे पेट सो रहा है उसे कोई क्या न्याय की जरूरत है उसके लिए तो पहला न्याय उसके पेट को भरना है। गरीब अपनी मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति कर पाए यही उसका पहला न्याय है, बाकी तो बाद की बातें हैं। ग्राम न्यायलय पूरी तरह ग्राम पंचायत के आधार पर हों जिनमें गांव की बात गंाव में ही खत्म हों और जिसमें कोई मुकदमेंबाजी न हो। चूंकि जहां सरकार जुड़ती है वहां अनेक औपचारिकताएं होती है जिन्हें पूरा करने के लिए अक्सर रिश्वत के देवताओं को चढ़ावा चढ़ाना होता है। इसलिए ग्राम न्यायलय में किसी जज और वकील के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए तभी न्याय के लिए रिश्वत का चलन समाप्त हो पाएगा। योजना अच्छी है लेकिन इसका सकारात्मक असर तभी होगा जब इसे अच्छे ढंग से चलाया जाए। (साभार :सोपान स्टेप)
Wednesday, April 8, 2009
हर गरीब की अपनी हो पहचान : प्रभाष जोशी

इलाहाबाद। रोजी, रोटी और मकान अपनी हो पुख्ता पहचान। यही वह नारा था जो शहरी गरीबों के घोषणा पत्र पर अंकित था। शनिवार को शहरी गरीबों के इस नारे से सभागृह गूंज उठा। मौका था लोक सभा चुनाव पर शहरी गरीब संघर्ष मोर्चा द्वारा तैयार घोषणा पत्र का। घोषणा पत्र को प्रख्यात पत्रकार व चिंतक प्रभाष जोशी और मोर्चा की कार्यकर्ता तारा देवी ने जारी किया। कार्यक्रम का आयोजन शहरी गरीब संघर्ष मोर्चा, विज्ञान फाउण्डेशन, मुहिम एवं ह्यूमन राइटर्स ला नेटवर्क ने संयुक्त रूप से किया।
घोषणापत्र जारी करते हुए प्रभाष जोशी ने कहा कि हर गरीब की अपनी पुख्ता पहचान होनी चाहिए। इन मेहनतकश लोगों के बिना हमारे आधुनिक नगर की कल्पना संभव नहीं। उन्होंने कहा कि गरीबों को जब तक उनकी पहचान और नागरिकता के अधिकार नहीं मिल जाते तब तक चुनाव और लोकतंत्र की बातें अधूरी हैं। श्री जोशी ने बाल भारती कैरियर कोचिंग के हाल में हुए दूसरे सत्र में न्यू लिबरल वाशिंगटन कान्ससनेस की बात उठायी। उन्होंने कहा कि ब्रिटिश व अमेरिका के बीच संधि स्वरूप जो उदारीकरण की नीति विश्व में फैली उसके कई दुष्परिणाम देश को भुगतने पड़ रहे हैं। लेकिन इसका अहसास शासन व सत्ता पर बैठे लोगों को नहीं हो पा रहा है। आज की दुनिया में संघर्ष के नये सत्र विषयक संगोष्ठी में उन्होंने बताया कि उपनिवेशवाद अपने बदले स्वरूप में पैर पसार रहा है। पूंजी ही ब्रह्म और मुनाफा ही मोक्ष बन गया है। इसके प्रति सजग होने की जरूरत है। कार्यक्रम का आयोजन प्रगतिशील लेखक संघ व इतिहास बोधमंच, पाकिस्तान इन्डिया पीपुल्स फोरम फार पीस एण्ड डेमोक्रेसी की ओर से किया गया। संगोष्ठी की अध्यक्षता जियाउल हक ने की।
सुबह और शाम के सत्र में उपस्थित लोगों में डा.मानस मुकुल दास, रविकिरण जैन, प्रो. आरसी त्रिपाठी, प्रो. लाल बहादुर वर्मा, डा. पद्मा सिंह, उत्पला शुक्ला, डा. अनीता गोपेश, हरीश्चन्द्र, जीतेन्द्र मौर्य, यश मालवीय, जफर बख्त, असरार गांधी, फैज अंसारी आदि शामिल रहे। संचालन अंशु मालवीय ने किया।
Saturday, April 4, 2009
