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Saturday, April 4, 2009

मोहर लगेगी जात पर

उमाशंकर मिश्र/वाराणसी
पूर्वांचल में रोजगार का एकमात्र साधन यहां खेती-बाड़ी है। लम्बे समय तक अर्थव्यवस्था मनीआर्डर इकॉनमी पर आधारित रही है, लेकिन अब तो हर नौजवान मुम्बई, दिल्ली या फिर सूरत जाना चाहता है। अपने लिए क्या सही अथवा क्या गलत है, इसके बारे में भले ही लोगों को जानकारी न हो, लेकिन राजनीतिक समीकरणों को लेकर चर्चा करने में इनका कोई सामी नहीं। लोगों को धर्म और जाति के नाम पर बरगलाकर जनप्रतिनिधी सत्ता हासिल कर लेते हैं, जबकि जनता राजनीतिक गणित बिठाने में जुटी रहती है।
पूर्वांचल के ग्रामीण अंचल में यह मौसम आम के पेड़ों पर बौर आने का होता है। खेतों में रबी की पकी हुई फसलें कटने को तैयार खड़ी हैं, जबकि कुछ फसलें तो खलिहान तक पहुँच भी चुकी हैं। हवाओं में भरी महुए के फूलों की खुशबु, सुबह तक टप-टप करके चूने वाले महुए के पीले रंग के रसीले फूलों की जमीन पर बिछी चादर और उस पर पड़ने वाला सवेरे का मि(म प्रकाश एक अप्रतिम सौन्दर्य की छटा बिखेरता है। महुआ को इकट्ठा करने के लिए लोग सुबह से टोकरी लेकर निकल जाते हैं। प्रतापगढ़ के प्रसिद्ध आंवले के बागों में नई कोंपले फूटने लगी हैं। चना, अरहर, गेहूं, अरसी, मटर इत्यादि की फसलें लोकजीवन में नई आशाओं का संचार करती हैं। इन सबके चलते ग्रामीण आशााओं के आसमान में विचरण करते हुए जीवन की भावी योजनाएं बनाने में जुट जाते हैं। निरंतर चली आ रही ग्राम्य जीवन की इस परंपरा के बीच लोकसभा चुनावों की आहट लिये यह साल क्या भोले-भाले ग्रामीणों के लिए भी कुछ नई उम्मीदों से परिपूर्ण होगा? यह सवाल कई लोगोें के मन में है। लेकिन आम आदमी क्या सोच कर वोट देता है और विकास उसके लिए कितना मायने रखता है? यह जानने की कोशिश चुनाव मैदान में उतरने वाले राजनेता भी शायद ही करते होंं।
भोपियामऊ प्रतापगढ़ के लालजी मुसहर रिक्शा चलाकर जीवन यापन करते हैं। उल्लेखनीय है कि भोपियामऊ समाजवादी पार्टी के बाहुबली सांसद रहे अक्षय प्रताप सिंह उर्फ गोपाल का प्रभाव क्षेत्र माना जाता है और पिछला चुनाव भी उन्होंने जेल में रहकर जीता था। लालजीसे जब पूछा गया कि पिछले चुनाव में किसे वोट दिया था, तो वह कहता है-साईकिल को भईया। क्यों? अरे अपने राजा साहब हैं ना, इसीलिए। राजा साहब ने तुम्हारे लिया क्या किया है? लालजी चुप हो जाता है। कुल मिलाकर लब्बोलुआब यह था है कि लालजी मुसहर जाति का है और ठाकुर बहुल गांव में रहता है। उसे नहीं मालूम कि उसकी अपनी और अपने समुदाय की आवश्यकता क्या है, जिससे भावी पीढ़ी समाज की मुख्यधारा में शामिल हों सके। उसके वोट की कीमत उसे नहीं मालूम, लेकिन वह अच्छी तरह जानता है कि उसे साईकिल पर ही मुहर लगानी है, क्योंकि यह राजा साहब का चुनाव चिन्ह है।
