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Saturday, February 28, 2009

स्वरोजगारियों का गांव नगला धाकड़

उमाशंकर मिश्र/भरतपुर
भरतपुर जिले की वैर तहसील की इटामड़ा ग्राम पंचायत के गांव नगला-धाकड़ में रहने वाले धाकड़ जाति के लोगों की आजीविका का मुख्य आधार खेती और पशुपालन रहा है। लेकिन छोटी जोतें और उस पर अनुपजाऊ भूमि स्थानीय ग्रामीणों के जीवन की एक फांस बन चुकी थी और हालात भरण-पोषण के संकट तक पहुंच चुके थे। ऐसे में जीवन-यापन के साधन जुटाने के लिए स्थानीय लोगों में पलायन की प्रवृत्ति बढ़ रही थी। पलायन करने वालों में नगला के तीन ऐसे परिवार भी थे, जिन्हें जयपुर में नगीनों की पॉलिश का काम मिल गया। सुरेश चंद्र धाकड़ एवं उनके दो अन्य साथी इसमें शामिल थे। कुछ लोगों को आगरा एवं आसपास के अन्य इलाकों में भी काम मिल गया, लेकिन कमाई का अधिकांश हिस्सा वहां पर आवास, भोजन और आवागमन पर खर्च हो जाने से बचत नहीं हो पाती थी। स्थानीय स्तर पर संसाधनों की अनुपलब्धता के कारण तो आजीविका दूभर थी ही, लेकिन घर-बार छोड़कर जाने के बाद भी अपेक्षित लाभ नहीं हो रहा था। पलायन कर चुके हर व्यक्ति की तरह परदेस में रहते हुए नगला के लोगों के मन में भी ख्याल आते थे कि `यदि गांव में रहकर ही कोई काम मिल जाये तो परेशानियां हल हो जायेंगी, क्योंकि थोड़ी बहुत खेती-बाड़ी भी ऐसे में हो जाएगी।
गत दीपावली के दौरान सुरेश धाकड़ ने गांव में ही नगीना घिसाई मशीन व शेड बनाने का विचार गांव वालों के सम्मुख रखा। चर्चा हुई और ग्रामीणों की सहमती भी इस काम को लेकर बन गई। लेकिन इसके लिए संसाधन कैसे जुटाया जाये, यह गरीब ग्रामीणों के लिए इतना आसान नहीं था। नगीना घिसाई की मशीन व शेड बनाने हेतु लगभग 40-50 हजार रूपये की आवश्यकता थी। इस समस्या को कैसे हल किया जाये, इस बात को लेकर ग्रामीणों ने लुपिन ह्युमन वेलफेयर फांउडेशन के प्रतिनिधी से चर्चा की तो उसने लघु उद्योगों की स्थापना के लिए बैंकों से मिलने वाले ऋण के बारे में लोगों को जानकारी दी। यही नहीं लुपिन के प्रतिनिधियों ने ऋण के लिए आवेदन कराने से लेकर उद्यमों की स्थापना तक पूरा सहयोग नगला के नव-स्वरोजगारियों को दिया। इस तरह सुरेश को सिडबी की ओर से ऋण मिल गया और उसने अपनी छोटी से यूनिट नगला में ही आरंभ कर दी। जयपुर में काम करने वाले अन्य लोगों को जब नगला में हुए इस नए प्रयोग के बारे में पता चला तो उन्होंने भी लुपिन के प्रतिनिधियों से सहयोग की अपील की। इस तरह अन्य लोगों को भी स्थाीनय लोगों को ऋण दिला दिया गया। देखादेखी नगीना पॉलिश करने वाली स्वरोजगार इकाइयों की संख्या दिनो-दिन बढ़ने लगी।
अपने गांव में इस बदलाव से प्रभावित होकर आगरा में काम करने वाले लोग भी वापस अपने ही गांव में आ गये और संस्था के सहयोग से गांव में घुंघरू तथा पट्टा चैन की यूनिटे लगाई। इन लोगों को गांव में संचालित 6 महिला स्वयं तथा अन्य लोंगों को प्रशिक्षण केन्द्र के माध्यम से घुंघंरू व पट्टा चैन बनाने का प्रशिक्षण दिया गया। जिससे ये महिलाऐं उनकेे काम को सफलतापूर्वक निभाने लगी तथा उनके घर के पुरूष इनकीे मािर्कटिंग हेतु आगरा तथा आसपास के शहरों में जाने लगे। नगीना घिसाई के व्यवसाय के लिए गांव के अन्दर ही प्रशिक्षण केन्द्र प्रारम्भ किया गया, जिसमें गांव तथा आसपास के युवाओं को 3 महीने का गहन प्रशिक्षण दिया जाता है। इसके उपरान्त यहां से प्रशिक्षित लोग गांव में लगी हुई यूनिटों में तथा कुछ प्रशिक्षणार्थी अपनी इन स्वयं की यूनिटें लगाकर काम करने लगे।