मोहर लगेगी जात पर
उमाशंकर मिश्र/वाराणसीपूर्वांचल में रोजगार का एकमात्र साधन यहां खेती-बाड़ी है। लम्बे समय तक अर्थव्यवस्था मनीआर्डर इकॉनमी पर आधारित रही है, लेकिन अब तो हर नौजवान मुम्बई, दिल्ली या फिर सूरत जाना चाहता है। अपने लिए क्या सही अथवा क्या गलत है, इसके बारे में भले ही लोगों को जानकारी न हो, लेकिन राजनीतिक समीकरणों को लेकर चर्चा करने में इनका कोई सामी नहीं। लोगों को धर्म और जाति के नाम पर बरगलाकर जनप्रतिनिधी सत्ता हासिल कर लेते हैं, जबकि जनता राजनीतिक गणित बिठाने में जुटी रहती है।
पूर्वांचल के ग्रामीण अंचल में यह मौसम आम के पेड़ों पर बौर आने का होता है। खेतों में रबी की पकी हुई फसलें कटने को तैयार खड़ी हैं, जबकि कुछ फसलें तो खलिहान तक पहुँच भी चुकी हैं। हवाओं में भरी महुए के फूलों की खुशबु, सुबह तक टप-टप करके चूने वाले महुए के पीले रंग के रसीले फूलों की जमीन पर बिछी चादर और उस पर पड़ने वाला सवेरे का मि(म प्रकाश एक अप्रतिम सौन्दर्य की छटा बिखेरता है। महुआ को इकट्ठा करने के लिए लोग सुबह से टोकरी लेकर निकल जाते हैं। प्रतापगढ़ के प्रसिद्ध आंवले के बागों में नई कोंपले फूटने लगी हैं। चना, अरहर, गेहूं, अरसी, मटर इत्यादि की फसलें लोकजीवन में नई आशाओं का संचार करती हैं। इन सबके चलते ग्रामीण आशााओं के आसमान में विचरण करते हुए जीवन की भावी योजनाएं बनाने में जुट जाते हैं। निरंतर चली आ रही ग्राम्य जीवन की इस परंपरा के बीच लोकसभा चुनावों की आहट लिये यह साल क्या भोले-भाले ग्रामीणों के लिए भी कुछ नई उम्मीदों से परिपूर्ण होगा? यह सवाल कई लोगोें के मन में है। लेकिन आम आदमी क्या सोच कर वोट देता है और विकास उसके लिए कितना मायने रखता है? यह जानने की कोशिश चुनाव मैदान में उतरने वाले राजनेता भी शायद ही करते होंं।
भोपियामऊ प्रतापगढ़ के लालजी मुसहर रिक्शा चलाकर जीवन यापन करते हैं। उल्लेखनीय है कि भोपियामऊ समाजवादी पार्टी के बाहुबली सांसद रहे अक्षय प्रताप सिंह उर्फ गोपाल का प्रभाव क्षेत्र माना जाता है और पिछला चुनाव भी उन्होंने जेल में रहकर जीता था। लालजीसे जब पूछा गया कि पिछले चुनाव में किसे वोट दिया था, तो वह कहता है-साईकिल को भईया। क्यों? अरे अपने राजा साहब हैं ना, इसीलिए। राजा साहब ने तुम्हारे लिया क्या किया है? लालजी चुप हो जाता है। कुल मिलाकर लब्बोलुआब यह था है कि लालजी मुसहर जाति का है और ठाकुर बहुल गांव में रहता है। उसे नहीं मालूम कि उसकी अपनी और अपने समुदाय की आवश्यकता क्या है, जिससे भावी पीढ़ी समाज की मुख्यधारा में शामिल हों सके। उसके वोट की कीमत उसे नहीं मालूम, लेकिन वह अच्छी तरह जानता है कि उसे साईकिल पर ही मुहर लगानी है, क्योंकि यह राजा साहब का चुनाव चिन्ह है।