उत्तर प्रदेश में दलितों रहनुमाई की झंडाबरदार कही जाने वाली बहुजन समाज पार्टी की सरकार है, जिसके गठन का आधार ब्राम्हणों, दलितों एवं मुसलमानों को मिलाकर की गई सोशल इंजीनियरिंग को माना जाता है। दलितों ने मायावती की सरकार में अपने जीवन को लेकर सपने बुने थे, बेहतरी के लिए आशायें संजोयी थी और उन्हीं आशाओं को ध्यान में रखकर राज्य में दलित की बेटी को मुख्यमंत्री की गद्दी पर बैठाया था, ऐसा आमतौर पर समझा जाता है। पूर्वांचल का दौरा करने के पश्चात् यह धारणा परंपरागत जान पड़ी। यहां स्थानीय प्रत्याशी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को ध्यान में रखने की बजाय पिछड़ी जातियों के लोग हाथी को इसलिए वोट देते हैं क्योंकि उन्हें लगता है, हाथी उनका जन्मजात साथी है। कैसे और क्यों? यह किसी को नहीं मालूम। वयोवृद्ध बाबादीन प्रतापगढ़ जिले की पट्टी तहसील के डंडवा महोखरी गांव में रहते हैं। परिवार में चार बेटे, चार नाती और पांच पनाती हैं। चारों बेटों समेत बाबादीन खुद भी मजदूरी करके परिवार चलाते हैं। जब उनसे पूछा गया कि किसे वोट दोगे तो तपाक से बाबादीन कहते हैं कि-हाथी को। क्यों? तो वे कहते हैं कि-`जब समाजय हाथी का वोट देत अह्य तो हमहू देत अही।´ क्या पनातियों से भी मजदूरी कराओगे, अब तो आपकी सरकार भी है? इस सवाल से बाबादीन असमंजस में पड़ जाते हैं। उनसे जब यह पूछा गया कि अगर बसपा से कोई ऐसा व्यक्ति चुनाव लड़े जो अपराधिक प्रवृत्ति का हो तब किसे वोट देगें? जवाब में वे कहते हैं-`जेल तो सहिव का होत है और गैर सहिव का होई जात है। उल्लेखनीय है कि बाबादीन को कानूनी खामियां तो पता हैं कि सही व्यक्ति को भी जेल हो जाती है। लेकिन उनके आत्म-विकास के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार कितना जरूरी है, इस बात का उन्हें आभास नहीं है और न ही वे इसकी मांग करते हैं।
चनुआपट्टी के रामसिंह कहते हैं कि `यहां कोई चुनावी मुद्दा नहीं होता, राजनीति जात बिरादरी की हो गई है। विकास को रामसिंह गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से जोड़ कर देखते हैं। वे कहते हैं कि गांव में यदि बेहतर शिक्षा की व्यवस्था हो जाये तो लोगों की सोच में कुछ बदलाव आ सकता है। मिड-डे मील योजना को वे बंद कर देने की राय देते हैं। उनका मानना है कि इससे बच्चों का ध्यान पढ़ाई की बजाय खाने पर ही लगा रहता है और अध्यापक भी पूरा दिन खाना बनाने और खाना बनाने वाली से बतियाने में जुटे रहते हैं। खेती में सिंचाई की व्यवस्था को पुख्ता करने की बात पर रामसिंह जोर देते हैं। खेती के लिए मिलने वाले इन्पुट्स मसलन खाद, बीज इत्यादि के वितरण में होने वाली धांधली की बात करते हुए वे कहते हैं कि `प्रत्येक खाद की बोरी पर 10 रुपये कमीशन किसानों को जरूर देना पड़ता है।´ वहीं चनुआपट्टी ग्राम पंचायत के ही बालमुकुन्द मिश्र कहते हैं कि-`मंदिर मिस्जद मुद्दा रहा तो उससे कौन सा विधायक या मंत्री मरा है, मरता तो आम आदमी ही है। दूसरी ओर वे यह भी कहते हैं कि वर्तमान सरकार ने कौन सा रोजगार हमें दिया है? अपने गांव गड़ौरी कलां में स्कूल और डिस्पैन्सरी जैसी बुनियादी सुविधाओं के न होने का भी उन्हें मलाल है। इन बातों को लेकर बालमुकुन्द ने किसी भी राजनीतिक दल को वोट न देने का फैसला किया है। हालांकि पिछड़ेपन और परंपरागत सोच के अंधेरे के बीच कहीं-कहीं आशा की किरण भी नज़र आती है। छोटेलाल तिवारी डंड़वा महोखरी गांव के प्रधान हैं, उनके गांव में खड़ंजा, पानी की टंकी, स्कूल और स्वास्थ्य केन्द्र जैसी बुनियादी सुविधाएं मौजूद हैं। छोटेलाल विकासोन्मुख एवं रोजगारपरक शिक्षा की जरूरत पर जोर देते हैंं।