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने की दिशा में एक और कदम बढ़ाते हुए संस्था ने `लुपिन ग्राम विकास पंचायत´ का गठन किया गया है। गांव के लोग प्रतिनिधि चुनकर इस कमेटी का गठन करते हैंं, जो ग्रामीणों के ऋण प्रस्तावों पर विचार-विमर्श कर अनुमोदन के बाद स्वीकृत कर लुपिन, राष्ट्रीय महिला कोष तथा स्थानीय बैंकों से धन दिलाने में मदद करती है। इस तरह गांव में ही स्वरोजगार के साधन ग्रामीणों को उपलब्ध हो जाते हैं और वे इससे होने वाली आय से ऋण समय पर चुका देते हैं। गांव के सहायता समूह की महिलाएं आपस में स्वरोजगार की छोटी-मोटी आवश्यकताएं अपने समूह से ही ऋण लेकर पूरी कर लेती है। गांव के 26 अनुभवी तथा प्रशिक्षित लोगों को वहां के स्थानीय बैंक द्वारा उद्यमी कार्ड भी दिलवाया हुआ है। इसके तहत सदस्य 25000 तक का लेन-देन कभी कर सकते है। यह कार्ड सदस्यों की समय-समय पर आने वाली आवश्यकता जैसे मजदूरी भुगतान, कचचे माल का क्र्रय, डीजल क्रय आदि हेतु काफी काम आता है। वर्तमान में नगला धाकड़ गांव में नगीना पॉलिश की 42, घुंघरू की 14 तथा पट्टे चैन की 28 यूनिटें कार्य कर रही हैं, जिससे लगभग 1000 लोगों को सीधे तौर पर रोजगार मिल रहा है। यहां पुरूष नगीना पॉलिश तथा महिलाऐं घुंघरू के व्यवसाय में लगी हुई है। समय-समय पर संस्था का गांव के लोगों को स्वरोजगार के प्रति प्रोत्साहन महत्वपूर्ण रहा है। स्थानीय लोगों को प्रशिक्षित कर उनकी कला निखरने में संस्था की भूमिका एक उत्प्रेरक की रही है। आसपास के लोगो को आदर्श गांवों का भ्रमण कराकर उन्हें इसी प्रकार के कार्य की पुनरावृत्ति करने की प्रेरणा दे रही है।
सिलसिला शुरू हुआ तो कारवां बनता चला गया और इसका प्रभाव कुछ ही समय में नगला-धाकड़ में नज़र आने लगा। सिडबी के सहयोग से ग्रामीण उद्यमिता विकास कार्यक्रम केे तहत 450 लोगों को प्रायोगिक व सैद्धान्तिक प्रशिक्षण मिल जाने से लोगों में उद्यमीय कौशल में भी वृद्धि हुई है। आज नगला में विभिन्न व्यवसाय की 84 इकाइयां कार्यरत हैं, जिसमें लगभग एक हजार परिवारों के आर्थिक तथा सामाजिक विकास को प्रोत्साहन मिला है। चूल्हे चौके तक सिमट कर रहने वाली महिलाएं भी स्वरोजगार से जुड़कर गांव के विकास की मुख्यधारा में शामिल होने लगी हैं। यही नहीं आसपास के क्षे़़त्रों में सैकड़ों लोगों ने इस तरह के प्रयास के प्रारम्भ कर दिये हैं, जो एक सुखद बात कही जा सकती है। जीवन यापन की समस्या हल हो जाने के बाद स्थानीय ग्रामीणों का रूझान शिक्षा की तरफ अब बढ़ने लगा है। आधारभूत सुविधाओं के विकास के चलते गांव की छात्राएं अब उच्च शिक्षा हेतु जाने लगी हैं। हालांकि अब नगला धाकड़ आर्थिक समृद्धि की ओर अग्रसर है, परन्तु आज भी गांव के लोग व्यथित है कि यहां मात्र 6 से 8 घन्टे बिजली रहती है। जिससे प्रत्येक परिवार का लगभग 30 हजार रूपये का डीजल बिजली की वैकल्पिक व्यवस्था करने में खर्च हो जाता है। फिलहाल गांव के सभी लोग लुपिन के सहयोग से जिला प्रशासन से गांव को कस्बे के समान अधिक बिजली दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। गांव वालों की मानें तो बिजली की समस्या हल हो जाने से उनकी सारी मुिश्कलें हल हो जाएंगी और नगला-धाकड़ एक संपूर्ण आत्मनिर्भर गांव बनकर एक मिसाल कर पाने में समर्थ हो जाएगा।