उत्तर प्रदेश में दलितों रहनुमाई की झंडाबरदार कही जाने वाली बहुजन समाज पार्टी की सरकार है, जिसके गठन का आधार ब्राम्हणों, दलितों एवं मुसलमानों को मिलाकर की गई सोशल इंजीनियरिंग को माना जाता है। दलितों ने मायावती की सरकार में अपने जीवन को लेकर सपने बुने थे, बेहतरी के लिए आशायें संजोयी थी और उन्हीं आशाओं को ध्यान में रखकर राज्य में दलित की बेटी को मुख्यमंत्री की गद्दी पर बैठाया था, ऐसा आमतौर पर समझा जाता है। पूर्वांचल का दौरा करने के पश्चात् यह धारणा परंपरागत जान पड़ी। यहां स्थानीय प्रत्याशी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को ध्यान में रखने की बजाय पिछड़ी जातियों के लोग हाथी को इसलिए वोट देते हैं क्योंकि उन्हें लगता है, हाथी उनका जन्मजात साथी है। कैसे और क्यों? यह किसी को नहीं मालूम। वयोवृद्ध बाबादीन प्रतापगढ़ जिले की पट्टी तहसील के डंडवा महोखरी गांव में रहते हैं। परिवार में चार बेटे, चार नाती और पांच पनाती हैं। चारों बेटों समेत बाबादीन खुद भी मजदूरी करके परिवार चलाते हैं। जब उनसे पूछा गया कि किसे वोट दोगे तो तपाक से बाबादीन कहते हैं कि-हाथी को। क्यों? तो वे कहते हैं कि-`जब समाजय हाथी का वोट देत अह्य तो हमहू देत अही।´ क्या पनातियों से भी मजदूरी कराओगे, अब तो आपकी सरकार भी है? इस सवाल से बाबादीन असमंजस में पड़ जाते हैं। उनसे जब यह पूछा गया कि अगर बसपा से कोई ऐसा व्यक्ति चुनाव लड़े जो अपराधिक प्रवृत्ति का हो तब किसे वोट देगें? जवाब में वे कहते हैं-`जेल तो सहिव का होत है और गैर सहिव का होई जात है। उल्लेखनीय है कि बाबादीन को कानूनी खामियां तो पता हैं कि सही व्यक्ति को भी जेल हो जाती है। लेकिन उनके आत्म-विकास के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार कितना जरूरी है, इस बात का उन्हें आभास नहीं है और न ही वे इसकी मांग करते हैं।
चनुआपट्टी के रामसिंह कहते हैं कि `यहां कोई चुनावी मुद्दा नहीं होता, राजनीति जात बिरादरी की हो गई है। विकास को रामसिंह गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से जोड़ कर देखते हैं। वे कहते हैं कि गांव में यदि बेहतर शिक्षा की व्यवस्था हो जाये तो लोगों की सोच में कुछ बदलाव आ सकता है। मिड-डे मील योजना को वे बंद कर देने की राय देते हैं। उनका मानना है कि इससे बच्चों का ध्यान पढ़ाई की बजाय खाने पर ही लगा रहता है और अध्यापक भी पूरा दिन खाना बनाने और खाना बनाने वाली से बतियाने में जुटे रहते हैं। खेती में सिंचाई की व्यवस्था को पुख्ता करने की बात पर रामसिंह जोर देते हैं। खेती के लिए मिलने वाले इन्पुट्स मसलन खाद, बीज इत्यादि के वितरण में होने वाली धांधली की बात करते हुए वे कहते हैं कि `प्रत्येक खाद की बोरी पर 10 रुपये कमीशन किसानों को जरूर देना पड़ता है।´ वहीं चनुआपट्टी ग्राम पंचायत के ही बालमुकुन्द मिश्र कहते हैं कि-`मंदिर मिस्जद मुद्दा रहा तो उससे कौन सा विधायक या मंत्री मरा है, मरता तो आम आदमी ही है। दूसरी ओर वे यह भी कहते हैं कि वर्तमान सरकार ने कौन सा रोजगार हमें दिया है? अपने गांव गड़ौरी कलां में स्कूल और डिस्पैन्सरी जैसी बुनियादी सुविधाओं के न होने का भी उन्हें मलाल है। इन बातों को लेकर बालमुकुन्द ने किसी भी राजनीतिक दल को वोट न देने का फैसला किया है। हालांकि पिछड़ेपन और परंपरागत सोच के अंधेरे के बीच कहीं-कहीं आशा की किरण भी नज़र आती है। छोटेलाल तिवारी डंड़वा महोखरी गांव के प्रधान हैं, उनके गांव में खड़ंजा, पानी की टंकी, स्कूल और स्वास्थ्य केन्द्र जैसी बुनियादी सुविधाएं मौजूद हैं। छोटेलाल विकासोन्मुख एवं रोजगारपरक शिक्षा की जरूरत पर जोर देते हैंं।