ग्राम सरायनानकार निवासी वीरेन्द्र मिश्र कहते हैं बिजली की आंख मिचौली का जिक्र करते हुए विद्युत आपूर्ति हेतु सरकारी प्रतिब(ता की कलई बखूबी खोलते हैं। कटाक्ष करते हुए वे कहते हैं कि `आजकल परीक्षाएं चल रही हैं इसलिए रात को 11 बजे के बाद बिजली आ जाती है और सुबह 5 बजे चली जाती है। यही नहीं मुख्य लाईन से घर तक बिजली का तार खींचने के लिए सालों से हमें कामचलाऊ खंभे खुद ही गाड़ने पड़ते हैं।´ बिजली की इस अनियमितता का असर खेती पर भी पड़ता है। घर से करीब 2 किलोमीटर दूर सुनसान में उनके खेत हैंं। वे बताते हैं कि सिंचाई के लिए उन्हें घर से मोटर लेकर वहां जाना पड़ता और खुले आसमान के नीचे चारपाई लगाकर पौष माघ की सदीZ में बिजली आने का इंतजार करना पड़ता था। ताकि खेतों को सींचा जा सके। सिंचाई सुविधाओं को बेहतर बनाने के अलावा बिजली और आवागमन सुविधाओं की बेहतरी की आस वीरेन्द्र को है। लेकिन चौपई गांव के गुरुप्रसाद तिवारी ने इस बार मतदान न करने का फैसला किया है। वे कहते हैं कि-`जनता को नेता लोग सपने दिखाकर बरगला लेते हैं और जब उनका स्वार्थ आता है तो एक पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में चले जाते हैं।
वाराणसी के संजीव सिंह पढ़े लिखे बेरोजगार युवाओं में से एक हैं। वे कहते हैं-`किसी पार्टी के पास कोई मुद्दा नहींं है। किसी राष्ट्रीय विषय से राजनीतिक दलों का सरोकार नहीं है। अल्पसंख्यक राजनीति को लेकर वे कहते हैं कि आज पूर्वांचल में कई आजमगढ़ दिखाई देते हैं, जबकि अशिक्षा, बेरोजगारी और धर्मान्धता को उपेक्षित किया जा रहा है।´ दूसरी ओर उत्तर प्रदेश में नये परिसीमन के बाद भी लोग जातिगत आधार पर ही वोट दे रहे हैं। एक अन्य महत्वपूर्ण बात स्थानीय भौतिक आवश्यकताओं की आपूर्ति से भी जुड़ी है। कृषि को ही लीजिये। पिछला मानसून किसानों के लिए लाभप्रद था, लेकिन सरकार को चावल देने का मामला आया तो उनके कोटे कम कर दिये गए। झांसी मंडल, चित्रकूट, इलाहाबाद इत्यादि के कोटे बढ़ा दिये गए। परिणाम यह हुआ कि यहां हजारों िक्वंटल धान जस के तस पड़े हुए हैं। वहीं गरीब किसानों की हजारों एकड़ जमीन गंगा एक्सप्रेस-वे की भेंट चढ़ गई। विडंबना है कि प्रदेश सरकार नदियों को पाट कर पार्क बनाने में जुटी है। बिजली की समस्या के चलते व्यावसायी उत्तरांचल की ओर रुख कर रहे हैं। सरकारों ने औद्योगिक केन्द्र खोले, लेकिन ढांचागत सुविधाओं का अभाव देखने को मिलता है। बकौल संजीव सिंह विगत 10 वर्षों में सरकार किसी बिजनेस का प्रारूप ही नहीं रख पाई है। वे कहते हैं कि जे.के. सीमेन्ट कारखाने से लोगों में आशाएं जगी थी, लेकिन उसे मूलभूत सुविधाएं ही नहीं मिल पा रही हैं।