Friday, February 27, 2009

आंचलिक पत्राकारिता की ताकत : खबर लहरिया

डॉ स्मिता मिश्र
किसी देश के समग्र विकास में जनसंचार माध्यमों की अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका होती है। भारत के सन्दर्भ में ये माध्यम और अधिक महत्वपूर्ण हो उठते है। हमारी दो-तिहाई मानवीय पूंजी ग्रामीण भारत से ही सम्बद्ध है, जो कि आज भी ज्ञान तथा सूचना से वंचित है। विडम्बना यह है कि सरकार उनके लिये जितनी योजनाएं तथा नीतियां बनाती हैं उनकी जानकारी उन तक ही नहीं पहुंच पाती। यदि पहुंचती भी है तो आधी अधूरी। गाँव में संचार-रिक्तता की स्थिति हैं। इसी प्रकार कृषि अनुसंधनों या योजनाओं के क्रियान्वयन की प्रतिपुष्टि भी यहां से नहीं जा पाती। होता यह है कि प्रतिपुष्टि के अभाव में महानगर में बैठे नीति-नियामकों को उसकी जानकारी नहीं मिल पाती और विकास प्रक्रिया की पूरी कवायद की सार्थकता पर प्रश्नचिंह लग जाता है। इस संचार रिक्तता को आंचलिक पत्राकारिता ही दूर कर सकती है। क्योंकि अंचलों से निकलने वाली पत्र-पत्रिकाएँ समाचार-पत्र उस क्षेत्र-विशेष की भाषा और जरूरत को समझते हैं तथा स्थानीय लोग भी ऐसे माध्यमों से जुड़ाव महसूस करते हैं।आज बड़े-बड़े नामों वाली बहुत चमक-ध्मक और ग्लैमर वाली पत्राकारिता का जोर है। ऐसे में मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे चित्राकूट जनपद के कर्वी गाँव से निकलने वाले अखबार `खबर-लहरिया´ की उपस्थिति आश्चर्य के रूप में सामने आती है। प्रतििष्ठत `चमेली देवी´ पुरस्कार से सम्मानित इस अखबार को जनपद की नौ नवसाक्षर महिलाओं ने लगभग चार साल पहले शुरू किया। हालांकि इससे जुड़ी महिलाओं के पास पत्राकारिता की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं है। यह अखबार महिला सशक्तीकरण का अद्भुत उदाहरण है। ऐसा सशक्तीकरण जो सरकारी योजनाओं के अन्तर्गत नहीं हुआ है बल्कि गाँव की पिछड़ी और दलित महिलाओं ने `निरन्तर´ ट्रस्ट द्वारा प्रेरित किये जाने पर अपने कंधें पर यह दायित्व लिया और उसे बखूबी पूरा कर रही हैं।आज बाजार, राजनीति, अपराध्, सिनेमा और क्रिकेट के ग्लैमर को ही तवज्जो देना पत्राकारिता का मुख्य लक्ष्य हो गया है। ऐसे में आम आदमी खासतौर पर गाँव या पिछड़े इलाके में रह रहे आदमी के विकास का मुद्दा पीछे छूटा जा रहा है। ऐसे समय में `खबर लहरिया´ जैसे आंचलिक समाचार-पत्रा आशा की किरण के रूप में सामने आते हैं। बुंदेली भाषा में प्रकाशित इस समाचार-पत्रा की संपादिका मीरा देवी संघर्ष के दिनों को याद करते हुए बताती हैं कि प्रारम्भ में संवाददाताओं (मिथिलेश, दुर्गा, सोनिया, शकीला, मीरा, कविता, शांति, मंजूद्ध को कोई भी सूचना या समाचार हासिल करने में बहुत समस्या आती थी। महिला होने के कारण लोग गम्भीरता से नहीं लेते थे। सरकारी महकमों के लोग परेशान करते थे। पिफर भी वे हिम्मत न हारते हुए जनपद