ग्राम सरायनानकार निवासी वीरेन्द्र मिश्र कहते हैं बिजली की आंख मिचौली का जिक्र करते हुए विद्युत आपूर्ति हेतु सरकारी प्रतिब(ता की कलई बखूबी खोलते हैं। कटाक्ष करते हुए वे कहते हैं कि `आजकल परीक्षाएं चल रही हैं इसलिए रात को 11 बजे के बाद बिजली आ जाती है और सुबह 5 बजे चली जाती है। यही नहीं मुख्य लाईन से घर तक बिजली का तार खींचने के लिए सालों से हमें कामचलाऊ खंभे खुद ही गाड़ने पड़ते हैं।´ बिजली की इस अनियमितता का असर खेती पर भी पड़ता है। घर से करीब 2 किलोमीटर दूर सुनसान में उनके खेत हैंं। वे बताते हैं कि सिंचाई के लिए उन्हें घर से मोटर लेकर वहां जाना पड़ता और खुले आसमान के नीचे चारपाई लगाकर पौष माघ की सदीZ में बिजली आने का इंतजार करना पड़ता था। ताकि खेतों को सींचा जा सके। सिंचाई सुविधाओं को बेहतर बनाने के अलावा बिजली और आवागमन सुविधाओं की बेहतरी की आस वीरेन्द्र को है। लेकिन चौपई गांव के गुरुप्रसाद तिवारी ने इस बार मतदान न करने का फैसला किया है। वे कहते हैं कि-`जनता को नेता लोग सपने दिखाकर बरगला लेते हैं और जब उनका स्वार्थ आता है तो एक पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में चले जाते हैं।
वाराणसी के संजीव सिंह पढ़े लिखे बेरोजगार युवाओं में से एक हैं। वे कहते हैं-`किसी पार्टी के पास कोई मुद्दा नहींं है। किसी राष्ट्रीय विषय से राजनीतिक दलों का सरोकार नहीं है। अल्पसंख्यक राजनीति को लेकर वे कहते हैं कि आज पूर्वांचल में कई आजमगढ़ दिखाई देते हैं, जबकि अशिक्षा, बेरोजगारी और धर्मान्धता को उपेक्षित किया जा रहा है।´ दूसरी ओर उत्तर प्रदेश में नये परिसीमन के बाद भी लोग जातिगत आधार पर ही वोट दे रहे हैं। एक अन्य महत्वपूर्ण बात स्थानीय भौतिक आवश्यकताओं की आपूर्ति से भी जुड़ी है। कृषि को ही लीजिये। पिछला मानसून किसानों के लिए लाभप्रद था, लेकिन सरकार को चावल देने का मामला आया तो उनके कोटे कम कर दिये गए। झांसी मंडल, चित्रकूट, इलाहाबाद इत्यादि के कोटे बढ़ा दिये गए। परिणाम यह हुआ कि यहां हजारों िक्वंटल धान जस के तस पड़े हुए हैं। वहीं गरीब किसानों की हजारों एकड़ जमीन गंगा एक्सप्रेस-वे की भेंट चढ़ गई। विडंबना है कि प्रदेश सरकार नदियों को पाट कर पार्क बनाने में जुटी है। बिजली की समस्या के चलते व्यावसायी उत्तरांचल की ओर रुख कर रहे हैं। सरकारों ने औद्योगिक केन्द्र खोले, लेकिन ढांचागत सुविधाओं का अभाव देखने को मिलता है। बकौल संजीव सिंह विगत 10 वर्षों में सरकार किसी बिजनेस का प्रारूप ही नहीं रख पाई है। वे कहते हैं कि जे.के. सीमेन्ट कारखाने से लोगों में आशाएं जगी थी, लेकिन उसे मूलभूत सुविधाएं ही नहीं मिल पा रही हैं।