बनारसी साड़ी के बुनकरों का व्यावसाय भी पावरलूम की भेंट चढ़ने लगा है। एक ओर बनारसी साड़ी की कला ख़तरे में पड़ गई है तो दूसरी ओर हजारों बुनकरों पर रोजी रोटी का संकट आन पड़ा है। मो. शाहिद कहते हैं कि हमारी अपनी मण्डी होनी चाहिए, जहां माल खरीदा और बेचा जा सके। वे इसके लिए सरकार द्वारा एक सोसाइटी बनाये जाने की बात कहते हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता लेनिन रघुवंशी राजनीती के अपराधीकरण पर चिंता व्यक्त करते हुए कहते हैं कि इससे जनाधिकार खतरे में पड़ गए हैं. जबकि गंगापुत्र डॉ. वीरभद्र मिश्र जैसे समाजसेवी पिछडेपन के लिए जनता को ही दोषी मानते हैं. वे कहते हैं कि ''यहाँ तो कुछ हो ही नहीं रहा है. ना पढाई, ना विकास और ना ही पर्यावरण। लीडर लीड करते हैं और जनता पीछे चलती है। जनता आगे दौड़ ही नहीं रही है। अगर पूर्वांचल को अलग राज्य बना भी दिया जाये तो यह आर्थिक तौर पर व्यावहारिक नहीं होगा।´´
इन सबके बीच वाराणसी समेत पूरे उत्तर प्रदेश में चुनावों में बाहुबलियों को टिकट दिये जाने की चर्चा जोरों पर है। न्यूनाधिक सभी राजनीतिक दलों ने आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों को राजनीतिक समीकरणों को ध्यान में रखकर टिकट दिया है। लेकिन बसपा इस मामले में भी सर्वाधिक बाहुबलियों को टिकट देकर इस मामले में भी आगे निकल गई। बहरहाल इस बीच काशी के हर नुक्कड़, गली, मोहल्ले, चाय की दुकान से लेकर बीएचयू के प्रांगण तक वाराणसी की संस्कृति एवं सभ्यता को बाहुबलियों के चंगुल से बचाने को लेकर चर्चाएं आम हो गई हैं। वाराणसी के ही तुलसीदास कहते हैं `अल्पसंख्यक वोटों का ध्रवीकरण यहां भाजपा को हराने में सक्षम प्रत्याशी की ओर हो जाता है। अंत समय तक मुस्लिम वॉच करते हैं और अंतत: मिस्जदों से ऐलान कर दिया जाता है कि किस दल को वोट करना है।´ बाहुबली को प्रत्याशी बनाने की बात पर वे कहते हैं कि प्रधानमंत्री बनने के लिए मायावती अब किसी भी स्तर पर जा सकती हैं। आगे वे कहते हैं कि 20-25 सालों से चुनावों से मुद्दे गायब हो चुके हैं और मतदाताओं को जातियों में बांट दिया गया है। जबकि जमीनी मुद्दे बौद्विक वर्ग की चर्चा का विषय बन कर रह गए हैं।

2 comments:

हर्षवर्धन said...

सही है

संगीता पुरी said...

पारे विश्‍लेषण के साथ अच्‍छा आलेख प्रस्‍तुत किया आपने ... इतनी जानकारी देने के लिए धन्‍यवाद।