की समस्याओं विकास की बाधओं और महिला मुद्दों को बहुत बेबाकी से प्रस्तुत करते रहीं जिसके पफलस्वरूप प्रतििष्ठत `चमेली देवी´ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। शाहिर सी बात है कि स्थानीय लोगों की आवाज उन्हीं की भाषा में जब इस अखबार ने उठाई तो वह अपनी सामान्यता में ही असामान्य हो गया। इतने कम समय में इस आठ पृष्ठीय अखबार ने कई उपलिब्ध्यां हासिल की। जैसे इस अखबार की संवाददाता मिथिलेश को हन्ना गाँव की सड़क बनवाने का श्रेय जाता है। हन्ना गाँव में सड़क कापफी पहले बन गई थी, लेकिन सिर्पफ सरकारी कागजों पर। मिथिलेश ने जब सारी छानबीन कर इसकी रिपोर्ट `खबर लहरिया´ में छापी तो जिला मैजिस्ट्रेट ने सारी जाँच कराई और कागजी सड़क को हकीकत में बदल दिया। इसी प्रकार सूचना के अिध्कार से ग्रामीणों के जीवन में सम्भावित परिवर्तनों को भी मीरा देवी ने अपने सम्पादकीय में लक्षित किया। तमाम सरकारी योजनाओं की घोषणा की खबरें समय-समय पर इस अखबार में छपती रहती है। और इन सूचनाओं को ही ताकत बनाकर गाँव का आदमी अपने हक की लड़ाई लड़ने लगा है। जैसे मुख्यमंत्राी योजना में गरीब राशनकार्डधरियों का सरकारी अस्पताल में मुफ्रत इलाज का प्रावधन रखा गया। जब यह सूचना अख़्ाबार ने छापी तो अनेक ग्रामीण राशनकार्ड लेकर अस्पताल में पहुंचे। डॉक्टरों ने कहा कि ऐसी कोई योजना नहीं है तो ग्रामीणों ने झट से कहा कि योजना है, हमने `खबर लहरिया´ में पढ़ा है।अखबार से जुड़ी सभी महिलाएं रोजाना अपने घरेलू काम-काज निपटाने के बाद सूचना एकत्राीकरण पर निकलती है। महीने में दो बार पूरे समूह की सभा होती है। जिसमें एकत्रा सूचनाओं की छंटनी होती है। पृष्ठों के आधर पर समाचार तय किये जाते हैं। पिफर समाचार-पत्रा का खाका बनता है। प्रथम पृष्ठ पर चित्राकूट या प्रदेश से सम्बंिध्त किसी महत्वपूर्ण समाचार को स्थान दिया जाता है। दूसरे पृष्ठ पर `देश-विदेश´ शीर्षक के अन्तर्गत देश-दुनिया की महत्वपूर्ण हलचलों पर भी नशर रखी जाती है। तीसरे पृष्ठ `विकास´ पर गाँव के विकास सम्बन्ध्ी मुद्दों को स्थान दिया जाता है। `महिला मुद्दा´ पृष्ठ पर महिलाओं की समस्याओं उनकी पीड़ा को अभिव्यक्ति दी जाती है। `पंचायत´ पृष्ठ पर सरकारी योजनाओं/नीतियों की सूचना, उनके क्रियान्वयन में की जा रही घपलेबाजी को उजागर किया जाता है। अंतिम पृष्ठ पर `सम्पादकीय´ तथा `पाठकों के पत्रा´ छापे जाते हैं।इस अखबार की संवाददाताओं को प्रशिक्षण देने के लिये समय-समय पर आयोजित कार्यशालाओं में भेजा जाता है। साथ ही इनकी राजनीतिक समझ विकसित करने के लिये `निरन्तर´ एन।जी.ओ., दिल्ली से विशेषज्ञ आते हैं। साथ ही राजनीतिक समाचारों द्वारा भी ये महिलाएं अपनी राजनीतिक समझ विकसित करती हैं। अखबार की बढ़ती लोकप्रियता के चलते सम्पादिका मीरा देवी इसका विस्तार करने की इच्छुक हैं। बांदा जिले से भी इसके प्रकाशन की योजना बन रही है। साथ ही इसे पाक्षिक से साप्ताहिक करने की भी योजना है ताकि अिध्क से अिध्क क्षेत्रा और अिध्क से अिध्क समाचारों को समाहित किया जा सकें।जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि आज की पत्राकारिता केवल अपराध् की सनसनीखेज पत्राकारिता बन कर रह गई है। बड़े अखबार सनसनी पैफलाने के ही काम में लगे हुए हैं। आदमी को आदमी से जोड़ने वाली खबरों की आजकल बेहद कमी है। इन आंचलिक अखबारों में ये ताकत है कि वे छूटी हुई खबरों को खबर बना सकते हैं क्योंकि आज का पाठक कूट घटनाओं का समाचार पढ़ देख कर ऊब गया है। खबर लहरिया में अक्सर आंचलिक प्रतिभाओं का `बातचीत´ कॉलम में इंटरव्यू लिया जाता है। जैसे जून 2006 अंक में बांदा जिले के बड़ोखर गाँव के जादूगर बुद्ध विलास से बातचीत की गयी। सम्पादकीय टिप्पणी में भी जिस तरह बेबाक शैली का प्रयोग किया जाता है वह शैली बड़े-बड़े अखबारों में द्रष्टव्य नहीं होती है। जैसे खबर लहरिया समूह कइती से सबहिन का नमस्ते। सरकार किसानन के विकास का िढंढोरा पीटत हवै अउर दूसर कइत किसानन के पेट मा लात मारत हवै। चित्राकूट जिला की ज्यादातर नहर सुखान परी हवै। ...सरकार आपन बड़ाई करत हवै। कहते हवै फ्या साल पूर देश मा बहुतै नीक पफसल भे हवै। यहै कारन सबै किसान खुशी हवै।य् इ बात मुलायम सिंह यादव कुरसी मा बइठे बइठे कहते हवै। का कतौ सरकार किसानन से उनके खुशी के बात पूछत हवै?इसी तरह `सूचना का अिध्कार´ कानून लागू होने पर प्रथम पृष्ठ का शीर्षक था µ `आ गा सूचना का अिध्कार´ अब मड़ई सरकारी आपिफस, सरकारी अस्पताल, ब्लॉक, पंचायत, पुलिस चौकी अउर दूसर सरकारी विभागन से सूचना लइ सकत हवैं। अब सरकारी अिध्कारी सूचना दे मा आनाकानी न करिहैं। काहे से सूचना न दे मा उनका जुर्माना दे का पड़ी।अखबार के नाम पर विचार करें तो पायेंगे कि `खबर लहरिया´ नाम द्योतक है समाचारों के अनवरत प्रवाह का। लहरिया कह देने से बुंदेलखंड की आंचलिक महक भर जाती है। एक ऐसा नाम जिसमें विज्ञापनों की भ्रामक दुनिया नहीं है, पेज-थ्री का ग्लैमर नहीं, एक दूसरे से मच रही अखबारों की गला काट प्रतियोगिता नहीं। जिसमें है तो हाशिये पर खड़े इंसान की आवाश, जिसमें है सदियों से दबी औरत की अभिव्यक्ति। इसलिये `खबर लहरिया´ नाम लेते ही अपने आसपास सुख-दु:ख बाँटने वाला कोई आत्मीय साथी ध्यान में आ जाता है। यही इसकी पहचान भी है और यही इसकी सार्थकता भी।
(डॉ स्मिता मिश्र दिल्ली विश्विद्यालय में व्याख्याता के तौर पर कार्यरत हैं और मीडिया और इससे जुड़े विषयों से से सीधा सरोकार रखती हैं। पत्रकारों की कई पीढियों को कलम पकड़ने की सीख दे चुकी स्मिता मिश्र की मिडिया पर कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। हाल ही में भारतेंदु हरिश्चद्र पुरस्कार से आपको नवाजा गया है। देश भर में भ्रमण कर ख़बर लहरिया जैसे ढेरों अनुभव बटोरे हैं स्मिता जी ने।)