बनारसी साड़ी के बुनकरों का व्यावसाय भी पावरलूम की भेंट चढ़ने लगा है। एक ओर बनारसी साड़ी की कला ख़तरे में पड़ गई है तो दूसरी ओर हजारों बुनकरों पर रोजी रोटी का संकट आन पड़ा है। मो. शाहिद कहते हैं कि हमारी अपनी मण्डी होनी चाहिए, जहां माल खरीदा और बेचा जा सके। वे इसके लिए सरकार द्वारा एक सोसाइटी बनाये जाने की बात कहते हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता लेनिन रघुवंशी राजनीती के अपराधीकरण पर चिंता व्यक्त करते हुए कहते हैं कि इससे जनाधिकार खतरे में पड़ गए हैं. जबकि गंगापुत्र डॉ. वीरभद्र मिश्र जैसे समाजसेवी पिछडेपन के लिए जनता को ही दोषी मानते हैं. वे कहते हैं कि ''यहाँ तो कुछ हो ही नहीं रहा है. ना पढाई, ना विकास और ना ही पर्यावरण। लीडर लीड करते हैं और जनता पीछे चलती है। जनता आगे दौड़ ही नहीं रही है। अगर पूर्वांचल को अलग राज्य बना भी दिया जाये तो यह आर्थिक तौर पर व्यावहारिक नहीं होगा।´´
इन सबके बीच वाराणसी समेत पूरे उत्तर प्रदेश में चुनावों में बाहुबलियों को टिकट दिये जाने की चर्चा जोरों पर है। न्यूनाधिक सभी राजनीतिक दलों ने आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों को राजनीतिक समीकरणों को ध्यान में रखकर टिकट दिया है। लेकिन बसपा इस मामले में भी सर्वाधिक बाहुबलियों को टिकट देकर इस मामले में भी आगे निकल गई। बहरहाल इस बीच काशी के हर नुक्कड़, गली, मोहल्ले, चाय की दुकान से लेकर बीएचयू के प्रांगण तक वाराणसी की संस्कृति एवं सभ्यता को बाहुबलियों के चंगुल से बचाने को लेकर चर्चाएं आम हो गई हैं। वाराणसी के ही तुलसीदास कहते हैं `अल्पसंख्यक वोटों का ध्रवीकरण यहां भाजपा को हराने में सक्षम प्रत्याशी की ओर हो जाता है। अंत समय तक मुस्लिम वॉच करते हैं और अंतत: मिस्जदों से ऐलान कर दिया जाता है कि किस दल को वोट करना है।´ बाहुबली को प्रत्याशी बनाने की बात पर वे कहते हैं कि प्रधानमंत्री बनने के लिए मायावती अब किसी भी स्तर पर जा सकती हैं। आगे वे कहते हैं कि 20-25 सालों से चुनावों से मुद्दे गायब हो चुके हैं और मतदाताओं को जातियों में बांट दिया गया है। जबकि जमीनी मुद्दे बौद्विक वर्ग की चर्चा का विषय बन कर रह गए हैं।
Thursday, April 2, 2009
सिर से मैला नहीं उतार पायी सरकार
सभ्यता के विकास में मल निस्तारण समस्या रही हो या न रही हो, लेकिन भारत में कुछ लोगों के सिर पर आज भी मैला सवार है. तमाम कोशिशों के बावजूद भारत सरकार उनके सिर से मैला नहीं उतार पायी है जो लंबे समय से इस काम से निजात पाना चाहते हैं. हालांकि सरकार द्वारा सिर से मैला हटा देने की तय आखिरी तारीख कल बीत गयी लेकिन कल ही 31 मार्च को दिल्ली में जो 200 लोग इकट्ठा हुए थे वे आज वापस अपने घरों को लौट गये हैं. तय है, आज से उन्हें फिर वही सब काम करना पड़ेगा जिसे हटाने की मंशा लिये वे दिल्ली आये थे. उमाशंकर मिश्र की रिपोर्ट- 
