
Monday, December 31, 2007
Thursday, December 6, 2007
ग्रामीण भारत के अंचलों में पसरी सभ्यता, संस्कृति, लोकाचार, रीती रिवाजों तथा परम्पराओं के लिए यह देश दुनिया भर में जाना जाता है, जिसके मोहपाश में बंधकर सैलानी हज़ारों मील की यात्रा कर भारत आ जाते हैं, ताकि वे भारत के ग्रामीण जीवन से रूबरू हो सकें... विशेषकर राजस्थान जैसे राज्यों को इसी कड़ी का हिसा कहा जा सकता है। आज हम भले ही दुनिया के साफ्टवेयर निर्माताओं मी भले ही अग्रणी हो गए हों, लेकिन कहीं न कहीं अपनी परम्पराओं से कटते जा रहे हैं.......संवेदनाएं...परम्पराएँ....कहें दबित होकर सिसकती हुयी सी जान पड़ती हैं...
''उज्जास'' ने एक ऐसी पहल करने का फैसला किया है, जिससे ग्रामीण परम्पराओं, रीती रिवाजों की एक बार फिर से चर्चा हो, वह भी आम स्तर पर। आप अपने परिवेश की कुछ बातें बताएं और कुछ मैं भी बताऊंगा, तो कुछ बातें आपने अध्ययन, भ्रमण एवं अनुभवों से जुटाई जा सकती हैं। तो आइये शुरुआत करते हैं एक ऐसी श्रंखला की जिससे उन मुरझाई हुई परंपराओं की शिराओं मे प्राणसन्चार कर अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिये सन्जोकर रख दें।
Wednesday, December 5, 2007
Saturday, December 1, 2007
अल्पसंख्यक धनाढ्य वर्ग और बहुसंख्यक गरीब

खुशवन्त सिंह
जिस दिन भारत का शेयर बाजार 20 हजार के आंकड़े को छू रहा था और मुकेश अंबानी को दुनिया का सबसे अमीर आदमी घोषित कर दिया गया था, वहीं दूसरी ओर 20 हजार पुरुष एवं महिलाएं मध्य भारत से (ग्वालियर -दिल्ली) तक पैदल यात्रा की। उनकी यह यात्रा इस बात को लेकर प्रदशन के लिए थी कि उनके पास दिन के एक समय का पर्याप्त भोजन तक नहीं है। इसे संयोग ही कहा जाएगा कि भारत जैसा देश, जिसे दुनिया के निर्धनतम देशों की दीघाZ में रखा जाता है( दुनिया का सबसे धनाढ्य व्यक्ति भी वहीं पर ही है। जिन 20 हजार लोेगों ने राजधानी तक का सफर तय किया था, वे इस बात की आशा लेकर आए थे कि यहां उनकी बात सुनी जाएगी। ये वही लोग थे, जिन्हें बांधों तथा फैिक्ट्रयों के निर्माण एवं खनन जैसे कार्याेंं को अंजाम देने के लिए अपनी ही जमीन से बेदखल होना पड़ा था। इतने पर भी वंचितों के इस हुजूम ने अनुशासित होकर अपनी बात रखी, लेकिन यदि समय पर उनकी मांगों पर गौर नहीं किया गया तो वे फिर से अपनी बात रखने के लिए आएंगी, ऊंचे स्वर में अपनी बात को रखने के लिए, तब शायद उनका अनुशासनात्मक रवैया भी देखने को न मिल सके।
आज जरूरत है कि हम इस कठोर सत्य को समझें कि `अल्पसंख्यक धनाढ्य वर्ग और बहुसंख्यक गरीबों के बीच का अंतर एक लोकतांत्रिक समाज में स्वीकार्य नहीं है।´ इस तरह की बातें राजतन्त्र अथवा तानाशाही वाले शासन का अंग हो सकती हैं। एक लोकतािन्त्रक देश होकर भी यदि हम अमीरों एवं अथाह गरीबों के बीच विषमता की खाई को न पाट सके, तो इसे अपराध, भ्रष्टाचार तथा हिंसा को बढ़ने से नहीं रोका जा सकेगा। दक्षिण कोरिया, ताईवान, सिंगापुर, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, यूरोप, कनाडा और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे अन्य लोकतािन्त्रक देशों को देखें तो वहां भारत जैसी गरीबी और न ही धन का इतने बड़े पैमाने पर केंद्रीकरण ही देखने को मिलता है। ऐसा बहुत ही कम देखने को मिलता है, जब इन देशों में लोग अपने घरों में नौकर रखते हों, वे खुद ही खाना बनाते हैं, खुद ही कार ड्राईव करते हैं और यहां तक कि टॉयलेट भी खुद ही साफ करते हैं। यह कहने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि वर्ग विभेद भारत की तरह गहरा नहीं है। शायद इसीलिए इन देशों में भ्रष्टाचार, हिंसा और अपराधों में भी कमी देखने को मिलती है।
अंंबानी, बिरला, टाटा एवं अजीम प्रेमजी जैसे लोगों और गरीबी से ग्रस्त लोगों के बीच की विकराल विषमता को पाटना नििश्चत तौर पर हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। यह कैसे संभव हो सकेगा, मुझे नहीं मालूम, इस तथ्य के साथ कि हमारे पास शायद पर्याप्त भूमि न हो, जो भूमिहीनों को उपलब्ध कराई जा सके। लेकिन हम उनके लिए रोजगार तो पैदा कर ही सकते हैं, जिससे वे सम्मानपूर्वक जीवन-यापन के लिए पर्याप्त संसाधन जुटा सकें।