Tuesday, February 24, 2009

स्लमडॉग के नाम पर ही भीख दे दो

जैसा कि आपका मालूम ही है कि स्लमडॉग को ऑस्कर प्राप्त हो गया है। परन्तु भिखारी भी स्लमडॉग कहकर भीख मांग रहे हैं। मामला दिल्ली का है। तुलसी जी एक प्रतिष्ठित पत्रिका से जुड़े हुए हैं और अच्छे नेट-फ्रेंड हैं। हाल ही में उन्होंने बड़ी ही विचित्र घटना सुनाई, जिसे सुनकर हतप्रभ होना स्वाभाविक ही था। घर से ऑफिस की तरफ़ जाते हुए सीलमपुर की लालबत्ती पर उन्होंने देखा कि कुछ भिखारी हमेशा की तरह अपने दैनिक शिडयुल में व्यस्त थे। लेकिन गौर करने वाली बात यह थी कि आज उनका तरीका एकदम नया और आकर्षक था। अब वे भिखारी अल्लाह, भगवान या फ़िर अपने नवजात बच्चे के नाम पर भीख मांगने कि बजाय "स्लमडॉग के नाम पर" जनता जनार्दन कि सहानुभूति हासिल करने में जुट गए हैं।

Sunday, February 22, 2009

अब हम घोषित स्लमडॉग हैं

स्लमडॉग को ऑस्कर मिला, जबकि निदेशक गैर भारतीय था. इससे पहले भी बेहतर फिल्में ऑस्कर के लिए गई है. लेकिन उनमे भारत की ताकत और पारम्परिक पहचान का प्रतीकात्मक चित्रण किया गया था. सवाल है कि मदर इंडिया और लगान जैसी फिल्में क्यों ऑस्कर नही प्राप्त कर सकी? कारण साफ़ है कि पाश्चात्य विकसित देशों ने भारत की उपलब्धियों और चिंतन को सदैव नजरअंदाज किया है. हालाँकि इसके पीछे उनका डर भी है की भारत कहीं उन्हें पछाड़ कर कहीं आगे न निकल जाए. हमने बेहतर फिल्म दी लेकिन ऑस्कर कभी नहीं मिला था, लेकिन आज जब किसी दूसरे देश के फिल्मकारों ने मुम्बई कि धारावी पर आधारित फ़िल्म के माध्यम से भारत की गरीबी पर फ़िल्म बनाकर पूरी दुनिया को यह बताने की कोशिश की कि यह देश अपनी उपलब्धियों से कहीं अधिक स्लमडॉग है, तो हमें ऑस्कर कि मार्फ़त पूरी दुनिया में प्रमाण पत्र मिल गया. अब हम घोषित तौर पर स्लमडॉग हैं. एकदम ''डर्टी और प्रमाणित स्लमडॉग मिलिनायर''. गौर करने वाली बात है कि हम करोड़पति भी तो हैं, लेकिन स्लम्स के मामले में, जनसँख्या में या फ़िर धन के मामले यह स्पष्ट नहीं किया गया है इस प्रमाणपत्र में. यह तो understood है. और इसी बात को स्थापित करने का प्रयास किया गया है कि भारत अब एक 'घोषित स्लमडॉग' है. लेकिन हम इस पर खुस हो रहे हैं कि हमें कुत्ता होने का अमेरिका ने अब सर्टिफिकेट दे दिया है. आप सब मित्रों कि प्रतिक्रिया आमंत्रित है....