आज जरूरत है कि हम इस कठोर सत्य को समझें कि `अल्पसंख्यक धनाढ्य वर्ग और बहुसंख्यक गरीबों के बीच का अंतर एक लोकतांत्रिक समाज में स्वीकार्य नहीं है।´ इस तरह की बातें राजतन्त्र अथवा तानाशाही वाले शासन का अंग हो सकती हैं। एक लोकतािन्त्रक देश होकर भी यदि हम अमीरों एवं अथाह गरीबों के बीच विषमता की खाई को न पाट सके, तो इसे अपराध, भ्रष्टाचार तथा हिंसा को बढ़ने से नहीं रोका जा सकेगा। दक्षिण कोरिया, ताईवान, सिंगापुर, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, यूरोप, कनाडा और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे अन्य लोकतािन्त्रक देशों को देखें तो वहां भारत जैसी गरीबी और न ही धन का इतने बड़े पैमाने पर केंद्रीकरण ही देखने को मिलता है। ऐसा बहुत ही कम देखने को मिलता है, जब इन देशों में लोग अपने घरों में नौकर रखते हों, वे खुद ही खाना बनाते हैं, खुद ही कार ड्राईव करते हैं और यहां तक कि टॉयलेट भी खुद ही साफ करते हैं। यह कहने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि वर्ग विभेद भारत की तरह गहरा नहीं है। शायद इसीलिए इन देशों में भ्रष्टाचार, हिंसा और अपराधों में भी कमी देखने को मिलती है।
अंंबानी, बिरला, टाटा एवं अजीम प्रेमजी जैसे लोगों और गरीबी से ग्रस्त लोगों के बीच की विकराल विषमता को पाटना नििश्चत तौर पर हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। यह कैसे संभव हो सकेगा, मुझे नहीं मालूम, इस तथ्य के साथ कि हमारे पास शायद पर्याप्त भूमि न हो, जो भूमिहीनों को उपलब्ध कराई जा सके। लेकिन हम उनके लिए रोजगार तो पैदा कर ही सकते हैं, जिससे वे सम्मानपूर्वक जीवन-यापन के लिए पर्याप्त संसाधन जुटा सकें।
नव-उदारवादी विकास और शहरी-ग्रामीण आबादी में विषमता

टी. रविकुमार/रीडर, अर्थशास्त्र विभाग, किरोड़ीमल कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय
यद्यपि गत तीन वर्ष राष्ट्रीय आय में 8.5 प्रतिशत की औसत वृिद्ध दर के साक्षी रहे हैं, इस विकास दर की प्रकृति ने कई मुद्दों को खड़ा कर दिया है, जिसमें से एक है इसका क्षेत्रीय विस्तार। यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे उस क्षेत्र में होने वाले विकास और सुविधाओं में होने वाली बढ़ोत्तरी का आकलन हो जाता है और यह पता चल जाता है कि उस क्षेत्र में हो रही प्रगति, निवेश के अनुरूप है अथवा नहीं। वर्तमान समय में भारत ने नव-उदारवादी अर्थव्यवस्था के सिद्धांत को आत्मसात् कर लिया है। बाजार अपनी शक्ति के अनुरूप काम करे इसके लिए महत्वपूर्ण बात यह है, कि बाजार की गतिविधियों में सरकार का हस्तक्षेप कम से कम हो और इसके लिए सुधार तथा प्रयास दोनो जारी हैं। इस क्रम में सरकार ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विकास में कटौती के प्रयास चालू कर दिये हैं। जिसके संभावित दुष्परिणाम शहरी-ग्रामीण असमानता की बढ़ती खाई के रूप में सामने आ रहे हैं। शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्र में शुद्ध घरेलू उत्पाद के ताजा आंकड़ों को वषZ 1999-2000 से जोड़कर देखें तो चालू मूल्यों पर एनडीपी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में 775,601 करोड़ रुपये था, जो पूरे देश के कुल एनडीपी के आधे से भी कम था। ऐसे में 90 के दशक के उत्तरार्ध में अर्थव्यवस्था का शहरी हिस्सा एक तरह से पहले की अपेक्षा अधिक प्रबल होने लगा था। जबकि 1993-94 में इस तबके की हिस्सेदारी महज 46.3 प्रतिशत ही थी। लेकिन इतने पर भी ग्रामीण क्षेत्र आज भी अपनी तीन चौथाई आबादी के चलते महत्वपूर्ण बना हुआ था। इसी दौरान प्रति व्यक्ति शुद्ध घरेलू उत्पाद (एनडीपी) शहरों में 30,183 रुपये था, जबकि ग्रामीण क्षेत्र में यह 10,683 के स्तर पर था और ग्रामीण तथा शहरी स्तर पर एनडीपी का प्रति व्यक्ति अनुपात 0.35 था, जो दर्शाता है कि शहरी आबादी, ग्रामीणों की अपेक्षा करीब तिगुनी आय का उपभोग कर रही थी। 1993-94 से 1999 के दौरान एनण्डीण्पीण् में ग्रामीण अर्थव्यवस्था की हिस्सेदारी में 5.44 फीसदी गिरावट दर्ज की गई थी, जो दर्शाता है कि शहरी क्षेत्र में विकास की दर ग्रामीण क्षेत्रों से अपेक्षाकृत अधिक थी।
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